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Monday, 18 May 2015

कृष्ण भक्त भी और भगवान भी

कृष्ण भक्त हैं, और भगवान भी हैं। और जो भी भक्ति में प्रवेश करेगा, वह भक्तसे शुरू होगा और भगवान पर पूरा हो जाएगा
इस संबंध में थोड़ी सी बात पीछे हुई है, लेकिन हमें समझ में नहीं आती है, इसलिए फिर दूसरी तरह से लौट आती है। मैंने प्रार्थना के संबंध में जो कहा, वह थोड़ा खयाल में लेंगे तो समझ में आ जाएगा। जैसा मैंने कहा कि प्रेयर नहीं, प्रेयरफुलनेस। ऐसा भक्ति का मतलब किसी की भक्ति नहीं होती, भक्ति का मतलब है, डिवोशनल एटिटयूड। भक्ति का मतलब है, भक्त का भाव। उसके लिए भगवान होना जरूरी नहीं है। भक्ति भगवान के बिना हो सकती है, ऐसा नहीं, भक्ति के कारण भगवान दिखाई पडना शुरू हुआ है। जिन लोगों का हृदय भक्ति से भरा है, उन्हें यह जगत भगवान हो जाता है। जिनका हृदय भक्ति से नहीं भरा है, वे पूछते हैं--भगवान कहां है? वे पूछेंगे। और उन्हें बताया नहीं जा सकता, क्योंकि वह भक्त के हृदय से देखा गया जगत है। वह भक्त के मार्ग से देखा गया जगत है।
जगत भगवान नहीं है, भक्तिपूर्ण ह्रदय जगत को भगवान की तरह देख पाता है। जगत पत्थर भी नहीं है, पत्थर की तरह हृदय जगत को पत्थर की तरह देख पाता है। जगत में जो हम देख रहे हैं, वह प्रोजेक्शन है, वह हमारे भीतर जो है उसका प्रतिफलन है। जगत में वही दिखाई पड़ता है, जो हम हैं। अगर भीतर भक्ति का भाव गहरा हुआ, तो जगत भगवान हो जाता है। फिर ऐसा नहीं है कि भगवान कहीं बैठा होता है किसी मंदिर मेंय फिर जो होता है वह भगवान ही होता है।
कृष्ण भक्त हैं, और भगवान भी हैं। और जो भी भक्ति में प्रवेश करेगा, वह भक्त से शुरू होगा और भगवान पर पूरा हो जाएगा। एक दिन जब वह बाहर भगवान को देख लेगा, तो उसने खुद ऐसा क्या कसूर किया है कि उसे भीतर भगवान नहीं दिखाई पड़ेंगे! भक्त शुरू होता है भक्त की तरह, पूरा होता है भगवान की तरह। यात्रा शुरू करता है जगत को देखने की देखता है उसे जो जगत में है। भक्तिपूर्ण हृदय से, डिवोशनल माइंड से, प्रेयरफुल, भक्तिपूर्ण, भावपूर्ण, प्रार्थनापूर्ण मन से देखता है जगत को। फिर धीरे-धीरे अपने को भी उसी तरह देख पाता है, कोई उपाय नहीं रह जाता। फिर ऐसा भी हो जाता है, जैसा रामकृष्ण को एक बार हुआ। बहुत मजे की घटना है।
रामकृष्ण को एक मंदिर में पुरोहित की तरह रखा गया था, दक्षिणेशवर में। बहुत सस्ती नौकरी थी। शायद सोलह रूपये महीने की नौकरी थी। पुजारी की तरह रखा था उनको। लेकिन दस-पांच दिन में ही तकलीफ शुरू हो गई, क्योंकि ट्रस्टियों को खबर मिली कि यह आदमी तो ठीक नहीं मालूम होता। भगवान को जो भोग लगाता है, पहले खुद चख लेता है। और भगवान पर जो फूल चढ़ाता है, सूंघ लेता है। तो छिपकर ट्रस्टियों ने आकर देखा मंदिर में कि मामला क्या है? देखा कि बड़े भाव से रामकृष्ण नाचते हुए भीतर आए, भोग पहले खुद को लगाया, फिर भगवान को लगायाय फूल पहले सूंघे, फिर भगवान को सुंघाए। ट्रस्टियों ने उनको पकड़ लिया और कहा, यह क्या कर रहे हो? यह कोई ढंग है भक्ति का? रामकृष्ण ने कहा, भक्ति का ढंग होता है, यह कभी सुना नहीं। भक्त देखे हैं, भक्त सुने हैं, भक्ति का कोई ढंग होता है? कोई ढांचा, कोई डिसिप्लिन होती है? उन्होंने कहा, निकाल बाहर करेंगे! कहीं सूंघा हुआ फूल भगवान को चढ़ाया जा सकता है? रामकृष्ण ने कहा, बिना सूंघे चढ़ा कैसे सकता हूं? पता नहीं सुगंध हो भी या न हो! ट्रस्टियों ने कहा, बिना भगवान को प्रसाद लगाए तुम खुद कैसे खा लेते हो? रामकृष्ण ने कहा, मेरी मां मुझे खिलाती थी तो पहले चख लेती थी। मैं बिना चखे नहीं चढ़ा सकता। नौकरी तुम सम्हालो। अन्यथा मुझे यहां रखना है, तो मैं चखूगां, फिर चढ़ाऊंगा। पता नहीं खाने योग्य हो भी या न हो!
अब यह जो आदमी है, यह आदमी बाहर ही भगवान को कैसे देख पाएगा? बहुत जल्दी वह वक्त आ जाएगा, यह कहेगा कि भीतर भी भगवान है। तो भक्त से तो शुरु होती है यात्रा, भगवान पर पूरी होती है। ऐसा नहीं है कि बाहर कहीं किसी भगवान पर पूरी होती है, अंततरू सारी दुनिया की यात्रा करके हम अपने पर लौट आते हैं और पाते हैंरू जिसे हम खोजने गए थे वह घर में बैठा हुआ है।
कृष्ण दोनों हैं। तुम दोनों हो, सभी दोनों हैं। लेकिन भगवान से शुरू नहीं कर सकते हो तुम। भक्त से ही शुरु करना पड़ेगा। क्योंकि अगर तुमने यह कहा कि मैं भगवान हूं, तो खतरा है। ऐसे कई लोग खतरा पैदा करते हैं, जो भगवान की घोषणा तो कर देते हैं, तब ऐसे लोग अहंकेंद्रित होकर, इगोसेट्रिक होकर दूसरों को भक्त बनाने की कोशिश में लग जाते हैं। क्योंकि उनके भगवान के लिए भक्तों की जरूरत है। पर वे दूसरें में भगवान नहीं देख पाते। अपने में भगवान देखते हैं, दूसरे में भक्त देखते हैं। ऐसे गुरुडम के बहुत घेरे हैं सारी दुनिया में। यात्रा शुरु करनी पड़ेगी भक्ति से।
अब कृष्ण को भगवान माना जा सकता है, क्योंकि यह आदमी घोड़े तक की भक्ति कर सकता है। सांझ का जब घोड़े थक जाते हैं तो उन्हें ले जाता है नदी पर स्नान कराने।
 उनको नहलाता है, उनको खुरे से साफ करता है। यह आदमी भगवान होने की हैसियत रखता है। क्योंकि घोड़े को भी भगवान की तरह स्नान करवा सकता है। इस आदमी से डर नहीं है, इससे खतरा नहीं है। यह अगर भगवान की अकड़ वाला आदमी होता तो सारथी की जगह बैठ नहीं सकता। अर्जुन से कहता, बैठो नीचे, बैठने दो ऊपर! रहा मैं भगवान, तुम हो भक्त! भगवान बैठेंगे रथ में, भक्त चलाएगा।
जो अपने को भगवान घोषित करते हैं, जरा उन्हें तख्त के नीचे बिठाल कर आप तख्त पर बैठ कर देखिए, तब पता चलेगा!
भक्त से शुरु होगी यात्रा, भगवान पर पूरी होती है।

