Tuesday, 31 March 2015

आडवाणी-अमिताभ को पद्म सम्मान!


नई दिल्ली। मोदी सरकार ने पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, फिल्म अभिनेता अमिताभ, रजनीकांत समेत 148 लोगों को पद्म सम्मान प्रदान करने का निर्णय लिया है। 25 जनवरी को इन पुरस्कारों का आधिकारिक ऐलान किया जाएगा। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार लालकृष्ण आडवाणी, अभिताभ बच्चन, रजनीकांत, रामदेवऔर श्रीश्री रविशंकर को पद्म विभूषण सम्मान प्रदान किया जाएगा। दिलीप कुमार, केएस वाजपेयी, अशोक गुलाटी, हरीश साल्वे, एन गोपाल स्वामी, पीवी राजा रमन को पद्म भूषण पुरस्कार दिया जाएगा। बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधू, हॉकी स्टार सरदारा सिंह, पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा को पद्म श्री पुरस्कार प्रदान किया जाएगा।

30 साल से चाय पर जिंदा है ये महिला!

पटना।।  क्या कोई इंसान सिर्फ चाय पीकर जिंदा रह सकता है। वो भी 1-2 साल नहीं बल्कि पूरे 30 सालों तक। जी हां सुनकर आपको भले ही पहले आपको यकीन ना हो लेकिन ये हकीकत है। बिहार के हाजीपुर में रहने वाली एक महिला पिछले 30 सालों से सिर्फ चाय पर जिंदा है। आप इसे कुदरत का करिश्मा कहे या कुछ और लेकिन एक महिला ने अपने पति के मौत के बाद लगातार 30 साल तक अन्न जल त्याग दिया और केवल चाय पर अपने को जिंदा रखा। केवल चाय पर जिंदा रखने की इस मिसाल पर आसपास के लोग महिला को चाय वाली चाची और दादी के नाम से पुकारते हैं। हाजीपुर से महज 6 किलोमीटर की दूरी पर रामपुर नाम का एक गांव है। आम गांव की तरह दिखने वाला गांव किरण देवी नाम की इस महिला की वजह से अचानक सुर्खियों में आ गया है। दरअसल करीब 30 साल पहले किरण देवी के पति उपेंद्र सिंह का देहांत हो गया था उसके बाद पति के मौत से किरण देवी इतनी दुखी हुई कि उनके वियोग में उन्होंने अन्न जल त्याग दिया। और चाय पीकर जीवन गुजारने लगी। इसे कुदरत का करिश्मा ही कहा जाएगा कि किरण देवी ने पति के वियोग में लगातार 30 सालों तक केवल चाय पर जिंदा रहने की मिशाल कायम की है।

भारत की सबसे वृद्ध महिला का देहांत

त्रिचूर (केरल)। देश की सबसे वृद्ध 112 वर्षीय महिला कुंजननाम एंटनी का मंगलवार को यहां एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उनके परिवार ने बताया कि उन्हें सोमवार रात अस्पताल में भर्ती कराया गया था और मंगलवार सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। उन्हें वृद्धावस्था से संबंधित बीमारिया थीं।वर्ष 2014 में लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ने कुंजननाम को देश की सबसे वृद्ध महिला बताया था। वे अविवाहित थीं। कुंजननाम के परिवार के पास गिरिजाघर से जारी बपतिस्मा प्रमाण-पत्र भी है, जो यह बताता है कि 20 मई, 1903 को उनका बपतिस्मा किया गया था।

देश को बनाना है वाईफाई कंट्री: प्रो0एनके गोयल

भारत में सीएमएआई के नाम से सभी परिचित हैं, खासतौर से टेलीकॉम सेक्टर। सीएमएआई इंफोर्मेशन एंड टेक्नॉलॉजी के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान दे रही है। सीएमएआई के अध्यक्ष प्रो0 एन के गोयल से हुई एक मुलाकात में उन्होंने बताया कि किस तरह सीएमएआई आईसीटी सेक्टर और डिजिटल इंडिया में योगदान कर रही है। सीएमएआई देश की पहली और अकेली ऐसी सोसिएशन है जो शिक्षा, साइबर सुरक्षा, संचार, मल्टीमीडिया, मन्युफैक्चरिंग और बुनियादी ढांचा क्षेत्र के काम कर रही है। CMAI ने अब तक साइबर सुरक्षा में 10,000 से अधिक प्रतिनिधियों को प्रशिक्षित किया है। अब सीएमएआई का सपना है कि पूरा हिन्दुस्तान वाईफाई से लैस हो।

देश मे डिजिटल इंडिया का दौर चल रहा है, सूचना प्रोद्योगिकी से जुड़े होने के नाते आप डिजिटल इंडिया को कैसे सपोर्ट कर रहे हैं? 
डिजिटल इंडिया भारत सरकार का एक ऐसा प्रोग्राम है जिसमें हम चाहते हैं कि भारत के हर गांव और शहर के बच्चे के हाथ में इंटरनेट कनेक्शन हो चाहे मोबाइल से हो या कम्प्युटर से हो, उसके लिये हमारी एसोसिएशन सीएमएआई, टेक्नॉलॉजी को देश भर में सुलभ बनाने के लिये काम कर रही है। इसके लिये सबसे आसान तरीका है मोबाइल। इस क्षेत्र में हमारी एसोसिएशन के सदस्य डाटाविंड ने सबसे सस्ता फोन इंटरनेट सुविधा के साथ भारतीय बाजार में इंट्रोड्यूस कर दिया है। ये एक महत्वपूर्ण कदम है।
आपका अगला विजन क्या है?
हमारा अगला विजन है हिन्दुस्तान को वाईफाईलैस कंट्री बनाने का। भारत सरका भी इस दिशा मं बात कर रही है। लेकिन इसमे सबसे बड़ी समस्या ये है टेक्नॉलॉजी की, इसके समाधान के लिए हमने एक टेक्नॉलॉजी आईडेंटीफाई की है उस पर काम हो रहा रहा। उम्मीद है हम जल्द ही इसे भी भारत में पेश करेंगे।
डाटाविड के इस रिवोल्युशननरी डिवाइस की बात करे तो अभी इसका प्रोडक्शन कितना हुआ है, अभी तो ये फोन भारत से बाहर बन रहे हैं?
जी हां!, प्रोडक्शन का काफी काम हो चुका है कुछ डिवाइसेस अभी बाहर से ही आ रही हैं।, लेकिन तीन महीने के अन्दर-अन्दर इसका 90% प्रोडेक्शन भारत में शिफ्ट हो जायेगा, जिससे यहां नये जॉब्स क्रिएट होंगे।

सीएमएआई का इसमे क्या रोल होगा
हमारी एसोसिएशन है जिसमे डाटाविंड मेम्बर हैं, हम इन्हे हेल्प करते रहते हैं,  जैसे टेक्नॉलॉजी लाने में, या हिन्दुस्तान में स्थापित होने के लिये सारी फेसिलिटी उपल्ब्ध कराने के लिये हम काम करते रहते हैं।

रैना का इंतजार

अंतरराष्ट्रीय बल्लेबाज सुरेश रैना का शादी से पहले ही ससुराल में जबरदस्त इंतजार रहा। रैना के साले विवेक की शादी के अवसर पर सभी रिश्तेदार एवं बाराती स्टार क्रिकेटर की एक झलक देखने के लिए देर रात तक डटे रहे, किंतु वह नजर नहीं आए। पंडाल में लोग सुरेश रैना और उनकी मंगेतर प्रियंका की एक झलक पाने के लिए बेताब रहे। पंडाल में भारी भरकम सुरक्षा के बीच मीडिया को भी एंट्री नहीं मिली। इस दौरान कई मीडियाकर्मियों से झड़प भी हुई बाईपास स्थित एक निजी रेसार्ट में सुरेश रैना के साले विवेक की शादी हुई। माना जा रहा था कि तीन तारीख को तय अपनी शादी से पहले सुरेश रैना विवेक की शादी में मेरठ आएंगे, किंतु देर रात तक उनकी झलक नहीं मिली। रात करीब आठ बजे अंसल कालोनी से विवेक की बारात निकली। हालांकि इससे पहले ही रिसोर्ट में बड़ी संख्या में लोग पहुंच चुके थे। सुेरश रैना की एक झलक पाने के लिए रिसोर्ट पर भारी भीड़ जमा हो गई थी। चुनिंदा लोगों को ही शादी का निमंत्रण दिया गया था, ऐसे में पंडाल की सुरक्षा बेहद कड़ी रखी गई। बाहरी लोगों को गेट से एंट्री नहीं मिली। पंडाल में प्रियंका चौधरी की सर्वाधिक चर्चा रही, जिसकी शादी तीन अप्रैल को सुरेश रैना से होगी। अंसल कालोनी से लेकर बाईपास स्थित रिसोर्ट तक इस हाईप्रोफाइल शादी की चर्चा रही। विवेक और उनकी दुल्हन को बधाई देने वालों का तांता लगा रहा। पहले सूचना आई कि रात 11 बजे सुरेश रैना शादी में पहुंच सकते हैं। इसी बीच बड़ी संख्या में लोग गेट पर खड़े हो गए। उन्होंने बाराह बजे तक इंतजार भी किया। आखिर रैना के न आने पर कई लोगों ने उनके मां-बाप एवं भाई से मुलाकात की इच्छा जताई। लोगों ने माना कि आईपीएल नजदीक होने की वजह से कैंप के कारण रैना नहीं आ सकेंगे। बड़ौत के बमनौली गांव से भी बड़ी संख्या में बाराती पहुंचे। उन्होंने बताया कि तीन अप्रैल को सुरेश रैना एवं प्रियंका की शादी में भी वह अवश्य पहुंचेंगे, भले ही वह कहीं भी आयोजित की जाए।

आप सबका दायित्व: जल संरक्षण

देश में बढ़ती आबादी और बिगड़ते पर्यावरण ने सबसे ज्यादा प्रदूषित हवा और पानी को किया है जिसके बिना जीवन का कोई अस्तित्व नहीं। ऐसे में शुद्ध जल और वायु के लिए प्रयत्नशील रहना हमारा- आपका सबका दायित्व है लेकिन वास्तव में गिन-चुने लोग हैं जो इस बारे में ईमानदार पहल करते हैं। ऐसा ही एक नाम आईआईटी से पढ़ाई पूरी करने वाले हर्ष चौहान का है जिन्होंने झाबुआ जिले के भील बहुल क्षेत्र में पानी बचाने का अभियान शुरू किया। हर्ष ने वहां की स्थानीय परंपरा हलमा को इससे जोड़कर आदिवासियों को प्रेरित किया। आज वहां 20 हजार आदिवासियों का पानी के संरक्षण की मुहिम में जुटना इसका प्रमाण है कि उनके भीतर इस प्राकृतिक संपदा को बचाने की ललक बहुत गहरे जाग गई है। ठीक इसके उलट शहरों में सरकार द्वारा विज्ञापनों में लाखों रुपए फूंकने पर भी दशा जस की तस है। यह भी कटु सत्य है कि सबसे ज्यादा उपेक्षित समाज व स्थान भी आदिवासियों के ही हैं फिर भी बिना सरकारी सहायता के इतना पानी व हरियाली बचाना/बढ़ाना सचमुच स्तुत्य है। हर्ष चौहान जैसे समाजसेवियों व देशप्रेमियों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए ताकि दूसरे प्रेरणा ले सकें।साथ ही सरकार भी तालाबों के निर्माण/व गहरी कारण के लिए यदि गर्मी में मुफ्त मुरमा निकलकर ले जाने की छूट देवे तो कई तालाब बिना खर्च के गहरे हो सकते हे! ऎसे ही नयी तालाब भी बन सकते हे! छोटी नदियों पर चेक डैम बनाने का आदर्श उदाहरण उज्जैन जिले के भट पचलाना के शिक्षक मोहन सोलंकी ने पेश किया हे उन्होने पंचायत व जान सहतोग से 8 चेक डैम निर्मित करवाकर गाव की पेय जाल समस्या दूर करने के साथ ही वात्तेर ल्व्बल में बढ़ोतरी की हे!इन्हे भी पुरस्कृत किया जाना चाहिए!

25 साल से कोमा में पड़े शख़्स की 'प्रेम कहानी'

