Monday, 18 May 2015

कृष्ण भक्त भी और भगवान भी

कृष्ण भक्त हैं, और भगवान भी हैं। और जो भी भक्ति में प्रवेश करेगा, वह भक्तसे शुरू होगा और भगवान पर पूरा हो जाएगा
इस संबंध में थोड़ी सी बात पीछे हुई है, लेकिन हमें समझ में नहीं आती है, इसलिए फिर दूसरी तरह से लौट आती है। मैंने प्रार्थना के संबंध में जो कहा, वह थोड़ा खयाल में लेंगे तो समझ में आ जाएगा। जैसा मैंने कहा कि प्रेयर नहीं, प्रेयरफुलनेस। ऐसा भक्ति का मतलब किसी की भक्ति नहीं होती, भक्ति का मतलब है, डिवोशनल एटिटयूड। भक्ति का मतलब है, भक्त का भाव। उसके लिए भगवान होना जरूरी नहीं है। भक्ति भगवान के बिना हो सकती है, ऐसा नहीं, भक्ति के कारण भगवान दिखाई पडना शुरू हुआ है। जिन लोगों का हृदय भक्ति से भरा है, उन्हें यह जगत भगवान हो जाता है। जिनका हृदय भक्ति से नहीं भरा है, वे पूछते हैं--भगवान कहां है? वे पूछेंगे। और उन्हें बताया नहीं जा सकता, क्योंकि वह भक्त के हृदय से देखा गया जगत है। वह भक्त के मार्ग से देखा गया जगत है।
जगत भगवान नहीं है, भक्तिपूर्ण ह्रदय जगत को भगवान की तरह देख पाता है। जगत पत्थर भी नहीं है, पत्थर की तरह हृदय जगत को पत्थर की तरह देख पाता है। जगत में जो हम देख रहे हैं, वह प्रोजेक्शन है, वह हमारे भीतर जो है उसका प्रतिफलन है। जगत में वही दिखाई पड़ता है, जो हम हैं। अगर भीतर भक्ति का भाव गहरा हुआ, तो जगत भगवान हो जाता है। फिर ऐसा नहीं है कि भगवान कहीं बैठा होता है किसी मंदिर मेंय फिर जो होता है वह भगवान ही होता है।
कृष्ण भक्त हैं, और भगवान भी हैं। और जो भी भक्ति में प्रवेश करेगा, वह भक्त से शुरू होगा और भगवान पर पूरा हो जाएगा। एक दिन जब वह बाहर भगवान को देख लेगा, तो उसने खुद ऐसा क्या कसूर किया है कि उसे भीतर भगवान नहीं दिखाई पड़ेंगे! भक्त शुरू होता है भक्त की तरह, पूरा होता है भगवान की तरह। यात्रा शुरू करता है जगत को देखने की देखता है उसे जो जगत में है। भक्तिपूर्ण हृदय से, डिवोशनल माइंड से, प्रेयरफुल, भक्तिपूर्ण, भावपूर्ण, प्रार्थनापूर्ण मन से देखता है जगत को। फिर धीरे-धीरे अपने को भी उसी तरह देख पाता है, कोई उपाय नहीं रह जाता। फिर ऐसा भी हो जाता है, जैसा रामकृष्ण को एक बार हुआ। बहुत मजे की घटना है।
रामकृष्ण को एक मंदिर में पुरोहित की तरह रखा गया था, दक्षिणेशवर में। बहुत सस्ती नौकरी थी। शायद सोलह रूपये महीने की नौकरी थी। पुजारी की तरह रखा था उनको। लेकिन दस-पांच दिन में ही तकलीफ शुरू हो गई, क्योंकि ट्रस्टियों को खबर मिली कि यह आदमी तो ठीक नहीं मालूम होता। भगवान को जो भोग लगाता है, पहले खुद चख लेता है। और भगवान पर जो फूल चढ़ाता है, सूंघ लेता है। तो छिपकर ट्रस्टियों ने आकर देखा मंदिर में कि मामला क्या है? देखा कि बड़े भाव से रामकृष्ण नाचते हुए भीतर आए, भोग पहले खुद को लगाया, फिर भगवान को लगायाय फूल पहले सूंघे, फिर भगवान को सुंघाए। ट्रस्टियों ने उनको पकड़ लिया और कहा, यह क्या कर रहे हो? यह कोई ढंग है भक्ति का? रामकृष्ण ने कहा, भक्ति का ढंग होता है, यह कभी सुना नहीं। भक्त देखे हैं, भक्त सुने हैं, भक्ति का कोई ढंग होता है? कोई ढांचा, कोई डिसिप्लिन होती है? उन्होंने कहा, निकाल बाहर करेंगे! कहीं सूंघा हुआ फूल भगवान को चढ़ाया जा सकता है? रामकृष्ण ने कहा, बिना सूंघे चढ़ा कैसे सकता हूं? पता नहीं सुगंध हो भी या न हो! ट्रस्टियों ने कहा, बिना भगवान को प्रसाद लगाए तुम खुद कैसे खा लेते हो? रामकृष्ण ने कहा, मेरी मां मुझे खिलाती थी तो पहले चख लेती थी। मैं बिना चखे नहीं चढ़ा सकता। नौकरी तुम सम्हालो। अन्यथा मुझे यहां रखना है, तो मैं चखूगां, फिर चढ़ाऊंगा। पता नहीं खाने योग्य हो भी या न हो!
अब यह जो आदमी है, यह आदमी बाहर ही भगवान को कैसे देख पाएगा? बहुत जल्दी वह वक्त आ जाएगा, यह कहेगा कि भीतर भी भगवान है। तो भक्त से तो शुरु होती है यात्रा, भगवान पर पूरी होती है। ऐसा नहीं है कि बाहर कहीं किसी भगवान पर पूरी होती है, अंततरू सारी दुनिया की यात्रा करके हम अपने पर लौट आते हैं और पाते हैंरू जिसे हम खोजने गए थे वह घर में बैठा हुआ है।
कृष्ण दोनों हैं। तुम दोनों हो, सभी दोनों हैं। लेकिन भगवान से शुरू नहीं कर सकते हो तुम। भक्त से ही शुरु करना पड़ेगा। क्योंकि अगर तुमने यह कहा कि मैं भगवान हूं, तो खतरा है। ऐसे कई लोग खतरा पैदा करते हैं, जो भगवान की घोषणा तो कर देते हैं, तब ऐसे लोग अहंकेंद्रित होकर, इगोसेट्रिक होकर दूसरों को भक्त बनाने की कोशिश में लग जाते हैं। क्योंकि उनके भगवान के लिए भक्तों की जरूरत है। पर वे दूसरें में भगवान नहीं देख पाते। अपने में भगवान देखते हैं, दूसरे में भक्त देखते हैं। ऐसे गुरुडम के बहुत घेरे हैं सारी दुनिया में। यात्रा शुरु करनी पड़ेगी भक्ति से।
अब कृष्ण को भगवान माना जा सकता है, क्योंकि यह आदमी घोड़े तक की भक्ति कर सकता है। सांझ का जब घोड़े थक जाते हैं तो उन्हें ले जाता है नदी पर स्नान कराने।
 उनको नहलाता है, उनको खुरे से साफ करता है। यह आदमी भगवान होने की हैसियत रखता है। क्योंकि घोड़े को भी भगवान की तरह स्नान करवा सकता है। इस आदमी से डर नहीं है, इससे खतरा नहीं है। यह अगर भगवान की अकड़ वाला आदमी होता तो सारथी की जगह बैठ नहीं सकता। अर्जुन से कहता, बैठो नीचे, बैठने दो ऊपर! रहा मैं भगवान, तुम हो भक्त! भगवान बैठेंगे रथ में, भक्त चलाएगा।
जो अपने को भगवान घोषित करते हैं, जरा उन्हें तख्त के नीचे बिठाल कर आप तख्त पर बैठ कर देखिए, तब पता चलेगा!
भक्त से शुरु होगी यात्रा, भगवान पर पूरी होती है।

Thursday, 14 May 2015

अब हमें विकसित होना हैं । विकास के लिए अपना समर्थन दें ।

ग़ांधी जी ने विदेशी शासको से असहयोग आंदोलन और अपनों के साथ सहयोग अभियान चलाया। हमें भी आज सहयोग अभियान की आवश्यकता है विरोध  से होने वाली हानि रोककर सम्पन्नता एवं समृद्धि की दिशा में बढ़े।
- प्रजातंत्र  है। जनता शासक है। जनप्रतिनिधियों का शासन चलाने हेतु चयन किया गया है अपने सभी जनप्रतिनिधियों का प्रत्येक माह मूल्यांकन करें। उन्हें मार्गदर्शन दें। और अपनी अभिव्यक्ति एवं सम्भावनाये हमें भेजें हम श्रम शिखर में प्रकाशित करेंगे, आप अपना विडिओ भी भेज सकते है।
श्रम शिखर के सदस्य बने सदस्यता राशी २५०/- वार्षिक
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A/c Name:  SHRAM SHIKHAR
A/C NO. :  3155197714
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BRANCH:  Ahiran East Hapur Road Meerut City
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कल्याणं करोति का नेत्र शिविर

स्याल चैरिटेबिल फाउण्डेशन ट्रस्ट मेरठ, श्री वाई.पी. कौशल, कल्याणं करोति मेरठ (पंजीकृत) एवं जिला दृष्टिड्हीनता निवारण समिति (बागपत)  के संयुक्त तत्वाधान में लैन्स की सुविधा के साथ निरूशुल्क नेत्र चिकित्सा शिविर का आयोजन महावीर सिंह पूर्व प्रधान का निवास, ग्राम- दरकावदा, ब्लाक बिनौली, (बागपत) के प्रांगण में आयोजित किया गया। जिसमें १४२ नेत्र रोगियों की जांच अभिषेक गुप्ता द्वारा की गयी, सभी नेत्र रोगियों का निरूशुल्क दवाईयां वितरित करके १५ को मोतियाबिन्द के आपरेशन हेतु चयन किया गया। सभी नेत्र रोगियों को मोतियाबिन्द के आपरेशन हेतु कल्याणं करोति, मेरठ द्वारा संचालित निरूशुल्क चिकित्सालय कैन्टोनमैन्ट जनरल अस्पताल, मेरठ छावनी में लाया गया। 
सभी ऑपरेशन डा0 सतीश नागर एवं डा0 पी0पी0 मित्तल द्वारा किये गये। चश्में के लिए २० नेत्र रोगियों की जांच श्री अभिषेक गुप्ता द्वारा की गयी और ११ को रियायती दर पर चश्में उपलब्ध कराने का निर्णय लिया गया। शिविर को सफल बनाने हेतु सर्व श्रीमतीध्श्री डी.के. अग्रवाल, ईश्वरचन्द गुप्ता, रामपाल सिंह, बिजेन्द्र उर्फ विनय, दिलबाग सिंह, महिपाल सिंह, मीता एवं विजय आदि ने विशेष योगदान दिया।
कैन्टोनमैन्ट जनरल अस्पताल, बेगमपुल, मेरठ   पिन-२५०००१
फोन रू (का0) ०१२१-२६६४७२२, (अध्यक्ष) ९४१२२०६२१०, (महामंत्री) ९४५६८३८४५६ 

ओशो सत्संग और मेडिटेशन

स्कूल ऑफ लाइफ् गोमती धारा आत्मदर्शन की स्थिति कुंज बिहार में कार्यक्रम मैं प्रोफेसर वाचपति जी ने दीप जलाया कार्यक्रम शुभारम्भ हुआ।
ओशो का प्रवचन गीता दर्शन पर हुआ परिणाम की फिकर मत कर अर्जुन तू कर्म कर यही तेरा धर्म है। कृष्ण अर्जुन तू कर्म कर यही तेरा धर्म है। कृष्ण अर्जुन का समझाते हुए कहते जो व्यक्ति अकत्र्ता होकर कार्य करता है। वह कर्म अकर्म बन जाते है। फिर वह साधक अकत्र्ता बन जाता है।
स्वामी आत्मोकमरान ने कुण्डलिनी जागरण एक घण्टे का ध्यान कराया और अन्तर स्नान का अनुभव कराये। सभी मित्रो ने सहयोग दिया। रामानन्द जी, शिवकुमार, वन्दना, मोनिका, सत्यवीर जी आदि कार्यक्रम में उपस्थित रहे।
सदड्ढ्भावना समिति (पंजी.) स्वामी आत्मो कामरान 8057982656, 8273548730

स्वामी की सोच को किया सार्थक

पिछली सदी के आठवें दशक में स्वामी चिन्मयानंद ने कांगड़ा जिले के दो हजार गांवों में गरीबी मिटाने का संकल्प लिया। इसे पूरा करने के लिए उन्होंने स्वयसेवी संस्था कार्ड (चिन्मय आर्गेनाइटेशन ऑफ रूरल डेवलपमेंट) का गठन किया। इसे चलाने के लिए उन्हें एक ऐसे नेतृत्व की तलाश थी जो उनकी सोच को अजाम तक पहुंचा सके। उनकी इस सोच को डॉ. क्षमा मेत्रेय ने साकार किया।
डॉ. क्षमा मेत्रेय नई दिल्ली के मोलाना अबुल कलाम आजाद मेडिकल कॉलेज में बाल रोग विशेषज्ञ का पद छोड़कर कार्ड की राष्टड्ढ्रीय अध्यक्ष बनीं। १९८५ में संस्था की बागडोर संभाली और कुछ महिलाओं को सिलाई मशीनें बांटकर उन्हें आत्मनिर्भर करने का प्रयास शुरू किया। आज सस्था नौ सो गांवों में साक्षरता, स्वरोजगार व स्वास्थ्य से संबंधित सेवाएं प्रदान कर रही है। वह खुद वर्ष भर में करीब २० हजार रोगियों को चिकित्सा प्रदान करती है। इन्होंने १४ हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार के साधन से जोड़ा। विधिक साक्षरता में भी संस्था अहम योगदान दे रही है। करीब ८२७ मामलों में से ६१३ सुलझाए। पर्यावरण संरक्षण में भी संस्था अहम कार्य कर रही है। ६९५ गांवों में करीब २० हजार शौचालयों का निर्माण करवाया है।
महिला दिवस को सार्थक रूप तभी दिया जा सकता है, जब पुरुष भी महिलों का सम्मान करें। सबसे पहले महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना को उजागर करना होगा। लिंग भेदभाव को समाप्त करने के लिए महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों को भी आगे आना होगा।