Thursday, 14 May 2015

अब हमें विकसित होना हैं । विकास के लिए अपना समर्थन दें ।

ग़ांधी जी ने विदेशी शासको से असहयोग आंदोलन और अपनों के साथ सहयोग अभियान चलाया। हमें भी आज सहयोग अभियान की आवश्यकता है विरोध  से होने वाली हानि रोककर सम्पन्नता एवं समृद्धि की दिशा में बढ़े।
- प्रजातंत्र  है। जनता शासक है। जनप्रतिनिधियों का शासन चलाने हेतु चयन किया गया है अपने सभी जनप्रतिनिधियों का प्रत्येक माह मूल्यांकन करें। उन्हें मार्गदर्शन दें। और अपनी अभिव्यक्ति एवं सम्भावनाये हमें भेजें हम श्रम शिखर में प्रकाशित करेंगे, आप अपना विडिओ भी भेज सकते है।
श्रम शिखर के सदस्य बने सदस्यता राशी २५०/- वार्षिक
Bank Name: Central Bank
A/c Name:  SHRAM SHIKHAR
A/C NO. :  3155197714
IFSC CODE: CBIN0280255
BRANCH:  Ahiran East Hapur Road Meerut City
में जमा करके रिसिप्ट shramshikhar@gmail.com पर भेजें।

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स्वामी की सोच को किया सार्थक

पिछली सदी के आठवें दशक में स्वामी चिन्मयानंद ने कांगड़ा जिले के दो हजार गांवों में गरीबी मिटाने का संकल्प लिया। इसे पूरा करने के लिए उन्होंने स्वयसेवी संस्था कार्ड (चिन्मय आर्गेनाइटेशन ऑफ रूरल डेवलपमेंट) का गठन किया। इसे चलाने के लिए उन्हें एक ऐसे नेतृत्व की तलाश थी जो उनकी सोच को अजाम तक पहुंचा सके। उनकी इस सोच को डॉ. क्षमा मेत्रेय ने साकार किया।
डॉ. क्षमा मेत्रेय नई दिल्ली के मोलाना अबुल कलाम आजाद मेडिकल कॉलेज में बाल रोग विशेषज्ञ का पद छोड़कर कार्ड की राष्टड्ढ्रीय अध्यक्ष बनीं। १९८५ में संस्था की बागडोर संभाली और कुछ महिलाओं को सिलाई मशीनें बांटकर उन्हें आत्मनिर्भर करने का प्रयास शुरू किया। आज सस्था नौ सो गांवों में साक्षरता, स्वरोजगार व स्वास्थ्य से संबंधित सेवाएं प्रदान कर रही है। वह खुद वर्ष भर में करीब २० हजार रोगियों को चिकित्सा प्रदान करती है। इन्होंने १४ हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार के साधन से जोड़ा। विधिक साक्षरता में भी संस्था अहम योगदान दे रही है। करीब ८२७ मामलों में से ६१३ सुलझाए। पर्यावरण संरक्षण में भी संस्था अहम कार्य कर रही है। ६९५ गांवों में करीब २० हजार शौचालयों का निर्माण करवाया है।
महिला दिवस को सार्थक रूप तभी दिया जा सकता है, जब पुरुष भी महिलों का सम्मान करें। सबसे पहले महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना को उजागर करना होगा। लिंग भेदभाव को समाप्त करने के लिए महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों को भी आगे आना होगा।

Tuesday, 5 May 2015

अपने लिए आप ही जिम्मेदार हैं जनाब!