"लव जिहाद" के माहौल में एक अनोखी प्रेम कहानी है जो आपको जीवन और मृत्यु दोनों के बारे में सोचने पर मजबूर कर देगी। मैं इच्छा-मृत्यु पर स्टोरी करने के लिए घर से निकला था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में मेरी मुलाक़ात आइवी सिंह और उनकी मुंहबोली बेटी भूमिका से हुई। आइवी अपने ही घर में एक छोटा सा स्कूल चलाती हैं। बच्चों की चहल-पहल की आवाज़ दोपहर तक तो घर में गूंजती रहती है फिर एक चुप्पी सी छा जाती है। इस घर में एक ऐसा शख़्स भी रहता है जिनकी असाधारण कहानी, इच्छा-मृत्यु पर पहले से ही जटिल बहस को और उलझा देती है। पढ़िए आनंद सिंह की पूरी कहानी इस बेहद ख़ूबसूरत शख़्स का नाम आनंद सिंह है। जवानी की तस्वीरें देखें तो किसी फ़िल्म स्टार से कम नहीं। लेकिन ये पच्चीस साल पहले की बात है। वे भारतीय नौसेना में कार्यरत थे, आइवी से शादी के कुछ महीने बाद छुट्टियों के लिए घर लौट रहे थे कि उनकी मोटरसाइकिल दुर्घटना का शिकार हो गई। मस्तिष्क में चोट लगी और उनका जीवन हमेशा के लिए बदल गया। अब वह न बोल सकते हैं, न खा सकते हैं, न चलफिर सकते हैं और डॉक्टरों के अनुसार उनके फिर से सक्रिय होने की संभावना नहीं है। पच्चीस साल से वह बिस्तर पर पड़े हैं, नाक में ट्यूब डली हुई है, खाने के लिए वो टयूब का और खिलाने के लिए आइवी का सहारा लेते हैं। आइवी सिंह की कहानी इन पच्चीस वर्षों में उनकी हर ज़रूरत आइवी सिंह ने पूरी की है। उनकी उम्र लगभग 48 साल है।शादी के समय उन्होंने जवानी में क़दम रखा ही था कि इस हादसे ने उनका जीवन भी हमेशा के लिए बदल दिया। वे बताती हैं, "हम केवल छह-सात महीने ही साथ रहे। वह भी लगातार नहीं, क्योंकि आनंद की नौकरी ही ऐसी थी और फिर यह दुर्घटना हो गई। तब से मेरा जीवन आनंद की देखभाल में ही गुज़रा है।" जिस कमरे में आनंद दिन-रात लेटे रहते हैं, वह किसी अस्पताल के कमरे से कम नहीं है। एक अलमारी दवाइयों से भरी हुई है और उसमें ज़रूरत का सारा सामान मौजूद है, इंजेक्शन की सिरिंज से लेकर 'नेबोलाइज़र' ट्यूब तक। आइवी खुद एक प्रशिक्षित नर्स से कम नहीं हैं। मैं झिझकते हुए वो दो सवाल पूछ ही लेता हूँ जो मेरे दिल में तो हैं लेकिन ज़ुबान पर आसानी से नहीं आते कि क्या आपने आनंद को छोड़कर कभी दूसरी शादी के बारे में नहीं सोचा? और आपने अपना जीवन तो आनंद को जीवित रखने में गुज़ार दिया लेकिन वो क्या हालात होंगे जिनमें आप भी 'मर्सी किलिंग' या इच्छा मृत्यु का समर्थन कर सकती हैं? आईवी बताती हैं, "यदि कोई व्यक्ति कोमा में हो, पूरी तरह बेहोश और परिवार के पास इतना पैसा नहीं हो कि देखभाल कर सके तो यह किया जा सकता है क्योंकि उसे तो कुछ पता ही नहीं ।।।" और "हाँ मैंने शादी के बारे में सोचा था, लेकिन मेरी एक शर्त थी कि मेरे जीवन में जो भी दूसरा व्यक्ति आए उसे आनंद को भी स्वीकार करना होगा!" आइवी सिंह के जीवन में कोई दूसरा व्यक्ति तो नहीं आया। वे कहती हैं, "बीमार कोई जानबूझकर तो होता नहीं, शायद यही मेरी तक़दीर थी, मेरे माता-पिता ने हमेशा ही सिखाया था कि जिससे शादी हो रही है उसके दुख और परेशानी में शामिल रहना।" लेकिन दस साल पहले उन्होंने एक बच्ची को गोद लेने का फ़ैसला किया। भूमिका की कहानी आइवी सिंह बताती हैं, ''भूमिका एक यतीमख़ाने में पल रही थी। मुझे बेटी चाहिए थी, मैं उसे घर ले आई।'' अब भूमिका की उम्र दस-ग्यारह साल है। स्कूल से लौटते ही वह आनंद सिंह के साथ खेल में लग जाती है। "मुंह खोलो, मुंह बंद ।।। बोलो ए, बी, सी ।।। सब चीज़ें एक ही तरह बोलोगे।।।!" मुझे भी आनंद की बेजान आँखों में थोड़ी चमक नज़र आती है। वो गले से कुछ आवाज़ तो निकालने की कोशिश करते हैं लेकिन शायद इसका मतलब आइवी और भूमिका ही समझ सकते हैं।भूमिका भी अब पूरी फुर्ती के साथ वह सारे काम करती है जो पच्चीस वर्षों से आइवी करती आई हैं। इस बच्ची ने अपने जीवन का रास्ता भी तय कर रखा है, बड़े होकर वह डॉक्टर बनना चाहती है। मुश्किल सा सवाल आइवी और नन्ही भूमिका ने आनंद को ज़िन्दा रखा है। "उन्हें कुछ दिनों के लिए अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा तो घर बिल्कुल सूना हो गया।" लेकिन मेरे मन में यह सवाल उठता है कि जो प्यार और देखभाल आनंद को मिली है, वो दूसरे कितने लोगों को मिल पाती होगी? कितने लोग आईवी की तरह अपना जीवन क़ुर्बान करने का जज़्बा रखते होंगे और यदि मरीज़ के ठीक होने की कोई संभावना न हो तो क्या उन्हें ये क़ुर्बानी देनी भी चाहिए? यही चर्चा आजकल हिंदुस्तान में चल रही है। क्या जीवन के अधिकार में मृत्यु का अधिकार भी शामिल है? किन परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को अपना जीवन ख़त्म करने का अधिकार होना चाहिए? जीवन का मालिक कौन है और यह मुश्किल फ़ैसला करने के लिए अधिकृत व्यक्ति कौन है? यह ज़िंदगी और मौत का सवाल है। ज़िंदगी कब जीने लायक़ नहीं रहती, इस जटिल सवाल का कोई आसान जवाब नहीं है।

घूस में वाकई दम है...

कल मेरे एक साथी ने कहा, सर जहाँ हम जा रहे है ज्यादा हरिशचंद्र नहीं बनना है, मैं आपको दिखाऊंगा 500 और 1000 के नोट में कितना दम होता है। हम सरकारी दफ्तर पहुंचे, कलर्क से कहा, बैक डेट में एक पेपर पर अपने विभाग का मुहर लगा दो, उसने पूरा कानून समझा दिया और नहीं माना फिर मेरे साथी ने कहा सेवा करेंगे, उसने बोला 500 दो तो काम हो जायेगा, हमने हाँ बोला उसने मुहर लगाकर दे दिया।मेरे साथी ने कहा उसने 500 माँगा है, हम उसे हज़ार देंगे और देखना आप कल से ये हमारी गुलामी करेगा, जहाँ देखेगा हमें सलाम ठोकेगा, उसे हज़ार दिया तो उसके चेहरे की मुस्कुराहट रोकने से नहीं रुक रही थी, और सलामी देने का तो जवाब ही नहीं।एक दूसरी घटना में मेरे साथी ने कहा ये तो कलर्क है मैं आपको इससे बड़े रैंक के अधिकारी को दिखता हूँ, वो कैसे दुम हिलाता है पैसे देने पर... उन्होंने फिर एक दूसरे काम के लिए पैसे की पेशकश की, उसका रवैया बदल गया, बहुत खुश, फिर हमने कहा यही लेंगे या बाहर चलकर लेंगे, कहा बाहर चलते है, बाहर चाय के दुकान पर वो सेवक के भांति खडा था, पैसे देने से पहले मेरे साथ के लोग उससे आप और सर करके बात कर रहे थे जैसे ही हज़ार के दो नोट पकड़ाये, पहली लाइन हमारी साथियों की थी, तुम हमारी भक्ती करो, फल मिलता रहेगा और वो अधिकारी, जी सर, जी सर कहता रहा, बाद में उसने कहा मैं भी बहुत बड़ा केजरीवाल भक्त था लेकिन उससे काम नहीं चलेगा।उस अधिकारी के चेहरे की मुस्कराहट, केजरीवाल की नाकामियों को साफ-साफ बता रही थी... मैंने भी सोचा खाना खाने जाते है तो 100 – 50 की टिप देते है, वेटर खुश, आपकी भरपूर सेवा करता है, वैसे ही सरकारी कर्मचारियों – अधिकारीयों को टिप दें तो क्या बुराई, वो भी हमारी सेवा करेगा। मैं वाकई बेहद हैरान था कैसे हजारों रुपयों की नौकरी करने वाला अधिकारी अपनी दुम हिलाता है 500 के नोट पर। ऐसे कर्मचारी और अधिकारी क्या शिक्षा देते होंगे अपने बच्चों को.. भगवान बचाए इस देश को....

संस्कृत के गूढ ज्ञान को लोगो तक पहुंचाना चाहती हूं: प्रज्ञा मिश्रा

संस्कृत देवो की भाषा! सब भाषा की जननी भारत की मूल भाषा! लेकिन आज वो विस्मृत हो चली है अपने ही देश में उसके विद्वानो का अभाव हो गया। अमेरीका में हुई एक शोध के मुताबिक संस्कृत भाषा सूचना और प्रोद्योगिकी की मूल इकाई कम्प्यूटर के लिये सर्वोत्तम भाषा है।फिर भी लोक भाषा से ये लुप्तप्राय भाषा हो गई। संस्कृत दुनिया की अकेली वैज्ञानिक भाषा है जिसकी व्याकरण का हर सिद्धांत सिद्ध किया जा सकता है। यहां BUT बट PUT पुट नहीं होता ये कहना है संस्कृत की विद्वान और कवित्री श्रीमति प्रज्ञा मिश्रा का। संस्कृत की विद्वान और कवित्री श्रीमति प्रज्ञा मिश्रा इस महान भाषा में समाहित ज्ञान को सरल भाषा में लोगो तक पहुंचाने का कार्य कर रही हैं। चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय (चित्रकूट , मध्य प्रदेश) के संस्कृत विभाग की अध्यक्षा प्रज्ञा मिश्रा बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। चित्रकला, गायन, लेखन, कथक में पारंगत प्रज्ञा मिश्रा हर क्षेत्र में कई सम्मान और पुरूस्कार ले चुकी हैं। चित्रकूट विश्वविद्यालय से पीएचडी करने वाली प्रथम महिला प्रज्ञा मिश्रा ने एनसीसी में सी सर्टिफिकेट भी हासिल किया। इन्होंने दर्पण, प्रज्ञा, मानसी भाग्योदय जैसी कई पुस्तकें लिखीं हैं। हाल ही इनकी कई किताबों का सार खंड प्रकाशित हुआ है। “प्रज्ञा” नाम के इस खंड में विभिन्न विषयों पर उनकी लिखी 7 किताबों के सार को एक जगह समाहित किया गया है ताकि अधिक से अधिक लोग इसका लाभ उठा सकें। संस्कृत भाषा के महान ज्ञान और उसके महत्व को एक बार फिर से जन जन तक पहुंचाने जैसे विषयों पर लीड इंडिया ग्रुप की समूह सम्पादक तरूणा एस गौड़ ने प्रज्ञा मिश्रा जी से विस्तार से बात की प्रस्तुत है पूरी बात।आप संस्कृत जैसे विषय की ज्ञाता हैं। कई क्षेत्रों की महारथी हैं साथ ही आपका नाम भी प्रज्ञा है जिसका अर्थ ही है तीनों काल की ज्ञाता। “प्रज्ञा त्रैकालिकी मता! मैं आपके लेखन से बात शुरू करती हूं। आपने अब तक 19 पुस्तकें लिखी हैं उसके विषय में बताइयेउत्तर:संस्कृत की सेवा करने का मुझे अवसर मिला ये मेरा सौभाग्य है। मेरे जीवन का उद्देश्य है कि मैं इसमें समाहित अपार ज्ञान को सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाऊं ताकि उनमें मूल विषय यानि संस्कृत को जानने की इच्छा प्रबल हो सके। संस्कृत में किस विषय पर नहीं लिखा गया इसमे कला है साहित्य है, सौन्दर्य है, यहां तक की फूड प्रिसर्वेशन जैसे विषय भी शामिल हैं। मैंने हर विषय को चुना है। जल्द ही मेरा शोध आने वाला है, “श्रीराम का विश्वमानवता दर्श”। हाल ही में मेरी एक पुस्तक प्रकाशित हुई है “”प्रज्ञा”” इसमें 7 खंड हैं जिसमें “भाग्योदय” ज्योतिष पर, “राममय चित्रकूट” आध्यात्म पर, “नाम नवनीत” नामकरण की वैज्ञानिकता पर, “चित्रकूट दर्पण” पर्यटन पर, : धर्म” सनातन एवं हिन्दू धर्म पर, “ फालगुनी” कविताओं और “सीखो बुन्देली” प्रसार पर आधारित हैं। इन सबका मूल संस्कृत से ही लिया गया है। प्रश्न : संस्कृत के विषय में कुछ बताइये हमारे देश का गौरव ये भाषा लुप्तप्राय हो गयी है इसे जीवंत कैसे किया जा सकता है। उत्तर: संस्कृत सूत्र शैली कहलाती है। बहुत संक्षेप में आप काफी बड़ा वाक्य कह सकते हैं। यहां तक कि इसके एक एक वाक्य पर विदेशों में शोधार्थी शोध कर रहें हैं। ये वैज्ञानिक भाषा है जिसके हर सूत्र को सिद्ध किया जा सकता है। इसकी खासियत है कि इसमें शब्द के फेर बदल से भी वाक्य नहीं बदलता। उदाहरण के लिये- राम जाता है का अनुवाद होगा “राम: गच्छति” और गच्छति राम:। शब्दों के स्थान परिवर्तन से वाक्य का अर्थ नहीं बदलता। प्रश्न: आपने अब तक 16 लघुशोध प्रबन्ध और 60 से अधिक शोध पत्र लेखन का कार्य किया है। इसकी प्रेरणा कैसे मिलती है। उत्तर:सच कहूं तो स्वर्गीय श्री नाना जी देशमुख जिन्होने मुझे स विश्वविद्यालय में कार्य करने का मौका दिया और प्रथम विषय भी सुझाया वो मेरी प्रेरणा के स्रोत हैं। और लेखन में मेरे पति और मेरे परिवार का सहयोग भी सबसे बड़ी प्रेरणा है। चित्रकूट विश्वविद्यालय में आपके संरक्षण में वैदिक कालीन महिला अधिकारों पर काफी काम हुआ है। उत्तर:जी भारत का वैदिक काल का समय काफी समृद्ध काल रहा है। अधिकारों के मामले में भी वैदिक महिलाओ को बराबरी का दर्जा प्राप्त था। हमारे यहां 36 विदुषी ऋषिकाएं हुई हैं जिन्होंने कई ग्रंथो की रचना भी की है। लेखन के अलावा आप एक उम्दा चित्रकार भी हैं। आप की हर पेंटिंग कुछ कहती है। उत्तर:मेरे साथ कुछ ऐसा है, कि यदि कोई दृश्य मुझे भा जाये या आहत कर तो जब तक मैं उसका चित्र नही बना देती तब तक व्याकुलता बनी रहती है और वो दृश्य मेरे आंखो में तैरता रहता है। जब वो भावनाएं कागज अपर उतर जाती है तो मन को शांति मिलती है।
आप कवित्री भी हैं एक बार आपको जब बहुत क्रोध आया तो भी कविता बन गई थी! हां ये बड़ा रोचक किस्सा है। मैंने गुरु जी के जन्मदिन पर विषेशतौर से लिखी एक कविता प्रकाशन के लिये दी थी। लेकिन जाने किस ने गलती से या जानकर मैं नही कह सकती, उस कविता में शब्दों के साथ कुछ परिवर्तन कर दिया। उससे उस कविता के छन्द समास सब बुरी तरह बिखर गये। अर्थ का अनर्थ हो गया। मुझे उस पर उतना क्रोध आया कि एक कविता ही बन गई।
कपट करे कपटी का क्या है ।
छदम्-छवी छलना करना है।
कुटिल आग कोयला सा काला।
रात्रि राख रेता सा रूखा।
काटे होकर कलियां बनना ।
हीरा बने कॅंच का क्या है ।

आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा कि कोई है जो भारत के गौरव संस्कृत भाषा के लिये इतने समर्पण से कार्य कर रहा है। हम आशा करते हैं कि संस्कृत को एक बार फिर से जन भाषा बनाने का आपका स्वप्न जल्द ही पूरा हो।

अयोध्या मामले में आडवाणी-उमा को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में मंगलवार को वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, केंद्रीय मंत्री उमा भारती और सीबीआई समेत 20 लोगों को नोटिस जारी किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले की सुनवाई अपील दायर करने में सीबीआई की तरफ से हुई देरी के साथ साथ मेरिट के आधार पर भी की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका हाजी मेहबूब अहमद की तरफ से दायर की गई है।     अदालत ने अयोध्या से जुड़े आपराधिक मुकदमें में बरी किए जाने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई की अपील पर सुनवाई की है। कोर्ट ने सीबीआई से भी 4 हफ्तों में जवाब मांगा है।उल्लेखनीय है कि 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा गिराया गया था।