Monday, 11 May 2015

साईकिल ट्रैक उद्देश्यपूरक

उ0प्र0 के मुख्यमन्त्री की महत्वाकांक्षी श्साईकिल ट्रैक्य योजना प्रदेश के बड़े महानगरों में सकारात्मक हो चली है। पश्चिमी उ0प्र0 में मेरठ के बाद गाजियाबाद में भी इस के स्थान नियत होने के अलावा टेण्डर प्रक्रिया आदि के साथ बजट आवटन प्रक्रिया भी हो गई है। इस योजना को गरीब की सवारी व स्वास्थ्य की दृष्टिड्ढगत उच्चतम न्यायालय के सख्त रुख के बाद ट्रैक की व्यवस्था को राज्य सरकारों को अपनाना पड़ा। सड़क बनाकर गतिवान वाहनों की बढ़ती भीड़ ने साईकिल व पैदल चालकों के लिए समस्या बना डाली थी।
मेरठ मे सीताराम हॉस्टल मेरठ से मंगल पाण्डे नगर तक नियत किया गया है। साईकिल ट्रैक वहां गाजियाबाद में इसका स्थान हापुड़ चुंगी से विवेकानंद नगर तक प्रथम चरण शुरु हो चुका है। दूसरे चरण का नया गाजियाबाद आर ओबी से गोविन्दपुरम का भी निर्मित हो चुका है। पूरे प्रोजेक्ट पर ९ करोड़ प्राधिकरण खर्च कर रहा है। तीसरे ट्रैक पर विचार हो रहा है। यह एएलटी पलाई ओवर ब्रिज से हापुड़ चुंगी तक का है।
साईकिल ट्रैक पर आम जन यानि की दुपहिया साईकिल चालकों से जब बात की तो वह इस ट्रैक व्यवस्था से खुश नही थे। इनका कहना था कि हमे ट्रैक की उपलब्धता तो तब भी नही होगी। इन ट्रैकों पर अपेक्षा अनुरुप साईकिलिंग किया जाना संभव होगा इसमें संशय है। सड़कों के किनारे व अन्य पगडंडियों पर जिस तरह चलना दुष्कर है बड़े वाहनों के खड़े रहने या चलने के प्रयास अथवा इन पर अतिक्रमण कर कारोबार होते है उसे देखकर नही लगता की यह ट्रैक जिस लक्ष्य को लेकर बन रहे है। उनसे जनता को सुविधा मिलेगी। यह जरुर है कि प्रदेश की सरकार जिसका चुनाव चिन्ह ही साईकिल है अथवा लाभ की अपेक्षा करती हो।
साईकिल निर्माता जिन्होने अब साईकिल बनाना बंद कर दिया था या बंद करने में लगे थी वापस चेहरे पर मुस्कान ला बैठे। साईकिल मरम्मत के लगे लोग भी पुनरू इस कार्य में रुचि लेने लगे है। 
साईकिल ट्रैक प्रतीकात्मक न बने रहे
वरिष्ठ नागरिक कल्यान समिति अध्यक्ष ईआरएस गुप्ता का कहना था कि जिस शो शराबे के तहद बड़े शहरों में इक्का दुक्का साईकिल ट्रैक बन रहे है या बनाने का प्रस्ताव है इससे लोगो का स्वास्थ्य नही सुधरने वाला है। इस तरह यह प्रतीकात्मक रह जायेगे। जरुरत है सड़कों के किनारे दो और जो पटरी छोडी जाती है उसे साईकिल ट्रैक संरक्षित कर उस पर अतिक्रमण रोक कर इसके दुरुपयोग का रोका जाएं। 
साईकिल ट्रैंक तो हो गया पदैल चलने की राह भी तो
साईकिल ट्रैक पर उ0प्र0 सरकार द्वारा जिस तरह की कर्मठता का प्रदर्शन दिखाया जा रहा है। इसके बाद पैदल चलने वालों जिनमें वरिष्ठ नागरिक व महिला और बच्चों ने जिज्ञासा जाहिर की है की पैदल सड़क किनारे चलना या फिर साईकिल ट्रैक की तरह स्वास्थय बनाने हेतु घुमने की राह के लिए भी इस तरह प्रदेश सरकार सोचेगी और उपलब्ध करायेगी। आज सड़कों व अन्य रास्तों पर पदैल चलने वालों के साथ भी साईकिल चालकों से कम दुघर्टना नही होती है।
       -अतिथि सम्पादक निष्ठा अग्रवाल

मन मोह लेता है ‘मनीप्लांट’

मनीप्लांट के पौधे लगभग सभी घरों में लगाए जाते हैं। यह क्यारियों, गमलों, डिब्बों आदि में लगाया जा सकता है। बहुत से लोगों का मानना है कि मनीप्लांट का पौधा घर में लगाने से सुख-समृद्धि भी आती है। मनीप्लांट को छांव वाले स्थान पर लगाना चाहिए। समय-समय पर इसकी सूखी शाखाओं और पत्तियों की काट-छांट करते रहना चाहिए। इससे पौधे की सुंदरता और निखर जाती है। अगर मनीप्लांट गमलों में लगे हैं तो साल-डेढ़ साल के अंतराल पर इन्हें दूसरे गमलों में लगा देना चाहिए।
मनीप्लांट के पौधों को समय.समय पर गोबर की खाद व नई मिट्टी देते रहना चाहिए। दो-तीन महीने के अंतराल पर इसके पौधों में चुटकीभर डीएपी व यूरिया खाद डालने से पत्तियां हरी बनी रहती हैं। इसकी पत्तियों के आकार-प्रकार एवं रंग के आधार पर मनीप्लांट को कई भागों में विभाजित किया गया है। इसकी कुछ प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं।
गोल्डन पोथो- हल्के पीले धब्बों युक्त पत्तियों वाली यह प्रजाति काफी लोकप्रिय है। दरवाजे के आसपास लटकती इसकी पत्तियां सबका मन मोह लेती हैं।
मार्बल क्वीन- इसकी पत्तियां सुंदर, सफेद संगमरमरी रंग एवं हल्के हरे धब्बों वाली होती हैं।
मेक्रोफिला- मनीप्लांट की यह काफी लोकप्रिय किस्म है। इसकी पत्तियां बड़े आकार की और पीले धब्बों वाली होती हैं।
ग्रीन ब्यूटी- इसकी पत्तियां चिकनी हरे रंग की होती हैं।
सिल्वर मून- इसका यह नाम इसकी चमकीली क्रीम रंग की आकर्षक धब्बों वाली पत्तियों के कारण पड़ा।

‘राइट टू एजुकेशन एक्ट’ के स्थान पर नया ‘राइट टू क्वालिटी एजुकेशन फॉर ऑल एक्ट’ बनाये भारत सरकार

किसी भी देश का विकास उस देश के बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। भारत के संदर्भ में यह कहना गलत न होगा कि देश की कम गुणवत्ता वाली शिक्षा के कारण ही भारत ने आज उतनी प्रगति नहीं की, जितनी प्रगति अन्य देशों ने की। स्कूली शिक्षा के मामले में आज भारत चीन से 30 वर्ष पीछे है। भारत के माध्यमिक स्कूलों की जो नामांकन दर आज है वह चीन में आज से 30 वर्ष पूर्व हुआ करती थी। इसके साथ ही बच्चों के विद्वता प्रदर्शन के संदर्भ में भी भारत चीन से काफी पीछे है। इन्टरनेशनल पीसा स्टैन्डर्डराइज्ड एचीवमेंट टेस्ट 2009 में शामिल 74 देशों में चीन को जहां प्रथम स्थान मिला था वहीं भारत को 73वां स्थान मिला था। अतरू यह समय की मांग है कि अपनी शिक्षा पद्धति को विश्व स्तरीय बनाने के लिए भारत सरकार को श्राइट टू एजुकेशन्य की जगह नया श्राइट टू क्वालिटी एजुकेशन फार ऑल एक्ट्य बनाकर सारे देश में लागू करना होगा।  
स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए राइट टू एजुकेशन एक्ट (आरटीई) 2009 में 3 बड़े तरीके को अपनाया गया है। पहला, निजी स्कूलों की मान्यता के लिए बुनियादी ढांचे और अन्य निर्धारित मानक को पूरा करना (धारा 19), दूसरा, सभी निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्लूएस) के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीट आरक्षित करना (धारा 12) तथा तीसरा, सरकारी स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता को तय करना व कक्षा में छात्र-शिक्षक अनुपात को कम करते हुए अधिकतम अनुपात 30रू1 निर्धारित करना। पर व्यवहारिक रूप में शिक्षा में गुणवत्ता लाने के ये तरीके जहां एक ओर अप्रमाणिक हैं वहीं दूसरी ओर दोषपूर्ण भी लगते हैं। इस सम्बन्ध में ऐरिक हानुशेक द्वारा किये गये अध्ययन को देखा जा सकता है जिसमें 400 अध्ययनों के आधार पर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि छात्र-शिक्षक अनुपात को कम करने, अध्यापकों की योग्यताओं को बढ़ाने व स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाने का छात्रों की पढ़ाई-लिखाई से कोई सुसंगत सम्बन्ध नहीं है। 
इसके साथ ही राइट टू एजुकेशन की धारा 12 व 19 में शिक्षा में गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए किये गये प्रावधानों को लागू करने में राज्य सरकारों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा है। उन राज्यों में जहां पर शिक्षा के लिए उत्तरदायी संस्थाओं के द्वारा आरटीआई एक्ट में निजी स्कूलों की मान्यता के संबंध में दिये गये निर्धारित मानकों (स्कूल के कमरों के आकार, छात्र-शिक्षक अनुपात, फर्नीचर, स्वयं का भवन होने की अनिवार्यता, पंजीकृत संस्था होना, लाभ के बिना स्कूल को चलाने आदि) का अनुपालन कठोरता के साथ किया गया। इसके चलते बहुत कम फीस लेने वाले निजी स्कूलों के इन मानकों को पूरा न कर पाने की स्थिति में बड़ी संख्या में बंद करने के आदेश दिये गये, लेकिन इन आदेशों को कई कानूनी चुनौतियों और अदालत के स्थगन आदेश का सामना करना पड़ा है। सरकारी स्कूलों का एक बड़ा अनुपात स्वयं ही शिक्षा अधिकार अधिनियम के भौतिक बुनियादी ढांचों के नियमों पर खरा नहीं उतरता। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कुछ राज्य सरकारों (गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र) ने स्कूलों की मान्यता संबंधी मानक में, भौतिक बुनियादी ढांचों के मानदंडों के अनुपालन की अनिवार्यता के साथ ही, छात्रों के विद्वता प्रदर्शन स्तर को भी एक महत्वपूर्ण मानक मे रूप में शामिल किया है। 
इसके अलावा, भारत में बेसिक शिक्षा प्रदान करने में सरकार निजी स्कूलों पर काफी निर्भर है क्योंकि निजी स्कूल भारत के ग्रामीण इलाकों के 31 प्रतिशत (उत्तर प्रदेश में 52 प्रतिशत, हरियाणा में 54 प्रतिशत और केरल में 62 प्रतिशत) और कई अन्य राज्यों में 90 प्रतिशत या उसके ऊपर शहरी बच्चों को शिक्षा दे रहें हैं। इन परिस्थितियों में शिक्षा अधिकार अधिनियम के मान्यता संबंधी मानकों को पूरा करने में असमर्थ रहने पर यदि कई निजी स्कूलों को बंद कर दिया गया तो सरकारी स्कूलों की सीटों को बढ़ाने में अत्यधिक वित्तीय बोझ (जहां पर प्रत्येक छात्र पर 20 गुना अधिक खर्च किया जाता है, क्योंकि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को ग्रामीण क्षेत्रों के निजी स्कूलों की तुलना में 20 गुना ज्यादा वेतन मिलता है) को सहन करना असम्भव हो जायेगा। इसलिए मेरा सुझाव है कि गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र की तरह एक संशोधित शिक्षा अधिकार अधिनियम को लागू किया जाये, जिसमें स्कूलों की मान्यता के लिए निर्धारित मानक के अन्तर्गत शिक्षा की गुणवत्ता व स्कूल के छात्रों के विद्वता प्रदर्शन पर सबसे अधिक महत्व देना चाहिए।
राइट टू एजुकेशन एक्ट की धारा 12 कहती है कि राज्य निजी स्कूलों के खर्च की भरपाई इस प्रकार करेगारू (अ) स्कूल की वास्तविक फीस या (ब) सरकारी स्कूल के प्रति छात्र खर्च, इन दोनों में से जो भी कम हो। हम इस धारा के साथ सरकार को होने वाली परेशानी को समझने के लिए उत्तर प्रदेश का उदाहरण ले सकते हैं। उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूल के प्रत्येक छात्र पर 450 रूपये का खर्च अनुमानित किया गया है। (हालांकि कुछ अनुमानों के अनुसार यह 2000 रूपये प्रतिमाह है)। इसके विपरीत ग्रामीण क्षेत्रों के निजी स्कूलों की औसत फीस 90 रूपये प्रतिमाह होती है जो कि सरकारी स्कूलों के प्रत्येक बच्चे के खर्च के लिए अनुमानित 450 रूपये का 1ध्5वां भाग ही है। इस पांच गुणा अंतर की वजह से कम फीस लेने वाले प्राइवेट स्कूल जोकि उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में है, को यह प्रलोभन देते हैं कि वे बढ़ा-चढ़ा कर फीस बताये या बढ़ा-चढ़ाकर दाखिला दिलायें। कागज पर नये प्राइवेट स्कूल दिखायें या 25 प्रतिशत से अधिक आर्थिक रुप से कमजोर बच्चे ले लें। भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले इस तरह के प्रलोभन की वजह से सरकार को निजी स्कूल की भरपाई हेतु सरकारी बजट की व्यवस्था करने में कठिनाई आती है।
शहर के अधिक फीस लेने वाले निजी स्कूलों की असंतुष्टता एक मुख्य कारण यह है कि प्रतिपूर्ति की अधिकतम सीमा (शहर के उच्च फीस वाले निजी स्कूल के लिए) बहुत कम है, जो कि उत्तर प्रदेश में प्रतिमाह 450 रूपये, उत्तराखण्ड में 860 रूपये, दिल्ली में 1190 रूपये निर्धारित है। सरकार को चाहिए कि प्रत्येक बच्चे पर आने वाले इस खर्च को निर्धारित करने के लिए पारदर्शी गणना करें। कुछ अनुमानों के अनुसार उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों के प्रत्येक प्राइमरी बच्चे पर खर्च 2000 रूपये व उच्च प्राथमिक के प्रत्येक बच्चे पर 2500 रूपये का खर्च अनुमानित है। निजी स्कूलों को इस बात का भी भय होता है कि उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर 25 प्रतिशत बच्चों के लिए स्कूल की वर्दी, किताबें, स्टेशनरी, कम्प्यूटर, शैक्षिक यात्रा व फर्नीचर आदि की व्यवस्था पर भी अतिरिक्त खर्च वहन करना पड़ेगा। इसके साथ ही एक अन्य कारण के रूप में प्रतिपूर्ति की कठिन प्रक्रिया से भ्रष्ट्राचार व देर से भुगतान मिलने की सम्भावना है। उन राज्यों में जहां धारा 12 को लागू हुए 2-3 वर्ष हो चुके है और वहां देर से प्रतिपूर्ति करने पर पीडि़त निजी स्कूलों को जुर्माने के रूप में अतिरिक्त भुगतान की कोई व्यवस्था नहीं है, निजी स्कूल और भी अधिक डरे हुए हैं। 
निष्कषर्रू
श्राइट टू एजुकेशन एक्ट्य जो कि सभी को एक समान श्गुणवत्तापूर्ण शिक्षा्य का अवसर नहीं प्रदान करता है, को एक नये श्राइट टू क्वालिटी एजुकेशन फॅार ऑल्य (सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार अधिनियम) से विस्थापित कर दिया जाये। यह कहाँ का न्याय होगा कि हम आर्थिक रूप से कमजोर केवल 25 प्रतिशत बच्चों को ही निजी स्कूलों में दाखिला दिलाकर उन्हें गुणात्मक शिक्षा प्रदान करने का अवसर प्रदान करें? वास्तव में यह हमारे संविधान के अनुच्छेद 21(ए) की मूल भावना के भी विपरीत होगा। इसलिए सरकार को चाहिए कि वे आर्थिक रूप से कमजोर 25 प्रतिशत बच्चों की पढ़ाई के लिए निजी स्कूलों को प्रतिपूर्ति के रूप में दी जाने वाली धनराशि को देने की बजाय उस धनराशि का उपयोग भारत के कोने-कोने में सरकारी स्कूलों की स्थापना एवं शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने में करे। इससे केवल 25 प्रतिशत भाग्यशाली बच्चों के स्थान पर 100 प्रतिशत बच्चों को अपना भाग्य बनाने का एक समान अवसर प्राप्त होगा। इसके लिए सरकार को गाँवों के साथ ही शहरों में भी सरकारी स्कूलों की संख्या को बढ़ाते हुए उसमें गुणात्मक शिक्षा देने की व्यवस्था सुनिश्चित करना होगा। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता को सुधारने का मतलब यह नहीं है कि केवल भौतिक सुविधाओं की उपलब्धि हो (जैसा कि आर.टी.आई. एक्ट में बताया गया है) बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि शिक्षक की योग्यता के साथ ही बच्चों के विद्वता प्रदर्शन के प्रति भी उनकी जबावदेही तय हो। इसलिए आज हमें एक ऐसे एक्ट की आवश्यकता है जो कि स्कूलों की गुणवत्ता को बढ़ाने पर केन्द्रित हो। जिसके अन्तर्गत यह सुनिश्चित किया जाये कि अच्छा वेतन पाने वाले सरकारी शिक्षक नियमित रुप से स्कूल आये, अपने शैक्षिक कार्य को पूरा समय दे, बच्चों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए सर्वश्रेष्ठ कदम उठाये, जिससे बच्चों की शैक्षिक विद्वता के अच्छे परिणाम सामने आये व भारत की युवा पीढ़ी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में और भी अधिक सक्षम बनें।
- प्रोफेसर गीता किंग्डन, 
चेयर ऑफ एजुकेशन इकोनोमिक्स एण्ड इन्टरनेशनल डेवलपमेन्ट, 
यू.सी.एल. इन्स्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन, यूनिवर्सिटी ऑफ लन्दन

