Monday, 11 May 2015

‘राइट टू एजुकेशन एक्ट’ के स्थान पर नया ‘राइट टू क्वालिटी एजुकेशन फॉर ऑल एक्ट’ बनाये भारत सरकार

किसी भी देश का विकास उस देश के बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। भारत के संदर्भ में यह कहना गलत न होगा कि देश की कम गुणवत्ता वाली शिक्षा के कारण ही भारत ने आज उतनी प्रगति नहीं की, जितनी प्रगति अन्य देशों ने की। स्कूली शिक्षा के मामले में आज भारत चीन से 30 वर्ष पीछे है। भारत के माध्यमिक स्कूलों की जो नामांकन दर आज है वह चीन में आज से 30 वर्ष पूर्व हुआ करती थी। इसके साथ ही बच्चों के विद्वता प्रदर्शन के संदर्भ में भी भारत चीन से काफी पीछे है। इन्टरनेशनल पीसा स्टैन्डर्डराइज्ड एचीवमेंट टेस्ट 2009 में शामिल 74 देशों में चीन को जहां प्रथम स्थान मिला था वहीं भारत को 73वां स्थान मिला था। अतरू यह समय की मांग है कि अपनी शिक्षा पद्धति को विश्व स्तरीय बनाने के लिए भारत सरकार को श्राइट टू एजुकेशन्य की जगह नया श्राइट टू क्वालिटी एजुकेशन फार ऑल एक्ट्य बनाकर सारे देश में लागू करना होगा।  
स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए राइट टू एजुकेशन एक्ट (आरटीई) 2009 में 3 बड़े तरीके को अपनाया गया है। पहला, निजी स्कूलों की मान्यता के लिए बुनियादी ढांचे और अन्य निर्धारित मानक को पूरा करना (धारा 19), दूसरा, सभी निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्लूएस) के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीट आरक्षित करना (धारा 12) तथा तीसरा, सरकारी स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता को तय करना व कक्षा में छात्र-शिक्षक अनुपात को कम करते हुए अधिकतम अनुपात 30रू1 निर्धारित करना। पर व्यवहारिक रूप में शिक्षा में गुणवत्ता लाने के ये तरीके जहां एक ओर अप्रमाणिक हैं वहीं दूसरी ओर दोषपूर्ण भी लगते हैं। इस सम्बन्ध में ऐरिक हानुशेक द्वारा किये गये अध्ययन को देखा जा सकता है जिसमें 400 अध्ययनों के आधार पर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि छात्र-शिक्षक अनुपात को कम करने, अध्यापकों की योग्यताओं को बढ़ाने व स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाने का छात्रों की पढ़ाई-लिखाई से कोई सुसंगत सम्बन्ध नहीं है। 
इसके साथ ही राइट टू एजुकेशन की धारा 12 व 19 में शिक्षा में गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए किये गये प्रावधानों को लागू करने में राज्य सरकारों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा है। उन राज्यों में जहां पर शिक्षा के लिए उत्तरदायी संस्थाओं के द्वारा आरटीआई एक्ट में निजी स्कूलों की मान्यता के संबंध में दिये गये निर्धारित मानकों (स्कूल के कमरों के आकार, छात्र-शिक्षक अनुपात, फर्नीचर, स्वयं का भवन होने की अनिवार्यता, पंजीकृत संस्था होना, लाभ के बिना स्कूल को चलाने आदि) का अनुपालन कठोरता के साथ किया गया। इसके चलते बहुत कम फीस लेने वाले निजी स्कूलों के इन मानकों को पूरा न कर पाने की स्थिति में बड़ी संख्या में बंद करने के आदेश दिये गये, लेकिन इन आदेशों को कई कानूनी चुनौतियों और अदालत के स्थगन आदेश का सामना करना पड़ा है। सरकारी स्कूलों का एक बड़ा अनुपात स्वयं ही शिक्षा अधिकार अधिनियम के भौतिक बुनियादी ढांचों के नियमों पर खरा नहीं उतरता। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कुछ राज्य सरकारों (गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र) ने स्कूलों की मान्यता संबंधी मानक में, भौतिक बुनियादी ढांचों के मानदंडों के अनुपालन की अनिवार्यता के साथ ही, छात्रों के विद्वता प्रदर्शन स्तर को भी एक महत्वपूर्ण मानक मे रूप में शामिल किया है। 