ये समय चुनौती का है


ये समय चुनौती का है, इसको सोकर मत खोना,
चाहे नींद झुके पलकों पर, नैनों में सपन सलोना,
सैंकड़ों हजारों बीघा,जिनके जमीन नाम,
भूल से भी  मूठ नहीं पकड़ा है  हल का,
हल के चलाने वाले, फसल उगाने वाले,
दुखी हैं कि हक नहीं उनको फसल का,
तय करो कौन है किसान जमींदार कौन,
काम का किसे है हक,किसको है फल का,
श्रम में नहाने वालो, फसल उगाने वालो,
जड़ से ख़तम करो, शोषण ये  छल का,
अब के उधार धरती पर, हमें बीज नहीं है बोना।
ये समय चुनौती का है, ं ं ं ं
अनगिन माया जाल, सैंकड़ों करें सवाल,
करना यकीन नहीं किसी ज्ञानवान का,
पादरी भी प्रेयर करे, पंडित भी मन्त्र पढ़े,
अर्थ कोई होता नहीं, मुल्ला की अजान का,
धरम को जानने को जानना जरूरी नहीं,
बाइबिल, वेद, गुरु गं्रथ औ्य कुरान का,
ये उधार धर्म आज आदमी की जिन्दगी में,
गौर से निहारिए तो  रोग है  मसान का,
जीवन पर भार हुए हैं, अब कठिन है इनको ढोना।
ये समय चुनौती का है, ं ं ं ं
गौरी-गजनी को कैसे रोक लेंगे आप गर,
घर को भरेंगे सारा देश लूट-लूट कर,
उग्रवादियों को सही मार्ग पर लाने के लिए,
देश-प्रेम हदय में भरो तो कूट-कूट कर,
प्यार से दुलार से भी, जोर से भी मार से भी,
उनको मानएंगे गए जो रूठ-रूठ कर,
चाहे पंजाब कश्मीर  खूब जोर करे,
देश को बिखरने न देंगे टूट-टूट कर,
इसके सँग में मत खेलो, यह देश नहीं है खिलौना।
ये समय चुनौती का है,

मनुष्य का जीवन स्वयं में एक अबूझ पहेली है

मनुष्य का जीवन स्वयं में एक अनबूझ पहेली है। अपार रहस्यों से भरा हमारा जीवन एक साथ अनेक दिशाओं में चलते हुए अनेक अथरें को प्रतिपादित करता है। यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति इस जीवन को अपने अनुरूप धारण करता है। जीवन के रहस्यों को जब हम जानने का प्रयास करते हैं, तो एक साथ कई रहस्य सामने आ जाते हैं। कभी यह विचार आता है कि हमारा जीवन सार्थक है, कभी निर्थक दिखता है। इस तरह की शंकाएं सदियों से मानव मन को मथती रही हैं और यह जानने की कोशिश भी कि वास्तविक सत्य क्या है? कभी भगवान पर शंका की उंगली उठती है। इस तरह के अनेक प्रश्न मन को झकझोरते रहते हैं। उनमें से एक प्रश्न यह भी उठता है कि हम अपने इष्टदेव को भगवान क्यों कहते हैं? जैसे भगवान राम और भगवान कृष्ण। इस भगवान शब्द का औचित्य क्या है? प्रश्न यह उठता है कि हम अपने इष्टदेव को जब भगवान कहते हैं, तो भगवान शब्द को ठीक से समझ लेना चाहिए। मनुष्य के जीवन में अभिलाषा होती है कि उसे अधिक से अधिक आयु मिले, विद्या मिले, बल हो, अपार बुद्धि हो, ऐश्वर्य हो और शांति मिले। इन छह तत्वों की कामना हमारे जीवन में होती है, लेकिन मनुष्य का जीवन कामनाओं से भरा है। हम कामनाओं की पूर्ति का जितना प्रयास करते हैं, रेत पर पानी की बूंद की तरह सब विलीन होता रहता है।
इसलिए आयु, विद्या, बल, बुद्धि, ऐश्वर्य और शांति की पिपासा जीवन भर बनी रहती है। भगवान शब्द भग और वान से बना है। भग का अर्थ होता है आयु, विद्या, बल, बुद्धि, ऐश्वर्य और शांति का सम्मिलित स्वरूप और वान का अर्थ होता है जिनके पास ये तमाम शक्तियां हों, उसी को भगवान कहते हैं।

युवाओं को तकनीकी शिक्षा की बड़ी जरूरत

युवाओं को स्वरोजगार स्थापित कर दूसरों को रोजगार देने वालों को आदर्श मानना चाहिए। रूस शिक्षा एवं अनुशासन के बल पर ही विश्व शक्ति बना। देश में उच्च शिक्षा प्राप्त युवक नवीनतम तकनीकी शिक्षा के अभाव में बेरोजगार है। जबकि युवाओं को उच्च शिक्षा के साथ तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर स्वरोजगार स्थापित करने पर बल देना चाहिए।
उक्त विचार पुलिस उपाधीक्षक आरएन कुशवाहा ने एमएसएमई विकास संस्थान भारत सरकार आगरा के द्वारा नेशनल पीजी कालेज के सभागार में आयोजित औद्योगिक अभिप्रेरणा एक दिवसीय शिविर के मुख्य अथिति के रूप में व्यक्त किए। उन्होंने कहा है कि आज के परिपेक्ष्य में युवाओं को एपीजे अब्दुल कलाम, टाटा, धीरू भाई अंबानी को आदर्श मानना चाहिए। 
संस्थान के सहायक निदेशक ब्रजेश यादव ने शिविर के उद्देश्य एवं उपयोगिता के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि स्वरोजगार के द्वारा ही बेरोजगारी को कम किया जा सकता है। युवाओं को जीवकोपर्जन हेतु छोटे-छोटे लघुउद्योग लगाने चाहिए। बड़े-बड़े उद्योगपतियों के द्वारा भी पूर्व में लघुउद्योग ही स्थापित किए गए थे। मार्केटिंग क्षेत्र के विशेषज्ञ डॉ. अखिलेश सिंह यादव ने मार्केटिंग क्षेत्र में प्रोडक्ट के लिए मार्केट सर्वे, मार्केट रिसर्च एवं डिमांड फॉर कास्टिंग के साथ-साथ विज्ञापन के बारे में विस्तृत जानकारी दी। 
जिला उद्योग केन्द्र के महाप्रबंधक आरपी वर्मा ने जिला उद्योग केन्द्र के द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं के बारे में विस्तृत जानकारी दी। जिला अग्रणी बैंक ऑफ इंडिया की मुख्य शाखा के प्रबंधक संजय वैद्य बैंक ऋण लेने की प्रक्रिया एवं शिक्षा ऋण तथा ब्याज दरों के साथ अचल संपदा तथा पूंजीगत अन्य मदों के बारे में जानकारी मुहैया कराई।
 महाविद्यालय प्राचार्य डॉ. अजब सिंह यादव ने कहा कि जनपद में लघु एवं सूक्ष्म उद्योगों के लिए अपार संभावनाएं हैं। इस मौके पर डॉ. एसके पाल, डॉ. कौशलेन्द्र दीक्षित, डॉ. राकेश गुप्ता, डॉ. आशारानी वर्मा, डॉ. कृष्ण कुमार, आदित्य गुप्ता, राजेश चैहान, बंदना सक्सैना, प्रवीन सक्सैना, रामकृष्ण वर्मा, पंकज दीक्षित, मानवेन्द्र सिंह आदि मौजूद थे।

पंच स्नानी महाज्ञानी

पंच स्नानी से आशय है कि मुंह, हाथ, पांच उंगलियों वाले हाथ के चुल्लू बना कर पानी लेना और फिर, मुंह साबुन से या केवल पानी से धोकर, तौलिया या अंगौछे से पोंछ लेना, बस इसी को पंच स्नानी कहते हैं। पांच स्नानी सम्पूर्ण स्नान का शार्ट कट होता है। और इसका उपयोग अधिकतर सर्दी के मौसम में ही किया जाता है। वैसे कई ऐसे भले लोग होते हैं जो उम्र भर स्नान करने की गलती नहीं करते। उन्हीं के बारे में ही तो कहा गया है, उनको या तो दाई स्नान करवाती है या भाई करवाते हैं। गर्मियों की बात तो जाने दो, सर्दियों में तो उन लोगों के लिए ठंडे पानी से स्नान करना मौत के मुंह में जाने वाली बात होती है, और पानी गर्म करना ये एक सिरदर्दी समझते हैं। एक ज्ञानी जी मेरे साथ एक बार बहस करने लगे कि आखिर सुबह-सुबह ठंडे पानी में डूबने की मुसीबत भी क्यों मोल ली जाए। किसी हकीम ने थोड़े ही बताया है। सच पूछो तो आजकल के हकीम पंच स्नान से ही अपना काम चला लेते हैं, और डॉक्टर तो कहते ही हैं गर्म पानी से स्नान करने को। ज्ञानी जी ने कहा कि मनुष्य का शरीर तो पूरा कपड़ों से ढका रहता है। केवल हाथ और मुंह ही खुले रहते हैं। इसलिए इन्हें ही धोने की जरूरत होती है। आपके शरीर के शेष भाग लोग देखते भी नहीं। खासकर जाड़ों में। तब उनको कष्ट देने की क्या जरूरत है। ज्ञानी जी ने फिर विचार प्रकट किया, यदि शरीर को रोज पानी में डुबाना जरूरी होता तो मनुष्य का शारीरिक ढांचा बनाते समय उस महान कुम्हार ने स्वयं ही मनुष्य की आकृति मछली, मेंढक, कछुआ आदि की तरह बना कर उसे समुद्र में ढकेल दिया होता। पर उसको यह मंजूर नहीं था। ईश्वर के जो भक्त तीर्थों पर स्नान करने के लिए धन बर्बाद करते हैं, उनको भी ज्ञानी जी ने बुरा भला कहा है। उन्होंने कहा कि अगर ईश्वर नहाने के मिल जाता तो मेढ़क, मछली के वह मिल गया होता। स्पष्ट है कि अगर भगवान केवल स्नान करते ही रीझ सकता होता तो वह जल, जीवों को अपने भगत होने का डिप्लोमा अवश्य देता। ज्ञानी जी का विश्वास था कि पंच स्नान करने वाले तो होते ही ईश्वर भक्त हैं, और इसकी तुलना में सम्पूर्ण स्नान करने वाले निठल्ले, निकम्मे, और दलिद्र होते हैं। उन्होंने निम्नलिखित उद्धरण दियारू पंच स्नानी महाज्ञानी नित्य स्नानी दलिद्री। ज्ञानी जी कहने लगे हम तो जो कुछ गुरु साहिब अपनी पवित्र वाणी से उपदेश दे गए हैं, उसी पर अमल करेंगे। गुरु साहिब ने सुखमनी साहिब की तीसरी अष्टपदी में फरमाया है, श्जलि धोवे बहु देह अनीति, शुद्ध कहां होई काची भीति उन्होंने फरमाया कि तीर्थों पर धक्के खाने की तो आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि पाठ करने से तीर्थों के स्नान का महात्म मिल जाता है। जैसे सुखमनी साहिब में फरमाया है, श्प्रभु के सिमरनि तीरथ इशनानी। भला हो गुसलखाने बनवाने वालों का, पांच स्नान करने वालों का पर्दा ढका रहता है। गुसलखानों का किवाड़ा बंद करके जितना चाहो समय लगा लो, किसी को क्या पता लगता है कि तुमने स्नान किया है या पंच स्नान। गांवों में इस प्रकार की हेराफेरी करना संभव नहीं होता है, क्योंकि वहां बाहर कुएं पर जाकर नहाना होता है। शहरों के निवासी बड़ी आसानी से दूसरों की आंखों में धूल झोंक सकते हैं। आजकल के लड़के-लड़कियां तो बहुत चालाक है। वे गुसलखाने में घुसते ही नल खोलकर गाना गाने लगते हैं। मां-बाप को पता ही नहीं लग सकता कि उनके जिगर के टुकड़े या टुकड़ी ने स्नान किया है या पंच स्नान। दुरूख तो इस बात का है कि अगर पूछो कि तुमने स्नान किया है या मुंह हाथ ही धो लिए हैं, तो वह पैरों पर पानी भी तो नहीं पडने देते। एक दिन मैंने अपनी पत्नी से कहा, श्तुम आज हाथ-मुंह धो कर ही बाहर आ गई हो, क्योंकि नल खुला रहने की आवाज नहीं आई।्य उसके तुरन्त उत्तर दिया, श्मैं आपकी तरह नहीं हूं। आप तो नल खुला छोड़ देते हैं और कक्षा धोकर ही बाहर आ जाते हैं।्य
पंच स्नानी पंजाबी का शब्द है। पंजाब के लोग इसका अर्थ समझते हैं, पर दूसरे प्रांतों के लोगों ने यह शब्द नहीं सुना है। कहते हैं एक ज्ञानी जी जाड़ें के दिनों में कांगड़ा गए। वहां उन्होंने एक छोटा सा मकान किराये पर लिया। पहाड़ के लोग जाड़ों में कम ही स्नान करते हैं। पर ज्ञानीजी को झरने के ताजे पानी से स्नान करने का शौक था। उन्होंने केवल स्नान करने हेतु पानी लाने के लिए एक नौकर रख लिया। वह तड़के ही ज्ञानी जी के लिए दो बाल्टी पानी झरने से ला देता। झरना बहुत बेढ़ब स्थान पर था। कहीं ऊंची चढ़ाई चढनी पड़ती थी, कहीं ढलान उतरनी पड़ती थी। नौकर बेचारा एक बाल्टी ही लाने में थक जाता था। बड़ी कठिनाई से ला पाता था। एक हफ्ता इसी प्रकार बीत गया। एक दिन ज्ञानी जी की तबियत कुछ ढीली थी। उन्होंने नौकर से कहा, आज मैं पंच स्नानी करना चाहता हूं।्य नौकर ने समझा, शायद ज्ञानी जी पांच बार स्नान करना चाहते हैं। वह अपनी एक महीने की तनख्वाह छोड़कर भाग गया। और ऐसा गया कि फिर लौट कर ही न आया। यह बात भी गलत है कि पढ़े-लिखे आदमी रोज स्नान करते हैं। बर्नार्ड शॉ ने एक बार कहा था कि श्मुझे याद नहीं कि मुझे स्नान किए हुए कितने दिन हो गए हैं।

मनुष्य का जीवन स्वयं में एक अबूझ पहेली है


मनुष्य का जीवन स्वयं में एक अनबूझ पहेली है। अपार रहस्यों से भरा हमारा जीवन एक साथ अनेक दिशाओं में चलते हुए अनेक अथरें को प्रतिपादित करता है। यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति इस जीवन को अपने अनुरूप धारण करता है। जीवन के रहस्यों को जब हम जानने का प्रयास करते हैं, तो एक साथ कई रहस्य सामने आ जाते हैं। कभी यह विचार आता है कि हमारा जीवन सार्थक है, कभी निर्थक दिखता है। इस तरह की शंकाएं सदियों से मानव मन को मथती रही हैं और यह जानने की कोशिश भी कि वास्तविक सत्य क्या है? कभी भगवान पर शंका की उंगली उठती है। इस तरह के अनेक प्रश्न मन को झकझोरते रहते हैं। उनमें से एक प्रश्न यह भी उठता है कि हम अपने इष्टदेव को भगवान क्यों कहते हैं? जैसे भगवान राम और भगवान कृष्ण। इस भगवान शब्द का औचित्य क्या है? प्रश्न यह उठता है कि हम अपने इष्टदेव को जब भगवान कहते हैं, तो भगवान शब्द को ठीक से समझ लेना चाहिए। मनुष्य के जीवन में अभिलाषा होती है कि उसे अधिक से अधिक आयु मिले, विद्या मिले, बल हो, अपार बुद्धि हो, ऐश्वर्य हो और शांति मिले। इन छह तत्वों की कामना हमारे जीवन में होती है, लेकिन मनुष्य का जीवन कामनाओं से भरा है। हम कामनाओं की पूर्ति का जितना प्रयास करते हैं, रेत पर पानी की बूंद की तरह सब विलीन होता रहता है।
इसलिए आयु, विद्या, बल, बुद्धि, ऐश्वर्य और शांति की पिपासा जीवन भर बनी रहती है। भगवान शब्द भग और वान से बना है। भग का अर्थ होता है आयु, विद्या, बल, बुद्धि, ऐश्वर्य और शांति का सम्मिलित स्वरूप और वान का अर्थ होता है जिनके पास ये तमाम शक्तियां हों, उसी को भगवान कहते हैं।