रेल यात्रियों को और अधिक सुविधाओं का प्रयास

रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा के कथनानुसार रेलवे में यात्री सुविधाएं और बढाने का काम प्राथमिकता के आधार पर किया जायेगा। इसके लिये तेजी से जरुरी प्रक्रियाएं चल रही है इसका यात्रियों को जल्दी ही असर दिखाई देगा।
१. जिन रेलगडियों में २४ से कम कोच लगाये जा रहे है उनमें साधारण श्रेणी के दो कोच बढाये जायेगे जिस से बिना आरक्षण लिये लोगों की रेल यात्रा आसान हो सके।
२. वाराणी के मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन से नई दिल्ली तक नई रेलगाड़ी चलाई गई है जिसका नं0 १२५८१ है। यह यात्रा मार्ग में ज्ञानपुर रोड़, इलाहाबाद ज0, कानपुर सैन्ट्रल तथा गाजियाबाद जं0 पर रुकेगी। इसमें सामान्य 
श्रेणी के ६, शयनयान श्रेणी के आठ, ए.सी. ढ्ढढ्ढढ्ढ के तीन, ए.सी. ढ्ढढ्ढ के एक, प्रथम सह द्वितीय ए.सी. श्रेणी का एक तथा एस एल आर के दो कोचो सहित कुल २१ कोच लगाये जायेंगे।
३. मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन के सौदर्यीकरण के लिये ३० करोड़ रु. आंवटित किये गये है जिससे आने वाले समय में यहां यात्रियों को और बेहतर सुविधाएं मिल सकेगी। इसके अलावा वाराणसी  सिटी, सारनाथ, लोहटा रेलवे स्टेशन के विकास हेतु अनेक परियोजनाएं स्वीकृत की गई।
४. लखनऊ-छपरा वायां वाराणसी साप्ताहिक एक्सप्रेस ट्रेन नम्बर- १५०५४  लखनऊ से सोमवार-बुधवार, शुक्रवार रात्रि ९ बजे चलकर अगले दिन मध्यान्ह १२.१५ पर छपरा पहुंचेगी तथा छपरा ट्रेन नम्बर- १५०५३ छपरा से मंगलवार, वीरवार एवं शनिवार रात्रि ७.३५ पर प्रस्थान कर अगले दिन सुबह ९.०० बजे लखनऊ पहुंचेगी। यात्रा विराम बादशाह नगर, गोमती नगर, फैजाबाद, अयोध्या, शाहगंज, जौनपुर, वाराणसी, ओडिहार, गाजीपुर सिटी एवं बलिया है। इसमें कुल १८ कोच है। इसमें साधारण श्रेणी ६, शयनयान ७, ए.सी. ढ्ढढ्ढढ्ढ २, ए.सी. ढ्ढढ्ढ १ तथा एस.एल.आर. के २ कोच होगे।   

Wednesday, 6 May 2015

वरिष्ठ नागरिकों के लिए आयोग बनाने पर विचार करेगी सरकार

नई दिल्ली। केंद्र सरकार अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों, बच्चों और महिलाओं की तर्ज पर वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक आयोग गठित करने पर विचार कर सकती है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान सदस्यों के सवालों के जवाब में बताया, श्मैं कोई आश्वासन नहीं दे सकता कि सरकार वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक आयोग गठित करेगी। लेकिन हम इस पर विचार कर सकते हैं।्य
वह बीजद के भतृहरि मेहताब के सवाल का जवाब दे रहे थे जिन्होंने सवाल किया था कि क्या सरकार अल्पसंख्यकों, पिछड़ों, महिलाओं और बच्चों की तर्ज पर वरिष्ठ नागरिकों के लिए भी कोई आयोग गठित करने पर विचार कर रही है? गहलोत ने कहा कि सरकार अनुसूचित जातियों-जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्गों, मादक पदार्थों की लत के शिकार लोगों के कल्याण के लिए विभिन्न योजनाओं को क्रियान्वित करने के मकसद से गैर सरकारी संगठनों को अनुदान प्रदान करती है। उन्होंने बताया कि एनजीओ द्वारा धन की हेराफेरी साबित होने पर मंत्रालय एनजीओ को काली सूची में डालने के लिए पहल करता है।
गहलोत ने बताया कि इस प्रकार के मामलों में 87 एनजीओ को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और दस एनजीओ को काली सूची में डाला गया।

बैंक हड़ताल से आमजन चिंतित वेतन सुविधा में केन्द्रकर्मी बराबर?


मुम्बई (महाराष्टड्ढ्र) केन्द्र सरकार व बैकों के संगठन आईबीए द्वारा यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन (यूएफबीयू) की बैक कार्मिकों की वेतन व अन्य समस्याओं के समाधान में ढुलमुल रुप अपनाने से बढते टकराव के कारण २५ से २८ फरवरी तक चार दिवसीय हड़ताल पर उद्यम व आम जन में चिंता बढ़ गई है। वित्तीय वर्ष १४-१५ के समाप्ति के पूर्व माह में बैकों की बंदी अर्थव्यवस्था को गड़बडा देगी।
फोरम के अध्यक्ष के के नायर कहते है कि बैंक कार्मियों के बीच दरार पैदा करने के प्रयास सफल न होगे बल्कि इस प्रयासों से बैंककर्मी अधिक सबल होकर अपनी समस्याओं को सरकार या आईबीए को न ही बल्कि जनता के समक्ष रखेगे। जनता की शाक्ति हो उन्हे समझाएंगी।
बैंक आफ बड़ौदा के के एक जिम्मेदार वरिष्ठ प्रबन्धक संजय अग्रवाल एवं इसी बैंक के निदेशक प्रेम मक्कड़ कहते है कि बैंक देश की अर्थव्यवस्था की रीढ है फिर भी इस क्षेत्र की उपेक्षा को बैंक कर्मी को केन्द्र सरकार के कार्मिकों से कम वेतन पर जिम्मेदारियां अधिक यह अन्तर ४०-४५ प्रतिशत कम है। अखिल भारतीय बैंक अधिकारी संघ के अध्यक्ष एस एस सिसौदिया ने उम्मीद जाहिर की कि सरकार व आईबीए द्वारा २१ से २४ जनवरी की हड़ताल को टालने के लिए जो सकारात्मकता दिखाई थी उसे ढुलमुलता को समय रहते खत्म किया जायेगा।
देश में सरकार द्वारा जो विकास की अपेक्षा की है उसे लाने मे बैंक भूमिका अग्रणी है वह बैंक कार्मियों की अपने केन्द्र कर्मी के समकक्षता लाना होगा। यूं जिम्मेदारी देखते हुए अपर स्तर सुविधाओं में मिलना चाहिए। 
सातंवा वेतन आयोग पर केन्द्र चुप्पी से असमजस्य
पूर्ववती भारत सरकार द्वारा गत वर्ष सातंवा वेतन आयोग गठन की घोषणा की गई थी, वर्तमान केन्द्र सरकार की इस पर चुप्पी ने केन्द्र व राज्य कर्मचारियों मे बैचनी बढा रही है और इनके स्तर पर भी आन्दोलन की तैयारी का समाचार है। बैंक कार्मिकों के वेतन व केन्द्र सरकार के कार्मिक वेतन मानों में अन्तर की दिवार न बढे इसके लिए जरुरी है कि बैंक व केन्द्र कार्मिकों के वेतन पुनरीक्षण का कार्य साथ हो या फिर केन्द्र सरकार वेतन वृद्धि व सुविधाओं के निर्धारण के मापदण्ड नियत करें, तब ही प्रधानमन्त्री का सबका साथ सबका विकास का आवाहन रास्ता पा सकता है,यह विचार श्रमशिखर के पाठक एवं चितंक नई दिल्ली के प्रमुख व्यवसायी, चितंक श्री रवि प्रकाश मित्तल व्यक्त किए। श्री मित्तल समय-समय पर केन्द्र सरकार स्तर पर अपने विचारों से अवगत कराते रहते है। उन्होने बैंक, बिजली व सरकारी कार्मिकों के आन्दोलनों की स्थिति लाये जाने को बेहतर सरकार की स्थिति में नही लाता। हड़ताल की स्थिति आपसी विश्वास को परिलक्षित करती है, जबकि काम कराने व करने वाले के बीच सबसे अहम है।
श्रमशिखर से बातचीत में श्रमशिखर के हमारों पाठकों ने बैंक या केन्द्र कर्मचारियों की समस्याओं बनें रह कर उन्हे टालने की प्रकृति या फिर निजी क्षेत्र को समस्याओं के समाधान की बढती प्रकृति को अहितकर बताया। सरकारी व निजी के प्रतिस्पर्धा में रहना देश हित में है।

Tuesday, 5 May 2015

अमलतास

अमलतास के फूल झर गये धीरे से
कल तक जिसने प्यार किया
जब रूठे तो  मनुहार किया
आज वही अलि वादा अपना भूल गये
प्यार का प्रतिदान ऐसा भी है क्या
प्यास से जलते अधर दो मिल गये
माधुरी पीकर कहीं को उड़ चले
शेष  केवल रह गयी बेबस सी चाह
काँपती जाती  डगर है दूर तक
कल थे जो अपने वह न हैं यहाँ
साथ देने से भी उसको क्या मिला
हैं कहाँ वह और मंजिल है कहाँ
ठहर कर के दो पलों को सो लिया
बैठ कर छाया  में आँखें मूंदकर
स्वप्न में डूबा पथिक फिर चल पड़ा
अब किसी अनजान मंजिल के लिये
जिन पर था विश्वास उन्होंने कुचल दिया
रुँधे गले से दूब कह रही धीरे से
मीत खो गये गीत सो गये
अमलतास के फूल झर गये धीरे से

आम-आदमी की आंकाक्षाओ पर खरा उतरना है

आम-आदमी के जोश-जनून में नही है कोई शंका।
दिल्ली में आम-आदमी पार्टी का खूब बज रहा डंका।।
आम-आदमी की ताकत को, जो नेता थे गये भूल।
आम-आदमी के साहस ने उन्हे दय बार चटा दी धूल।।
गली-मुहल्लो-चैराहो पर आम आदमी की चर्चा सर्वत्र।
आम आदमी ने रच दिया, इतिहास एक विचित्र।।
आम-आदमी ही माध्यम, चुनाव में जीत-हार का।
कोरे आश्वासन झूठे वादो, के मृदुल व्यवहार का।।
लेकिन आम-आदमी का सवाल, सवाल ही रह जाता।
नेताओ से उसका, क्यो नही उत्तर भी बन पाता।।
आश्वासन के कटघरे में, खड़ा हुआ आम आदमी।
अपनी जायज मागों पर, अड़ा हुआ आम आदमी।।
अक्सर हर रोज, अपना बयान जाहिर करता है।
अपने अधिकारो की, मांग करने से नही डरता है।।
दिल्ली के मुख्यमंत्री, अब अपना कर्तव्य निभायेगे।
दिल्ली वासियो की, सभी समस्याओ को निपटायेगे।।
आमजन को मिलेगा, समय पर बिजली व पानी।
प्रशासनिक अधिकारी, नही कर पायेगे मन मानी।।
व्यवस्था-सुधारने को, तत्पर हुए है केजरीवाल।
जन लोकपाल बिल पर भी, अमल होगा तत्काल।।
स्वच्छ दिल्ली-स्वस्थ दिल्ली के साथ हो प्रशासन का सुधार।
अपराध-नियंत्रण के लिए, कमर कसे अब दिल्ली सरकार।।
आम-आदमी पार्टी को यदि अब आगे बढना है।
आम-आदमी की आंकाक्षाओ पर खरा उतरना है।।
सुशासन कैसे लाये, आम आदमी पार्टी को चुनौती है।
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि सेवक, जनता शासक होती है।।

अपने लिए आप ही जिम्मेदार हैं जनाब!