इसके अलावा, भारत में बेसिक शिक्षा प्रदान करने में सरकार निजी स्कूलों पर काफी निर्भर है क्योंकि निजी स्कूल भारत के ग्रामीण इलाकों के 31 प्रतिशत (उत्तर प्रदेश में 52 प्रतिशत, हरियाणा में 54 प्रतिशत और केरल में 62 प्रतिशत) और कई अन्य राज्यों में 90 प्रतिशत या उसके ऊपर शहरी बच्चों को शिक्षा दे रहें हैं। इन परिस्थितियों में शिक्षा अधिकार अधिनियम के मान्यता संबंधी मानकों को पूरा करने में असमर्थ रहने पर यदि कई निजी स्कूलों को बंद कर दिया गया तो सरकारी स्कूलों की सीटों को बढ़ाने में अत्यधिक वित्तीय बोझ (जहां पर प्रत्येक छात्र पर 20 गुना अधिक खर्च किया जाता है, क्योंकि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को ग्रामीण क्षेत्रों के निजी स्कूलों की तुलना में 20 गुना ज्यादा वेतन मिलता है) को सहन करना असम्भव हो जायेगा। इसलिए मेरा सुझाव है कि गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र की तरह एक संशोधित शिक्षा अधिकार अधिनियम को लागू किया जाये, जिसमें स्कूलों की मान्यता के लिए निर्धारित मानक के अन्तर्गत शिक्षा की गुणवत्ता व स्कूल के छात्रों के विद्वता प्रदर्शन पर सबसे अधिक महत्व देना चाहिए।
राइट टू एजुकेशन एक्ट की धारा 12 कहती है कि राज्य निजी स्कूलों के खर्च की भरपाई इस प्रकार करेगारू (अ) स्कूल की वास्तविक फीस या (ब) सरकारी स्कूल के प्रति छात्र खर्च, इन दोनों में से जो भी कम हो। हम इस धारा के साथ सरकार को होने वाली परेशानी को समझने के लिए उत्तर प्रदेश का उदाहरण ले सकते हैं। उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूल के प्रत्येक छात्र पर 450 रूपये का खर्च अनुमानित किया गया है। (हालांकि कुछ अनुमानों के अनुसार यह 2000 रूपये प्रतिमाह है)। इसके विपरीत ग्रामीण क्षेत्रों के निजी स्कूलों की औसत फीस 90 रूपये प्रतिमाह होती है जो कि सरकारी स्कूलों के प्रत्येक बच्चे के खर्च के लिए अनुमानित 450 रूपये का 1ध्5वां भाग ही है। इस पांच गुणा अंतर की वजह से कम फीस लेने वाले प्राइवेट स्कूल जोकि उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में है, को यह प्रलोभन देते हैं कि वे बढ़ा-चढ़ा कर फीस बताये या बढ़ा-चढ़ाकर दाखिला दिलायें। कागज पर नये प्राइवेट स्कूल दिखायें या 25 प्रतिशत से अधिक आर्थिक रुप से कमजोर बच्चे ले लें। भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले इस तरह के प्रलोभन की वजह से सरकार को निजी स्कूल की भरपाई हेतु सरकारी बजट की व्यवस्था करने में कठिनाई आती है।