युवाओं को तकनीकी शिक्षा की बड़ी जरूरत


युवाओं को स्वरोजगार स्थापित कर दूसरों को रोजगार देने वालों को आदर्श मानना चाहिए। रूस शिक्षा एवं अनुशासन के बल पर ही विश्व शक्ति बना। देश में उच्च शिक्षा प्राप्त युवक नवीनतम तकनीकी शिक्षा के अभाव में बेरोजगार है। जबकि युवाओं को उच्च शिक्षा के साथ तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर स्वरोजगार स्थापित करने पर बल देना चाहिए।
उक्त विचार पुलिस उपाधीक्षक आरएन कुशवाहा ने एमएसएमई विकास संस्थान भारत सरकार आगरा के द्वारा नेशनल पीजी कालेज के सभागार में आयोजित औद्योगिक अभिप्रेरणा एक दिवसीय शिविर के मुख्य अथिति के रूप में व्यक्त किए। उन्होंने कहा है कि आज के परिपेक्ष्य में युवाओं को एपीजे अब्दुल कलाम, टाटा, धीरू भाई अंबानी को आदर्श मानना चाहिए।
संस्थान के सहायक निदेशक ब्रजेश यादव ने शिविर के उद्देश्य एवं उपयोगिता के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि स्वरोजगार के द्वारा ही बेरोजगारी को कम किया जा सकता है। युवाओं को जीवकोपर्जन हेतु छोटे-छोटे लघुउद्योग लगाने चाहिए। बड़े-बड़े उद्योगपतियों के द्वारा भी पूर्व में लघुउद्योग ही स्थापित किए गए थे। मार्केटिंग क्षेत्र के विशेषज्ञ डॉ. अखिलेश सिंह यादव ने मार्केटिंग क्षेत्र में प्रोडक्ट के लिए मार्केट सर्वे, मार्केट रिसर्च एवं डिमांड फॉर कास्टिंग के साथ-साथ विज्ञापन के बारे में विस्तृत जानकारी दी।
जिला उद्योग केन्द्र के महाप्रबंधक आरपी वर्मा ने जिला उद्योग केन्द्र के द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं के बारे में विस्तृत जानकारी दी। जिला अग्रणी बैंक ऑफ इंडिया की मुख्य शाखा के प्रबंधक संजय वैद्य बैंक ऋण लेने की प्रक्रिया एवं शिक्षा ऋण तथा ब्याज दरों के साथ अचल संपदा तथा पूंजीगत अन्य मदों के बारे में जानकारी मुहैया कराई।
 महाविद्यालय प्राचार्य डॉ. अजब सिंह यादव ने कहा कि जनपद में लघु एवं सूक्ष्म उद्योगों के लिए अपार संभावनाएं हैं। इस मौके पर डॉ. एसके पाल, डॉ. कौशलेन्द्र दीक्षित, डॉ. राकेश गुप्ता, डॉ. आशारानी वर्मा, डॉ. कृष्ण कुमार, आदित्य गुप्ता, राजेश चैहान, बंदना सक्सैना, प्रवीन सक्सैना, रामकृष्ण वर्मा, पंकज दीक्षित, मानवेन्द्र सिंह आदि मौजूद थे।

Monday, 30 March 2015

देश से खत्म होगा बिजली संकट

सरकार अगले 2.5 साल में पॉवर सेक्टर की सभी समस्याओं को हल कर देगी। पॉवर और कोयला मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि वो पॉवर प्लांट्स के मैनेजमेंट को सुधार कर और एफिशियंसी बढ़ाकर समस्याओं का कुछ तत्काल हल निकालेंगे। उन्होंने ये भी कहा कि सरकार पावर प्लांट्स को कोयला मुहैया कराने के लिए नई पॉलिसी पर काम कर रही है। पीयूष गोयल का कहना है कि उन्होंने 1 महीने के दौरान राज्यों में जाकर चीजें समझीं और अलग-अलग पहलू को देखकर पावर की दिक्कतों को समझा है। वहीं पीयूष गोयल ने कोल इंडिया की रीस्ट्रक्चरिंग पर कहा कि रीस्ट्रक्चरिंग समाधान नहीं है क्योंकि हर यूनिट की दिक्कतें अलग-अलग हैं। कोल इंडिया के मसले पर सिर्फ औपचारिक भाषण से काम नहीं चलेगा बल्कि लेबर की दिक्कतों को समझना होगा। साथ ही गुड गवर्नेंस और ईमानदारी की भी जरूरत है। पीयूष गोयल के मुताबिक उनका मकसद सबको साथ लेकर चलना है। लिहाजा कोल इंडिया के मामले में ट्रेड यूनियन से कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि ट्रेड यूनियन एंटी बिजनेस नहीं हैं। कोयले की दिक्कत को दूर करने के लिए नई खदानों की पहचान जारी है, पर विवादित खानों पर एक्शन नहीं लिया जाएगा। सरकार का फोकस रेडी टू गो प्रोजेक्ट पर है। पीयूष गोयल ने बताया कि बड़े फैसलों को लेकर कोई समय सीमा तय नहीं है। पॉवर और कोयला मंत्रालय एक साथ हैं और कस्टमर को खुश करने पर जोर है। ज्यादा मात्रा में कोल वॉशरीज लगाने की योजना है और कस्टमर को ही कोयले की क्वॉलिटी को जांचने की सुविधा दी जाएगी। पिछली सरकार के वादे कागज पर ही रहे, पर हम अच्छी नीयत से काम करेंगे। उम्मीद है कि 2.5-3 साल में कोयले की खदान खोलने में कामयाबी मिलेगी। हमारी सरकार ब्लेम गेम के पचड़े में फंसने की बजाय प्रोजेक्ट जल्द शुरू करने पर जोर देगी। पीयूष गोयल ने बिजली की दरों पर कहा कि बिजली दरें बढ़ाना बड़ा मुद्दा नहीं है बल्कि जनता की सेवा पर फोकस है। बिजली की चोरी से भी दिक्कत है पर पहले क्वॉलिटी सुधारना जरूरी है क्योंकि जनता सरकार से काम चाहती है। गुजरात मॉडल से काफी सीखा है, लेकिन हमारे लिए हर राज्य काफी अहम है। राज्यों के साथ मिलकर काम करने की योजना है क्योंकि साथ मिलकर काम करना ही होगा। पीयूष गोयल का कहना है कि प्रोजेक्ट तेजी से शुरू किए जाएंगे और निवेशकों को भरोसा दिलाएंगे। सरकार के लिए हर विकल्प खुले हैं। न्यूक्लियर पावर में सुरक्षा सबसे अहम है और खर्च पर भी विचार की जरूरत है, लेकिन न्यूक्लियर पॉवर में आगे बढ़ने की योजना है। साथ ही रीन्युएबल एनर्जी भी काफी जरूरी है क्योंकि रीन्यूएबल एनर्जी से ऊर्जा सुरक्षा संभव है। राज्य के स्तर पर फ्रेमवर्क के साथ सौर ऊर्जा को प्रोत्साहन जरूरी है। जनता के हित के लिए काम करेंगे और सौर ऊर्जा बढ़ाने पर जोर रहेगा।

आगरा से नोएडा के लिए मोनो रेल सेवा होगी शुरू!


उत्तर प्रदेश सरकार राज्य में जल्द ही मोनो रेल परियोजना शुरू करने वाली है, जो नोएडा से आगरा को जोड़ेगी। आगरा एवं लखनऊ के बीच एक्सप्रेसवे के लिए रविवार को आधारशिला रखे जाने के बाद, अब राज्य सरकार का इरादा जल्द ही मोनोरेल सेवा शुरू करने का है अधिकारियों ने कहा कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मोनोरेल परियोजना के लिए रजामंदी दे दी है। मोनोरेल सेवा नोएडा से आगरा के बीच 200 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। मोनोरेल सेवा को लेकर बीते 19 नवंबर को लखनऊ में उच्चाधिकारी समिति की बैठक हुई, जहां परियोजना पर चर्चा की गई। मुख्य सचिव आलोक रंजन ने कहा कि मोनो रेल आगरा के लिए काफी फायदेमंद साबित होगी। नोएडा मेट्रो रेल निगम को परियोजना के क्रियान्वयन का जिम्मा सौंपा गया है। मोनो रेल सेवा नोएडा के महामाया फ्लाइओवर, बुद्ध इंटरनेशन सर्किट और मथुरा होते हुए आगरा तक जाएगी। एक अधिकारी ने कहा कि मोनो रेल यमुना नदी के किनारे से होकर गुजरेगी।

गंगोत्री से गंगा सागर तक

भागीरथ की कठिन तपस्या , आखिर रंग लाई थी।
ज्येष्ठ मास दश्मी को मागंगे पृथ्वी पर आई थी।।
आगे-आगे चले भागीरथ, पीछे गंगा की थी धारा।
जहां से होकर निकली गंगा, तीर्थ बन गया प्यारा।।
गंगोत्री से गंगा सागर तक, गंगा मां की महिमा।
ठंडे मीठे पवित्र जल से है, विश्व में इनकी गरिमा।।
गंगोत्री से गंगा सागर तक, अनेक तीर्थस्थल न्यारे।
कपिल मुनि के आश्रम में, शापित सभी पिटर तारे।।
ऋषिकेश, हरिद्वार, शुक्रताल, शिववल्लभ गढ़मुक्तेश्वर।
तीर्थराज प्रयाग,वाराणसी, हरिहर क्षेत्र मनोहर।।
भागीरथ के नाम पर गंगा, भागीरथी भी कहलाती।
इसकी सुन्दर अविरल धारा, गंगोत्री से है आती।।
उत्तराखंड में पंच प्रयागों का है अद्भुत संगम।
कल-कल करती मंदाकिनी का है, दृश्य मनोरथ।।
वह स्थान जहां पर ऋषियों ने धोय थे अपने केश।
ऐसे पावनधाम को, हम सब कहते है ऋषिकेश।।
स्वर्गाश्रम, लक्ष्मणझूला का भी दृश्य निराला है।
ईशवानंद झूले पर चढे यात्री, फेरे शिव की माला है।।
हर की पौड़ी हरिद्वरार में, लगता कुम्भ का मेला है।
तीर्थयात्री हर कोने से आते, दृश्य बड़ा अलबेला है।।
शुकदेव मुिन ने राजा परीक्षित को, भगवत कथा सुनाई।
जनपद मुज्जफरनगर में श्शुक्रताल्य विलक्षण तीर्थ है भाई।।
शिवगणों ने स्नानकर, जहां अपने शाप से मुक्ति पाई।
शिववल्लभ तीर्थनगरी ही अब गढमुक्तेश्वर कलाई।।
शिव के त्रिशूल पर बसी हुई है, अद्भुत नगरी काशी।
कुछ लोग बनारस भी कहते इसे, वही है वाराणसी।।
गज-ग्राह का यही हुआ था, एक अद्भुत संग्राम।
सोन नदी के तट पर, हरिहर क्षेत्र है अनुपम धाम।।
पश्चिमी बंगाल में हुगली नाम से, गंगा का सागर से हुआ मिलन।
सारे तीर्थ बार-बार, गंगा सागर एक बार कहते है सज्जन।।
बंगलादेश में पद्मा नदी भी गंगा की ही धारा है।
बंगाल की खाड़ी में गिरने का उसका सुन्दर नजारा है।।
गंगा, गीता, गायत्री ये तीनो भारत भूमिकी पहचान।
इनकी अनुपम प्रतिष्ठा से, विदेशों मे है भारत का मान।।
गंगाजल को अब हमने निर्मल और पवित्र यदि रखना है।
औद्योगिक रसायन, कूड़ा-कचरा के प्रदूषण से मुक्त करना है।।
अब नमामि गंगें का प्रधानमंत्री ने रखा है एकदम ध्यान।
आओ हम सब सफल बनाये उनका यह सुन्दर अभियान।।
पोलीथीन, प्लास्टिक के कचरे से कितना बढता है प्रदूषण।
कूड़े के ढेर में गुम हो रहे शहर, करना है सही निवारण।।
           - सुमनपाल सिंह, उप सम्पादक

सेवा भारती द्वारा नवरात्र पर कन्या पूजन कार्यक्रम


मेरठ। सेवा भारती मेरठ महानगर द्वारा नवरात्र के अवसर पर विभिन्न बस्तियों में कन्या पूजन कार्यक्रम कराये गये। इस वर्श सेवा भारती द्वारा 12 बस्तियों में कन्या पूजन के कार्यक्रम सम्पन्न हुए। इस कार्यक्रमों में समाज के सभी वर्गों का सहयोग मिलता है। भोजन, फल, बर्तन एवं पूजन सामग्री सभी परिवारों के सहयोग से एकत्रित की जाती है। सेवा भारती के विभाग मंत्री देवेन्द्र गोयल ने बताया कि वर्तमान में जिस प्रकार समाज में बेटियों की संख्या कम होती जा रही है और असुरक्षा भी बढ़ रही है। इस कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में बेटी की आवष्यकता और सम्मान का भाव बढ़ता है। समाज में फैले हुए भेदभाव को भी इस कार्यक्रम के माध्यम से दूर किया जा सकता है। समाज में पुत्री देवी का स्वरूप है। वह पूजनीय है। इस भाव को बढ़ाने की आवष्यकता है। सेवा भारती इस लक्ष्य को लेकर ही समाज में इन कार्यक्रमों का आयोजन करती है। पूजन का आयोजन अभावग्रस्त एवं सेवा बस्तियों में किया जाता है। जिसमें सभी वर्गों का सहयोग मिलता है। इससे समाज में समरसता एवं संगठन का भाव भी बढ़ता है।




