‘‘ममता का सम्मान है नारी, संस्कारों का मान है नारी
स्नेह-प्यार और त्याग की, अनोखी पहचान है नारी।।
महिला दिवस मानने की तभी सार्थकता है जब सारे देश की महिलाओं के साथ न्याय होगा। जब पुरुषों की, समाज की सोच और मानसिकता बदलेगी जब हर गरीब महिला, गांव की रहने वाली महिला को भी देश के आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक विकास का लाभ मिल सकेगा।
आज अनेक महिलाये घर की मर्यादाओ, परम्पराओं को निभाते हुए सामाजिक कार्य भी कर रही है। खेल, कला, साहित्य में आगे बढ़ रही है। संस्कृति एवं सभ्यता से भरपूर भारतीय महिला सारे रिश्ते कितनी आसानी से, ईमानदारी से निभाती है यह किसी से छिपा नही है वह नौकरी भी करती है घर भी संभालती है चट्टड्ढान सी सहनशीलता लिये वह मां, बीवी, बहन, बेटी, पुत्रवधु आदि ढेर सारे रिश्ते शालीनता से निभाती है। जो लोग महिलाओं के पहनावे पर टिप्पणी करते है, उनके चरित्र का मूल्यांकन करते है, अश्लील फब्तिया, छेडखानी करने से बाज नही आते उनकी मानसिकता-परिवर्तन की जरुरत है, समाज की सोच बदलेगी तो नारी उत्पीडन, दहेज, भ्रूण हत्या जैसी घटनाए स्वतरू समाप्त हो जायेगी। इसके लिये अपने बच्चों को भारतीय सस्ंकारों में ढालना होगा। ताकि शहर हो या गांव प्रत्येक जगह महिला सुरक्षित अनुभव करे और किसी निर्भयाकाण्ड की पुनरावृति न हो तभी हम श्महिला दिवस्य पर गौरवानुभूति प्राप्त कर सकते है। इसके अभाव मे यह अन्य दिवसों की तरह मात्र औपचारिकता बनकर रह जायेगा।
प्रतिवर्ष ‘महिला दिवस’ मानकर, कर्तव्य की इतिश्री हो जाती।
प्रतिदिन ‘महिला-उत्पीडन’ की घटनाएं कोमल मन को तड़पाती।।
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