Tuesday, 31 March 2015

संस्कृत के गूढ ज्ञान को लोगो तक पहुंचाना चाहती हूं: प्रज्ञा मिश्रा

संस्कृत देवो की भाषा! सब भाषा की जननी भारत की मूल भाषा! लेकिन आज वो विस्मृत हो चली है अपने ही देश में उसके विद्वानो का अभाव हो गया। अमेरीका में हुई एक शोध के मुताबिक संस्कृत भाषा सूचना और प्रोद्योगिकी की मूल इकाई कम्प्यूटर के लिये सर्वोत्तम भाषा है।फिर भी लोक भाषा से ये लुप्तप्राय भाषा हो गई। संस्कृत दुनिया की अकेली वैज्ञानिक भाषा है जिसकी व्याकरण का हर सिद्धांत सिद्ध किया जा सकता है। यहां BUT बट PUT पुट नहीं होता ये कहना है संस्कृत की विद्वान और कवित्री श्रीमति प्रज्ञा मिश्रा का। संस्कृत की विद्वान और कवित्री श्रीमति प्रज्ञा मिश्रा इस महान भाषा में समाहित ज्ञान को सरल भाषा में लोगो तक पहुंचाने का कार्य कर रही हैं। चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय (चित्रकूट , मध्य प्रदेश) के संस्कृत विभाग की अध्यक्षा प्रज्ञा मिश्रा बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। चित्रकला, गायन, लेखन, कथक में पारंगत प्रज्ञा मिश्रा हर क्षेत्र में कई सम्मान और पुरूस्कार ले चुकी हैं। चित्रकूट विश्वविद्यालय से पीएचडी करने वाली प्रथम महिला प्रज्ञा मिश्रा ने एनसीसी में सी सर्टिफिकेट भी हासिल किया। इन्होंने दर्पण, प्रज्ञा, मानसी भाग्योदय जैसी कई पुस्तकें लिखीं हैं। हाल ही इनकी कई किताबों का सार खंड प्रकाशित हुआ है। “प्रज्ञा” नाम के इस खंड में विभिन्न विषयों पर उनकी लिखी 7 किताबों के सार को एक जगह समाहित किया गया है ताकि अधिक से अधिक लोग इसका लाभ उठा सकें। संस्कृत भाषा के महान ज्ञान और उसके महत्व को एक बार फिर से जन जन तक पहुंचाने जैसे विषयों पर लीड इंडिया ग्रुप की समूह सम्पादक तरूणा एस गौड़ ने प्रज्ञा मिश्रा जी से विस्तार से बात की प्रस्तुत है पूरी बात।आप संस्कृत जैसे विषय की ज्ञाता हैं। कई क्षेत्रों की महारथी हैं साथ ही आपका नाम भी प्रज्ञा है जिसका अर्थ ही है तीनों काल की ज्ञाता। “प्रज्ञा त्रैकालिकी मता! मैं आपके लेखन से बात शुरू करती हूं। आपने अब तक 19 पुस्तकें लिखी हैं उसके विषय में बताइयेउत्तर:संस्कृत की सेवा करने का मुझे अवसर मिला ये मेरा सौभाग्य है। मेरे जीवन का उद्देश्य है कि मैं इसमें समाहित अपार ज्ञान को सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाऊं ताकि उनमें मूल विषय यानि संस्कृत को जानने की इच्छा प्रबल हो सके। संस्कृत में किस विषय पर नहीं लिखा गया इसमे कला है साहित्य है, सौन्दर्य है, यहां तक की फूड प्रिसर्वेशन जैसे विषय भी शामिल हैं। मैंने हर विषय को चुना है। जल्द ही मेरा शोध आने वाला है, “श्रीराम का विश्वमानवता दर्श”। हाल ही में मेरी एक पुस्तक प्रकाशित हुई है “”प्रज्ञा”” इसमें 7 खंड हैं जिसमें “भाग्योदय” ज्योतिष पर, “राममय चित्रकूट” आध्यात्म पर, “नाम नवनीत” नामकरण की वैज्ञानिकता