मोबाइल विकिरण के दुष्प्रमाणों का मामला चर्चा मे है इस बार केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा पर्यावरण मन्त्रालय को जनसूचना गलत देने पर लगाई गई फटकार से है। पर्यावरण मन्त्रालय को गलत सूचना देने पर कारण बताओं नोटिस केन्द्रीय सूचना आयोग ने दिया है। सद्भावना समिति वरिष्ठ नागरिक फोरम ने आश्चर्य प्रकट किया है कि जनसूचना अधिनियम की भावना का असर जब देश की सरकार के मन्त्रालय स्तर से नही होगा फिर उसके विभाग या प्रदेश स्तर पर पालन करना कितना दुष्कर है इसे बतानेकी जरुरत है। आवश्यकता है केन्दीय सूचना आयुक्त इस मामले की इस तरह निस्तारित करें की भविष्य के लिए इस अधिनियम की अनेदखी करने डरें। समय से व पूर्ण वास्तविक सूचनाएं दी जाये।
जन सूचना अधिकार कार्य कत्र्ता द्वारा पर्यावरण मन्त्रालय द्वारा विश्व स्वास्थ्य संगठन (ङ्ख॥ह्र) द्वारा मोबाइल की विद्युत चुबंकीय तरगों से कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी होने की आशंका जाहिर किए जाने को दृष्टिड्ढ रखते हुए रेडियों तरंगों से मानव स्वास्थय पर पडने वाले दुष्प्रभावों की कम करने के लिए मन्त्रालय द्वारा उठाये गये कदमों की जानकारी मांगी थी। यह भी जानकारी मंागी थी कि मानव स्वास्थय पर मोबाइल तरंगों से पडने वाले प्रभाव के लिए पर्यावरण मन्त्रालय द्वारा कोई अध्ययन कराया गया है।
पर्यावरण मन्त्रालय ने सूचना का उत्तर न दिए जाने पर केन्द्रीय सूचना आयोग की याचिका दी थी और आयोग को मन्त्रालय ने अवगत कराया की कोई इस बारे में अध्ययन नही कराया गया है। इसके विपरीत आयोग में सुनवाई मे यह स्पष्टड्ढ हो गया कि इस बारे में अन्तर मन्त्रालय समूह ने अध्ययन कर रिपोर्ट २०१० में दी थी।
जन सूचना आयुक्त द्वारा पर्यावरण मन्त्रालय से विद्युत चुबंकीय क्षेत्र को वायु प्रदूषण घोषित करने यदि नही किया है तो इसका कारण बताने को कहा है इसके साथ ही दिल्ली राज्य सरकार के मुख्यमंत्री कार्यालय को भी निर्देश दिए है कि वह जांच कराये कि छत्तों पर लगी मोबाइल टावरों की अनुमति में लोगों के स्वास्थ्य पर इन टावर प्रभाव की अनदेखी क्यों हो रही है। इसके साथ ही राज्य सरकार जनता को इसके प्रभावों के प्रति जागरूक भी करें।
मोबाइल टावर से स्वास्थय प्रभाव मुद्दा गम्भीरता नही ले रहा
मोबाइल के इस्तेमाल एवं इसकी सेवाओं के लिए लगाने वाली टावरों की तरंगों से स्वास्थय पर प्रभाव पडने व इन्हे बस्तियों व घरों आदि में लगाने के लिए मानकों व इसकी अनुमति कुछ वर्षों से मुद्दा बनता रहा है। इसे स्थानीय अदालतों के अलावा देश की उच्चतम अदालत में गम्भीरता से लिया जाता रहा है। सरकार-प्रशासन व मोबाइल कम्पनियों को बार-बार फटकार लगी है। जनता के आक्रोश पर प्रशासन व स्थानीय निकायों ने टावरों के लगे होने पर कार्यवाही का शोर भी मचाया है परन्तु समाधान के नाम पर या जनता को सजग किए जाने के प्रति खाना पूर्ति से अधिक नही दिखा है।
खतरे की आवाजे बनती है अवैध कमाई जारी
देखने मे आ रहा है कि प्रशासन हो या जनता आवाज उठाती है इन मोबाइल टावरों के औचित्य पर इनके दुष्परिणामों पर समाधान स्वरूप मे आवाजे बंद हो जाती है वह दबाव धन से हो या अन्य ताकत। इसे कहने में सकोच नही कि आज टावर लगाने व लगवाने को कमाई का धंधा बना डाला है। चंद लोगों की इच्छा पूर्ति आवाज न उठा पाने वालों के लिए जी का जजाल बनी है।
उच्चतम न्यायालय स्तर से मोबाइल व बिजली की उच्च क्षमता टावरों की तरंगों से मानव जाति का स्वास्थय ही प्रभावित नही बल्कि पशु-पक्षी व अन्य जीव-जन्तु के साथ-साथ उपज तक प्रभावित है।