सच यह है कि आपके जीवन के लिए आपके सिवा और कोई जिम्मेदार नहीं हो सकता है। अपनी सेहत, अपनी खुशियों, करियर में प्रगति, वित्तीय सुरक्षा, रिश्तों में सकारात्मकता, समय के सदुपयोग और मन की शांति आदि के लिए आप ही जिम्मेदार हैं। जिस दिन आप यह समझ लेंगे, उसी दिन से अपने जीवन में प्रगति की ओर आपके कदम खुद-ब-खुद ही बढ़ जाएंगे। याद रखिए कि आज आप जिन स्थितियों का अनुभव कर रहे हैं, वे सब अतीत में आपने ही चनी थीं। इसमें दूसरों की राय पर आगे बढना भी शामिल  हो सकता है। अगर आप बेहतर परिणाम चाहते हैं, तो आज से ही बेहतर चयन करना सीख लें।
अगर अपको लगता है कि जीवन या कोई स्थिति अपने-आप ही बेहतर में बदलेगी, तो निश्चित मानिए कि आपको निराशा ही हाथ लगेगी। आपको खुद इसके लिए कुछ करना होगा। इसीलिए अपने जीवन में बदलाव लाने की जिम्मेदारी लें। पूरी जिम्मेदारी। अपने जीवन के खुद मालिक बनें। उसका खाका खुद तैयार करें, ताकि वह आपके सपनों, लक्ष्यों और आकांक्षाओं का आईना बन सकें। इसके लिए आज से ही इन तीन बातों को अपनाएं...
दूसरों को दोष देना आज से बंद
बचपन से ही आप अपनी खामियों के लिए किसी दूसरे को दोष देते आए हैं। हालांकि अपने माता-पिता, टीचर, सहकर्मियों, अधिकारियों, सरकार, मौसम किस्मत, सितारे, ग्रह और कुंडली जैसी चीजों पर दोष मढ़कर आपको मिला कुछ नहीं। और न ही कभी मिल सकता है। इन पर आपका नियंत्रण है क्या? आप उस पर ध्यान लगाएं, जिस पर आपका नियंत्रण है- वह हैं आप स्वयं।
अब बस भी करो बहानें
हर बार जब आप किसी असमर्थता के लिए कोई बहाना लगाते हैं, बेहतरी का एक मौका गंवा रहे होते हैं। साथ ही आप एक ढीले-ढीले या अव्यावसायिक नजरिए वाले व्यक्ति की छवि अपने लिए गढ़ते हैं। अधिकतर लोग बहाने इसलिए गढ़ते हैं, क्योंकि उन्हें असफल होने से डर लगता है। पर अगर इस डर का सामना करें तो असफल होने से डर बंद हो जाएगा। आसान स्थितियों के बजाय अपने लिए कुछ चुनौतीपूर्ण चुनने की हिम्मत बंधेगी। जैसे ही आप कुछ चुनौतीपूर्ण अपने हाथ में लेंगे, आपका खुद पर तो विश्वास बढ़ेगा ही, दूसरे भी आप पर विश्वास करेेंगे। इस तरह नए अवसर आप तक पहुंचेंगे।
शिकायत क्यों और किससे?
सच मानिए कि शिकायती शख्सियतें किसी को पसंद नहीं आतीं। शिकायत करने से आपकी और दूसरों की शक्ति भी जाया होती है। यह सच है कि कभी-कभी अपने आक्रोश को अभिव्यक्त करने का मन जरूर करता है। इसके बारे में बात करना एक स्वस्थ तरीका है। या फिर इसकी चर्चा करके इसमें सुधार करने वाले बिंदुओं को पहचानकर उस दिशा में कुछ करना बहुत फायदेमंद है। पर हर वक्त शिकायत करते रहकर आप एक पीडि़त की छवि तैयार करते हैं।
मैंने देखा है कि लोग जैसे ही अपने कर्मों और जीवन की जिम्मेदारी खुद लेना शुरू करते हैं, वे बहुत ऊर्जावान हो जाते हैं, उनमें प्रेरणात्मक नजरिया बढ़ जाता है और संकल्प की दृढ़ता भी बढ़ती है। इसीलिए आज से ही अगले तीस दिनों का लक्ष्य यह बनाएं कि आप किसी को दोष नहीं देंगे, शिकायत नहीं करेंगे और बहाने नहीं बनाएंगे। जब आप अपनी जिम्मेदारी लेना शुरू करेंगे, तो आपको ये सात अनुभव जरूर होंगेरू-
१. आजादी का आनंद रू अपने जीवन में खड़ी चुनौतियों के कारणों और उनके समाधान की खोज जब आप अपने अंदर करेंगे तो आपको एक अलग ही आजादी का अनुभव होगा। आपको महसूस होगा कि आप सोच-समझकर खुद का जीवन खुद ही संवार सकने में समर्थ हैं।
२. स्थायी प्रेरणा रू कठिन समय का सामना करने के लिए हम सबको प्रेरणा की जरूरत होती है। जब आप खुद के भीतर देखते हुए जीना शुरू करेंगे, जब आपको प्रेरणा का कभी खत्म न होने वाला स्त्रोत मिल जाएगा। अंतर्मन से उठने वाली प्रेरणा से जीवन उत्साह और आनंद से भर जाएगा।
३. बेहतर नियंत्रण रू जब आप अपने जीवन की कमान खुद संभालेंगे तो खुद का चयन होगा, खुद के चुने हुए कर्म होंगे, खुद के सीचे निर्णय होंगे। और इन सबसे आप खुद को ज्यादा सामथ्र्यवान और नियंत्रण में अनुभव करेंगे।
४. निजी शक्ति रू यह अनुभव सकारात्मकता का होगा। यह वह भावना है, जिसमें आपको अपने विकास, पालन-पोषण आदि के लिए स्वयं के संपूर्ण होने का एहसास होता है। यह भावना लक्ष्य तक पहुंचाने में ईधन का काम करती है।
५. नयेपन का आगाज रू जब आप मन से शांत होते हैं, आजाद होते हैं और नए विचारों के लिए मन खुला रखे होते हैं, तो जीवन में कई श्अरे वाह्य कहने वाले मौके आते हैं। खुद की जिम्मेदारी खुद लेने की प्रक्रिया में हर दिन आपका अपनी रचनात्मकता के प्रति आत्मविश्वास बढ़ता है।
६. नजरिए का विस्तार रू अब तक आपको अपने अनुभवों की सीखों से ही काम लेना आता है, जबकि कई अन्य तरीके भी संसार से भरे पड़े हैं। जब आप उनके प्रति खुलेंगे तो सोच का दायरा भी बढ़ेगा।
७. मन की शांति रू यह तो हर किसी को चाहिए। जब आप शिकायत व बहानों का सहारा लेते हैं तो नकारात्मकता से खुद को जला रहे होते हैं।
इससे उलझनें बढ़ती हैं। जब खुद की जिम्मेदारी खुद लेना शुरू करते हैं, तो श्क्या हुआ, किसने किया्य जैसे प्रश्नों में फंसने के बजाय श्आगे क्या करना है्य सोचते हैं।
कुछ बातों पर विचार करें
२ अगर आप शिकायत करना या बहाने बनाना छोड़ दें तो अपने बारे में क्या राय बनेगी और कैसा महसूस होगा?
      -आगामी अंक में जारी....
२ अपने जीवन की हर चीज के लिए खुद जिम्मेदारी लेने पर क्या होगा? इससे आपको फायदा कैसे होगा?
२ इस आदत को विकसित करने और उसे बनाए रखने के लिए आपको क्या करना होगा?

Monday, 4 May 2015

रेल सफर में तत्काल मदद को हैल्पलाइन

राजकीय रेलवे पुलिस ने ३ मार्च को निम्नलिखित हैल्पलाइन सेवा का शुभारंभ किया है, जिसके जरिये उत्तर प्रदेश राज्य की सीमा के अंदर रेल सफर में यात्री चोरी, लूट, डकैती, मारपीट, छेड़खानी, हत्या, जहरखुरानी जैसे मुश्किल हालात में डायल कर शिकायत दर्ज करा कर मदद ले सकते हैंरू-  हैल्पलाइनरू १५१२

स्टेशन आने से पहले जगाएगी अलर्ट सुविधा

ट्रेन में रात के समय सफर करने वाले बहुत से यात्रियों को गंतव्य स्टेशन आने से पहले उठने में काफी परेशानी होती है। कई बार तो आंख न खुल पाने से ट्रेन आगे निकल जाती है और उन्हें वापस आने में बहुत दिक्कत झेलनी पड़ती है। इस परेशानी का निराकरण करने के लिए रेलवे ने १३९ पर फोन कर वेकअॅप कॉल-डेस्टिनेशन alert  की निम्नलिखित नई सुविधा कुछ ही दिन पहले शुरू की है। इससे गंतव्य स्टेशन आने से पहले ही मोबाइल पर अलार्म बज उठेगा
पहले alert  टाइप करें, फिर PNR Number टाइप करें, फिर १३९ पर Send करें और इसके बाद PNR Number एक्टिवेट हो जाएगा।    

‘आप’ के ट्रैक पर देर से दौड़ेगी की बजट की गाड़ी

आम आदमी पार्टी की सरकार दिल्ली का बजट पेश करने में किसी तरह की हड़बड़ी के मूड में नहीं है। दिल्ली डॉयलॉग कमीशन की टास्क फोर्स गठित होने और उसकी सिफारिश आने का इंतजार किया जाएगा।
जिन 10 विधान सभा में जनता के सुझाव से बजट का प्रावधान किया जाना हैए वह प्रक्रिया भी इस दौरान पूरी की जाएगी। हालांकि लेखानुदान से सरकार खर्चों में कटौती की शुरुआत कर सकती है। दिल्ली सरकार का बजट 37 हजार करोड़ रुपये का है। वित्त वर्ष में लोकसभा और विस का चुनाव आने से बेशक प्रोजेक्ट पूरे नहीं हो पाए, खर्चे कम हुए लेकिन वसूली में 4300 करोड़ रुपये की कमी हुई। अधिकारी बता रहे हैं कि लेखानुदान में कटौती बहुत जरूरी है। लेखानुदान इसलिए लेना है ताकि कर्मियों के वेतन व अन्य खर्चों की व्यवस्था की जा सके। सूत्र बताते हैं कि लेखानुदान तीन महीने का लिया जाएगा। इसके लिए विस का सत्र मार्च के अंतिम सप्ताह में दो दिन का होगा। इसकी तैयारी योजना व वित्त विभाग के अधिकारियों ने शुरू भी कर दी है।
सरकार का पूर्ण बजट मई में आएगा। तब तक दिल्ली डॉयलॉग कमीशन में दिए गए मोबाइल पर सरकार, वाई-फाई और सीसीटीवी वाली दिल्ली, अनधिकृत कॉलोनी नियमन, झुग्गी झोपड़ी पुनर्वास, जॉब और जॉब सिक्योरिटी जैसे विषयों को दिल्ली के पूर्ण बजट में शामिल किए जाने की तैयारी है।

यह पब्लिक है सब जानती है

भाजपा के रणनीतिकार आप को बहुत हल्के में लेते हुए मान रहे थे कि मोदी की सदाबाहर लोक प्रियता के बूते पार्टी लगातार राज्यों के विधानसभा चुनाव जीतती रहेगी। अहंकार के चलते नेतृत्व ने मान लिया था कि मोदी के राजनीतिक व्यक्तित्व के सामने कोई चुनौती नही है लेकिन भारतीय मतदाता जानते है कि राजनेताओ को है लेकिन भारतीय मतदाता जानते है कि राजनेताओ को कब वास्तविकता से अवगत कराया जाये। प्रधानमंत्री ने दिल्ली के विधानसभा चुनाव को अपने व्यक्तित्व पर जनमत बना दिया था, मतदाताओ ने उन्हे दो टूक आभास करा दिया कि उन्होने मतदाताओं के समर्थन का गलत अनुमान लगाया था।
लोकतंत्र में शासक जनता है जनप्रतिनिधि सेवक है। उन्हें जनता का दिल जीतने के लिये जनहित में योजनाएं बनाना उन्हे कार्यन्वित करना होगा। क्योकि यह पब्लिक है, सब जानती है।