शहर के अधिक फीस लेने वाले निजी स्कूलों की असंतुष्टता एक मुख्य कारण यह है कि प्रतिपूर्ति की अधिकतम सीमा (शहर के उच्च फीस वाले निजी स्कूल के लिए) बहुत कम है, जो कि उत्तर प्रदेश में प्रतिमाह 450 रूपये, उत्तराखण्ड में 860 रूपये, दिल्ली में 1190 रूपये निर्धारित है। सरकार को चाहिए कि प्रत्येक बच्चे पर आने वाले इस खर्च को निर्धारित करने के लिए पारदर्शी गणना करें। कुछ अनुमानों के अनुसार उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों के प्रत्येक प्राइमरी बच्चे पर खर्च 2000 रूपये व उच्च प्राथमिक के प्रत्येक बच्चे पर 2500 रूपये का खर्च अनुमानित है। निजी स्कूलों को इस बात का भी भय होता है कि उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर 25 प्रतिशत बच्चों के लिए स्कूल की वर्दी, किताबें, स्टेशनरी, कम्प्यूटर, शैक्षिक यात्रा व फर्नीचर आदि की व्यवस्था पर भी अतिरिक्त खर्च वहन करना पड़ेगा। इसके साथ ही एक अन्य कारण के रूप में प्रतिपूर्ति की कठिन प्रक्रिया से भ्रष्ट्राचार व देर से भुगतान मिलने की सम्भावना है। उन राज्यों में जहां धारा 12 को लागू हुए 2-3 वर्ष हो चुके है और वहां देर से प्रतिपूर्ति करने पर पीडि़त निजी स्कूलों को जुर्माने के रूप में अतिरिक्त भुगतान की कोई व्यवस्था नहीं है, निजी स्कूल और भी अधिक डरे हुए हैं। 
निष्कषर्रू
श्राइट टू एजुकेशन एक्ट्य जो कि सभी को एक समान श्गुणवत्तापूर्ण शिक्षा्य का अवसर नहीं प्रदान करता है, को एक नये श्राइट टू क्वालिटी एजुकेशन फॅार ऑल्य (सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार अधिनियम) से विस्थापित कर दिया जाये। यह कहाँ का न्याय होगा कि हम आर्थिक रूप से कमजोर केवल 25 प्रतिशत बच्चों को ही निजी स्कूलों में दाखिला दिलाकर उन्हें गुणात्मक शिक्षा प्रदान करने का अवसर प्रदान करें? वास्तव में यह हमारे संविधान के अनुच्छेद 21(ए) की मूल भावना के भी विपरीत होगा। इसलिए सरकार को चाहिए कि वे आर्थिक रूप से कमजोर 25 प्रतिशत बच्चों की पढ़ाई के लिए निजी स्कूलों को प्रतिपूर्ति के रूप में दी जाने वाली धनराशि को देने की बजाय उस धनराशि का उपयोग भारत के कोने-कोने में सरकारी स्कूलों की स्थापना एवं शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने में करे। इससे केवल 25 प्रतिशत भाग्यशाली बच्चों के स्थान पर 100 प्रतिशत बच्चों को अपना भाग्य बनाने का एक समान अवसर प्राप्त होगा। इसके लिए सरकार को गाँवों के साथ ही शहरों में भी सरकारी स्कूलों की संख्या को बढ़ाते हुए उसमें गुणात्मक शिक्षा देने की व्यवस्था सुनिश्चित करना होगा। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता को सुधारने का मतलब यह नहीं है कि केवल भौतिक सुविधाओं की उपलब्धि हो (जैसा कि आर.टी.आई. एक्ट में बताया गया है) बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि शिक्षक की योग्यता के साथ ही बच्चों के विद्वता प्रदर्शन के प्रति भी उनकी जबावदेही तय हो। इसलिए आज हमें एक ऐसे एक्ट की आवश्यकता है जो कि स्कूलों की गुणवत्ता को बढ़ाने पर केन्द्रित हो। जिसके अन्तर्गत यह सुनिश्चित किया जाये कि अच्छा वेतन पाने वाले सरकारी शिक्षक नियमित रुप से स्कूल आये, अपने शैक्षिक कार्य को पूरा समय दे, बच्चों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए सर्वश्रेष्ठ कदम उठाये, जिससे बच्चों की शैक्षिक विद्वता के अच्छे परिणाम सामने आये व भारत की युवा पीढ़ी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में और भी अधिक सक्षम बनें।
- प्रोफेसर गीता किंग्डन, 
चेयर ऑफ एजुकेशन इकोनोमिक्स एण्ड इन्टरनेशनल डेवलपमेन्ट, 
यू.सी.एल. इन्स्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन, यूनिवर्सिटी ऑफ लन्दन

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