सच यह है कि आपके जीवन के लिए आपके सिवा और कोई जिम्मेदार नहीं हो सकता है। अपनी सेहत, अपनी खुशियों, करियर में प्रगति, वित्तीय सुरक्षा, रिश्तों में सकारात्मकता, समय के सदुपयोग और मन की शांति आदि के लिए आप ही जिम्मेदार हैं। जिस दिन आप यह समझ लेंगे, उसी दिन से अपने जीवन में प्रगति की ओर आपके कदम खुद-ब-खुद ही बढ़ जाएंगे। याद रखिए कि आज आप जिन स्थितियों का अनुभव कर रहे हैं, वे सब अतीत में आपने ही चनी थीं। इसमें दूसरों की राय पर आगे बढना भी शामिल  हो सकता है। अगर आप बेहतर परिणाम चाहते हैं, तो आज से ही बेहतर चयन करना सीख लें।
अगर अपको लगता है कि जीवन या कोई स्थिति अपने-आप ही बेहतर में बदलेगी, तो निश्चित मानिए कि आपको निराशा ही हाथ लगेगी। आपको खुद इसके लिए कुछ करना होगा। इसीलिए अपने जीवन में बदलाव लाने की जिम्मेदारी लें। पूरी जिम्मेदारी। अपने जीवन के खुद मालिक बनें। उसका खाका खुद तैयार करें, ताकि वह आपके सपनों, लक्ष्यों और आकांक्षाओं का आईना बन सकें। इसके लिए आज से ही इन तीन बातों को अपनाएं...
दूसरों को दोष देना आज से बंद
बचपन से ही आप अपनी खामियों के लिए किसी दूसरे को दोष देते आए हैं। हालांकि अपने माता-पिता, टीचर, सहकर्मियों, अधिकारियों, सरकार, मौसम किस्मत, सितारे, ग्रह और कुंडली जैसी चीजों पर दोष मढ़कर आपको मिला कुछ नहीं। और न ही कभी मिल सकता है। इन पर आपका नियंत्रण है क्या? आप उस पर ध्यान लगाएं, जिस पर आपका नियंत्रण है- वह हैं आप स्वयं।
अब बस भी करो बहानें
हर बार जब आप किसी असमर्थता के लिए कोई बहाना लगाते हैं, बेहतरी का एक मौका गंवा रहे होते हैं। साथ ही आप एक ढीले-ढीले या अव्यावसायिक नजरिए वाले व्यक्ति की छवि अपने लिए गढ़ते हैं। अधिकतर लोग बहाने इसलिए गढ़ते हैं, क्योंकि उन्हें असफल होने से डर लगता है। पर अगर इस डर का सामना करें तो असफल होने से डर बंद हो जाएगा। आसान स्थितियों के बजाय अपने लिए कुछ चुनौतीपूर्ण चुनने की हिम्मत बंधेगी। जैसे ही आप कुछ चुनौतीपूर्ण अपने हाथ में लेंगे, आपका खुद पर तो विश्वास बढ़ेगा ही, दूसरे भी आप पर विश्वास करेेंगे। इस तरह नए अवसर आप तक पहुंचेंगे।
शिकायत क्यों और किससे?
सच मानिए कि शिकायती शख्सियतें किसी को पसंद नहीं आतीं। शिकायत करने से आपकी और दूसरों की शक्ति भी जाया होती है। यह सच है कि कभी-कभी अपने आक्रोश को अभिव्यक्त करने का मन जरूर करता है। इसके बारे में बात करना एक स्वस्थ तरीका है। या फिर इसकी चर्चा करके इसमें सुधार करने वाले बिंदुओं को पहचानकर उस दिशा में कुछ करना बहुत फायदेमंद है। पर हर वक्त शिकायत करते रहकर आप एक पीडि़त की छवि तैयार करते हैं।
मैंने देखा है कि लोग जैसे ही अपने कर्मों और जीवन की जिम्मेदारी खुद लेना शुरू करते हैं, वे बहुत ऊर्जावान हो जाते हैं, उनमें प्रेरणात्मक नजरिया बढ़ जाता है और संकल्प की दृढ़ता भी बढ़ती है। इसीलिए आज से ही अगले तीस दिनों का लक्ष्य यह बनाएं कि आप किसी को दोष नहीं देंगे, शिकायत नहीं करेंगे और बहाने नहीं बनाएंगे। जब आप अपनी जिम्मेदारी लेना शुरू करेंगे, तो आपको ये सात अनुभव जरूर होंगेरू-
१. आजादी का आनंद रू अपने जीवन में खड़ी चुनौतियों के कारणों और उनके समाधान की खोज जब आप अपने अंदर करेंगे तो आपको एक अलग ही आजादी का अनुभव होगा। आपको महसूस होगा कि आप सोच-समझकर खुद का जीवन खुद ही संवार सकने में समर्थ हैं।
२. स्थायी प्रेरणा रू कठिन समय का सामना करने के लिए हम सबको प्रेरणा की जरूरत होती है। जब आप खुद के भीतर देखते हुए जीना शुरू करेंगे, जब आपको प्रेरणा का कभी खत्म न होने वाला स्त्रोत मिल जाएगा। अंतर्मन से उठने वाली प्रेरणा से जीवन उत्साह और आनंद से भर जाएगा।
३. बेहतर नियंत्रण रू जब आप अपने जीवन की कमान खुद संभालेंगे तो खुद का चयन होगा, खुद के चुने हुए कर्म होंगे, खुद के सीचे निर्णय होंगे। और इन सबसे आप खुद को ज्यादा सामथ्र्यवान और नियंत्रण में अनुभव करेंगे।
४. निजी शक्ति रू यह अनुभव सकारात्मकता का होगा। यह वह भावना है, जिसमें आपको अपने विकास, पालन-पोषण आदि के लिए स्वयं के संपूर्ण होने का एहसास होता है। यह भावना लक्ष्य तक पहुंचाने में ईधन का काम करती है।
५. नयेपन का आगाज रू जब आप मन से शांत होते हैं, आजाद होते हैं और नए विचारों के लिए मन खुला रखे होते हैं, तो जीवन में कई श्अरे वाह्य कहने वाले मौके आते हैं। खुद की जिम्मेदारी खुद लेने की प्रक्रिया में हर दिन आपका अपनी रचनात्मकता के प्रति आत्मविश्वास बढ़ता है।
६. नजरिए का विस्तार रू अब तक आपको अपने अनुभवों की सीखों से ही काम लेना आता है, जबकि कई अन्य तरीके भी संसार से भरे पड़े हैं। जब आप उनके प्रति खुलेंगे तो सोच का दायरा भी बढ़ेगा।
७. मन की शांति रू यह तो हर किसी को चाहिए। जब आप शिकायत व बहानों का सहारा लेते हैं तो नकारात्मकता से खुद को जला रहे होते हैं।
इससे उलझनें बढ़ती हैं। जब खुद की जिम्मेदारी खुद लेना शुरू करते हैं, तो श्क्या हुआ, किसने किया्य जैसे प्रश्नों में फंसने के बजाय श्आगे क्या करना है्य सोचते हैं।
कुछ बातों पर विचार करें
२ अगर आप शिकायत करना या बहाने बनाना छोड़ दें तो अपने बारे में क्या राय बनेगी और कैसा महसूस होगा?
      -आगामी अंक में जारी....
२ अपने जीवन की हर चीज के लिए खुद जिम्मेदारी लेने पर क्या होगा? इससे आपको फायदा कैसे होगा?
२ इस आदत को विकसित करने और उसे बनाए रखने के लिए आपको क्या करना होगा?

Saturday, 25 April 2015

पंचायतों में ‘सरपंच पति’ संस्कृति समाप्त करें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंचायतों में ‘सरपंच पति’ संस्कृति समाप्त करने का आह्वान करते हुए आज गरीबी उन्मूलन तथा शिक्षा के प्रचार-प्रसार में निर्वाचित ग्राम प्रतिनिधियों के लिए नेतृत्व वाली भूमिका की वकालत की। सरपंच पत्नियों के कामकाज में पतियों के कथित दखल के बारे में मोदी ने एक राजनीतिक घटनाक्रम का जिक्र किया। उनके अनुसार किसी ने उनसे कहा कि वह एस.पी. (सरपंच पति) है।  प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘एस.पी. का काम चल रहा है। कानून ने महिलाओं को अधिकार दिए। जब कानून उन्हें अधिकार देता है तो उन्हें अवसर भी मिलना चाहिए। इस एस.पी. संस्कृति को खत्म करें। उन्हें (महिलाओं को) अवसर दिया जाना चाहिए। उन्हें आगे बढ़ाया जाना चाहिए।’’
 
प्रधानमंत्री ने पंचायत स्तर पर नेतृत्व क्षमता विकसित करने, निरक्षरता तथा गरीबी मिटाने और पंचवर्षीय योजना तैयार करने का आज आह्वान किया। मोदी ने ‘अपना गांव अपना विकास’ का नया नारा बुलंद करते हुए पंचायतों से संकल्प लेने का आह्वान किया कि उनके कार्यकाल में कोई बच्चा स्कूल नहीं छोड़ेगा और वे कम से कम 5 परिवारों को गरीबी से मुक्ति दिलाएंगे। महात्मा गांधी को उद्धृत करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘भारत गांवों में बसता है। हमें यह सोचने की जरूरत है कि हमारे गांवों का विकास कैसे हो। यहां तक कि सुदूरवर्ती गांव में भी लोगों के बड़े सपने हैं। सोचिए कि अपने गांव के लिए आप अगले 5 साल में क्या हासिल कर सकते हैं।’’
 
पंचायतों में महिलाओं के आरक्षण की अवधि 10 साल होगी
सरकार पंचायती राज्य संस्थाओं में महिलाओं का आरक्षण मौजूदा 5 साल से बढ़ाकर 10 साल करने के राज्यों के एक सुझाव को स्वीकार कर सकती है। ग्रामीण विकास मंत्री बीरेन्द्र सिंह ने आज यहां एक चर्चा के दौरान कहा कि राज्यों के कई प्रतिनिधियों ने सुझाव दिया है कि आरक्षण के आधार पर 5 साल के एक कार्यकाल के लिए पंचायती राज संस्थाओं में चुनी जाने वाली महिला सदस्य ज्यादा कुछ कर पाने में अक्षम रहीं। 
 