मेरठ मेडिकल कॉलेज में स्थायी प्रधानाचार्य

मेरठ। प्रदेश के कुछ मेडिकल कॉलेजों में मेडिकल काउंसिल आफ इडिया के द्वारा नियत मानकों के पूरा न होने तथा प्रदेश सरकार प्रमुख उपलब्धियों में एक सहारनपुर मेडिकल कॉलेज का अभी तक विघिवत कार्य की शुरुआत न होने व समूह श्ग्य की भर्तियों को कार्य न होने पर मुख्यमन्त्री की नाराजगी प्रदेश के स्वास्थय यहा निदेशक  शिक्षा डा0 के.के. गुप्ता को भारी पड़ी। डा0 गुप्ता को इस पद से हटा कर वापस मेरठ मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य के दायित्व निर्वहन के लिए भेजा गया है। इस वापसी को डा0 गुप्ता की पदावत कहां जा रहा है। इसके विपरीत इसे उनकी इच्छा भी कह रहे है ताकि वह अपनी गडबड निजी प्रैक्टिस को रास्ते पर ला सके।
डा0 गुप्ता द्वारा तत्काल प्रधानाचार्य का दायित्व सम्भाल लिया गया। डा0 गुप्ता के स्थान पर स्वास्थय महानिदेशक शिक्षा पद मुख्यमन्त्री द्वारा अपने निर्वाचन क्षेत्र कन्नौज के मेडिकल कॉलेज प्रधानाचार्य वी.एन. त्रिपाठी को दिया गया ताकि प्रदेश में बढ़ रहे स्वाइन फ्लू की चुनौती में यह बदलाव से असफलता के असर को प्रभावहीन करने का प्रयास किया।
डा0 गुप्ता को वापस मेरठ मेडिकल कॉलेज प्रधानाचार्य का दायित्व देने के लिए दलील इस कॉलेज में एडोक्रायोनोलॉजी विभाग होने व उसके दायित्व को के स्थान पर गत ढाई वर्ष से व्यवस्था न होने पर एमसीआई द्वारा आपत्ति करना बताया जा रहा है। डॉ0 गुप्ता अगले वर्ष सेवानिवृत्ति पूरी कर रहे है। इसके बाद यह शिक्षण कार्य सरकार की चिकित्सा शिक्षक उम्र बढाने के लाभ के अन्तर्गत कार्य कर सकेगें, परन्तु प्रधानाचार्य नियमित की जरुरत अगले वर्ष होगी। इसके लिए स्थाई प्रधानाचार्य खोज अभी से शुरु होगी संशय है।
सद्भावना समिति वरिष्ठ नागरिक फोरम ने अपेक्षा कि है लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज मेरठ को भविष्य का स्थाई प्रधानाचार्य समय रहते दिए जाने की व्यवस्था प्रदेश सरकार करेगी। इस मेडिकल कॉलेज में डा0 उषा शर्मा के बाद से कुछ अवधि छोड़ अस्थाई प्रधानाचार्य लम्बे अन्तराल तक रहने की व्यवस्था में कॉलेज में गड़बडियों से इसकी शाख गिरी है। अस्थाई प्रधानाचार्य पद पर बनें रहने की कुछ लोगो की चाह से जबरदस्त गुटबाजी चल रही है। जिसमें सरकार द्वारा नई-नई व्यवस्थाओं के किए जाने के बाद भी कॉलेज छात्रों व जनता को उनका लाभ दिलाने में पिछड़ा है। स्वयं मेडिकल छात्र व जूनियरों में अनुशासनहीनता बढ रही है। कॉलेज के पास जिस तरह अतिक्रमण बढ रहा है। वह एक दिन इस कॉलेज के ्रप्रर्यावरण व कानून व्यवस्था के लिए भयकर चुनौती होगा।
व्यवस्था तो एॅडोक्रायोलांजी शिक्षण व चिकित्सा
डा0 गुप्ता की मेरठ वापसी का एक कारण प्रदेश में आगरा के बाद एॅडोक्रायोलाजी चिकित्सा व शिक्षण विषय की व्यवस्था होने व इसके शिक्षण कराने व इस मेडिकल कॉलेज में इसकी चिकित्सा हेतु चिकित्सक की व्यवस्था न होना भी कहा गया है। इस विषय के अध्ययन कर चुके छात्र चिकित्सकों व पढाई करने वाले छात्र चिकित्सकों का कहना है कि इस चिकित्सा अध्ययन व विभाग को नई व्यवस्था पर अभी से ध्यान देना होगा ताकि निकट भविष्य में इनकी सेवानिवृति व अपनी नीजि प्रैक्टिस की चाह के अवरोध से निजात मिल सके।

बेंगलुरु दुनिया में सबसे सस्ता शहर


इकोनोमिक इंटेलीजेंस यूनिट द्वारा तैयार श्वल्र्डवाइट कॉस्ट ऑफ लिविंग रिपोर्ट, २०१५्य के अनुसार, न्यूयार्क को आधार मानकर, १३३ शहरों को शामिल कर, १६० सेवाओंध्उत्पादों की कीमतों को ध्यान में रखकर, यह घोषणा की गई है कि भारत की सूचना प्रौद्योगिकी का केंद्र बेंगलुरु और पाकिस्तान की वित्तीय राजधानी कराची को संयुक्त रूप से १३३ वें स्थान पर रखकर दुनिया के सबसे सस्ते शहरों में शुमार किया गया है। यहां गुजर-बसर करना काफी सस्ता है। इसके बाद मुंबई को १३० वां, चैन्नई को१२९ वां और नई दिल्ली को १२८ वां स्थान दिया गया है। दुनिया के सबसे महंगे शहरों में सिंगापुर दूसरे वर्ष भी शीर्ष पर है। उसके बाद, पेरिस, ओस्लो, ज्यूरिख और सिडनी का नंबर आता है।

चलना होगा साथ

जम्मू-कश्मीर के विकास पर, चलना होगा साथ
राष्टड्ढ्र के हित में करनी होगी, अब तो सारी बात।
अब आंतकवाद की गंध, न केसर क्यारी में फैले
राष्टड्ढ्र-प्रेम, विश्वास, एकता पर, न हो अब आघात।।
        अपने पांव पर आप कुल्हाड़ी मारी, कुछ दीवानो ने।
        मानवता को लज्जित कर डाला, ऐसे इंसानों ने।।
        इस सुन्दर घाटी का समुचित विकास रुक गया यूं।
        बरसों लग जायेगें इसको विकसित कर पाने में।।

Sunday, 3 May 2015

मच्छरों से छुटकारा दिलाएंगे पौधे

घर के आसपास लगे कुछ पौधे ही मच्छर के बचाव के लिए सुरक्षा कवच का काम कर सकते हैं। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च के हाल ही प्रकाशित शोध पत्र में इस बात खुलासा किया है। इसमें पाया गया है कि मच्छरों से बचने के लिए किए गए किसी भी रासयनिक छिड़काव की जगह घर के किचन गार्डन में लगे कुछ जाने-माने पौधे ही मच्छरों से मुकाबला करने के लिए काफी है। सदाबहार, सांची, गारडेनिया जैसे पौधों को हम केवल उनके खूबसूरत फूलों की वजह से जानते हैं। आयुर्वेद में कभी इनका प्रयोग डायबिटिज या फिर ब्लडप्रेशर को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है, लेकिन पहली बार इनकों मच्छरों के लार्वा खत्म करने के लिए भी बेहतर माना गया है।
शोधकर्ता अनुपम घोष के अनुसार देश में हर साल मच्छर जनित बीमारियों के बढ़ते आंकड़ों को देखते हुए इससे बचाव के लिए नये विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए। अब तक किए गए अध्ययन में यह भी देखा  गया है कि लंबे समय तक स्प्रे या फिर मच्छररोधी छिड़काव सेहत के लिए ठीक नहीं, जबकि वेक्टर बोर्न बीमारी या मच्छर जनित बीमारियों के लिए सरकार अब तक कोई कारगर वैक्सीन भी नहीं बना पाई है। यही कारण है कि शुरू से ही मच्छरों से बचाव पर अधिक ध्यान दिया जाता है। इसी क्रम में बायोलॉजिकल स्प्रे में कुछ पौधों की पत्तियों के मिश्रण को मच्छरों को दूर भगाया जा सकता है। शोध के आधार पर अब पौधों से तैयार स्प्रे को नियमित मच्छर रोधी कार्यक्रम में शामिल करने की पैरवी की जा रही है। अहम यह है कि इन पौधों को आसानी से घर पर लगाया जा सकता है।
कैसे हुआ अध्ययन
इस बावत भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और जूलॉजी विभाग क्रिश्चियन कॉलेज बाकुरा की टीम द्वारा अध्ययन किया गया। अध्ययन में क्यूलेक्स प्रजाति के १०० से अधिक मच्छरों के लार्वा को स्वच्छ पानी में रखा गया। शोध टीम में शामिल डॉ. अनुपम घोष ने बताया कि लार्वा को बढने के लिए कुछ अप्राकृतिक खाद्य सामग्री भी पानी में डाली गई। जिसमें यीस्ट पाउडर और कुत्तों को दिए जाने वाले बिस्कुट शामिल थे। लार्वा को ३१ से ३३ डिग्री सेल्सियस के तापमान पर एक हफ्ते तक रचाा गया। इससे पहले यीस्ट पॉउडर में चिकित्सीय पौधों को पत्ती से तैयार मिश्रण को मिलाया गया।

कल्याणं करोति का नेत्र शिविर

स्व0 पं0 हरस्वरूप शर्मा जी की पुण्य स्मृति में, तन्मय ट्रस्ट, कल्याणं करोति मेरठ (पंजीकृत) एवं जिला दृष्टिड्ढहीनता निवारण समिति (मेरठ)  के संयुक्त तत्वाधान में लैन्स की सुविधा के साथ निरूशुल्क नेत्र चिकित्सा शिविर का आयोजन राधा गोविन्द पब्लिक स्कूल, कॉपरेटिव सोसाईटी के पीछे, खरखौदा, (मेरठ) के प्रांगण में आयोजित किया गया। जिसमें १५५ नेत्र रोगियों की जांच डा0 पी.पी. मित्तल द्वारा की गयी, सभी नेत्र रोगियों का निरूशुल्क दवाईयां वितरित करके १४ के मोतियाबिन्द के आपरेशन हेतु चयन किया गया। सभी नेत्र रोगियों को मोतियाबिन्द के आपरेशन हेतु कल्याणं करोति, मेरठ द्वारा संचालित निरूशुल्क नेत्र चिकित्सालय कैन्टोनमैन्ट जनरल अस्पताल, मेरठ छावनी में लाया गया।
सभी आपरेशन डा0 पी0पी0 मित्तल द्वारा किये गये। चश्में के लिए ६२ नेत्र रोगियों की जांच श्री संजय कुमार द्वारा की गयी और २३ को रियायती दर पर चश्में उपलब्ध कराने का निर्णय लिया गया। शिविर को सफल बनाने हेतु सर्व श्रीमतीध्श्री तिलकराज अरोड़ा, ईश्वरचन्द गुप्ता, डा0 (कु0) सरोजनी वासन, ब्रहमदत्त शर्मा, शैलजा दत्त, प्रशान्त शर्मा,   मीता एवं विजय आदि ने विशेष योगदान दिया।
कैन्टोनमैन्ट जनरल अस्पताल, बेगमपुल, मेरठ   पिन-२५०००१
फोन: (का0) ०१२१-२६६४७२२, (अध्यक्ष) ९४१२२०६२१०, (महामंत्री) ९४५६८३८४५६ म्उंपसरू ााउउममतनज/हउंपसण्बवउ

ओशो सत्संग और मेडिटेशन

गोमती आत्मदर्शन की धारा में आज स्वामी देव प्रकाश एडवोकेट ने दीप प्रज्वलित किया। ओशो के १ घंटे प्रवचन का रहा। सभी साधकों ने प्रवचन श्रवणकर आत्मिक लाभ उठाया।
स्वामी आत्मो कामरान ने कीर्तन ध्यान और नादबृहय ध्यान कराया। आज ध्यान की बहुत आवश्यकता है, विक्षिप्ता और मनोरोगो से छुटकारा पाना सम्भव है। हम ध्यान रहने की कला जानते तो जीवन जीना आ गया।
नटराज ध्यान १ घंटे तक कराया हम नृत्य करना भूल गये। हमे नृत्य करना आ जायें तो जीवन में उत्सव उतरने लगता है। मीता के पैरों नाच है, चैतेन्य प्र्रभु के पैरों में नाच है। यह नाच तुम्हारे पैरों में उतर आये तो जीवन उत्सव से धन्य हो जायेगा। तब पता चल जायेगा कि जीवन क्यों मिला। निश्चित ही मन धन्यवाद देने का भाव उमड़ पड़ेगा। प्रत्येक रविवार को १२ बजे शिविर लगता है।
सद्भावना समिति (पंजी.) स्वामी आत्मो कामरान 8057982656, 8273548730

रेल यात्रा में तत्काल मदद हैल्प

ट्रेनों में सफर के दौरान सुरक्षा संबंधी खतरों से बचने और तुरन्त मदद पाने के लिए पीआरएस सिस्टम से जारी होने वाले सभी रेल टिकटों पर निम्नलिखित तत्काल नंबर और सूचनाएं प्रिन्ट की जाएंगीरू- १. आपात स्थिति में संपर्क किए जाने वाले व्यक्ति का नाम व फोन नंबर दर्ज करें। २. खतरे की स्थिति उत्पन्न हेाने पर रेलवे सुरक्षा हैल्पलाइन नंबर डायल करें रू- तत्काल मदद नं0 रू १८२

मिलावटखोरों की शिकायत करें

मेरठ मंडल के आयुक्त आलोक सिन्हा ने चिकित्सा-स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा आदि विभागों के अधिकारियों को कड़ा निर्देश दिया है कि वे होली तक मिलावटखोर मैडिकल स्टोरों, दूध की डेयरियों, हलवाइयों के खिलाफ ऐसा शिकंजा कसें कि ये लोग मिलावट न कर पाएं। साथ ही यह भी निर्देश दिया कि निम्न हैल्पलाइन नंबर सभी विकास खंडों और सरकारी भवनों पर अंकित करा दें, ताकि जनता मिलावट खोरों की शिकायत कर सके रू- १८०० १८० ५५३३