बुजुर्गों के लिए खास सुविधाओं वाला स्मार्टफोन

महानगरों में वरिष्ठ नागरिकों  के प्रति हिंसा को रोकने के लिए मोबाइल कंपनी मिताशी ने नया स्मार्टफोन श्मिताशी प्लेयर सीनियर फ्रेंड्य लॉन्च किया है। आधुनिक तकनीक से लैस यह स्मार्टफोन बुजुर्गों और अनपढ़ लोगों के लिए काफी फ्रेंडली है। मोबाइल कंपनी मिताशी ने अनपढ़ और वरिष्ठ नागरिकों के लिए मोबाइल में कई फीचर जैसे एसओएस, रंगीन कोडित आइकन्स को भी प्रमुखता दी है। कंपनी का दावा है कि इससे बुजुर्गों के प्रति शहरों में होने वाले अपराधों और हिंसा में कमी आएगी। मोबाइल फोन का नाम भी श्मिताशी प्लेयर सीनियर फ्रेंड्य रखा गया है।
कंपनी के उपाध्यक्ष अदनान चारा ने बताया कि स्मार्टफोन में आइकंस काफी बड़े हैं, जिन्हें देखकर ही समझा जा सकता है और वरिष्ठ नागरिक जिनकी नजर कमजोर हो चुकी है, वे भी उसे आसानी से समझ सकते हैं। इससे वे वीडियो रिकॉर्डिग आसानी से और अच्छी क्वालिटी में कर सकते हैं। इसके साथ ही वीडियो कॉलिंग की भी सुविधा है। एसओएस के ऑप्शन में जाकर वे किसी भी व्यक्ति या इमरजेंसी नंबर पर अपनी समस्या से अवगत करा सकते है। एसओएस ऑप्शन टच करते ही स्मार्टफोन के ऐप में दर्ज तीन लोगों को मैसेज प्राप्त होगा और तीस सेंकेड बाद कॉल भी अपने आप लग जाएगी, इससे वे पुलिस व अन्य परिजनों केा सूचित कर सकते हैं।
गौरतलब है कि नई पीढ़ी स्मार्टफोन को खूब पसंद कर रही है। वरिष्ठ नागरिक इच्छा होते हुए भी कई कारणों से उनका प्रयोग नहीं कर पा रहे थे। इसका मुख्य कारण वरिन्ष्ठ नागरिगकों के लिए यह तकनीक फे्रंडली न होना था।
देश के पांच प्रतिशत बुजुर्गों केा कंपनियां एक ऐसे वर्ग के रूप में देख रही हैं जिनके पास ऐसे आुधनिक स्मार्ट फोन खरीदने की क्षमता भी है। इसलिए इन वरिष्ठ नागरिकों को अपने बाजार में शामिल करने के लिए मोबाइल कंपनियों ने ऐसे स्मार्टफोन बनाना शुरू कर दिया है, जो बुजुर्गों और अनपढ़ लोगों से फ्रेंडली हों।
एक उपभोक्ता के युवा बेटे ने बताया कि पहले मेरे मैसेज भेजने पर मेरे मां-पापा ठीक से पढ़ नहीं पाते थे पर इस मोबाइल में मैसेज काफी बड़ा दिखता है, जिसे बिना किसी चश्मे के आराम से पढ़ा जा सकता है।

Sunday, 29 March 2015

वर्ष 2014-15 में दशमोत्तर छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति योजना के अन्तर्गत जारी हुई संशोधित समय सारणी


जिला अल्प संख्या कल्याण अधिकारी श्री एस0एन0 पाण्डेय ने बताया कि  वित्तीय वर्ष 2014 -15 में दशमोत्तर छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति योजना अन्र्तगत शासन द्वारा संशोधित समय सारणी जारी की गयी है।  उन्होंने बताया कि नये सारणी के अनुसार समस्त नयेध् नवीनीकरण हेतु पात्र छात्र छात्रायें छात्रवृत्ति शुल्क प्रतिपूर्ति हेतु 30 नवम्बर तक आवेदन का समय था ऑनलाइन त्रुटियो को  ठीक करने के लिये 07 दिसम्बर 2014 तक का समय था। ऑनलाइन आवेदन की हार्डकॉपी को संलग्नों सहित सम्बंधित संस्थान में जमा करने का 08 दिसम्बर का समय तय हुआ। छात्रों के ऑनलाइन विवरण को शिक्षण संस्थान द्वारा सत्यापित  करने एवं शिक्षा विभाग को अधिकारी को संस्तुति भेजने का समय 20 दिसम्बर 2014 तक हैं। प्रदेश के बाहर अध्यनरत छात्र छात्राओं के विवरण को ऑनलाइन सत्यापित करने तथा सम्बंधित छात्रों के गृहजनपद के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी को संस्तुति सहित सहित आवेदन की हार्डकॉपी भेजने की तिथि 24 दिसम्बर 2014 है। शिक्षा विभाग के अधिकारियों द्वारा शिक्षण संस्था पाठयक्रम में वास्तविक छात्र संख्या आदि की प्रमाणिकता के सम्बंध में ऑनलाइन विवरण को सत्यापित एवं अग्रसारित करने की तिथि 31 दिसम्बर 2014 है। 
प्रदेश के शिक्षण संस्थाओ में अध्यनरत छात्र-छत्राओं पर शिक्षण संस्थाओं के विवरण को शिक्षा विभाग के अधिकारी द्वारा ऑनलाइन सत्यापित एवं अग्रसारित करने तथा  प्रदेश के बाहर अन्य प्रदेशों में स्थित शिक्षण संस्थाओं द्वारा ऑनलाइन सत्यापित करने के उपरान्त राज्य एनआईसी द्वारा विभिन्न परीक्षा नियन्त्रक संस्थाओध्विभागों द्वारा यूपीटीयू, एआईसीटीई, यूजीसी, एनसीटीई, एनसीआई विश्वविद्यालयों एवं विभिन्न शिक्षा परीषदों बोर्ड आफ टैक्नीकल एजूकेशन एवं बोर्ड ऑफ रिवेन्यू आदि की वेबसाइट पर उपलब्ध डाटा से मिलान एवं समस्त जनपदों के छात्रों के डाटा को आपस में मिक्स कर डूप्टलीकेट डाटा की छटनी व परीक्षण कर शुद्व एवं संध्यास्पद डाटा सम्बंधित जनपदों की छात्रवृत्ति  एवं शुल्क प्रति पूर्ति समिति को निर्णाथ उपलब्ध कराये जाने की तिथि 15 जनवरी 15 है। 
जनपदीय छात्रवृत्ति समिति द्वारा छात्रवृत्ति एवं शुल्क पं्रतिपूति स्वीकृत करना व जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी के डिजीटल हस्ताक्षर से स्वीकृत डाटा लॉक किये जाने की तिथि 25जनवरी 2015 है तथा जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी के डिजीटल हस्ताक्षर से डाटा लॉक के आधार पर जनपदवार मांग के अनुसार छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति की धनराशि ई-पेयमेन्ट प्रक्रिया के तहत निफ्टध्आरटीजीएस के माध्यम से पात्र छात्र एवं छात्राओं के बचत बैंक खातों में निर्धारित प्रक्रिया के अन्र्तगत सीधे अन्तरित किये जाने की तिथि 25 फरवरी 2015 है।

जब तक न सफल हो, नींद चैन की त्यागो तुम..!


(1) कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होतीरू- 
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। हमारे अंदर किसी भी बुरी से बुरी परिस्थितियों को बदलने की असीम शक्ति छिपी होती है। केवल जरूरत है अपने अंदर छिपी उस असीम शक्ति को पहचानने तथा महसूस करने की। जीवन की कठिनाइयाँ हमें इस असीम शक्ति को पहचानने तथा विकसित करने में मदद करती है। विभिन्न युगों के अवतारों तथा महापुरूषों को अपने उद्देश्य तक पहुँचने के लिए काफी कष्टपूर्ण जीवन जीना पड़ा। जीवन की चुनौतियाँ क्या होती हैं, उससे उनका अच्छी तरह परिचय हो गया था। साथ ही उससे जुझना-उबरना भी वह साधारण व्यक्ति के अपेक्षा अच्छी तरह जानते थे। किसी ने क्या खूब कहा है - कौन कहता है कि आसमां में छेद नहीं हो सकता। अरे! एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो। अपने अन्दर की शक्ति को पहचानने के लिए हमें अपने अन्दर की आवाज भी सुनना जरूरी है। किसी महापुरूष ने कहा है कि परिपक्वता तब से शुरू नहीं होती जब से हम बड़ी चीजें बोलने लगते हैं बल्कि यह तब से शुरू होती है जब हम छोटी-छोटी चीजें समझने लगते हैं। 
(2) सर्वोच्च सफलता के लिए जुनून तथा जज्बा चाहिएः-
जीवन पुरूषार्थ का मैदान है जिसमें मनुष्य को एक कुशल खिलाड़ी की भांति खेलते हुए सर्वोच्च सफलता हासिल करनी चाहिए। दुनियाँ में कोई भी व्यक्ति हमारे भाग्य को बिगाड़ नहीं सकता। हर व्यक्ति अपनी किस्मत लेकर इस संसार में आया है। परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि हमने कितना पुरूषार्थ किया। अनवरत कर्म करते हुए कोई व्यक्ति हर तरह की बड़ी से बड़ी सफलता अर्जित कर सकता है। जीवन में सर्वोच्च सफलता अर्जित करने के लिए व्यक्ति में जुनून तथा जज्बा चाहिए। हमारे लिए जिन्दगी एक चुनौती की तरह हो। हमारे लिए यह जीवन कर्मयोग तथा ज्ञानयोग का आह्वान है। जीवन में महान कार्य करने का एक ही मार्ग यह है कि जो कार्य आप कर रहे हैं उस कार्य से आपको प्यार है कि नहीं? स्वयं को कमजोर साबित मत होने दे क्योंकि डूबते सूरज को देखकर लोग घरों के दरवाजे बंद करने लगते हैं। संघर्ष जितना बड़ा होगा, जीत भी उतनी ही शानदार होगी। संघर्ष में आदमी अकेला होता है, सफलता में दुनिया उसके साथ होती है, जब-जब जग उस पर हँसा है, तब-तब उसी ने इतिहास रचा है। 
(3) खुद को हम जीवन में आगे बढने से बहाने बनाकर न रोकेंरू- 
जब कोई तुलना करते हुए हमसे कहता है कि उसकी स्थिति भी तो तुम जैसी है। वह तो सब कर रहा है, तो तुम क्यों नहीं? इस बात से हमें लगता है! हम सोचते है कि जरूरी तो नहीं कि जो प्रतिभा उनमें है, वह हममें भी हो। पर यह भी कहां जरूरी है कि जो प्रतिभा हमारे अंदर है, वह उन लोगों में भी हो। इसलिए जरूरत इस बात की है कि हम अपनी क्षमताओं को पहचानें और अगली बार अपने अभावों को कोसते समय नीचे दिये 17 बिन्दुओं से प्रेरणा लेना न भूलेंरू- (1) मेरे पास ढेरों आइडिया हैं, पर लोग मानते ही नहीं! जेरॉक्स फोटो कॉपी मशीन के आइडिया को भी ढेरों कंपनियों ने अस्वीकार कर दिया था, पर आज परिणाम सामने है। (2) मैं इतनी बार हार चुका हूं कि अब हिम्मत नहीं! अब्राहम लिंकन कई बार चुनाव हारने के बाद राष्ट्रपति बने। (3) मेरे पास धन नहीं है! इफंोसिस के पूर्व चेयरमैन नारायणमूर्ति के पास धन नहीं था, उन्होंने अपनी पत्नी से पैसा उधार लिया। (4) मैंने साइकिल पर घूमकर आधी जिंदगी गुजारी है! निरमा के करसन भाई पटेल ने भी साइकिल पर निरमा बेचकर आधी जिंदगी गुजारी। (5) एक दुर्घटना में अपाहिज होने के बाद मेरी हिम्मत चली गयी! प्रख्यात नृत्यांगना सुधा चंद्रन का एक पैर नकली है। महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंस आज भी अपनी बीमारी से जूझते हुए अंतरिक्ष के रहस्य खोज रहे हैं।
(4) हम अपनी विशिष्ट क्षमता को पहचानेरू-  
(6) मुझे बचपन से मंदबुद्धि कहा जाता है! थॉमस एल्वा एडीसन को भी बचपन से मंदबुुद्धि कहा जाता था। (7) मुझे उचित शिक्षा लेने का अवसर नहीं मिला! उचित शिक्षा का अवसर फोर्ड मोटर्स के मालिक हेनरी फोर्ड को नहीं मिला। (8) मुझे बचपन से परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ी! लता मंगेशकर को भी बचपन से परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ी थी। (9) मेरी लम्बाई बहुत कम है! सचिन तेंदुलकर की लम्बाई भी कम है। (10) मैं एक छोटी सी नौकरी करता हूं, इससे क्या होगा? धीरू भाई अंबानी भी छोटी नौकरी ही करते थे। (11) मेरी कम्पनी एक बार दिवालिया हो चुकी है, अब मुझ पर कौन भरोसा करेगा! दुनिया की प्रसिद्ध शीतल पेय निर्माता कंपनी पेप्सी कोला भी दिवालिया हो चुकी है।
(5) कौन कहता है कि आसमां में छेद नहीं हो सकतारू- 
(12) मेरा दो बार नर्वस ब्रेकडाउन हो चुका है! डिज्नीलैंड बनाने के पहले वाल्ट डिज्नी का तीन बार नर्वस ब्रेकडाउन हुआ था। (13) मेरी उम्र बहुत ज्यादा है! विश्व प्रसिद्ध कैंटुकी फ्राइड चिकन के मालिक ने 60 साल की उम्र में पहला रेस्तरा खोला था। (14) मुझे ढेरों बीमारियाँ हैं! अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डिलानो रूजवेल्ट के दोनों पैर काम नहीं करते थे। वर्जिन एयरलाइंस के प्रमुख भी डिस्लेक्सिया से पीडि़त थे। (15) मैं अत्यंत गरीब घर से हूँ! विख्यात वैज्ञानिक तथा पूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भी गरीब घर से थे। (16) बचपन में ही मेरे पिता का देहांत हो गया था! प्रख्यात संगीतकार ए.आर. रहमान के पिता का भी देहांत बचपन में हो गया था।(17) मैं बचपन से ही अस्वस्थ था! ऑस्कर विजेता अभिनेत्री मैर्ली मेटेलिन भी बचपन से बहरी व अस्वस्थ थी।
(6) शिक्षक विश्व के निर्माता और छात्र विश्व के भविष्य हैंरू-
शिक्षक कभी साधारण नहीं होता। प्रलय और निर्माण उसकी गोद में पलते हैं। एक माँ शिक्षित या अशिक्षित हो सकती है, परन्तु वह एक अच्छी शिक्षक है जिससे बेहतर स्नेह और देखभाल करने का पाठ और किसी से नहीं सीखा जा सकता है। एक सफल व्यक्ति और सामान्य व्यक्ति के बीच जो फर्क है, वह शक्ति और ज्ञान का नहीं है, बल्कि इच्छा शक्ति का होता है। इतिहास इस बात का साक्षी है की जितना नुकसान हमें दुर्जनों की दुर्जनता से नहीं हुआ, उससे ज्यादा सज्जनों की निष्क्रियता से हुआ है। खुद को यूँ खोकर, जिन्दगी को मायूस न कर, मंजिलें चारों तरफ हैं, रास्तों की तलाश कर। जिन्दगी जीने का मकसद विश्वव्यापी होना चाहिए और अपने आप पर विश्वास होना चाहिए। जीवन में खुशियों की कोई कमी नहीं होती, बस जीने का अंदाज होना चाहिए। किसी ने सही ही कहा है कि दीपक तो अँधेरे में जला करते हैं, फूल तो काँटों में भी खिला करते हैं, थक कर ना बैठ ए मंजिल के मुसाफिर, हीरे अक्सर कोयले में ही मिला करते हैं। 
(7) लहरों से डरकर नौका पार नहीं होतीरू-
युग कवि हरिवंशराय बच्चन की यह रचना अत्यन्त प्रेरणादायी है - लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। नन्ही चींटी जब दाना लेकर चलती है, चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है। मन का विश्वास रगों में साहस भरता है, चढ़कर गिरना, गिरकर चढना न अखरता है। आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है, जा जाकर खाली हाथ लौटकर आता है। मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में, बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में। मुऋी उसकी खाली हर बार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो, क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो। जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागों तुम, संघर्ष का मैदान छोड़कर मत भागों तुम। कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
(8) विश्व को युवा पीढ़ी के जुनून की जरूरत हैरू-  
जीवन में सीखने की कोई सीमा नहीं होती है तथा ज्ञान अर्जित करने का कभी अंत नहीं होता है। नई सीख तथा नया ज्ञान हमको मजबूत बनाता है। साथ ही हमको बेहतर नागरिक बनने में मदद करता है। इस मानव पिण्ड में सारे ब्रह्माण्ड का ज्ञान समाहित है। युवा पीढ़ी से विश्व को ढेर सारी उम्मीदें हैं। विश्व को आज युवा पीढ़ी की ऊर्जा और उत्साह की बहुत जरूरत है। विश्व को युवा पीढ़ी के जुनून की जरूरत है। युवा पीढ़ी के उत्साह, उमंग और जुनून के बल पर हम सब मिलकर इस दुनियाँ की एक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था बना सकते हैं। मेरा विश्वास है कि हम जितनी कठिन कोशिश करते हैं, उतने ही बेहतर तथा मजबूत इंसान बनते जाते हैं। कठिन प्रयास हमको महानता के करीब ले जाते हैं। मेरा विश्वास है कि हम सब में विश्व के लिए बहुत कुछ करने की असीम क्षमता है। हम रोज रोज अच्छे और अच्छे बनते चले तथा हम रोज रोज उस परम शक्ति परमात्मा की ओर बढ़ते चलें। 
(9) असफलता वह कसौटी है जिस पर आपको परखा जाता हैरू-
जिस दिन आप तय करते हैं कि आपको सफलता पाना है, उसी दिन से अपने आपको असफलता का सामना करने के लिए भी तैयार हो जाना चाहिए, क्योंकि असफलता वह कसौटी है जिस पर आपको परखा जाता है कि आप सफलता के योग्य हैं या नहीं। यदि आप में दृढ़ इच्छाशक्ति है और आप हर असफलता की चुनौती का सामना कर आगे बढने में सक्षम हैं तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। किसी ने सही ही कहा है कि श्श्जो लोग असफलताएं के डर से भयभीत रहते हैं, वे सफलता की मिठास नहीं चख सकते। 
इसलिए हमें असफलता के डर से घबड़ाना नहीं चाहिए बल्कि कठोर परिश्रम के द्वारा अपने लक्ष्य को पाने का संकल्प लेना चाहिए। किसी ने सही ही कहा है कि नाविक क्यों निराश होता है। यदि तू हृदय उदास करेगा, तो जग तेरा उपहास करेगा, यदि तूने खोया साहस तो, यह जग और निराश करेगा, अरे क्षितिज के पार साहसी, नव प्रभात होता है, नाविक क्यों निराश होता है। 
      डा0 जगदीश गांधी, शिक्षाविदड्ढ्  
               एवं संस्थापक-
प्रबंधक, सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