उन्होंने बताया कि ये सुझाव हैं कि वार्ड एवं ब्लॉकों में महिला सदस्यों का कार्यकाल बढ़ाकर 10 साल (दो कार्यकाल) कर दिया जाए, ताकि वे लंबी अवधि के लिए योजनाएं तैयार कर सकें। सरकार सुझाव स्वीकार कर सकती है।

Sunday, 19 April 2015

समाज की सोच और मानसिकता परिवर्तन की जरूरत


‘‘ममता का सम्मान है नारी, संस्कारों का मान है नारी
 स्नेह-प्यार और त्याग की, अनोखी पहचान है नारी।।
महिला दिवस मानने की तभी सार्थकता है जब सारे देश की महिलाओं के साथ न्याय होगा। जब पुरुषों की, समाज की सोच और मानसिकता बदलेगी जब हर गरीब महिला, गांव की रहने वाली महिला को भी देश के आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक विकास का लाभ मिल सकेगा।
आज अनेक महिलाये घर की मर्यादाओ, परम्पराओं को निभाते हुए सामाजिक कार्य भी कर रही है। खेल, कला, साहित्य में आगे बढ़ रही है। संस्कृति एवं सभ्यता से भरपूर भारतीय महिला सारे रिश्ते कितनी आसानी से, ईमानदारी से निभाती है यह किसी से छिपा नही है वह नौकरी भी करती है घर भी संभालती है चट्टड्ढान सी सहनशीलता लिये वह मां, बीवी, बहन, बेटी, पुत्रवधु आदि ढेर सारे रिश्ते शालीनता से निभाती है। जो लोग महिलाओं के पहनावे पर टिप्पणी करते है, उनके चरित्र का मूल्यांकन करते है, अश्लील फब्तिया, छेडखानी करने से बाज नही आते उनकी मानसिकता-परिवर्तन की जरुरत है, समाज की सोच बदलेगी तो नारी उत्पीडन, दहेज, भ्रूण हत्या जैसी घटनाए स्वतरू समाप्त हो जायेगी। इसके लिये अपने बच्चों को भारतीय सस्ंकारों में ढालना होगा। ताकि शहर हो या गांव प्रत्येक जगह महिला सुरक्षित अनुभव करे और किसी निर्भयाकाण्ड की पुनरावृति न हो तभी हम श्महिला दिवस्य पर गौरवानुभूति प्राप्त कर सकते है। इसके अभाव मे यह अन्य दिवसों की तरह मात्र औपचारिकता बनकर रह जायेगा।
       प्रतिवर्ष  ‘महिला दिवस’  मानकर, कर्तव्य  की  इतिश्री हो जाती।
   प्रतिदिन ‘महिला-उत्पीडन’ की घटनाएं कोमल मन को तड़पाती।।

Thursday, 16 April 2015

कर्मक्षेत्र है दुनिया-गीता यह जीवन


पल-पल बीतता समय अपने बीतने का अहसास तभी कराता है जब हम इसके साथ चलते हुए पिछड़ जाते है या इसे बांधकर रखने की कोशिश करते है। कभी-कभी ऐसा होता है कि हमारे सपने टूटकर बिखर जाते है। हमे वक्त के हाथों मजबूर होकर समझौता करना पड़ता है। उस समय तो हम कुछ कर नही सकते परन्तु बाद में जब हम उन हालात से बाहर निकल आते है तो नये सिरे से अपनी जिन्दगी के बारे में सोचते है।
देखते ही देखते यूं वक्त गुजर जाता है।
    कोई जग में आता है, कोई जग से जाता है।।
जगत के रंगमंच पर हर व्यक्ति कलाकार।
यहां का अनुभव हमें बहुत कुछ सिखाता है।।
कहते है कि जिन्दगी में सफलता अन्दर से बाहर की ओर सफर तब तय करती है जब हमे जिन्दगी की ए.बी.सी. का मतलब पता हो। ए का मतलब अवेयरनेस, बी का मतलब बिलीव से, सी का मतलब च्वास सें, डी का मतलब डिटैचमैन्ट से और ई का मतलब एन्जायमेन्ट से है। जो लोग इनका मतलब समझ लेते है, वे अपने सपनों को, खूबसूरती को भी बखूबी समझते है। यही वजह है कि आने वाला कल उनका होता है।
जाने किस बाजी में जीता यह जीवन। हम भरते है, दुख से रीता यह जीवन।।
सुख ही उसने पाया जिसने पहचाना। कर्मक्षेत्र है दुनिया गीता यह जीवन।।
हर इंसान की जिन्दगी में सुख और दुख आते है। ऐसा नही हो सकता कि हमारे जीवन में सुख ही सुख आये और दुख का नामो-निशान न हो। सुख की तरह दुख भी जीवन का अनिवार्य अंग है। जरूरी है कि हम जीवन में सुख और दुख को लेकर एक साम्य बनाकर चले। इसी प्रकार मनुष्य की कार्य शैली में काम और आराम दोनो पहलू है। इंसान केवल काम के बदले आराम ही करना चाहे तो यह संभव नहीं क्योकि कर्म ही धर्म है और कार्य करने के बाद जो आराम करता है वह सुख का अनुभव करता है। अतरू जीवन में काम और आराम को लेकर एक साम्य बनाकर चले।

