मनुष्य का जीवन स्वयं में एक अनबूझ पहेली है। अपार रहस्यों से भरा हमारा जीवन एक साथ अनेक दिशाओं में चलते हुए अनेक अथरें को प्रतिपादित करता है। यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति इस जीवन को अपने अनुरूप धारण करता है। जीवन के रहस्यों को जब हम जानने का प्रयास करते हैं, तो एक साथ कई रहस्य सामने आ जाते हैं। कभी यह विचार आता है कि हमारा जीवन सार्थक है, कभी निर्थक दिखता है। इस तरह की शंकाएं सदियों से मानव मन को मथती रही हैं और यह जानने की कोशिश भी कि वास्तविक सत्य क्या है? कभी भगवान पर शंका की उंगली उठती है। इस तरह के अनेक प्रश्न मन को झकझोरते रहते हैं। उनमें से एक प्रश्न यह भी उठता है कि हम अपने इष्टदेव को भगवान क्यों कहते हैं? जैसे भगवान राम और भगवान कृष्ण। इस भगवान शब्द का औचित्य क्या है? प्रश्न यह उठता है कि हम अपने इष्टदेव को जब भगवान कहते हैं, तो भगवान शब्द को ठीक से समझ लेना चाहिए। मनुष्य के जीवन में अभिलाषा होती है कि उसे अधिक से अधिक आयु मिले, विद्या मिले, बल हो, अपार बुद्धि हो, ऐश्वर्य हो और शांति मिले। इन छह तत्वों की कामना हमारे जीवन में होती है, लेकिन मनुष्य का जीवन कामनाओं से भरा है। हम कामनाओं की पूर्ति का जितना प्रयास करते हैं, रेत पर पानी की बूंद की तरह सब विलीन होता रहता है।
इसलिए आयु, विद्या, बल, बुद्धि, ऐश्वर्य और शांति की पिपासा जीवन भर बनी रहती है। भगवान शब्द भग और वान से बना है। भग का अर्थ होता है आयु, विद्या, बल, बुद्धि, ऐश्वर्य और शांति का सम्मिलित स्वरूप और वान का अर्थ होता है जिनके पास ये तमाम शक्तियां हों, उसी को भगवान कहते हैं।
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