Coconut से होता है वजन कम, इससे बने कौन से Food खाएं


आपने वजन कम करने के लिए जिममें वर्कआउट और डाइटिंग, सब कुछ कर के देख लिया, लेकिन वजन वहीं का वही है। ये ऐसी समस्या है, जिससे न जाने कितने लोग परेशान हैं, खासकर महिलाएं। दरअसल, स्लिम होने में आपकी डाइट का बहुत बड़ा रोल है। यह बात बहुत मायने रखती है कि आप डाइट में किन चीजों को शामिल करते हैं, खासकर किस ऑयल का यूज करते हैं। फैट ऑयल से ज्यादा बढ़ता है। अगर आपका वजन कम नहीं हो रहा है, तो आप खाने में कोकोनट ऑयल का यूज करके देखें। इससे आपका वजन जल्दी कम होगा और स्किन भी हेल्दी रहेगी। आज हम आपको नारियल तेल के गुणों के बारे में बता रहे हैं। जानें, किस तरह से कोकोनट ऑयल से आप वजन कम कर सकते हैं और कैसे इसका यूज करें। 
1-मेटाबॉल्जिम को बूस्ट करने के लिए 
वजन कम करने के लिए मेटाबॉल्जिम को सही रखना सबसे जरूरी है। आपका मेटाबॉल्जिम जितना सही रहेगा, उतनी ही जल्दी कैलोरी बर्न होगी। कोकोनट ऑयल में थर्मोजेनिक एलिमेंट होता है। इससे आप कोकोनट ऑयल से बना भोजन करने से फैट बर्न होने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। 
हालांकि, एक स्टडी के मुताबिक अगर आप 1 से 2 बड़े चम्मच चैन फैट (कोकोनट में पाया जाता है) लेते हैं तो आपकी बॉडी से एक्स्ट्रा 120 कैलोरी बर्न होती है। इसलिए कोकोनट को किसी भी रूप में अपने भोजन में जरूर शामिल करें। 
एक दूसरी स्टडी के अनुसार, अगर आप 31 साल के ऊपर के हैं और आपका वजन ज्यादा है तो आपके लिए कोकोनट और ऑलिव ऑयल बेस्ट है। आप लगातार चार महीने तक एक चम्मच कोकोनट ऑयल का सेवन करें, फिर देखिए आपका वजन कैसे जल्दी से कम होता है।
2-वजन कम करने के लिए कोकोनट ऑयल को कैसे यूज करें 
कोकोनट ऑयल दो तरह से होते हैं- प्राकृतिक और रिफाइंड
1- प्राकृतिक ऑयल- इस तेल को फ्रेश कोकोनट या मिल्क से निकाल कर बनाया जाता है। 

2- रिफाइंड ऑयल-इसे कोकोनट को सुखा कर निकाला जाता है। 
अगर आप वजन कम करने के लिए कोकोनट ऑयल को यूज कर रहे हैं, तो प्राकृतिक तरीके से निकाले गए ऑयल का ही इस्तेमाल करें। 
1- नट बटर 
नट्स बॉडी के लिए हेल्दी और वजन कम करने में काफी कारगर हैं। इसे आप घर पर ही बना सकती हैं। सबसे पहले आप बादाम को अधकुटा करें या पीस लें। फिर उसमें कोकोनट ऑयल को मिक्स कर स्मूदी कर लें और रोज खाने में शामिल करें। 
2-बेक्ड फूड 
आप दूसरे ऑयल यूज करने की बजाय कोकोनट ऑयल से कूकीज, मफिन, केक और ब्राउनी बना सकते हैं। रोज के खाने को भी कोकोनट ऑयल से ही बनाएं। इससे खाने का टेस्ट भी चेंज होगा। साथ ही, आप कितना भी ऑयली खाएं, फिट रहेंगे।
3-रोस्टेड वेजिटेबल 
तोरी, बीन्स, आलू को एक साथ कुचल कर मिक्स कर लें और उसमें नींबू का रस, कोकोनट ऑयल और काली मिर्च को मिक्स कर खाएं। ये काफी टेस्टी होता है। इसके अलावा, आप ग्रिल करने के लिए भी कोकोनट ऑयल का ही यूज करें। 
4-पॉपकॉर्न 
पॉपकॉर्न को बनाने के लिए आप कोकोनट यूज करें। यह वजन कम करने में काफी कारगर होता है।
5-डेली डाइट में कोकोनट ऑयल खाएं 
जैसे ही आप खाने में कोकोनट ऑयल को यूज करने के बारे में सोचते हैं, जमे हुए ऑयल को देखकर आपका हाथ दूसरे ऑयल पर चला जाता है। दरअसल,  कोकोनट ऑयल 76 डिग्री पर जम जाता है। ऑयल के जमने से कोई दिक्कत नहीं है, बल्कि यह ठीक रहता है। आप कोकोनट ऑयल को गर्म पानी में डालकर पिघला सकते हैं या सीधे जमे हुए तेल को निकालकर यूज कर सकते हैं। 
6-कैलोरी कम करने के लिए 
आपको यह पता होना चाहिए कि कोकोनट ऑयल से सिफऱ् 9 ग्राम कैलोरी बढ़ती है। अगर आप खाने से पहले कैलोरी देखते हैं या कैलोरी को लेकर सतर्क हैं तो आप डाइट में कोकोनट ऑयल को जरूर शामिल करें। इसकी जगह आप दूसरी चीजों में कटौती कर सकते हैं। आप अपना कैलोरी चार्ट बना सकते है और उसी के हिसाब से डाइट में चीजों को शामिल करें।


-संकलनकर्ता श्रीमती मेघा अग्रवाल

राजस्थान का गौरव है चित्तौडगढ़ का दुर्ग

चित्तौडगढ़ किला राजस्थान का सबसे बड़ा किला है। किला चित्तौडगढ़ के शानदार इतिहास को बताता है। किला इस शहर का प्रमुख पर्यटन स्थल है। किला जमीन से लगभग 500 फुट ऊंचाई वाली एक पहाड़ी पर बना हुआ है। किले तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं है। इस किले में पहुंचने के लिए एक खड़े और घुमावदार मार्ग से होकर जाना होता है। इस किले में सात दरवाजे हैं जिनके नाम हिंदू देवताओं के नाम पर पड़े हैं। प्रथम प्रवेश द्वार पैदल पोल के नाम से जाना जाता है, जिसके बाद भैरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोली पोल, लक्ष्मण पोल और अंत में राम पोल है जो सन 1459 में बनवाया गया था। किले की पूर्वी दिशा में स्थित प्रवेश द्वार को सूरज पोल कहा जाता है। इस किले में कई सुंदर मंदिरों के साथ-साथ रानी पद्मिनी और महाराणा कुम्भ के शानदार महल हैं। किले में कई जल निकाय हैं जिन्हें वर्षा या प्राकृतिक जलग्रहों से पानी मिलता रहता है। दुर्ग अनेक दर्शनीय और ऐतिहासिक स्थानों से परिपूर्ण है।
इतिहास- चित्तौडगढ़ किला राजपूत शौर्य के इतिहास में गौरवपूर्ण स्थान रखता है। यह किला 7वीं से 16वीं शताब्दी तक सत्ता का एक महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था। लगभग 700 एकड़ के क्षेत्र में फैला यह किला 500 फुट ऊंची पहाड़ी पर खड़ा है। यह माना जाता है कि 7वीं शताब्दी में मोरी राजवंश के चित्रांगद मोरी द्वारा इसका निर्माण करवाया गया था।
आक्रमण- किले के लंबे इतिहास के दौरान इस पर तीन बार आक्रमण किए गए। पहला आक्रमण सन 1303 में अलाउद्दीन खलिजी द्वारा, दूसरा सन 1535 में गुजरात के बहादुरशाह द्वारा तथा तीसरा सन 1567-68 में मुगल बादशाह अकबर द्वारा किया गया था। इसकी प्रसिद्ध स्मारकीय विरासत की विशेषता इसके विशिष्ट मजबूत किले, प्रवेश द्वार, बुर्ज, महल, मंदिर, दुर्ग तथा जलाशय स्वयं बताते हैं जो राजपूत वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने हैं।
प्रवेश द्वार- इस किले के सात प्रवेश द्वार हैं। सूरज पोल, भैरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोली पोल, लक्ष्मण पोल और राम पोल।
कब जाएं- अक्टूबर से मार्च
मार्ग स्थिति- चित्तौडगढ़ का किला चित्तौडगढ़ बूंदी रोड से लगभग 4 से 5 किमी की दूरी पर स्थित है।
बोली जानी वाली भाषा- हिंदी, राजस्थानी, अंग्रेजी
कैसे पहुंचें- हवाई जहाज, रेल, बस आदि से पहुंचा जा सकता है।
क्या देखें- जैन कीर्तिस्तंभ, महावीरस्वामी का मंदिर, पद्मिनी का महल, कालिका माई का मंदिर
कहां ठहरे- यहां ठहरने के लिए कई होटल और धर्मशाला है।
क्या खाएं- दाल-बाटी, चूरमा आदि राजस्थानी भोजन।

उप जिलाधिकारी मवाना ने परीक्षतगढ़ के किसान द्वारा की गई आत्महत्या की जांच


दिनांक 27 मार्च 2015 को जहरीला पदार्थ खाकर परीक्षतगढ़
के किसान राकेश कुमार बंुसल पुत्र श्री बेगराज बंसल द्वारा की गयी
आत्महत्या के सम्बन्ध में जिलाधिकारी के निर्देश पर उपजिलाधिकारी
मवाना श्री अरविन्द कुमार सिंह ने दिनांक 28 मार्च 2015 को जांच
कर जांच आख्या जिलाधिकारी को प्रस्तुत की है। उपजिलाधिकारी
मवाना ने अपनी जांच आख्या में बताया कि गन्ना मूल्य भुगतान
बकाया व गन्ना समिति के कर्ज के सम्बन्ध में सचिव गन्ना विकास समिति
से जांच करायी गयी। जिसमें उसने बताया कि आत्महत्या करने वाला
कृषक राकेश पुत्र बेगराज निवासी अहमद नगर बढ़ला हाल निवासी
परीक्षतगढ़ का वर्ष 2013-14 पैराई सत्र में 243.84 कुन्तल गन्ना
सप्लाई हुआ था जिसका 66141.67 रूपये भुगतान बना जिसमें से
61264.87 रूपये का भुगतान हो चुका मात्र 4876 .80 रूपये एसएपी से
20 रूपये कम दर वाला ही अवशेष है। वर्तमान पैराई सत्र 2014-15
में 58.41 कुन्तल गन्ना सप्लाई हुआ जिसका 15843.72 रूपये अवशेष
है इस प्रकार दोनों सत्र का 20720.52 रूपये ही अवशेष है तथा
गन्ना समिति का उक्त कृषक पर ऋण/लोन बकाया नहीं था।
उपजिलाधिकारी मवाना ने बताया कि वर्षा ओलावृष्टि आदि से
फसल की क्षति तथा बैंक कर्ज के सम्बन्ध में तहसीलदार मवाना से
जांच करायी गयी उन्होंने अपनी जांच रिपोर्ट में बताया कि उक्त
कृषक के नाम खाता संख्या 183, खाता संख्या 400/1.501 हैक्ट0
खसरा संख्या 405/1.364 हैक्ट0 कुल 2 .किता 2.865 हैक्ट0 व
खाता संख्या 203 खसरा संख्या 115 अ रकबा 1.737 है0 खसरा संख्या 116
रकबा 1.338 है0 कुल क्षेत्रफल 3.075 हैक्ट भुमि ग्राम अहमद
नगर बढ़ला में तथा 0.507 हैैक्ट0 ग्राम सोना में बतौर सह
खातेदार के रूप में जिसमें से उक्त के हिस्से में 2.1450 हैक्ट0
भूमि ाती है जिस पर मौके पर गेहूं, गन्ना की फसल एवं आम का
बाग है। मौके पर निरीक्षण के समय पूर्व में हुई वर्षा व
ओलावृष्टि से फसल को कोई नुकसान नही है। खतौनी से स्पष्ट
हुआ कि उक्त कृषक ने 7-01-2009 को स्टेट बैंक आफ
इण्डिया दुर्वेशपुर से 1.5 लाख रूपये का लोन लेकर भूमि बन्धक
की हुई है जो कि भूमि के सापेक्ष बैंक से लिए लोन काफी कम
है। उन्होनंे बताया कि इनकी आर्थिक स्थिति भी सामान्य
थी।
उन्होंने बताया कि मृतक के भाई राम किशन बंसल द्वारा
थाना परीक्षतगढ़ में 27 मार्च 205 में दी गयी तहरीर की जांच
प्रभारी निरीक्षक थाना परीक्षतगढ़ एवं सीओ सदर देहात से करायी गयी
आख्या में उन्होंने बताया कि मृतक ने तीन वर्ष पूर्व पुरानी
गुड़ मंडी में मकान खरीद था तथा उसमें निवास कर रहा था।
इसके द्वारा परीक्षतगढ़ मार्केट में दो दुकानें खरीदी गयी थी एक
पर स्वयं किराना एवं परचून की दुकान थी वह दुकान चल नहीं पायी।
उसने अपनी दुकान को बन्द कर दिया इस व्यापार में उसे घटा हुआ
था उसने दोनों दुकानें किराये पर दे थी। घाटे के कारण
गृह कलेश व पत्नी से वाद विवाद हो जाता था। इस कारण पिछले जीन
माह से डिप्रेशन में था और इसी के वशीभूत जहरीला पदार्थ
खा लिया। उपजिलाधिकारी मवाना ने अपनी रिपोर्ट में राकेश कुमार
बंसल की आत्महत्या का कारण बकाया गन्ना भुगतान, फसल की क्षति,
बैक व सोसायटी का कर्जा के कारण प्रथम दृष्टया प्रतीत नही होना
बताया है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में बताया कि आत्महत्या का
सही कारण पुलिस विवेचना के समाप्ति के बाद ही निष्कृर्षित किया जा
सकता है।