विश्व में शांति की स्थापना के लिए महिलाओं को सशक्त बनायें


किसी भी बालक के व्यक्तित्व निर्माण में ‘माँ’ की ही मुख्य भूमिका
कोई भी बच्चा सबसे ज्यादा समय अपनी माँ के सम्पर्क में रहता है और माँ उसे जैसा चाहे बना देती है। इस सम्बन्ध में एक कहानी मुझे याद आ रही है जिसमें एक माता मदालसा थी वो बहुत सुन्दर थी। वे ऋषि कन्या थी। एक बार जंगल से गुजरते समय एक राजा ने ऋषि कन्या की सुन्दरता पर मोहित होकर उनसे विवाह का प्रस्ताव किया। इस पर उन ऋषि कन्या ने उस राजा से कहा कि श्श्मैं आपसे शादी तो कर लूगी पर मेरी शर्त यह है कि जो बच्चे होगे उनको शिक्षा मैं अपने तरीके से दूगी।्य्य राजा उसकी सुन्दरता से इतनी ज्यादा प्रभावित थे कि उन्होंने ऋषि कन्या की बात मान ली। शादी के बाद जब बच्चा पैदा हुआ तो उस महिला ने अपने बच्चे को सिखाया कि बुद्धोजी, शुद्धोजी और निरंकारी जी। मायने तुम बुद्ध हो। तुम शुद्ध हो और तुम निरंकारी हो। आगे चलकर यह बच्चा महान संत बन गया। उस जमाने में जो बच्चा संत बन जाते थे उन्हें हिमालय पर्वत पर भेज दिया जाता था। इसी प्रकार दूसरे बच्चे को भी हिमालय भेज दिया गया। राजा ने जब देखा कि उसके बच्चे संत बनते जा रहें हैं तो उन्होंने रानी से प्रार्थना की कि श्महारानी कृपा करके एक बच्चे को तो ऐसी शिक्षा दो जो कि आगे चलकर इस राज्य को संभालें।्य इसके बाद जब बच्चा हुआ तो महारानी ने उसे ऐसी शिक्षा दी कि वो राज्य को चलाने वाला बन गया। बाद में हिमालय पर्वत से आकर उसके दोनों भाईयों ने अच्छे सिद्धांतों पर राज्य को चलाने में अपने भाई का साथ दिया।
प्रत्येक बच्चे के हृदय में बचपन से
ही श्ईश्वरीय गुणों्य को डालेंरू-
प्रत्येक बच्चे का हृदय बहुत कोमल होता है। यदि हम किसी पेड़ के तने पर कुरेद कर श्राम्य लिख दें तो पेड़ के बड़े होने के साथ ही साथ श्राम्य शब्द भी बढ़ता हुआ चला जाता है। इसलिए हमें अपने बच्चों में बचपन से ही ईश्वरीय गुणों को डाल देना चाहिए। बचपन में बच्चों के मन-मस्तिष्क में डाले गये गुण उसके सारे जीवन को महका सकते हैं। सुन्दर बना सकते हैं। वास्तव में बचपन में डाले गये जिन विचारों के साथ बच्चा बड़ा होता जाता है धीरे-धीरे वह उन विचारों के करीब पहुँचता जाता है। इस प्रकार बच्चा एक पेड़ के तने के समान होता है। पतली टहनी को जितना चाहो उतना मोड़ सकते हों, लेकिन यही टहनी यदि मोटी डाल बन गई तो फिर हम उसे मोड़ नहीं सकते और अगर हमने उसे जबरदस्ती मोडने की कोशिश की तो उसके टूटने की संभावना ज्यादा हो जाती है। इसलिए हमें प्रत्येक बच्चे के हृदय में बचपन से ही गुणों को डाल देना चाहिए। बड़े होने पर बच्चों में इन गुणों को नहीं डाला जा सकता।
विश्व में श्एकता्य एवं श्शांत्यि की स्थापना में
महिलाओं की ही मुख्य भूमिकारू-
आज महिलाओं को चाहिए कि न वे केवल अपनी दक्षता, सहभागिता व नेतृत्व क्षमता को सिद्ध करें बल्कि उन सभी भ्रांतियों और कहावतों को भी मुँह तोड़ जवाब दें, जो उनका कमजोर आँकलन करती हैं क्योंकिरू-
नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे।
धैर्य, दया, ममता बल हैं विश्वास तुम्हारे।
कभी मीरा, कभी उर्मिला, लक्ष्मी बाई।
कभी पन्ना, कभी अहिल्या, पुतली बाई।
अपने बलिदानों से, युग इतिहास रचा रे।
नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे।
अबला नहीं, बला सी ताकत, रूप भवानी।
अपनी अद्भुत क्षमता पहचानो, हे कल्याणी।
बढ़ो बना दो, विश्व एक परिवार सगा रे।
नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे।
महिला हो तुम, मही हिला दो, सहो न शोषण।
अत्याचार न होने दो, दुष्टों का पोषण।
अन्यायी, अन्याय मिटा दो, चला दुधारे।
नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे।।
इस प्रकार धैर्य, दया, ममता और त्याग चार ऐसे गुण हैं जो कि महिलाओं में पुरुषों से अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। महात्मा गांधी ने कहा था कि श्श्जब आदमियों में स्त्रियोंचित्त गुण आ जायेंगे तो दुनिया में श्रामराज्य्य आ जायेगा।्य्य आज अमेरिका की आर्मी में बहुत सारी औरतें भी हैं। माँ ही बच्चों की सबकुछ होती है। वह जिस तरह से चाहेगी दुनिया को चलायेगी। अगर उसके हाथ में साइन करने की ताकत आ जायेगी तो कभी भी दुष्टों का पोषण नहीं होने पायेगा। लड़ाई सस्ती होती है या शांति? निरूसंदेह शांति सस्ती होती है। इसलिए शांति को लाने के लिए हमें बच्चों को प्रेम, दया, करुणा, न्याय, भाईचारा, एकता एवं त्याग आदि सिखाना है। और चूंकि सारी मानवजाति एक समान है इसलिए विश्व से भेदभाव को दूर करने के लिए हमें प्रत्येक बच्चे को एक समान शिक्षा दी जानी चाहिए। आज सारे विश्व की शिक्षा में एकरुपता लाने की आवश्यकता है। दुनिया के घावों को भरने के लिए हमें शांति रुपी मलहम का प्रयोग करना चाहिए।
विश्व में शांति की स्थापना के लिए महिलाओं
को सशक्त करना जरूरीरू-
अब्दुल बहा ने कहा है कि विश्व में शांति आदमियों के द्वारा नहीं लायी जायेगी बल्कि महिलाओं के द्वारा लाई जायेगी। यह शांति तभी आयेगी जब कि महिलाओं के पास निर्णय लेने की शक्ति या क्षमता आ जायेगी। कोई भी महिला कभी भी लड़ाइयों के दस्तावेज पर साइन नहीं करेंगी क्योंकि उसे पता है कि उस लड़ाई से उसके पुत्र की, उसके पति की हत्या हो सकती है।
एक बच्चे को जो वह पैदा करती है उसे पहले वह 9 महीने तक अपने पेट में पालती है। उसमें वह बहुत कष्ट उठाती है। उसके बाद उस बच्चे को 20 सालों तक पालती-पोषती है। इसमें उसको बहुत सी यातनायें सहनी पड़ती है। इसमें उसको बहुत त्याग करना पड़ता है। बहुत से कष्ट उठाने पड़ते हैं। इसलिए उस बच्चे के जीवन को खत्म करने के लिए वह कभी भी लड़ाई के दस्तावेज पर कभी भी साइन नहीं करेगी। इसलिए हमें महिलाओं को सशक्त बनाना है। उन्हें अच्छी शिक्षा देनी है। उन्हें अच्छी नौकरी देनी है। उन्हें ऊँचे ओहदों पर बैठाना है।
-जय जगत-
- डा0 भारती गाँधी
 संस्थापिक - निदेशिका
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

Saturday, 11 April 2015

बदलाव एक राजनीतिक संस्कृति का


प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की ९ अप्रैल से १६ अप्रैल तक फ्रांस, जर्मनी और कनाड़ा की यात्रा का उद्ेदश्य भारत की अर्थ व्यवस्था को बढावा देना और रोजगार पैदा करना है। उनकी तीन देशो की यात्रा भारत के आर्थिक एजेण्डे को आगे बढाने और देश के युवाओं के लिये रोजगार सृजित करने पर केन्द्रित रहेगी। वे भारत-फ्रांस आर्थिक सहयोग को मजबूत बनाने पर चर्चा करेगे तथा पेरिस के बाहर कुछ अत्याधुनिक औद्योगिक ईकाइयों को देखने जायेगे। तत्पश्चात् जर्मनी में श्चांसलर ऐेंजेला मार्केल और मोदी संयुक्त रूप से हैनोवर उत्सव का उद्घाटन करेगे जिसका भारत एक साझेदार देश है। यात्रा के अन्तिम चरण में प्रधानमन्त्री कनाड़ा के साथ संबधो को सुदृढ बनाने और कनाड़ा में नेताओं, उद्योग जगत के शीर्ष नेताओ और वहां रहने वाले भारतीयो से मुलाकात करेगें।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संवाद-कुशल हैं। संवाद के माध्यम से उन्होने एक गांव बड़ नगर से दिल्ली तक का राजनीतिक सफर तय किया है। अब उनके सामने कुछ कर दिखाने का समय है। उन्हे साबित करना है कि जनता ने अगर उन पर भरोसा किया है तो यह गलत नही है। यह एक सरकार बदलना मात्र नही है। एक राजनीतिक  संस्कृति का बदलाव भी है। देश की बेलगाम नौकर शाही पर नियंत्रण आवश्यक है। बदलाव के लिये लोग बेचैन है। बहुत उम्मीदो से वे मोदी को एक असंभव सी दिखने वाली जीत दिला चुके है किन्तु अब कथनी को करनी में बदलने का वक्त है। इतिहास उनसे, भाजपा, आर.एस.एस. सबसे हिसाब मांगेगा। अतरू बेहतर समन्वय के लिए निगहबानी और प्रयासो की अहम जरुरत है।

Friday, 10 April 2015

भगवान महावीर की शिक्षायें मानव कल्याण के लिए!

