Tuesday, 31 March 2015

पंच स्नानी महाज्ञानी

पंच स्नानी से आशय है कि मुंह, हाथ, पांच उंगलियों वाले हाथ के चुल्लू बना कर पानी लेना और फिर, मुंह साबुन से या केवल पानी से धोकर, तौलिया या अंगौछे से पोंछ लेना, बस इसी को पंच स्नानी कहते हैं। पांच स्नानी सम्पूर्ण स्नान का शार्ट कट होता है। और इसका उपयोग अधिकतर सर्दी के मौसम में ही किया जाता है। वैसे कई ऐसे भले लोग होते हैं जो उम्र भर स्नान करने की गलती नहीं करते। उन्हीं के बारे में ही तो कहा गया है, उनको या तो दाई स्नान करवाती है या भाई करवाते हैं। गर्मियों की बात तो जाने दो, सर्दियों में तो उन लोगों के लिए ठंडे पानी से स्नान करना मौत के मुंह में जाने वाली बात होती है, और पानी गर्म करना ये एक सिरदर्दी समझते हैं। एक ज्ञानी जी मेरे साथ एक बार बहस करने लगे कि आखिर सुबह-सुबह ठंडे पानी में डूबने की मुसीबत भी क्यों मोल ली जाए। किसी हकीम ने थोड़े ही बताया है। सच पूछो तो आजकल के हकीम पंच स्नान से ही अपना काम चला लेते हैं, और डॉक्टर तो कहते ही हैं गर्म पानी से स्नान करने को। ज्ञानी जी ने कहा कि मनुष्य का शरीर तो पूरा कपड़ों से ढका रहता है। केवल हाथ और मुंह ही खुले रहते हैं। इसलिए इन्हें ही धोने की जरूरत होती है। आपके शरीर के शेष भाग लोग देखते भी नहीं। खासकर जाड़ों में। तब उनको कष्ट देने की क्या जरूरत है। ज्ञानी जी ने फिर विचार प्रकट किया, यदि शरीर को रोज पानी में डुबाना जरूरी होता तो मनुष्य का शारीरिक ढांचा बनाते समय उस महान कुम्हार ने स्वयं ही मनुष्य की आकृति मछली, मेंढक, कछुआ आदि की तरह बना कर उसे समुद्र में ढकेल दिया होता। पर उसको यह मंजूर नहीं था। ईश्वर के जो भक्त तीर्थों पर स्नान करने के लिए धन बर्बाद करते हैं, उनको भी ज्ञानी जी ने बुरा भला कहा है। उन्होंने कहा कि अगर ईश्वर नहाने के मिल जाता तो मेढ़क, मछली के वह मिल गया होता। स्पष्ट है कि अगर भगवान केवल स्नान करते ही रीझ सकता होता तो वह जल, जीवों को अपने भगत होने का डिप्लोमा अवश्य देता। ज्ञानी जी का विश्वास था कि पंच स्नान करने वाले तो होते ही ईश्वर भक्त हैं, और इसकी तुलना में सम्पूर्ण स्नान करने वाले निठल्ले, निकम्मे, और दलिद्र होते हैं। उन्होंने निम्नलिखित उद्धरण दियारू पंच स्नानी महाज्ञानी नित्य स्नानी दलिद्री। ज्ञानी जी कहने लगे हम तो जो कुछ गुरु साहिब अपनी पवित्र वाणी से उपदेश दे गए हैं, उसी पर अमल करेंगे। गुरु साहिब ने सुखमनी साहिब की तीसरी अष्टपदी में फरमाया है, श्जलि धोवे बहु देह अनीति, शुद्ध कहां होई काची भीति उन्होंने फरमाया कि तीर्थों पर धक्के खाने की तो आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि पाठ करने से तीर्थों के स्नान का महात्म मिल जाता है। जैसे सुखमनी साहिब में फरमाया है, श्प्रभु के सिमरनि तीरथ इशनानी। भला हो गुसलखाने बनवाने वालों का, पांच स्नान करने वालों का पर्दा ढका रहता है। गुसलखानों का किवाड़ा बंद करके जितना चाहो समय लगा लो, किसी को क्या पता लगता है कि तुमने स्नान किया है या पंच स्नान। गांवों में इस प्रकार की हेराफेरी करना संभव नहीं होता है, क्योंकि वहां बाहर कुएं पर जाकर नहाना होता है। शहरों के निवासी बड़ी आसानी से दूसरों की आंखों में धूल झोंक सकते हैं। आजकल के लड़के-लड़कियां तो बहुत चालाक है। वे गुसलखाने में घुसते ही नल खोलकर गाना गाने लगते हैं। मां-बाप को पता ही नहीं लग सकता कि उनके जिगर के टुकड़े या टुकड़ी ने स्नान किया है या पंच स्नान। दुरूख तो इस बात का है कि अगर पूछो कि तुमने स्नान किया है या मुंह हाथ ही धो लिए हैं, तो वह पैरों पर पानी भी तो नहीं पडने देते। एक दिन मैंने अपनी पत्नी से कहा, श्तुम आज हाथ-मुंह धो कर ही बाहर आ गई हो, क्योंकि नल खुला रहने की आवाज नहीं आई।्य उसके तुरन्त उत्तर दिया, श्मैं आपकी तरह नहीं हूं। आप तो नल खुला छोड़ देते हैं और कक्षा धोकर ही बाहर आ जाते हैं।्य
पंच स्नानी पंजाबी का शब्द है। पंजाब के लोग इसका अर्थ समझते हैं, पर दूसरे प्रांतों के लोगों ने यह शब्द नहीं सुना है। कहते हैं एक ज्ञानी जी जाड़ें के दिनों में कांगड़ा गए। वहां उन्होंने एक छोटा सा मकान किराये पर लिया। पहाड़ के लोग जाड़ों में कम ही स्नान करते हैं। पर ज्ञानीजी को झरने के ताजे पानी से स्नान करने का शौक था। उन्होंने केवल स्नान करने हेतु पानी लाने के लिए एक नौकर रख लिया। वह तड़के ही ज्ञानी जी के लिए दो बाल्टी पानी झरने से ला देता। झरना बहुत बेढ़ब स्थान पर था। कहीं ऊंची चढ़ाई चढनी पड़ती थी, कहीं ढलान उतरनी पड़ती थी। नौकर बेचारा एक बाल्टी ही लाने में थक जाता था। बड़ी कठिनाई से ला पाता था। एक हफ्ता इसी प्रकार बीत गया। एक दिन ज्ञानी जी की तबियत कुछ ढीली थी। उन्होंने नौकर से कहा, आज मैं पंच स्नानी करना चाहता हूं।्य नौकर ने समझा, शायद ज्ञानी जी पांच बार स्नान करना चाहते हैं। वह अपनी एक महीने की तनख्वाह छोड़कर भाग गया। और ऐसा गया कि फिर लौट कर ही न आया। यह बात भी गलत है कि पढ़े-लिखे आदमी रोज स्नान करते हैं। बर्नार्ड शॉ ने एक बार कहा था कि श्मुझे याद नहीं कि मुझे स्नान किए हुए कितने दिन हो गए हैं।

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