Friday, 27 March 2015

उ0प्र0 में संविदा व्यवस्था के विभिन्न स्वरूप अधिकार भ्रष्टाचार व शोषण का जरिया

उ०प्र0 में नियमित नियुक्तियां वह भी समूह ग व घ दशकों से बंद है, संविदा व अन्य स्वरुप में कार्मिकों को या फिर सेवा निवृत केा रख कर काम चलाया जा रहा है। जिम्मेदारी की बात आने पर स्टाफ की कमी बताकर पल्ला झाडने की प्रशासनिक मशीनरी का सरकारी व अर्द्ध शासकीय निगमों आदि में मनोवृति बनी हुई है। समूह क व ख में भी भर्तियों पर आये दिन जांच बैठती है या अदालतों में वाद पर वाद की प्रक्रिया जारी है। नियुक्ति की व्यवस्था पर विश्वास बनाये नही बन रहा है, इसमें बड़ा कारण राजनीतिक व अन्य माध्यमो के दबाव है। माध्यम चलाया जा रहा है संविदा या अन्य अनयिमिति तरीके से कार्मिक या अधिकारी रखने जिनमे सेवा निवृत भी शामिल है। श्रम शिखर द्वारा नियमित स्टाफ व अधिकारी की भर्ति कर उत्तरदायित्व की कार्य संस्कृति बनाने का जब प्रश्न किया जाता है तो अधिकतर प्रशासन या निगमों आदि के जिम्मेदार स्तर पर नियमित कार्मिको के संगठित होकर जिस तरीके से कार्य कराने की व्यवस्था मे मनमानी पर शिकंजा कसा जा सकेगा या फिर भष्टड्ढाचार, अनियमित व अन्य स्वार्थ सिद्धि की पूर्ति अब इस व्यवस्था से है, उस स्थिति में सभव न होगी। ठेकेदारी या अन्य फ्रेचाइंजी माध्यमों से बिना किसी मानकों के स्टाफ व अन्य स्तर कार्मिक उपलब्धता है। उसमें अपने हितों के साथ ही नियमिति कायगार से आधे से भी कम में कार्य कराकर विभाग का भी हित साधा जा रहा है।

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