(1) मानवता के लिए त्याग करने वाला महावीर हैः- महावीर का जन्म वैशाली (बिहार) के एक राज परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम सिद्धार्थ और माता का नाम त्रिशिला था। बचपन से ही वे 23वें तीर्थकर पाश्र्वनाथ की आध्यात्मिक शिक्षाओं से अत्यधिक प्रभावित थे। एक राजा के पुत्र के रूप में युद्ध के बारे में उनका विचार भिन्न प्रकार का था। वे क्रोध, मोह, लालच, विलासिता पूर्ण वस्तुओं आदि पर विजय पाना सच्ची विजय मानते थे। वे आरामदायक और विलासपूर्ण जीवन पसंद नहीं करते थे। उनका विश्वास एक न्यायपूर्ण प्रजातंत्र में था। महावीर जैसे -जैसे बड़े हुए उनका ध्यान समाज में फैले छूआछूत, भेदभाव, धार्मिक रूढिवादिता, अन्याय, गरीबी, दुखों तथा रोगों की पीड़ा की तरफ ज्यादा खिंचने लगा। इन्हीं सब बातों ने महावीर के मस्तिष्क में कोलाहल मचा रखा था। वह समय देश की संस्कृति के इतिहास का अंधकारमय काल था। एक राजा के घर में पैदा होने के बाद भी महावीर जी ने युवाकाल में अपने घर को त्याग कर वन में जाकर आत्मिक आनन्द को पाने का रास्ता चुना। सालवृक्ष के नीचे 12 वर्षों के तप के बाद उन्हें श्कैवल्य्य ज्ञान (सर्वोच्च ज्ञान) की प्राप्ति हुई। विश्वबंधुत्व और समानता का आलोक फैलाने वाले महावीर स्वामी, 72 वर्ष की आयु में पावापुरी (बिहार) में निर्वाण को प्राप्त हुये।
(2) जिसने अपने मन, वाणी तथा काया को जीत लिया वे जैनी हैंः- भारत अनेक धर्मों का पवित्र गृह है। इन धर्मों ने मनुष्य जाति को जीवन जीने की सच्ची राह दिखलाई है। जैन धर्म भारत की पवित्र भूमि में जन्मा पवित्र धर्म और विश्वव्यापी दर्शन है। श्जैन्य कहते हैं उन्हें, जो श्जिन्य के अनुयायी हों। श्जिन्य शब्द बना है श्ज्यि धातु से। श्ज्यि माने-जीतना। श्जिन्य माने जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी वाणी को जीत लिया और अपनी काया को जीत लिया, वे हैं श्जिन्य। जैन धर्म अर्थात श्जिन्य भगवान का धर्म। श्जैन धर्म्य का अर्थ है- श्जिन का प्रवर्तित धर्म। महावीर 24वें तथा अंतिम तीर्थंकर हैं और उनके द्वारा प्रतिपादित जैन धर्म के स्वरूप का ही पालन आज उनके अनुयायियों द्वारा किया जाता है। महावीर स्वामी के अनेक नाम हैं- अर्हत, जिन, वर्धमान, निग्र्र्र्रथ, महावीर, अतिवीर आदि, इनके श्जिन्य नाम से ही आगे चलकर इस धर्म का नाम श्जैन धर्म्य पड़ा। जिन भगवान के अनुयायी जैन कहलाते हैं और उनकी मान्यता के अनुसार जैन धर्म अनादिकाल से चला आ रहा है और इसका प्रचार करने के लिए समय-समय पर तीर्थंकरों का आविर्भाव होता रहता है। महावीर अपनी इन्द्रियों को वश में करने के कारण श्जिन्य कहलाये एवं पराक्रम के कारण श्महावीर्य के नाम से विख्यात हुए।
(3) जैन धर्म की मुख्य शिक्षा श्श्अहिंसा्य्य हैः- जैन धर्म ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न पक्षों को बहुत प्रभावित किया है। दर्शन, कला और साहित्य के क्षेत्र में जैन धर्म का महत्वपूर्ण योगदान है। जैन धर्म में वैज्ञानिक तर्कों के साथ अपने सिद्धान्तों को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है। अहिंसा का सिद्धान्त जैन धर्म की मुख्य षिक्षा है। जैन धर्म में पशु-पक्षी तथा पेड़-पौधे तक की हत्या न करने का अनुरोध किया गया है। अहिंसा की शिक्षा से ही समस्त देश में दया को ही धर्म प्रधान अंग माना जाता है। जैन धर्म की मानवीय शिक्षाओं से प्रेरित होकर कई दानवीरों ने उपासना स्थलों, औषधालयों, विश्रामालयों एवं पाठशालाओं के निर्माण करवाये। जैन धर्म में अहिंसा तथा कर्मों की पवित्रता पर विशेष बल दिया जाता है। उनका तीसरा मुख्य सिद्धान्त श्अनेकांतवाद्य है, जिसके अनुसार दूसरों के दृष्टिकोण को भी ठीक-ठाक समझ कर ही पूर्ण सत्य के निकट पहुँचा जा सकता है। जीव या आत्मा का मूल स्वभाव शुद्ध, बुद्ध तथा सच्चिदानंदमय है।
(4) महावीर स्वामी ने संसार को श्श्जियो और जीने दो्य्य का संदेश दियाः- जैनों में 24 तीर्थकर हैं। यथार्थ में जैन धर्म के तत्वों को संग्रह करके प्रकट करने वाले महावीर स्वामी ही हुए हैं। पंचशील सिद्धान्त के प्रर्वतक एवं जैन धर्म के चैबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी अहिंसा के मूर्तिमान प्रतीक थे। उन्होंने दुनियाँ को सत्य, अहिंसा तथा त्याग जैसे उपदेशों के माध्यम से सही राह दिखाने की सफल कोशिश की है। महावीर स्वामी ने जैन धर्म में अपेक्षित सुधार करके इसका व्यापक स्तर पर प्रचार किया। महावीर स्वामी के कारण ही 23वें तीर्थकर पाश्र्वनाथ द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों ने एक विशाल धर्म का रूप धारण किया। महावीर जी ने जो आचार-संहिता बनाई वह है- 1. किसी भी प्राणी अथवा कीट की हिंसा न करना, 2. किसी भी वस्तु को किसी के दिए बिना स्वीकार न करना, 3. मिथ्या भाषण न करना, 4. ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना, 5. वस्त्रों के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु का संचय न करना। वर्धमान महावीर जी ने संसार में बढ़ती हिंसक सोच तथा अमानवीयता को शांत करने के लिए मुख्य रूप से अहिंसा के विचारों पर आधारित उपदेश दिए, उनके उपदेश तथा ज्ञान बेहद सरल भाषा में है जो आम जनमानस को आसानी से समझ आ जाते हैं। भगवान महावीर ने इस विश्व को श्श्जियो और जीने दो्य्य एक महान संदेश दिया। सभी जैनी पूरी तरह से शाकाहारी होते हैं।
(5) जैन धर्म की अहिंसा, त्याग तथा प्रेम की शिक्षायें सारी मानव जाति के लिए हैः- महावीर ने तीर्थकर पाश्र्वनाथ के आरंभ किए तत्वज्ञान को परिमार्जित करके उसे जैन दर्शन का स्थायी आधार प्रदान किया। वे ऐसे धार्मिक मार्गदर्शक थे, जिन्होंने राज्य का या किसी बाहरी शक्ति का सहारा लिए बिना, केवल अपनी श्रद्धा के बल पर जैन धर्म की पुनरू प्रतिष्ठा की। आधुनिक काल में जैन धर्म की व्यापकता और उसके दर्शन का पूरा श्रेय महावीर को दिया जाता है। आज के मनुष्य को वही धर्म-दर्शन प्रेरणा दे सकता है तथा मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, राजनैतिक समस्याओं के समाधान में प्रेरक हो सकता है जो वैज्ञानिक अवधारणाओं का परिपूरक हो, लोकतंत्र के आधारभूत जीवन मूल्यों का पोषक हो, सर्वधर्म समभाव की स्थापना में सहायक हो, न्यायपूर्ण तथा अहिंसा पर आधारित विश्व व्यवस्था एवं सार्वभौमिकता की दृष्टि का प्रदाता हो तथा विश्व शान्ति एवं अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का प्रेरक हो। जैन धर्म की शिक्षायें एक अहिंसक, त्यागपूर्ण तथा प्रेमपूर्ण विश्व व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
(6) परमात्मा एक है, सभी धर्म एक है तथा सारी मानव जाति एक हैः- हमारा प्रयास होना चाहिए कि हमारे घरों में सभी धर्मों की पवित्र पुस्तकें तथा उनके मार्गदर्शकों के चित्र हों तथा एक ही परमात्मा की ओर से युग-युग में भेजी गई इन पवित्र पुस्तकों में समय-समय पर जो ज्ञान हम पृथ्वीवासियों के लिए परमात्मा ने प्रगतिशील श्रृंखला के अन्तर्गत सिलसिलेवार भेजा है, उन सभी ईश्वरीय ज्ञान के प्रति बच्चों में बाल्यावस्था से ही श्रद्धा एवं सम्मान की भावना पैदा करें। बच्चों को परिवारजन, स्कूल के टीचर्स तथा समाज के लोग बताये कि परमात्मा एक है, सभी धर्म एक है तथा सारी मानव जाति उसी एक परमात्मा की संतान है। हमें पूर्ण विश्वास है कि स्कूल, परिवार और समाज के संयुक्त प्रयास से परमात्मा को, धर्म को तथा पवित्र पुस्तकों के माध्यम से भेजे दिव्य ज्ञान को अलग-अलग समझने का अज्ञान धीरे-धीरे समाप्त हो जायेगा।
(7) विद्यालय है सब धर्मों का एक ही तीरथ-धामः- सारी सृष्टि को बनाने वाला और संसार के सभी प्राणियों को जन्म देने वाला परमात्मा एक ही है। सभी अवतारों एवं पवित्र ग्रंथों का स्रोत एक ही परमात्मा है। हम प्रार्थना कहीं भी करें, किसी भी भाषा में करें, उनको सुनने वाला परमात्मा एक ही है। अतरू परिवार तथा समाज में भी स्कूल की तरह ही सभी लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ मिलकर एक प्रभु की प्रार्थना करें तो सबमें आपसी प्रेम भाव भी बढ़ जायेगा और संसार में अहिंसा, त्याग, सुख, एकता, शान्ति, न्याय के कारण अभूतपूर्व भौतिक समृद्धि तथा आध्यात्मिक समृद्धि आ जायेगी। हमारा मानना है कि जैन धर्म की शिक्षायें एक अहिंसक, त्यागपूर्ण तथा प्रेमपूर्ण विश्व व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।         -डा0 जगदीश गांधी, शिक्षाविद्, संस्थापक, सिटी मोन्टेसी स्कूल, लखनऊ