स्वच्छ भारत अभियान, चढ़े परवान

प्रधानमंत्री के ‘स्वच्छ भारत’ अभियान से स्वयं को बड़ा प्रतिष्ठित व ख्याति प्राप्त समझने वाले लोग भी जुडने की घोषणा करते आ रहे है। क्या अपना दोहरा चरित्र जीने वाले इन लोगो से पूछा गया कि वे कहां-कहां सफाई-अभियान में लोगो को जागरूक करने गये। एक दिन हाथ में झाडू लेकर सफाई नही हो सकती। लोगो को समझाये कि वे सफाई की आदत बनाये यहां तो लोग अपने घर को साफ कर कूड़ा सडक पर बिखेर देते है। नाली में थूकने के बजाय सडक के बीच में थूकना अपनी शान समझते है। पान व गुटका खाकर लोग सार्वजनिक स्थलो की दीवारो पर आधुनिक पेन्टिंग बना देते है। ऐसे लेागो को कौन समझा सकता है, कानून का पालन करवा सकता है सफाई के लिए सभी को सचेत होना होगा। पश्चिम के लोग खुद ही पहल करते है। उनके कानून भी सख्त है पकड़े गये तो भारी जुर्माना अदा करना ही पड़ेगा।
पॉलीथीन सफाई का सबसे बड़ा दुश्मन हैं। यह पर्यावरण के लिए घातक है। उसी के प्रयोग से नाली, सीवर तो चोक होते ही है। यह नदियो के लिए भी गंभीर समस्या है। पॉलीथीन का बढ़ता प्रयोग हमारी धरा की जल शोषण की क्षमता क्षीण कर रहा है। जिससे कृषि जगत पर भी एक अदृश्य काला साया मंडरा रहा है। नगरों में ही नही देहातो में भी हवा में उड़ता, बिखरा पॉलीथीन इस बात को बार-बार समझा रहा है कि मेरा उपयोग बड़ा घातक है इसका प्रयोग रोको किन्तु इस ओर न तो हम देखना चाहते है और न ही कुछ करना चाहते है। आज जिस थोड़ी सुविधा के लिए हम पोलीथीन की पन्नियों का प्रयोग करते है यही सुविधा हमारे बच्चों के लिए घातक है। स्वच्छता अभियान सफल बनाने के लिये हम दृढ संकल्प ले।
 यमुना को प्रदूषण मुक्त करने हेतु राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एन.जी.टी.) की सार्थक पहल सचमुच प्रशसनीय है।
अब यमुना नदी में कूड़ा या धार्मिक सामग्री डालते पाये जाने पर ५०० रु. का जुर्माना देना होगा तथा निर्माण सामग्री फैकना भी प्रतिबंधित होगा ऐसा करने वालों पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण के अध्यक्ष न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार ने ५०,००० रु. का जुर्माना लगाने का निर्देश यमुना को प्रदूषण मुक्त करने हेतेु सार्थक पहल है। 

साधना और उपासना के बीच में अंतर


साधक में कुछ खोना नहीं है, पाना है और उपासक में सिवाय खोने के कुछ भी नहीं ळे
कृष्ण के व्यक्तित्व में साधना जैसा कुछ भी नहीं है। हो नहीं सकता। साधना में जो मौलिक तत्व है, वह प्रयास है, इफर्ट है। बिना प्रयास के साधना नहीं हो सकती। दूसरा जो अनिवार्य तत्व है, वह अस्मिता है, अहंकार है। बिना श्मैं्य के साधना नहीं हो सकती। करेगा कौन? कर्ता के बिना साधना कैसे होगी, कोई करेगा तभी होगी। साधना शब्द, जिनके लिए कोई परमात्मा नहीं है, आत्मा ही है, साधना शब्द उनका है। आत्मा साधेगी और पाएगी।
उपासना शब्द बिल्कुल उलटे लोगों का है। आमतौर से हम दोनों को एक साथ चलाए जाते हैं। उपासना शब्द उनका है, जो कहते हैं कि आत्मा नहीं, परमात्मा है। सिर्फ उसके पास जाना, पास बैठनाकृउप-आसन, निकट होते जाना, निकट होते जाना। और निकट होने का अर्थ है, खुद मिटते जाना, और कोई अर्थ नहीं है।
हम उससे उतने ही दूर हैं, जितने हम हैं। जीवन के परम सत्य से हमारी दूरी, हमारी डिस्टेंस उतना ही है, जितने हम हैं। जितना हमारा होना है, जितना हमारा मैं है, जितना हमारा ईगो है, जितनी हमारी आत्मा है, उतने ही हम दूर हैं। जितने हम खोते हैं और विगलित होते हैं, पिघलते हैं और बहते हैं, उतने ही हम पास होते हैं। जिस दिन हम बिलकुल नहीं रह जाते, उस दिन उपासना पूरी हो जाती है और हम परमात्मा हो जाते हैं। जैसे बर्फ पानी बन रहा हो, बस उपासना ऐसी है कि बर्फ पिघल रहा है, पिघल रहा है...
साधना क्या कर रहा है बर्फ? साधना करेगा तो और सख्त होता चला जाएगा। क्योंकि साधना का मतलब होगा कि बर्फ अपने को बचाए। साधना का मतलब होगा कि बर्फ अपने को सख्त करे। साधना का मतलब होगा कि बर्फ और क्रिस्टलाइज्ड हो जाए। साधना का मतलब होगा कि बर्फ और आत्मवान बने। साधना का मतलब होगा कि बर्फ अपने को बचाए और खोए न।
साधना का अर्थ अंततरू आत्मा हो सकता है। उपासना का अर्थ अंततरू परमात्मा है। इसलिए जो लोग साधना से जाएंगे, उनकी आखिरी मंजिल आत्मा पर रुक जाएगी। उसके आगे की बात वे न कर सकेंगे। वे कहेंगे, अंततरू हमने अपने को पा लिया। उपासक कहेगा, अंततरू हमने अपने को खो दिया। ये दोनों बातें बड़ी उलटी हैं। बर्फ की तरह पिघलेगा। उपासक और पानी की तरह खो जाएगा। साधक तो मजबूत होता चला जाएगा।
इसलिए कृष्ण के जीवन में साधना का कोई तत्व नहीं है। साधना का कोई अर्थ नहीं है। अर्थ है तो उपासना का है। उपासना की यात्रा ही उलटी हैं। उपासना का मतलब ही यह है कि हमने अपने को पा लिया, यही भूल है। हम हैं, यही गलती है। टू बी इज दि ओनली बांडेज। होना ही एकमात्र बंधन है। न होना ही एकमात्र मुक्ति है। साधक जब कहेगा तो वह कहेगा, मै मुक्त होना चाहता हूं। उपासक जब कहेगा तो वह कहेगा, मैं श्मैं्य से मुक्त होना चाहता हूं। साधक कहेगा, मैं मुक्त होना चाहता हूं। मैं मोक्ष पाना चाहता हूं। लेकिन श्मैं्य मौजूद रहेगा। उपासक कहेगा, श्मै्य से मुक्त होना है। श्मैं्य से मुक्ति पानी है। उपासक के मोक्ष का अर्थ है, श्ना-मैं्य की स्थिति। साधक के मोक्ष का मतलब है, श्मैं्य की परम स्थिति। इसलिए कृष्ण की भाषा में साधना के लिए कोई जगह नहीं हैय उपासना के लिए जगह है।
अब यह उपासना क्या है, इसे थोड़ा समझें।
पहली तो यह बात समझ लें कि उपासना साधना नहीं है, इससे समझने में आसानी बनेगी। अन्यथा भ्रांति निरंतर होती रहती है। और उपासक हममें से बहुत कम लोग होना चाहेंगे, यह भी ख्याल में ले लें। साधक हममें से सब होना चाहेंगे।
क्योंकि साधक में कुछ खोना नहीं है, पाना है। और उपासक में सिवाय खोने के कुछ भी नहीं है, पाना कुछ भी नहीं है। खोना ही पाना है, बस। उपासक कौन होना चाहेगा? इसलिए कृष्ण को मानने वाले भी साधक हो जाते हैं। कृष्ण के मानने वाले भी साधना की भाषा बोलने लगते हैं। क्योंकि वह भीतर जो अहंकार है, वह साधना की भाषा बुलवाता है। वह कहता है, साधो! पाओ! पहुंचो! उपासना बड़ी कठिन बात है, आरडुअस। इससे ्ययादा कठिन कोई बात नहीं हैकृपिघलो, मिटो, खो जाओ।
-ओशो
पुस्तकरू कृष्ण स्मृति
प्रवचन नं.12 से संकलित

Wednesday, 29 April 2015

राजस्थान में खनन माफिया चट कर गए पहाड़ भी

राजस्थान के मेवात क्षेत्र में खनन माफियाओं का खौफ किस कदर बढ़ता जा रहा है इसकी बानगी तब देखने को मिली जब प्रदेश के खुफिया विभाग के अतिरिक्त महानिदेशक (एडीजी) उत्कल रंजन साहू ने अलवर के एसपी विकास कुमार को हाल ही चिट्ठी लिखकर खनन माफियाओं से सतर्क रहने को कहा. चिट्ठी में कहा गया था, ''अलवर में अपराधियों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान से खनन माफियाओं और मेव कट्टर पंथियों में नाराजगी है. उनसे आपकी सुरक्षा को खतरा हो सकता है. '' दरअसल कुमार ने अलवर में अवैध खनन के खिलाफ सघन अभियान चला रखा है. जनवरी 2014 से अब तक उन्होंने अवैध खनन के खिलाफ एक हजार से अधिक कार्रवाई की और सात सौ से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है. फिर भी अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली जिले में अवैध खनन का काला कारोबार थमने का नाम नहीं ले रहा है. यहां खनन माफियाओं की आपस में या पुलिस से आए दिन हिंसक झड़पें होने लगी हैं.
बीती 2 अप्रैल को भरतपुर जिले के पहाड़ी थाना क्षेत्र के नागल क्रेसर जोन में खनन माफियाओं के दो गुटों में हुई झड़प में दो लोगों की मौत हो गई थी जबकि पांच अन्य घायल हो गए थे. इस घटना के कुछ ही दिन पहले, 18 मार्च को करौली जिले के मासलपुर थाना क्षेत्र में खनन रोकने गई पुलिस पर खनन माफियाओं ने हमला कर दिया था. यहां से पुलिस ने पत्थरों से भरा एक ट्रक और खनन मशीन जब्त की थी. अवैध खनन के मुख्य केंद्र अलवर में तीन साल में खनन माफिया ने पचास से ज्यादा बार पुलिस और वन विभाग के दल पर हमला किया है. 16 फरवरी को अलवर के ही राजगढ़ क्षेत्र में अवैध खनन की रोकथाम के लिए चलाए जा रहे ऑपरेशन ग्रीन अभियान के दौरान झोपड़ी नांगल गांव के पास अवैध खनन कर पत्थर ले जा रहे दो ट्रैक्टर चालकों ने वन विभाग की सरकारी गाड़ी को पचास फुट तक घसीट दिया था.

सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद बेहद हिंसक हो चुके खनन माफिया अलवर स्थित अरावली की पहाडिय़ों में अवैध खनन लगातार जारी रखे हुए हैं. अवैध खनन की वजह से ही भिवाड़ी, टपूकड़ा, तिजारा और किशनगढ़बास क्षेत्र से पहाडिय़ां गायब होती जा रही हैं. अलवर में डीएफओ रह चुके पी.काथिरवेल के आकलन के मुताबिक भिवाड़ी क्षेत्र में खनन माफियाओं ने बीते 15 साल में 50 हजार करोड़ रु. का अवैध खनन किया है और खनन इसी रफ्तार से जारी रहा तो इस क्षेत्र के पहाड़ तीन साल में खत्म हो जाएंगे. वन विभाग की ही एक रिपोर्ट बताती है कि टपूकड़ा क्षेत्र के चूहड़पुर, उधनवास, उलावट, ग्वालदा, इंदौर, सारे कलां, सारे खुर्द, खोहरी कलां, मायापुर, छापुर, नाखनौल, कहरानी, बनबन, झिवाणा, निंबाड़ी में हरियाणा के माफिया भी व्यापक स्तर पर फैले हुए हैं. और यहां के करीब एक हजार हैक्टेयर इलाके में पहाड़ खत्म हो चुके हैं. यहां पहाड़ों के खत्म होने के कगार पर पहुंचने के बाद माफियाओं ने तिजारा और किशनगढ़बास में अपना कारोबार फैलाया और नीमली, बाघोर, देवता, मांछा क्षेत्र के पहाड़ों में खनन शुरू कर दिया है.

काथिरवेल के मुताबिक, 1998 से 2003 के बीच एक हजार वाहनों से प्रति दिन दो ट्रिप के हिसाब से छह हजार करोड़ रु. का अवैध खनन हुआ. इसी तरह 2003 से 2008 के बीच 12 हजार करोड़ रु. और 2008 से 2013 के बीच 30 हजार करोड़ रु.का अवैध खनन हुआ है.

खनन रोकने में सबसे बड़ी परेशानी है इस कारोबार से जुड़े लोगों के पास भारी मात्रा मंड विस्फोटक और अवैध हथियारों का होना, जिनके मुकाबले पुलिस के संसाधन पर्याप्त नहीं हैं. धौलपुर के एसपी राजेश सिंह कहते हैं, ''खनन माफिया के लोग गुट बनाकर चलते हैं. ये लोग खनन के रास्ते में आने वाले की जान लेने से परहेज नहीं करते चाहे वह कितना बड़ा अधिकारी ही क्यों न हो. ''

हिंसक रुख अख्तियार कर चुके खनन माफिया के हौसले इतने बुलंद हैं कि अब उनके डंपर पुलिस चौकी, थानों और वन विभाग की चौकियों के सामने से बेखौफ निकलते हैं. और अपने खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाने से वे डरते नहीं.