पर्यटन के आधार स्वच्छता, सुरक्षा, सत्कार

देश के पर्यटन क्षेत्र द्वारा भारी राजस्व जुटाने में राजग सरकार जुट गई है। केन्द्रीय पर्यटन मंत्री ने बताया कि अगले साल तक पर्यटकों की संख्या दुगुनी करने का लक्ष्य  रखा गया है। इसके लिए सरकार ने देशी-विदेशी पर्यटकों को लुभाने के लिए तीन नीतियां बनाई हैंरू-
१. स्वच्छता  प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान के तहत अगले तीन महीनों में उन सभी स्मारकों को पूरी तरह से स्वच्छ-सुन्दर बनाया जाएगा, जहाँ बहुत ज्यादा पर्यटक सैर-सपाट के लिए आते हैं।
२. सुरक्षा  विदेशी पर्यटकों के साथ देश को शरमिंदा करने वाला कोई बुरा हादसा न हो, इसके लिए कड़ा कानून बनाने की तैयारी चल रही है, जिसमें विदेशी पर्यटक को छूना भी अपराध माना जाएगा।
उनकी संपूर्ण सुरक्षा के लिए चैबीस घंटे का फ्री विशेष सहायता नंबर चालू किया जाएगा। पर्यटन मंत्रालय अलग से सुरक्षाकर्मियों की नियुक्ति करेगा।
३. सत्कार  देश की प्राचीन परंपरा श्अतिथि देवो भव्य (मेहमान भगवान होता है) की विचार धारा को साकार करने के लिए पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों को पूरा मान-सम्मान प्रदान किए जाने की व्यवस्था की जा रही है। इसके लिए श्हुनर से रोजगार तक्य कार्यक्रम के अंतर्गत युवा गाइडों को प्रशिक्षित किया जाएगा। इससे नवयुवकों को रोजगार के नए मौके मिलेंगे, बेरोजगारी घटेगी।
भारत पर्यटन क्षेत्र में कहाँ है?
१. विदेशी पर्यटकों का भारत आगमन रू ७२ लाख
२. अंतरराष्टड्ढ्रीय पर्यटकों के आगमन में भारत का स्थान ४२वां
३. अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के आगमन में भारत की
    हिस्सेदारी  ०.६४
४. पर्यटन राजस्व के हिसाब से भारत का स्थान  १६वां
५. चीन और थाइलैंड जैसे एशियाई देशों के मुकाबले
   भारत बहुत पीछे है, जहाँ क्रमश सालाना ५.५७ और
   २.६५ करोड़ पर्यटक आते हैं।                

Saturday, 28 March 2015

दवा और विश्वास


अगर होम्योपैथी पर तुम्हें भरोसा है तो एलोपैथी तुम्हें ठीक न कर पाएगी। अगर एलोपैथी पर तुम्हें भरोसा है तो होम्योपैथी तुम्हें ठीक न कर पाएगी। तुम्हारा भरोसा ही तुम्हे ठीक करता है। इसीलिए तो राख भी दे देता है कोई तो कभी काम कर जाती है...

देखो, दुनिया में कितनी पैथीज हैं! एलोपैथी है, आयुर्वेद है, यूनानी है, होम्यिोपैथी है, नेचरोपैथी है, एक्युपंक्चर है, हजार..। कौन ठीक है? अब तो वैज्ञानिक भी संदिग्ध हो गए हैं कि कुछ साफ मामला नहीं है कौन ठीक है। क्योंकि सभी इलाजों से मरीज ठीक होते पाये जाते हैं। एलोपैथी से भी ठीक हो जाता है, आयुर्वेद से भी ठीक हो जाता है-मरीज बड़े अनूठे हैं, कोई एक सिद्धांत को मान कर नहीं चलते मालूम होता है, बीमारी भी बड़ी अजीब है-तो पश्चिम में बहुत से प्रयोग किए गये जिसको वे प्लेसबो कहते हैं। एक मरीज को एलोपैथी की दवा दी जाती है। उसी बीमारी के दूसरे मरीज को सिर्फ पानी दिया जाता है। और बताया नहीं जाता कि किसको दवा दी जा रही है, किसको पानी दिया जा रहा है। बड़ी हैरानी है, सत्तर परसेंट दोनों ठीक हो जाते हैं! पानी जिसको मिलता है, वह भी उतना ही ठीक हो जाता हैय जिसको दवा मिलती है, वह भी उतना ही ठीक हो जाता है।
तो ऐसा लगता है कि आदमी ठीक होना चाहता है इसलिए ठीक हो जाता है। और जिसका जिस पर भरोसा हो। अगर होमियोपैथी पर तुम्हें भरोसा है तो एलोपैथी तुम्हें ठीक न कर पाएगी। अगर एलोपैथी पर तुम्हें भरोसा है तो होमियोपैथी तुम्हें ठीक न कर पाएगी। तुम्हारा भरोसा ही तुम्हे ठीक करता है। इसीलिए तो राख भी दे देता है कोई तो कभी काम कर जाती है।
मैं एक साधु को जानता हूं। उन्होंने मुझे कहा। ग्रामीण हिस्से में रहते हैं। बड़े सरल आदमी हैं। बेपढ़ा-लिखा इलाका है। आदिवासी हैं सब आस-पास बस्तर में जहां उनका निवास है। बेपढ़े-लिखे लोग, जंगली लोग हैं। उन्होंने मुझे कहा कि एक दफे एक आदमी आया। लगता था कि वह क्षय रोग से बीमार है। उनको औषधि का थोड़ा ज्ञान है। तो उन्होंने कुछ दवा-अब वहां कुछ था नहीं लिखने कोय ईंट का एक टुकड़ा पड़ा थाय उस ईट के टुकड़े पर ही उन्होंने लिख दिया कि तुम जाकर बाजार से और ये दवा ले लेना।
वह आदमी गैर पढ़ा-लिखा। वह कुछ समझा नहीं कि क्या मामला है। वह घर गया, उसने समझा कि यह ईंट दवा है, उसको घोंट-घोंट कर वह पी गया। जब तीन महीने में बिल्कुल ठीक हो गया तब वह आया कि थोड़ी औषधि और दे देंय ऐसे तो मैं बिल्कुल ठीक हो गया। उन्होंने कहा, भई औषधि तो बाजार में मिलेगी। उसने कहा, बाजार जाने की क्या जरूरत? आपने दी थी वह काम कर गई। उन्होंने पूछा, क्या किया तुमने? उसने कहा कि हम तो घोल-घोल कर पी गए उसको और बिलकुल ठीक हो गए हैं। और बिल्कुल ठीक था, चंगा खड़ा था।
तो वह साधु मुझसे कह रहे थे कि फिर मैंने उचित न समझा कि वह ईंट थी और उसको पीने से टी.बी. ठीक नहीं होती। लेकिन जब ठीक हो ही गई तो अब कुछ कहना ठीक नहीं है, अब चुप ही रह जाना उचित है। और एक ईंट के टुकड़े पर वही मंत्र लिख कर दे दिया जो पहले लिखा था- वही दवाई का नाम। क्योंकि उसने कहा कि मंत्र लिख देना आप। ईंट तो हमारे गांव में भी है, लेकिन मंत्रसिक्त बात ही और है।
अब तो प्लेसबो पर सारी दुनिया में प्रयोग हुए हैं। और पाया गया है कि कोई भी दवा हो, सत्तर प्रतिशत मरीज तो ठीक होते ही हैं। इसलिए दवा का कोई बड़ा सवाल नहीं मालूम पड़ता।
क्या ज्ञान है? बुद्ध ने ज्ञान की परिभाषा की हैरू जिससे काम चल जाए। यह समझ में आती है परिभाषा। ज्ञान का यह अर्थ नहीं कि यह सत्य हैय ज्ञान का इतना ही अर्थ है कि जिससे काम चल जाए। वही ज्ञान है, कामचलाऊ ज्ञान है। जब काम न चले तो अज्ञान हो जाता है वही। जब काम ने चले तो अज्ञान हो जाता है वही। जब काम चला देता है तो ज्ञान हो जाता है वही।
डाक्टरों को पता है कि जब भी कोई नयी दवा निकलती है तो पहले तीन चार महीने बहुत काम करती है, फिर धीरे-धीरे असर कम होने लगता है। दवा वहींय असर क्यों कम होने लगता है? पहले जब दवा निकलती है, नयी दवा, तो तीन-चार महीने तो ऐसा काम करती है जादू का कि लगता है कि अब इससे बेहतर दवा इस बीमारी के लिए नहीं हो सकेगी। क्योंकि डॉक्टर भी नये के भरोसे से भरा होता हैय मरीज भी नयी दवा के भरोसे से भरा होता है। और जब मरीज शुरु में ठीक होते हैं तो दूसरे मरीजों में भी संक्रामक खबर फैल जाती है कि यह दवा काम करती है, लेकिन फिर धीरे-धीरे असर कम होने लगता है। दवा वहीय असर क्यों कम होने लगता है? पहले जब दवा निकलती है, नयी दवा, तो तीन-चार महीने तो ऐसा काम करती है जादू का कि लगता कि अब इससे बेहतर दवा इस बीमारी के लिए नहीं हो सकेगी। क्योंकि डॉक्टर भी नये के भरोसे से भरा होता हैय मरीज भी नयी दवा के भरोसे से भरा होता है। और जब मरीज शुरू में ठीक होते हैं तो दूसरे मरीजों में भी संक्रामक खबर फैल जाती है कि यह दवा काम करती है।
लेकिन फिर धीरे-धीरे उत्साह तो सभी चीजों में क्षीण हो जाता है। चार-छह महीने में डॉक्टर का उत्साह भी क्षीण हो जाता है। एकाध-दो मरीज ऐसे भी निकल आते हैं जिनको तुम ठीक ही नहीं कर सकते। उनके कारण दवा पर भरोसा गिर जाता है। जिद्दी तो सब जगह होते हैं। तीस परसेंट लोग जिद्दी होते हैं हर चीज में। बीमारी में सौ में से सत्तर आदमी जिद्दी नहीं होते, तीस आदमी जिद्दी होते हैं। वे किसी चीज में भरोसा नहीं उनका। वे पक्के नास्तिक है हर चीज में। हर चीज को वे इनकार की भाषा में देखते हैं। इस कारण उन पर कोई परिणाम नहीं होता। जैसे ही वे आदमी आ गये, और उन पर परिणाम न हुआ, मरीजों में भी खबर पहुंच जाती है कि अब काम न हो सकेगा। यह दवा भी गई। तब तत्क्षण दूसरी दवा खोजनी पड़ती है।
जो काम करे वह ज्ञान। मगर यह तो बड़ी कमजोर परिभाषा हुई। ज्ञान की परिभाषा तो होनी चाहिए-जो सदा है वही ज्ञान। लेकिन वैसा ज्ञान तो मनुष्य के पास नहीं है। वैसा ज्ञान तो तभी उपलब्ध होता है जब तुम अपनी मनुष्यता को भी छोड़ कर अतिक्रमण कर जाते हो। और तुम्हारी जानकारियां सिर्फ अज्ञान को छिपाने के उपाय है। उससे तुम जी लेते हो सुविधा से। लेकिन सुविधा से जी लेने का नाम जीवन रहस्य को जान लेना नहीं है।
यह दूसरी बात। और तीसरी बातय फिर हम सूत्र में प्रवेश करें।
जब भी तुम किसी चीज को जानते हो तो जानने का अर्थ ही होता है कि तुममें और जिसे तुम जान रहे हो एक फासला है। वहां तुम बैठो हो, मैं तुम्हें देख रहा हूँ। यहां मैं बैठा हूं, तुम मुझे देख रहे हो। अगर हम बहुत करीब आ जाएं तो देखना कम होने लगेगा। अगर हम अपने चेहरे बिल्कुल करीब कर लें, तो हम देख ही न पाएंगे। अगर हम दोनों की आंखें इतने करीब आ जाएं कि एक-दूसरे को छूने लगें, तो फिर कुछ भी न दिखाई पड़ेगा। ज्ञान के लिए फासला चाहिए, दूरी चाहिए। और यही अड़चन है। क्योंकि जिससे हम दूर हैं उसे हम जान कैसे सकेंगे? इंद्रियां उसे ही जान सकती हैं जो दूर है। और परमात्मा को, सत्य को जानने का एक ही उपाय है कि वह इतने पास आ जाए, इतने पास आ जाए कि हम और उसके बीच कोई भी रत्ती भर का फासला न रहे। तो परमात्मा को इंद्रियों से न जाना जा सकेगा। क्योंकि इंद्रियां तो दूर को ही जान सकती हैं। अतींद्रिय अनुभव से ही परमात्मा को जाना जा सकेगा। लेकिन तुम्हारा तो सार ज्ञान इंदियों का है। कुछ तुमने आंख से जाना है, कुछ हाथ से जाना है, कुछ कान से जाना है। लेकिन सब जाना है इंद्रियों से। इंद्रियां मन के द्वार हैं। जो-जो इंद्रियां जान कर लाती हैं, मन को दे देती हैं। मन ज्ञानी बन जाता है। मन के पीछे छिपी है तुम्हारी चेतना।
ओशो

Shram Shikhar

प्रत्येक भारतीय नागरिक को जन्म लेते ही पंजीकृत करके एक नागरिक नम्बर दिया जाये तथा प्रत्येक वर्ष निश्चित अवधि पर अपडेट/वार्षिक सूचना रिकार्ड किया जाये। आज की विकसित टैक्नोलाॅजी ने हमें सहज ऐसी सुविधा उपलब्ध कराई है। इसके प्रभाव से अपराधीकरण नियंत्रित होगा तथा विकास के विभिन्न आयाम खुलेगें।
कृपया इस पोस्ट के समर्थन में अपने विचार बतायें जिन्हे हम अपनी वेबसाइट पर आपकी फोटो के साथ पोस्ट करेंगे धन्यवाद

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भारत सरकार, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय

महिला श्रमिकों का कल्याण और प्रशिक्षण है जिसके अंतर्गत गैर-सरकारी संगठनोंध्स्वैच्छिक संगठनों को प्रत्यक्ष रूप से सहायता अनुदान के रूप में आर्थिक सहायता दी जाती है ताकि केन्द्रीयध्राज्य सरकारों के विभिन्न श्रम कानूनों के अंतर्गत कामकाजी महिलाओं को संगठित, उनके अधिकारों तथा ड्यूटियों के बारे में उन्हें शिक्षित, विधिक सहायता प्रदान की जाए और महिला श्रमिक की आम जागरूकता से संवर्धन करने के लिए सेमिनार, कार्यशालाएं इत्यादि का आयोजन किया जाए। सामान्य जागरूकता विकसित किए जा सके। 
साथ ही, विशेष रूप से महिला कामगारों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन केंद्रीय श्रमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा किया जाता है ताकि वे सशक्त हों और उनका कल्याण सुनिश्चित हो। 
इन योजनाओं के लिए निधियों का राज्व-वारध्संघ राज्य क्षेत्रवार अलग से आवंटन नहीं है। सहायता अनुदान योजना के अंतर्गत महिला श्रमिकों के कल्याण के लिए पिछले तीन वर्षों और मौजूदा वर्ष के दौरान कुल 1,03,030 महिलाएं लाभांवित हुई हैं।