Wednesday, 8 April 2015

सवा सौ प्रतिशत आजादी!

जबसे भारत से आई हूँ एक शीर्षक हमेशा दिमाग में हाय तौबा मचाये रहता है "सवा सौ प्रतिशत आजादी " कितनी ही बार उसे परे खिसकाने की कोशिश की सोचा जाने दो!!! क्या परेशानी है। आखिर है तो आजादी ना! जरुरत से ज्यादा है तो क्या हुआ। और भी कितना कुछ जरुरत से ज्यादा है - भ्रष्टाचार, कुव्यवस्था, बेरोजगारी, गरीबी , महंगाई , लापरवाही, कामचोरी, आदि आदि ।ऐसे में आजादी भी ज्यादा मिल जाये तो क्या बुरा है।

अब देखिये उसी के चलते हाल में हमारे कोयला मंत्री जी ने सारे आम आपत्तिजनक बयान दे डाला। आखिर अभिव्यक्ति की आजादी जो है हमारे यहाँ कोई भी, कहीं भी, किसी को भी, बिना सोचे समझे कुछ भी कह सकता है।वो तो उनकी भलमनसाहत थी कि उसके बाद उन्होंने माफी मांग ली। नहीं भी मांगते तो क्या फरक पड़ता आखिर मजाक करने की भी आजादी है और हमारे नेताओं का तो सेन्स ऑफ़ ह्यूमर वैसे भी काफी मजबूत है इस मामले में।  जैसे बोफोर्स ,चारा आदि घोटाले लोग भूल गए ऐसे ही कोयला घोटाला भी भूल जायेंगे। क्यों नहीं।। आखिर भूलने की भी आजादी है हमारी जनता को।अब तो लगता है कि कुछ कहावतों को बदलने की भी आजादी लेनी पड़ेगी - जैसे - कोयले की दलाली में हाथ काले होना। अब शायद होगा कोयले की दलाली में हाथ ही क्या दिल दिमाग सब काले होना।

यूँ इस आजादी के नमूने नेताओं के बयानों और कार्यकलापों में ही नहीं देखने में आते जगह जगह हर क्षेत्र में देखने को मिल जाते हैं।पता चला कि यू पी के एक शहर का रेलवे प्लेटफोर्म इसलिए इतना गन्दा रहता है क्योंकि वहां के कर्मचारियों ने उसकी सफाई का ठेका किसी और को ४०००रु  में दे रखा है और बाकी तनख्वाह (१५०००रु ) घर में बैठकर आराम से खाते हैं। आखिर आजाद हैं वो भी। सरकार को क्या उन्होंने तो तनख्वाह दे दी। अब उसका वो जो भी करें।