बूस्टर सीजन -4 का फाइनल नौ जून को

आबूलेन पीपीपी कांफ्रेंस हॉल के निकट स्थित बीट्स ऑफ डांस के डांस बूस्टर सीजन-4 का ऑडीशन मेरठ रॉकर्स एकेडमी में किया गया। ऑडीशन में बच्चों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। बीट्स ऑफ डांस के डायरेक्टर समीर खुर्शीद ने बताया कि डांस बूस्टर सीजन का तीसरा और आखिरी ऑडीशन तीन मई को होगा। इसका फाइनल नौ जून को होगा। इस मौके पर डांस इंडिया डांस की कोरियोग्राफर गीता कपूर बच्चों के हुनर को परखेंगी। दूसरे ऑडीशन में जज के रूप में दिव्या जैन, मीता, समीर खुर्शीद रहे।

दुश्मन मिले सबेरे लेकिन मतलबी यार न मिले

नौचंदी के पटेल मंडप में मंगलवार रात लखनऊ से पहुंचे भोजपुरी अवध गायक सुरेश कुशवाहा एंड ग्रुप ने रंगारंग प्रस्तुति पेश करते हुए समां बांध दिया। कलाकारों के ग्रुप ने भोजपुरी गीतों के साथ नृत्य कर दर्शकों की तालियां बटोरीं।
शुभारंभ विशाल कुमार ने साई भजन से किया। भोजपुरी गायक सुरेश ने मंच संभाला और भोजपुरी स्टाइल में भगवान शिव की स्तुति का गुणगान किया। 'रटन कहने लगी राम ही राम' गीत के बाद सुरेश ने 'दुश्मन मिले सबेरे लेकिन मतलबी यार न मिले' गीत गाकर प्रेम भावना से रहने का संदेश दिया। समाज में बढ़ती जा रही दहेज प्रथा को 'दूल्हे का मुंह जैसे फैजाबादी बंडा, दहेज में मां-बाप मांगे हीरो-होंडा' से बयां कर दहेज लोभियों को करारा जवाब दिया। 'यदि घर-घर के रगड़े-झगड़े आपस में मिट जाएंगे, गांधी के पुजारी खद्दर वाले कहां जाएंगे' गीत सुनाकर राजनीति के गिरते स्तर पर तीखा कटाक्ष किया। इसके बाद गायिका जया ने मंच संभाला। उन्होंने 'रेलिया बैरन पिया को लिया जाए रे, दीन भर चाहे जहां रही हो हमार पिया' गीत की नृत्य के साथ रंगारंग प्रस्तुति दी। भोजपुरी कलाकारों के ग्रुप में आफाक वारसी ने ढोलक, लालधर वर्मा ने आर्गन, सिबले ने बैन्जों के अलावा पैड पर शिवम व जयनाथ यादव ने झींका पर सुरीले संगीत से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।

Tuesday, 28 April 2015

पूरी तरह अभी भी पटरी पर नहीं आई सफाई व्यवस्था

नगर निगम के सफाई कर्मचारियों की हड़ताल खत्म होने के बाद शहर की सफाई व्यवस्था अभी भी पूरी तरह पटरी पर लौटती नहीं दिख रही है। ग्यारह दिन की हड़ताल जब रविवार को टूटी तो अफसरों ने राहत की सांस ली थी। मंगलवार को नगर निगम कर्मचारी सुबह से सफाई करने के लिए जुटे। सफाई एवं खाद्य निरीक्षकों की अगुवाई में टीमें बनकर चलीं। मुख्य सड़कों के साथ ही चौराहों पर अभियान चलाया गया। कई कालोनियों से भी कूड़े का उठान हुआ।
यहां हुई सफाई
मंगलवार को बेगमपुल, हापुड़ अड्डा, गांधी आश्रम, तेजगढ़ी चौराहा, बच्चा पार्क, घंटाघर, रेलवे रोड चौराहा, मेट्रो प्लाजा आदि मुख्य चौराहों के साथ ही सड़कों पर सफाई की गयी। सड़कों पर मिट्टी व कूड़े को इकट्ठा कर ट्रालियों व निगम गाड़ियों से उठान किया गया। इसके अलावा मोहल्लों में भी सफाई की सुध ली गयी। हालांकि कई मोहल्ले मंगलवार को भी सफाई की बाट जोहते रहे। साकेत, मानसरोवर कालोनी, शास्त्रीनगर, जागृति विहार, अजंता कालोनी, दामोदर कालोनी, प्रेमप्रयाग, गंगानगर, पंचशील कालोनी, बैंक कालोनी, सूरजकुंड, फूलबाग कालोनी, नेहरूरनगर आदि क्षेत्रों के कई मुहल्लों में सफाई कर्मी दिखे। पुराना इकट्ठे कूड़े का उठान किया गया। वहीं इन कालोनियों के कुछ मोहल्लों के साथ ही शहर के कई इलाकों में गंदगी के अंबार लगे रहे। नगर आयुक्त एसके दुबे ने कहा कि सफाई व्यवस्था पटरी पर आ गयी है, एक-दो दिन में व्यवस्था सामान्य हो जाएगी।

अभियान चला शराबी चालकों की धरपकड़

शराब पीकर दोपहिया और चौपहिया वाहनों को ड्राइव करने वाले लोगों की अब खैर नहीं है। ट्रैफिक पुलिस ने मंगलवार रात से अभियान चलाया। पुलिस का अभियान बेगमपुल और जीरोमाइल के अलावा कई मुख्य चौराहें पर चला, जिसमें करीब दो दर्जन से अधिक वाहनों के चालन और कई वाहन सीज किए गए।
वाहन चेकिंग के अभियान की कमान खुद ट्रैफिक सीओ बीएस वीर कुमार ने संभाल रखी थी। चार टीएसआई और पुलिसकर्मियों को जगह-जगह लगाकर वाहनों की घेराबंदी की गई। कई कारों में शराब की बोतलें, सोड़ा और नमकीन के पैकेट मिले। वहीं दोपहिया वाहन चालकों के मुंह में एलकोहल मीटर लगाकर जांच की गई। जिन वाहन चालकों की जांच में शराब पीना आया, उनका चालान काटा गया और जिनके पास वाहन के कागजात नहीं थे, उनको सीजा किया गया। बेगमपुल पर चेकिंग में एक बाइक चालक को रोका गया, लेकिन उसने बाइक तेज कर दी। घेराबंदी कर चालक को दबोचकर सड़क पर उसकी धुनाई की गई। पुलिस चेकिंग को देख कई वाहन चालक को काफी दूर से ही वापस हो गए।

मदद को बढ़ाए हाथ

मेरठ : नेपाल में आए भूकंप में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए विभिन्न स्थानों पर शोक सभाएं हुई। इस दौरान लोगों ने दो मिनट का मौन धारण कर श्रद्धांजलि दी और मृतकों के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की।

भारतीय बौद्ध महासभा की ओर से बुद्ध विहार में लोगों ने दो मिनट का मौन धारण कर श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान महेंद्र सिंह, ललित बौद्ध, रवि कुमार, पवन कुमार, यशपाल, श्री पाल आदि मौजूद थे। नोबल पब्लिक स्कूल में छात्र-छात्राओं ने कैंडल मार्च निकालकर दो मिनट का मौन धारण किया। श्रद्धांजलि देने वालों में प्रिंसिपल संतोष मेहता, अनिल चौधरी और अमित चौधरी शामिल रहे। डा. भीमराव अंबेडकर कल्याणकारी सेवा संस्थान के कार्यालय पर बैठक हुई, जिसमें आपदा में मारे गए लोगों को दो मिनट का मौन धारण कर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। मोहन लाल सहगल, डा. सेवा राम कैन, जौहरी मल, रीना गौतम कैली, चतर सिंह, ज्योति प्रसाद जाटव आदि उपस्थित रहे।

उधर, भूकंप पीड़ितों की आर्थिक मदद के लिए अब अधिवक्ता भी आगे आ गए हैं। उन्होंने बुधवार से पीड़ित परिवारों की मदद के लिए धनराशि एकत्र करने का निर्णय लिया। जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव कुमार त्यागी व महामंत्री संदीप चौधरी ने बताया कि भूकंप पीड़ितों की आर्थिक मदद के लिए बुधवार से कचहरी में धनराशि एकत्र करेंगे। धनराशि डीएम पंकज यादव को सौंपी जाएगी।

केदारनाथ: जहां मौत भी देती है उपहार

हिंदू धर्म में बहुत से तीर्थ स्थल हैं जिनकी यात्रा का अपना-अपना महत्व है लेकिन जब तक चार धाम यात्रा न कर लें तब तक यात्रा अपूर्ण ही रहती है। यह चार धाम है:- बद्रीनाथ, द्वारिकाधीश, जगन्नाथ और रामेश्वरम। मान्यता है की श्री हरि विष्णु बद्रीनाथ में स्नान करते हैं, द्वारिकाधीश में वस्त्र पहनते हैं, जगन्नाथ में भोजन करते हैं और रामेश्वरम में विश्राम करते हैं। शास्त्रों के अनुसार बारह ज्योतिर्लिंगों में केदारनाथ में स्थापित ज्योतिर्लिंग सबसे ऊंचे स्थान पर है।
धर्म शास्त्रों के अनुसार भविष्यवाणी की गई है की इस सारे क्षेत्र में जितने भी तीर्थ विद्यमान हैं वह सारे आने वाले समय में लुप्त हो जाएंगे। मान्यता है कि जब नर और नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे उस दिन बद्रीनाथ का रास्ता पूर्ण रूप से बंद हो जाएगा। बद्रीनाथ के दर्शन सदा के लिए बंद हो जाएंगे। उत्तराखंड में धटित प्राकृतिक आपदा इस ओर संकेत करती है। भविष्य में बद्रीनाथ धाम और केदारेश्वर धाम अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और फिर लंबे समय के उपरांत भविष्य में भविष्यबद्री नाम से नए तीर्थ का उद्गम होगा।

Topper बनना चाहते हैं तो समस्याओं का हल ढूंढना सीखो

- समय चाहे पढ़ाई का हो या परीक्षा का, समझदार छात्र अपने खानपान के साथ नींद का भी पूरा ध्यान रखते हैं। नींद न लेने से या बहुत कम लेने से भी हमारे दिमाग की याद्दाश्त क्षमता पर बुरा असर पड़ता है।
- टॉपर बनने के लिए गति से अधिक दिशा महत्वपूर्ण होती है।
- वही छात्र टॉपर बन सकते हैं जो आशा धूमिल होते हुए भी प्रयास जारी रखते हैं। जिन्हें यह विश्वास होता है कि  वे सफल होंगे।
- गलतियां तो हर कोई ढूंढ लेता है, यदि टॉपर बनना चाहते हैं तो समस्याओं का हल ढूंढना सीखो ।
- टॉपर बनना उस समय तक नामुमकिन लगता है, जब तक हम उसे मुमकिन बनाने के प्रयास शुरू नहीं कर देते।
- असफलता का भय सफलता के रास्ते की सबसे प्रमुख रुकावट होती है ।
- कोई भी छात्र अपनी मेहनत और कर्मों से टॉपर बन सकता है ।
- बिना उत्साह के कभी भी कुछ महान हासिल नहीं किया जा सकता ।

सड़क पर रहने वाले बच्चे बना रहे अपना बजट

दिल्ली सरकार इन दिनों जनता से बजट तैयार करने के लिए रायशुमारी कर रही है। यह रायशुमारी वो मोहल्ला सभाओं के माध्यम से कर रही है।
दिल्ली सरकार का ये तरीका सड़क पर रहने वाले कुछ बच्चों को इतना भा गया है कि उन बच्चों को बजट से क्या चाहिए इसका पूरा मेमोरंडम तैयार कर डाला है।
इन बच्चों ने राय ‌मश्विरे करके एक मसौदा तैयार किया है जिसमें उन्होंने ये लिखा है कि बच्चों को केजरीवाल सरकार से क्या उम्मीदें हैं।
बता दें कि ये बच्चे स्ट्रीट चिल्ड्रेन की एक फेडरेशन 'बढ़ते कदम' से जुड़े हैं। शनिवार को जब सरकार दिल्ली में मोहल्ला सभाओं की श्रंखला आयोजित कर रही थी तब ये बच्चे खुद एक-दूसरे सलाह मश्विरा कर खुद के अनुभव के आधार पर अपना बजट बनाने में लगे हुए थे।
ये सभी बच्चे अपने अपने-अपने चार्ट और मार्करों के साथ अपना प्लान बनाने बैठे थे ताकि वो सरकार के बजट बनाने की प्रक्रिया में सहायता कर सकें। जब मुशरत परवीन से पूछा गया कि उस जैसे लगभग 16 साल के बच्चों की क्या जरूरत है तो अपनी मां के साथ घरों में काम करने वाली मुशरत बोली कि 'सर्वे जरूरी है।'
मुशरत की बात का समर्थन करते हुए बेघर लोगों के लिए बने रैनबसेरे में रहने वाली ज्योति कहती है कि ‌अगर सर्वे होगा तो वो और बच्चों से मिल पाएंगे और उन्हें समझा पाएंगे कि कमाई के लिए पढ़ाई कितनी जरूरी है।
इन बच्चों ने न केवल यह सुझाया है कि सर्वे होने चाह‌िए बल्कि इन लोगों ने सर्वे किस तरह से किए जाएंगे उसका पूरा विस्तार में खाका भी तैयार कर लिया है। इसमें उन्होंने बताया है कि कैसे 11 जिलों में ये सर्वे होंगे और इस वक्त वो सर्वे पर कितना खर्च आएगा उसे तैयार करने में लगे हैं।
चांदनी जो शहीद कैंप वेस्ट दिल्ली में रहती है सीएम से और रैनबसेरों की मांग करने वाली है। ये बच्चे जब बजट तैयार कर रहे थे तो इनके बहस का जो सबसे बड़ा मुद्दा था वो बच्चों के लिए और रैनबसेरों की मांग का ही था।
दूसरा जो मुद्दा सबसे अहम था वो स्वास्थ्य का सामने आया। वर्तमान समय में अगर उन्हें किसी का साथ न मिले तो उन्हें स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध नहीं होती।
कूड़ा बिनने वाले बच्चों में कुत्ता काटने की समस्या आम बात है। लेकिन अगर वो इसके इलाज के लिए सरकारी अस्पताल जाते हैं तो या तो उन्हें भगा दिया जाता है या उनका इलाज करने से मना कर दिया जाता है।
इन बच्चों ने ही बताया कि कई ऐसे बच्चे रेबीज के शिकार हो जाते हैं बल्कि कई मर भी जाते हैं। वेटर का काम करने वाले चंदन ने बोला कि वो दिल्ली सरकार से कम से कम बच्चों के लिए चार अस्पताल बनाने को कहेंगे ताकि उन्हें सही इलाज मिल सके।