पर, “चित्रकूट दर्पण” पर्यटन पर, : धर्म” सनातन एवं हिन्दू धर्म पर, “ फालगुनी” कविताओं और “सीखो बुन्देली” प्रसार पर आधारित हैं। इन सबका मूल संस्कृत से ही लिया गया है। प्रश्न : संस्कृत के विषय में कुछ बताइये हमारे देश का गौरव ये भाषा लुप्तप्राय हो गयी है इसे जीवंत कैसे किया जा सकता है। उत्तर: संस्कृत सूत्र शैली कहलाती है। बहुत संक्षेप में आप काफी बड़ा वाक्य कह सकते हैं। यहां तक कि इसके एक एक वाक्य पर विदेशों में शोधार्थी शोध कर रहें हैं। ये वैज्ञानिक भाषा है जिसके हर सूत्र को सिद्ध किया जा सकता है। इसकी खासियत है कि इसमें शब्द के फेर बदल से भी वाक्य नहीं बदलता। उदाहरण के लिये- राम जाता है का अनुवाद होगा “राम: गच्छति” और गच्छति राम:। शब्दों के स्थान परिवर्तन से वाक्य का अर्थ नहीं बदलता। प्रश्न: आपने अब तक 16 लघुशोध प्रबन्ध और 60 से अधिक शोध पत्र लेखन का कार्य किया है। इसकी प्रेरणा कैसे मिलती है। उत्तर:सच कहूं तो स्वर्गीय श्री नाना जी देशमुख जिन्होने मुझे स विश्वविद्यालय में कार्य करने का मौका दिया और प्रथम विषय भी सुझाया वो मेरी प्रेरणा के स्रोत हैं। और लेखन में मेरे पति और मेरे परिवार का सहयोग भी सबसे बड़ी प्रेरणा है। चित्रकूट विश्वविद्यालय में आपके संरक्षण में वैदिक कालीन महिला अधिकारों पर काफी काम हुआ है। उत्तर:जी भारत का वैदिक काल का समय काफी समृद्ध काल रहा है। अधिकारों के मामले में भी वैदिक महिलाओ को बराबरी का दर्जा प्राप्त था। हमारे यहां 36 विदुषी ऋषिकाएं हुई हैं जिन्होंने कई ग्रंथो की रचना भी की है। लेखन के अलावा आप एक उम्दा चित्रकार भी हैं। आप की हर पेंटिंग कुछ कहती है। उत्तर:मेरे साथ कुछ ऐसा है, कि यदि कोई दृश्य मुझे भा जाये या आहत कर तो जब तक मैं उसका चित्र नही बना देती तब तक व्याकुलता बनी रहती है और वो दृश्य मेरे आंखो में तैरता रहता है। जब वो भावनाएं कागज अपर उतर जाती है तो मन को शांति मिलती है।
आप कवित्री भी हैं एक बार आपको जब बहुत क्रोध आया तो भी कविता बन गई थी! हां ये बड़ा रोचक किस्सा है। मैंने गुरु जी के जन्मदिन पर विषेशतौर से लिखी एक कविता प्रकाशन के लिये दी थी। लेकिन जाने किस ने गलती से या जानकर मैं नही कह सकती, उस कविता में शब्दों के साथ कुछ परिवर्तन कर दिया। उससे उस कविता के छन्द समास सब बुरी तरह बिखर गये। अर्थ का अनर्थ हो गया। मुझे उस पर उतना क्रोध आया कि एक कविता ही बन गई।
कपट करे कपटी का क्या है ।
छदम्-छवी छलना करना है।
कुटिल आग कोयला सा काला।
रात्रि राख रेता सा रूखा।
काटे होकर कलियां बनना ।
हीरा बने कॅंच का क्या है ।

आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा कि कोई है जो भारत के गौरव संस्कृत भाषा के लिये इतने समर्पण से कार्य कर रहा है। हम आशा करते हैं कि संस्कृत को एक बार फिर से जन भाषा बनाने का आपका स्वप्न जल्द ही पूरा हो।

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