और दूसरे ठेकेदार भी आजाद, उन्हें कौन सा सरकार ने रखा है। काम करें ना करें।और सरकार भी आजाद उन्होंने तो अपना काम किया, कर्मचारी नियुक्त किये, वेतन भी दिया अब और वो क्या कर सकते हैं।बाद में इसकी चर्चा एक मित्र से की तो पता चला ये तो चतुर्थ दर्जे के कर्मचारी हैं/ यह काम तो एक राज्य के अध्यापक तक करते हैं (अपना पढाने का काम किसी और को ठेके पे दे देने का)

किसी तरह बात पचाई आखिर आजाद देश के नागरिक तो सभी हैं। हमने भी सोचा छोडो यार हम भी थोड़ी आजादी ले लें दिमाग से, और घूम आयें कहीं। सोचा भारत की शान ताज महल देख आया जाये। यूँ पहले भी कई बार देखा था पर अब तो आश्चर्यों में भी शुमार हो गया है शायद  छठा  कुछ अलग हो।

परन्तु शहर में घुसते ही हर तरह की आजादी बिखरी हुई मिली ।सड़क पर फैले कचरे के रूप में, कहीं भी खुदी हुई बंद सड़क के रूप में, सड़क बंद के होने पर किस रास्ते जाना है उसकी कोई सूचना के ना होने के रूप में, ऑटो, रिक्शा, ऊँट गाड़ीघोड़ा गाड़ी सब मन मर्जी के पैसे मांगने के रूप में। सब के सब आजाद। हर तरफ आजादी ही आजादी बेशुमार।

अब आप अगर इस आजादी के आदी हैं तो निभा लेंगे नहीं तो मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी की तर्ज़ पर आपको इसे एन्जॉय करने के अलावा कोई चारा नहीं है।सो हमभी इसे एन्जॉय करते ताज की टिकट खिड़की तक पहुंचे जहाँ कम से कम चार तरह की पंक्तियाँ थीं सो वक़्त कम लगा पर उसके बाद ताज में घुसने के लिए पंक्तियाँ एक पुरुष के लिए जो बेहद लम्बी थी और एक महिलाओं के लिए जो बहुत ही छोटी थी। पहली बार अपने महिला होने पर सुकून मिला और पहुँच गए तुरंत चेक पोस्ट तक।जहाँ एक टॉर्च जैसी चीज को सिर्फ आपके शरीर पर घुमाया जा रहा था। पर ये क्या।

वहां ड्यूटी तैनात महिला ने भी अपनी काम करने की आजादी को अपनाया और बड़े रौब से बोलीं।। इस बच्चे को जेंट्स (११ साल का लड़का ) की लाइन में भेजिए। मैं इसकी चेकिंग नहीं कर सकती।हम हैरान परेशान कि बच्चे को अकेले कम से कम घंटे की  पुरुषों  की पंक्ति में अकेले हम कैसे भेज दें उसपर सूर्य महाराज भी पूरी आजादी से चमक रहे थे। और जब १४ साल से कम उम्र के बच्चों की टिकट नहीं है तो उन्हें अपने अविभावक के साथ किसी भी पंक्ति में लगने का अधिकार होना चाहिए। फिर बेशक आप चेकिंग के समय उन्हें दूसरे कूपे में भेज दें।

सारी दुनिया में यही होता है। और यहाँ तक कि दिल्ली मेट्रो तक में यही देखा हमने। जहाँ पुरुष , महिलाओं की पंक्तियाँ बेशक अलग थीं पर नाबालिक बच्चों को अपने साथ रखने का अधिकार तो था।पर वहां वो महिला कुछ ज्यादा ही आजाद थीं। हाथ खड़े करके एलान कर दिया मैं जेंट्स की चेकिंग नहीं करुँगी। हमें पहली बार अपने बच्चे का जेंट्स (बड़े हो जाने का) होने का एहसास हुआ ।डर गए कहीं अभी ये मोहतरमा हम पर कोई और इल्जाम ना ठोक दें।

तभी एक सुरक्षाकर्मी को हमारी स्थिति पर तरस आया और वह बच्चे को दूसरी तरफ पुरुष सुरक्षा जांच के लिए ले गया यह कहता हुआ कि आइन्दा नियमों का ध्यान रखियेगा।हमने उसे कृतज्ञता से देखा और यह भी कि कुछ विदेशी बड़े आराम से बिना पंक्ति के सुरक्षा जांच के लिए पहुँच गए।

आखिर अथिति देवो भव: को मानने वाला है देश हमारा। और ये सवा सौ प्रतिशत आजादी भी उन्हीं  की देन हैं तो इतना हक़ तो उनका बनता ही है। मन में एक ख़याल आया कि क्या अपना पासपोर्ट दिखाने से हमें भी वह हक़ मिल सकता था? अब बेशक आपको वो विदेशी वाला टिकट नहीं मिले पर और दूसरी बहुत सी सुविधा थीं जिनपर अपनी आजादी का प्रयोग करके हमने गौर ना करने की भूल की थी ।जैसे बाहर कुछ लोग बड़ी ही निर्भीकता से कहते पाए गए थे देख लीजिये साहब ।लाइन बहुत बड़ी है हमें दीजिये कुछ पैसे बिना लाइन के अन्दर पहुंचा देंगे।

वर्ना बहुत कड़ी धूप है घंटा खड़ा रहना पड़ेगा परेशान हो जायेंगे अन्दर पानी भी नहीं मिलता। मुझे समझ में नहीं आया कि यह प्रशासन के लोग हैं या दलाल ताज दिखाने ले जा रहे हैं या उससे डराने।

और स्थानीय पुलिस और सुरक्षा कर्मियों की सुरक्षा में घिरे यह देवदूत आजाद देश में पूरी तरह आजाद होने का जीता जागता सबूत पेश कर रहे थे।अब आपने यह सुविधा नहीं ली तो भुगतिए।उसके बाद वहां मौजूद पानी,जलपान आदि पर भी इसीतरह की कुछ आजादियाँ थीं। जितना सामान दुकानों के अन्दर नहीं था उससे ज्यादा बाहर फैला पड़ा था और साइड में पड़े कुछ कूड़े दान भी अपनी आजादी का जश्न मना रहे थे।

वहां हमने मान लिया कि उत्तर प्रदेश में कोई रोक टोक किसी चीज पर नहीं है वहां हाथी जैसे खूबसूरत पशु के साथ जिन्दा इंसानों के बुत बड़े शान से खड़े कर दिए जाते हैं। उनपर करोड़ों फूंका जाता है। तो यहाँ की साफ़ सफाई या रख रखाव के लिए पैसा भला कहाँ से आएगा अब पैसा कोई पेड़ पर तो उगता नहीं।

महामहिम ने भी कह दिया है।परन्तु फिर हमें बताया गया कि दुनिया की सबसे खूबसूरत इस इमारत  के परिसर की देखभाल का जिम्मा उत्तर प्रदेश सरकार का ना होकर ,केंद्र सरकार का है। अब एक बात मेरी समझ में नहीं आई कि जब दिल्ली मेट्रो में लोगों की भीड़ को छोड़कर सभी व्यवस्थाएं बेहतरीन ढंग से काम कर सकती हैं तो फिर देश के सर्वाधिक प्रसिद्द जगह पर व्यवस्था का यह हाल क्यों।


पर शायद यही विभिन्नता हमारे देश की खासियत है यहाँ कोस कोस पर पानी और वाणी ही नहीं इंसान और व्यवस्था भी बदल जाती है।