महान वैज्ञानिक बोले, नहीं तो मिट जाएगा इंसान का नामोनिशान

स्टीफन हॉकिंस ने कहा है कि मानव जाति को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए पृथ्वी को छोड़कर अंतरिक्ष में कहीं और बसेरा तलाशना होगा।
मानव जाति को ऐसा 1000 साल के अंदर करना होगा। अगर ऐसा नहीं होता है तो मानव जाति का नामोनिशान मिट सकता है। हॉकिंस ने कहा है कि मानव जाति को अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए अंतरिक्ष में जाना होगा।
उन्होंने कहा है कि उन्हें नहीं लगता कि अगले 1000 साल तक मानव जाति पृथ्वी से पलायन किए बगैर सुरक्षित रह सकती है। हॉकिंस ने ये बातें सिडनी ओपेरा हाउस में आयोजित वार्ता में कही।
स्टीफन हॉकिंस ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उदय से मानव जाति को खतरे की चेतावनी दी है। साथ ही मानव जाति को बचाने के लिए किसी दूसरे प्लेनेट की तलाश करने को कहा है।
इस वार्ता में हॉकिंस की उपस्थिति टेक्नोलॉजी के सहारे दर्ज हुई। हॉकिंस कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के अपने ऑफिस में ही बैठे रहे और वहीं से सिडनी ओपेरा हाउस में हुई आयोजन में हिस्सा लिया।
इसके लिए होलोग्राफिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया, जिसके जरिए हॉकिंस की 3डी इमेज सिडनी ओपेरा हाउस में पहुंचाई गई।
अपने लेक्चर के अंत में हॉकिंस ने उन्हें सुन रहे सभी लोगों को उत्साहित करने के लिए कहा कि मानव जाति को अब सितारों की ओर देखने की जरूरत है, न कि अपने पैरों के नीचे।
विश्व प्रसिद्ध महान वैज्ञानिक और बेस्टसेलर रही किताब 'अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम' के लेखक स्टीफन हॉकिंग ने शारीरिक अक्षमताओं को पीछे छोड़ते हु्ए यह साबित किया कि अगर इच्छा शक्ति हो तो व्यक्ति कुछ भी कर सकता है।
हमेशा व्हील चेयर पर रहने वाले हॉकिंग किसी भी आम इंसान से इतर दिखते हैं। कम्प्यूटर और विभिन्न उपकरणों के ज़रिए अपने शब्दों को व्यक्त कर उन्होंने भौतिकी के बहुत से सफल प्रयोग भी किए हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ़ केम्ब्रिज में गणित और सैद्धांतिक भौतिकी के प्रेफ़ेसर रहे स्टीफ़न हॉकिंग की गिनती आईंस्टीन के बाद सबसे बढ़े भौतकशास्त्रियों में होती है। उनका जन्म इंग्लैंड में आठ जनवरी 1942 को हुआ था।
यह पूछने पर कि क्या अपनी शारीरिक अक्षमताओं की वजह से वह दुनिया के सबसे बेहतरीन वैज्ञानिक बन पाए, हॉकिंग कहते हैं, ''मैं यह स्वीकार करता हूँ मैं अपनी बीमारी के कारण ही सबसे उम्दा वैज्ञानिक बन पाया, मेरी अक्षमताओं की वजह से ही मुझे ब्रह्माण्ड पर किए गए मेरे शोध के बारे में सोचने का समय मिला। भौतिकी पर किए गए मेरे अध्ययन ने यह साबित कर दिखाया कि दुनिया में कोई भी विकलांग नहीं है।''
हॉकिंग को अपनी कौन सी उपलब्धि पर सबसे ज्यादा गर्व है? हॉकिंग जवाब देते हैं ''मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि मैंने ब्रह्माण्ड को समझने में अपनी भूमिका निभाई। इसके रहस्य लोगों के लिए खोले और इस पर किए गए शोध में अपना योगदान दे पाया। मुझे गर्व होता है जब लोगों की भीड़ मेरे काम को जानना चाहती है।''
हॉकिंग के मुताबिक यह सब उनके परिवार और दोस्तों की मदद के बिना संभव नहीं था।
यह पूछने पर कि क्या वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं हॉकिंग कहते हैं, ''लगभग सभी मांसपेशियों से मेरा नियंत्रण खो चुका है और अब मैं अपने गाल की मांसपेशी के जरिए, अपने चश्मे पर लगे सेंसर को कम्प्यूटर से जोड़कर ही बातचीत करता हूँ।''
मरने के अधिकार जैसे विवादास्पद मुद्दे पर हॉकिंग बीबीसी से कहते हैं, ''मुझे लगता है कि कोई भी व्यक्ति जो किसी लाइलाज बीमारी से पीड़ित है और बहुत ज्यादा दर्द में है उसे अपने जीवन को खत्म करने का अधिकार होना चाहिए और उसकी मदद करने वाले व्यक्ति को किसी भी तरह की मुकदमेबाजी से मुक्त होना चाहिए।''
स्टीफन हॉकिंग आज भी नियमित रूप से पढ़ाने के लिए विश्वविद्यालय जाते हैं, और उनका दिमाग आज भी ठीक ढंग से काम करता है।
ब्लैक होल और बिग बैंग थ्योरी को समझने में उन्होंने अहम योगदान दिया है। उनके पास 12 मानद डिग्रियाँ हैं और अमेरिका का सबसे उच्च नागरिक सम्मान उन्हें दिया गया है।

कहर के बाद करिश्मा, 3 दिन बाद मलबे से ‌जिंदा निकली महिला

नेपाल में कुदरत के कहर के बाद इसका करिश्मा भी देखने को मिल रहा है। बचावकर्मियों ने शनिवार के भारी भूकंप से जमींदोज हो चुके एक पांच मंजिला मकान के मलबे से मंगलवार को एक महिला को सुरक्षित निकाल लिया
कई और लोगों के साथ मलबे में फंसी सुनीता सितौला नाम की इस महिला ने बाहर निकलते ही कहा कि लगता है मैं किसी दूसरी दुनिया में आ गई हूं। ई-कांतिपुर की रिपोर्ट के मुताबिक अब यह महिला अपने पति और दो बेटों के साथ एक स्कूल में शरण लिए हुए है।
उसके पति और बच्चे उसे पाकर बेहद खुश हैं। ये लोग भूकंप के दौरान किसी तरह खुद को बचाने में सफल रहे थे। नेपाल में बड़ी तादाद में मकान धंस गए हैं और इनमें अब भी सैकड़ों लोग फंसे हैं।
देश में खाना, पानी, बिजली और दवाई की भारी किल्लत है और लोग और भूकंप आने के डर से खुले मैदान में अस्थायी शिविरों में रहे हैं। जहां तक नजर जाती है तंबू ही तंबू दिखाई पड़ते हैं।

मौत के मुंह से बचकर आई प्रीति ने सुनाई भूकंप की खौफनाक कहानी

झटके के सिवा कुछ अहसास नहीं हुआ। धरहरा भरभरा कर गिर पड़ा। नेपाल के ‘कुतुबमीनार’ माने जाने वाले दो सौ तीन फीट ऊंचे धरहरा मीनार के मलबे में दबने से शनिवार को ही 180 लोगों की मौत हो गई थी।
खुशबू, प्रीति और उनकी मां बुढाथोकी खुशकिस्मत रहीं। मां और दोनों बेटियों का इलाज राजधानी के सिविल अस्पताल में चल रहा है। चार्टर्ड एकाउंटेंसी की छात्रा प्रीति कैसे धरहरा से नीचे कुछ पता नहीं चला। वह यह भी नहीं कैसे और किसने उसे अस्पताल पहुंचाया।
इस प्राकृतिक आपदा में भले इन तीनों की जान बच गई लेकिन बुढ़ाथोकी के चार सगे-संबंधियों का अब तक कोई अता-पता नहीं है। बैंक में काम करने वाली खुशबू काफी सहमी है।
वह कुछ भी बता नहीं पा रही है लेकिन अपनी बहन और मां को अस्पताल में साथ देखकर हैरान भी है। मां को पहले अस्पताल के अलग वार्ड में रखा गया था।
बाद में अस्पताल निदेशक डॉ विमल थापा ने सभी को एक ही वार्ड में रखवाया। प्रीति को गंभीर चोट है। ट्यूब डाला गया है। कुछ दिन और अस्पताल में ही रहना होगा। अस्पताल के निदेशक ने कहा खुशबू और मैया को अब बेहतर हैं लेकिन तीनों खतरे से बाहर हैं।नेपाल में शनिवार को सरकारी छुट्टी रहती है। इस दिन अधिकांश लोग घूमने निकलते हैं। काठमांडू में धरहरा सभी के आकर्षण का केंद्र था। और तो और नए वर्ष पर एमाले के अध्यक्ष केपी ओली भी धरहरा गए थे।
तब से नेपाल के लोगों का आकर्षण और बढ़ा। धरहरा का निर्माण 1832 में प्रधानमंत्री भीमसेन थापा ने कराया था। इस मीनार से काठमांडू को देखने का खास आनंद था।
1934 के भूकंप मे भी नौ माले का धरहरा टूट गया था। इसका पुनर्निर्माण कराया गया था। धरहरा मे दो सौ 13 सीढ़ियां थीं। इसे 2005 से आम लोगों के लिए खोल दिया गया था।
‘अचानक धरहरा हिला और मैं नीचे गिर गई, इसके बाद मुझे कुछ पता नहीं।’ यह कहना है प्रीति का। प्रीति अपनी बड़ी बहन और मां के साथ धरहरा देखने गई थी। शनिवार को जब भूकंप आया तो तीनों धरहरा के सातवें मंजिल पर थीं।

मुस्कराइये कि आप नौचंदी मेले में हैं

यूं तो यह दुनिया ही एक मेला है, मगर इसमें बहुत झमेला है। इसलिए झूला-सर्कस, बांसुरी-पिपिहरी, हलवा-पराठे वाले, गंवई-शहरी मिजाज वाले, मेले में चलिए। आपका अपना नौचंदी मेला। रोज के दुनियावी सर्कस से मन उचाट है तो यहां का जीवंत सर्कस देखिए। नींद न आने की बीमारी है तो मेले में आइए। मन बहलेगा। नींद भी आएगी। परंपराएं बदली हैं, मूड बदला है, लेकिन उत्सवधर्मिता बरकरार है। रोजाना हजारों की संख्या में उमड़ने वाली भीड़ गवाह है।
गंगा-जमुनी तहजीब की खुशबू से मेला गुलजार है इन दिनों। यहां, घुसते ही तरह-तरह की आवाजें, नजारे शहर की आम जिंदगी से अलग ले आते हैं। बैलों की घंटी-घुंघरू की जगह अब मोटरों की चिल्ल-पों है, पर इस शोर में भी अलग तरह का सुकून। मेले के स्वाद का कोई मेल नहीं। यहां सॉफ्टी है, भेलपूरी है। हलवा-पराठा, खजला-नान खताई की सोंधी खुशबू है। मुंह में लार है, मगर हाथ खाली। गोलगप्पे खाकर गाल कुप्पा करने का यहां अपना आनंद है। इन्हीं दुकानों पर कुछ खाते हुए, कुछ भसकते हुए तो एकाध आगे बढ़ने को लरजते हुए चेहरे नजर आते हैं। पांच रुपये, दस रुपये की वकत अभी भी यहां दुकानों पर मिल जाएगी। हालांकि इस कीमत में भी मोलभाव करने वाले कुछ चेहरे नजर आते हैं। मेला इसलिए न छोड़िए कि आगरे से घाघरा नहीं आया है, यहां सब कुछ मिलेगा। लघु उद्योगों के तमाम हुनर बिखरे पड़े हैं। आप यहां निशानेबाजी पर हाथ आजमा सकते हैं या फिर छल्ले फेंककर किस्मत। कुछ नहीं तो तजुर्बा जरूर मिलेगा। पांच मिनट में फोटो खिंचाकर मेले की स्मृतियां संजो सकते हैं। तनाव में हैं तो दस रुपये में पूरा हंसीघर मौजूद है। सात अजूबे सुने होंगे, लेकिन इसी हंसीघर के पास लगे पोस्टर में आठवें अजूबे की तस्वीर नजर आती है- 'दुनिया का सबसे लंबा शख्स।'
प्रचार-प्रसार की गरज से टेलीविजन धारावाहिकों की बड़ी-बड़ी होर्डिग भी जहां-तहां लटकी हैं। सर्कस के करतब में जीवन संघर्ष दिखेगा, मगर उनकी दिलेरी-जांबाजी आपको नई ऊर्जा देगी। दांतों तले अंगुलिया चाहे तो आप न दबाएं। यहां कमसिन बालाओं की अदाओं पर नीयतें डोलती हैं तो अब जानवरों का कमाल न देख पाने का मलाल भी है। जोकर की हरकतें मसखरी होने के साथ ही अब थोड़ी फूहड़ हो चली हैं। शायद यह वक्त की नजाकत है। और शायद वजूद बचाए रखने की कोशिश भी।
इसी मेला मैदान में भीड़ का फायदा उठाकर ठांव-कुठांव धक्का मारते छिछोरे भी नजर आते हैं। पलटकर, चढ़ी भौहों वाली कुछ नजरें घूरती हैं। जवान खून में गुदगुदी भले होती हो, मगर बुजुर्गो को मेले की यह संस्कृति मैली लगती है। लेकिन शायद यह भी मेले के मिजाज का एक हिस्सा है, यह सोचकर कदम बढ़ते जाते हैं। कुरेदने पर 'अब वह बात कहां' की शिकायतें और अफसोस जाहिर करते झुर्रीदार चेहरे मेले के सुनहरे अतीत से मुलाकात कराती हैं।
पटेल मंडप में अलग मेला आबाद है। यहां के रंगारंग कार्यक्रम मन के सरगमी तारों को झंकृत करते हैं। आसमान छूते झूलों पर बैठकर चाहें तो शहर के साथ आंखों से चहलकदमी करें या फिर ब्रेक डांस के हिचकोलों का आनंद ले सकते हैं। बशर्ते दिल बैठने का डर न हो। मेला उजड़ जाए, इससे पहले कुछ पल जरूर गुजारिए नौचंदी मैदान में!
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