प्रशासन स्तर पर मरीज या तिमारदार की सनुने हेतु सैल गठन जरूरी

संयुक्त व्यापार संघ के अध्यक्ष नवीन गुप्ता ने सुशील जसवंत राय अस्पताल में शुक्रवार को व्यापार संघ केमन्त्री व उनके परिजन के साथ मरपीट का आक्रोष करते हुए भी अस्पताल प्रबन्धन पर अभ्रदता व भर्ति करने के बाद भी की मो श्रेणी करने से इंकार करने वाले चिकित्सक के खिलाफ कार्यवाही पर विश्वास एक कारोबारी सम्बन्ध भावना का मान रखकर अपनों को ही समझा लिया है परन्तु वह प्रयास करेंगे। कि भविष्य में इस तरह की घटना न घटे या चिकित्सक व मरीज तथा तिमार दार हितों के संरक्षण हेतु चिकित्सक प्रशासन व जिला तथा पुलिस का सयुंक्त सैल स्थापित हो।
जहां मरीज व उसका तिमार दार व चिकित्सक तथा अस्पताल नर्सिंग होम प्रबन्धन अपनी शिकायत झगडने के स्थान पर कर सके तथा यह सैल किसी कानून व्यवस्था की स्थिति आने से पूर्व न्यायोचित मानवीय दृष्टिड्ढगत समाधान करा सके। इस सुझाव का अखिल भारतीय लोकाधिकार संगठन व वरिष्ठ नागरिक सद्भावना समिति फोरम ने स्वागत एवं समर्थन किया है।
इलाज मरीज व तिमारदार को विश्वास मे लेकर ही हो
गत दिनों उच्च तय न्यायालय द्वाा अपने दिशा निर्देश में इलाज के बारे में पूर्ण जानकारी खर्च व दवाई जो लिखी जाए आदि के बारे में मरीज व उसके तिमारदार को जानकारी देने जी बात नही है। इससे इलाज के खर्च क जानकारी भी है। खाली हस्ताक्ष्र लेना प्रर्याप्त नहीं है।

दवाई निर्माता विक्रेता के बिक्री बढाने के तरीके भी विवादो का कारण

अखिल भारतीय लोकाधिकार संगठन ने अफसोस जाहिर किया कि कोर्ट एवं सरकार द्वारा चिकित्सकों को दवाई निर्माता कम्पनियों द्वारा अपनी दवाईयों को लिखवाने के लिए दी जाने वाली सहुलतियों व नकद राशि व उपहारों पर दिखाने के लिए कानूनी रोक के प्राविधान किए  है, इन पर सरकारी सेवा के चिकित्सक एक स्तर तक नियंत्रित हो सके है परन्तु निजी प्रैक्टिस जो रोके नही एक रही है इस नियंत्रण से खुल्लम खुल्ला मूहं मोड़े है निजी क्षेत्र में चिकित्सक व अस्पताल, नर्सिंग होम तो आपसे से बाहर है। उनका कहना है कि नियंत्रण करने वाले खुद ईमानदार नही फिर हम ईमानदार क्यों बनें।
दवाई निर्माता कम्पनियों ने भी सीधे के स्थान पर घुमावदार तरीके ईजाद किए है। वह अब दवाई बेचने वालों के माध्यम की भी ईजाद कर लिया है यह दवाई बेचने वाले बहुत कुछ दवाई निर्माताओं के माध्यम बन बैठे है। चिकित्सक अब फीस के अलावा इलाज के स्थल व दवाई बेचने वालों से भी बहुत कुछ पाने में लगकर चिकित्सा के को ठेंगा दिखाने में लगे है। चिकित्सकों की परिषद केवल संशान शिकायत पर लेती है, घटना पर स्वयं लगाने से परेहज है जबकि कोर्ट संशान लेती देखी जाने लगी है जनहित समस्या।
वरिष्ठ नागरिक सदड्ढ्भावना फोरम भी बैठक में अफसोस जाहिर इस बात पर था कि जब महंगाई पर नियंत्रण के लिए उत्पादकत्र्ता या विक्रयदाताओं पर नियंत्रण व छापे मारी होती है फिर चिकित्सा परिषद व प्रशासन स्तर से समय-समय पर चिकित्सकों व उनके कार्य स्थल चिकित्सालय व नर्सिंग होम में दवाईयों विक्रेताओं पर छापेमारी होकर लिए जाने वाले चार्ज के पर निगरानी क्यों नही। अस्पतालों, नर्सिंग होम में दवाईयों की बिक्री प्रतिबन्धित सख्ती से होनी चाहिए ताकि अस्पतालों नर्सिंग होम से ही दवाईयां खरीद के लिए मजदूरी के विवाद उत्पन्न न हो। चिकित्सा लय नर्सिंग होम केवल अपने ऑपरेशन इस्तेमाल की दवाईयां ही रख सके, खुले ब्रिकी की छूट न मिले।

सुशीला जसंवत राय सुपरस्पेशलिटी अस्पताल में कैंसर मरीज तिमारदारों से मारपीट-दवाइयाँ बाहर से खरीद - कारण अस्पताल-नर्सिंग होमों से तिमारदारों में आक्रोश के कारणों को जानेें।

मेरठ। चिकित्सालय या नर्सिग होम में मरीज व उनके तीमारदारों के आक्रोश की घटनाएं आये दिन क्यों बढ़ रही है तथा चिकित्सकों के प्रति मरीज व तिमारदारों में घट रहे विश्वास पर सरकार व न्यायालय के बार-बार के निर्देश कारगार न होने पर कोई अनुसंधानत्मकता की जरूरत है बतालाई गई।
यह विचार यहां रविवार को अखिल भारतीय लोकाधिकार संगठन व वरिष्ठ नागरिक सदड्ढ्भावना प्रकोष्ठ की बैठकों में प्रबलरूप से व्यक्त किया गया। इस बैठक में गत शुक्रवार को सुशील जसंवत राय सुपरलेटी अस्पताल में कैंसर मरीज श्रीमती संतोष सिंघल को किमोथेरपी के लिए भर्ति करने के बाद मरीज के परिजनों द्वारा चिकित्सक द्वारा लिखी गई दवाई अस्पताल से अलग बाजार से खरीद लाने पर किमो करने से इंकार करने पर मरीज के परिजनों को आक्रोशित करने की स्थिति उत्पन्न करने वाले चिकित्सक के खिलाफ अखिल भारतीय चिकित्सा परिषद से सान लेकर कार्यवाही करने की मांग की गई । इसमे अस्पताल के स्टाफ द्वारा मरीज के परिजनों से मारपीट करने वालों के खिलाफ अस्पताल स्तर पर कार्यवाही का आश्वासन दिए जाने पर भी कार्यवाही न करने की भत्र्सना की गई। प्रदेश सरकार व प्रशासन से इस तरह की घटनाएं रोकने के लिए व मरीज व उसके तीमारदारों की सुरक्षा हेतु सख्त व्यवस्था बनाने व उसे क्रियान्वित करने की अपेक्षा की गई।

बिजली मे ठेकेदारों द्वारा श्रमिक सप्लाई श्रम विभाग में पंजीकरण तक नहीं

बिजली विभाग सहित कुछ सरकारी अर्द्ध सरकारी संस्थानों में श्रमिक व कुछ श्रमिक आदि स्तर की पूर्ति करने वाली अधिकतर फर्म संविदा श्रम (विनियमन एवं उत्पादन) अधिनियम १९७० के अन्र्तगत अधिष्ठापन के पंजीयन एवं संविदा कारों के द्वारा लाईसेन्स प्राप्त किए बिना बिजली इकाईयों से संविदा अनुबन्ध हो रहा है, इससे श्रम विभाग की अंसगठित श्रमिकों के लिए योजनाओं का लाभ तो दूर संविदा पर रखने वाले बिजली उपक्रम के ई.पी.एफ व बीमा का लाभ भी नही पा रहे है। बिजली विभाग में परिचालन व्यवस्था मे लगे श्रमिक जिनमे कुशल-अकुशल सभी डेढ लाख बिजली दुघर्टना की कीमत पा रहे है। कहने का अभिप्राय है कि बिजली विभाग में नियमित भर्ति न होकर ठेके पर परिचालन व्यवस्था या संविदा पर करके जिस तरह शोषण की प्रक्रिया चल रही है। राजस्थान की भांति संविदा समस्याओं पर समिति बनाकर विचार हो। प्रदेश मे एक प्रक्रिया हो तथा अनुभव योग्यता पर उन्हे नियमित सेवा मिले। 

महीनों पगार नहीं फिर काम के घंटे की भी सीमा नहीं

उ0प्र0 में सबसे बडे उ0प्र0 सरकार के उपक्रम उ0प्र0 पावर कारपोरेशन के उत्पादन, वितरण व ड्रास्कों में विभिन्न रूप से लगभग ६०-७० हजार से अधिक विभिन्न रुपों में संविदा या कम से कम ८.१० वर्ष से जबसे निगम बना है। इनको आदेशों के बाबजूद न ते इनके अधिकांशतरू खण्ड खाते है न बीमा पर काम करते सैकड़ों से हमारे तक भरते है या दुघर्टना ग्रस्त होते है। इनकी दुर्घटना पर जिम्मेदारी लेने वाला कोई नही। इसके विपरीत उ0प्र0 रोडवेज में विभाग द्वारा विज्ञापन द्वारा आवेदन रखकर सीधे संविदा दी जा रही है इनके कार्य एवं जिदंगी व छुट्टी आदि की व्यवस्था ही नही बल्कि नियमित सेवा के अवसर है।
प्रश्न यह उठता है कि एक ही राज्य में अलग-अलग व्यवस्था में संविदा पर नौजवानों के भविष्य की व्यवस्था किस कारण। बिजली में परिचालन व दफ्तर कार्यो हेतु ठेकेदारी या फ्रेचाइंजी से तो रोडवेज में सीधे संविदा रखने की व्यवस्था। राजस्थान की भांति उ0प्र0 मे संविदा कार्मिकों की समस्या हेतु समाधान क्यों नही। संविदा पर अब तो शिक्षक हो, चिकित्सक ही अथवा अन्य अधिकांश कार्यो मे नियमित भर्ति के स्थान पर संविदा या फिर अपने सेवानिवृत को रखने की ही व्यवस्था जोर शोर से चालू है। इससे प्रदेश का भला ही या ने हो, विभाग की लाभ हो ने हो पर विभाग के लोग व कुछ अन्य के स्वार्थ सिद्ध तो हो ही रहे है। भ्रष्टाचार व भाई भतिजा या फिर उपकार पनपन रहा है, काम करने वाले सम्पर्क में आने वाली जनता को लूट रहे लूटे भर्ति न होने का बहाना सब कुछ दायित्व फ्री कर रहा है।

Friday, 27 March 2015

उ0प्र0 में संविदा व्यवस्था के विभिन्न स्वरूप अधिकार भ्रष्टाचार व शोषण का जरिया

उ०प्र0 में नियमित नियुक्तियां वह भी समूह ग व घ दशकों से बंद है, संविदा व अन्य स्वरुप में कार्मिकों को या फिर सेवा निवृत केा रख कर काम चलाया जा रहा है। जिम्मेदारी की बात आने पर स्टाफ की कमी बताकर पल्ला झाडने की प्रशासनिक मशीनरी का सरकारी व अर्द्ध शासकीय निगमों आदि में मनोवृति बनी हुई है। समूह क व ख में भी भर्तियों पर आये दिन जांच बैठती है या अदालतों में वाद पर वाद की प्रक्रिया जारी है। नियुक्ति की व्यवस्था पर विश्वास बनाये नही बन रहा है, इसमें बड़ा कारण राजनीतिक व अन्य माध्यमो के दबाव है। माध्यम चलाया जा रहा है संविदा या अन्य अनयिमिति तरीके से कार्मिक या अधिकारी रखने जिनमे सेवा निवृत भी शामिल है। श्रम शिखर द्वारा नियमित स्टाफ व अधिकारी की भर्ति कर उत्तरदायित्व की कार्य संस्कृति बनाने का जब प्रश्न किया जाता है तो अधिकतर प्रशासन या निगमों आदि के जिम्मेदार स्तर पर नियमित कार्मिको के संगठित होकर जिस तरीके से कार्य कराने की व्यवस्था मे मनमानी पर शिकंजा कसा जा सकेगा या फिर भष्टड्ढाचार, अनियमित व अन्य स्वार्थ सिद्धि की पूर्ति अब इस व्यवस्था से है, उस स्थिति में सभव न होगी। ठेकेदारी या अन्य फ्रेचाइंजी माध्यमों से बिना किसी मानकों के स्टाफ व अन्य स्तर कार्मिक उपलब्धता है। उसमें अपने हितों के साथ ही नियमिति कायगार से आधे से भी कम में कार्य कराकर विभाग का भी हित साधा जा रहा है।

राजस्थान में संविदा कार्मिक समस्या निदान हेतु त्रिस्तरीय समिति- उ0प्र0 में कुछ ऐसा प्रयास जरूरी

राजस्थान सरकार द्वारा विभिन्न अपने सरकारी विभागों, सरकारी उपक्रमों या स्थानीय निकायों व सरकारी सहायता प्राप्त सस्थानों में कार्यरत संविदा आधारित कर्मचारियों, अधिकारियों की सेवा अवधि बढाने, नियमिति करण, या सेवा भर्तियों के सम्बधित समस्याओं के प्रभावी निरकारण हेतु तीन स्तरीय समितिया गठन इस वर्ष जनवरी २०१४ में किया गया था। इसके तहत विभागीय एवं राज्य स्तर पर स्थायी समितियों व मन्त्री मण्डलीय उपसमिति के गठन है। मन्त्री स्तर पर चिकित्सा मन्त्री राजेन्द्र सिंह राठौड़ अध्यक्ष है। इस मन्त्री स्तर समिति मे सार्वजनिक निर्माण मन्त्री व सहकारिता राज्यमन्त्री सदस्य है। विभाग स्तर पर विभागाध्यक्ष तथा राज्य स्तर पर अतिरिक्त मुख्य सचिव समित प्रमुख है।
इस समिति स्तर पर संविदा स्वरुप कार्य करने वाले कार्मिक या अधिकारी जहाँ अपने समस्या पर विचार होने से अब राहत महसूस कर रहे है, वहां इन संविदा को रखने की प्रक्रिया व इनसे काम लेने में श्रम कानूनों का मखौल उठाने वाला मे खलबली है तथा इन समितियों के उद्देश्य से समतियों को बरगराने के प्रयास में है। संविदा पर रखवाने या रखने व उनसे काम लेने में श्रम कानूनों की अनदेखी को धंधे से जोडने वालों को इन समिति गठन से झटका लगा है। इसके विपरीत देश के दूसरे राज्यों में राजस्थान की भांति संविदा व्यवस्था को बेहतर एवं भ्रष्टड्ढाचार मुक्त बनाने का प्रयास है।