तकनीक के नाम पर तरंगों का बढता इस्तेमाल चुनौती भी
भारत वर्ष जिसमें आध्यात्मिक तरंगों का संचार प्रधान रहा है, अब औद्योगिक विकास के नाम पर विद्युत तरंगों से इस देश की धरा अटती जा रही है उसमे इस देश की योग्यता की प्रतिभा तो प्रभावित हो ही रही है इस देश का अमन चैन के साथ-साथ यहां के इंसान व अन्य जीव जन्तु व होने वाली उपज तक वास्तविकता खो रहे है व नई-नई बिमारियों की चपेट में आ रहे है। इस देश में अस्थमा, कैंसर यहां तक भी नेत्र ज्योति व नाक तथा कान सभी प्रभावित है। इसे पर केन्द्रीय जन सूचना आयोग का पर्यावरण मन्त्रालय को नोटिस कोई चमत्कार करेगा विचार ना अनुचित है। उच्चतम न्यायालय के प्रयास प्रभावित नही कर सके। इसे तो देश की जनता की जागृति ही निजात दिला सकती है। देर सवेर हमें जागना होगा व विश्व स्वास्थय संगठन की चेतावनी के प्रति सजग होकर हमारे स्वास्थय व हमारी जीस व पशु-पक्षियों व जीव-जन्तुओं के साथ विद्युत तरंगों का खिलवाड करने वालों को भगाना होगा जैसे की देश से हमे गुलाम बनाने वालों को भगाया था। इस बार विदेशी ही नही बल्कि अपने बीच के अधिक है जिन्हे उनकी ओकात बतलानी होगी, जैसे की देश की ६५ वर्ष के शासकों को देश की जनता ने गत वर्ष भगाया है।
जन सूचना अधिकार कार्य कत्र्ता द्वारा पर्यावरण मन्त्रालय द्वारा विश्व स्वास्थ्य संगठन (ङ्ख॥ह्र) द्वारा मोबाइल की विद्युत चुबंकीय तरगों से कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी होने की आशंका जाहिर किए जाने को दृष्टिड्ढ रखते हुए रेडियों तरंगों से मानव स्वास्थय पर पडने वाले दुष्प्रभावों की कम करने के लिए मन्त्रालय द्वारा उठाये गये कदमों की जानकारी मांगी थी। यह भी जानकारी मंागी थी कि मानव स्वास्थय पर मोबाइल तरंगों से पडने वाले प्रभाव के लिए पर्यावरण मन्त्रालय द्वारा कोई अध्ययन कराया गया है।
पर्यावरण मन्त्रालय ने सूचना का उत्तर न दिए जाने पर केन्द्रीय सूचना आयोग की याचिका दी थी और आयोग को मन्त्रालय ने अवगत कराया की कोई इस बारे में अध्ययन नही कराया गया है। इसके विपरीत आयोग में सुनवाई मे यह स्पष्टड्ढ हो गया कि इस बारे में अन्तर मन्त्रालय समूह ने अध्ययन कर रिपोर्ट २०१० में दी थी।
जन सूचना आयुक्त द्वारा पर्यावरण मन्त्रालय से विद्युत चुबंकीय क्षेत्र को वायु प्रदूषण घोषित करने यदि नही किया है तो इसका कारण बताने को कहा है इसके साथ ही दिल्ली राज्य सरकार के मुख्यमंत्री कार्यालय को भी निर्देश दिए है कि वह जांच कराये कि छत्तों पर लगी मोबाइल टावरों की अनुमति में लोगों के स्वास्थ्य पर इन टावर प्रभाव की अनदेखी क्यों हो रही है। इसके साथ ही राज्य सरकार जनता को इसके प्रभावों के प्रति जागरूक भी करें।
मोबाइल टावर से स्वास्थय प्रभाव मुद्दा गम्भीरता नही ले रहा
मोबाइल के इस्तेमाल एवं इसकी सेवाओं के लिए लगाने वाली टावरों की तरंगों से स्वास्थय पर प्रभाव पडने व इन्हे बस्तियों व घरों आदि में लगाने के लिए मानकों व इसकी अनुमति कुछ वर्षों से मुद्दा बनता रहा है। इसे स्थानीय अदालतों के अलावा देश की उच्चतम अदालत में गम्भीरता से लिया जाता रहा है। सरकार-प्रशासन व मोबाइल कम्पनियों को बार-बार फटकार लगी है। जनता के आक्रोश पर प्रशासन व स्थानीय निकायों ने टावरों के लगे होने पर कार्यवाही का शोर भी मचाया है परन्तु समाधान के नाम पर या जनता को सजग किए जाने के प्रति खाना पूर्ति से अधिक नही दिखा है।
खतरे की आवाजे बनती है अवैध कमाई जारी
देखने मे आ रहा है कि प्रशासन हो या जनता आवाज उठाती है इन मोबाइल टावरों के औचित्य पर इनके दुष्परिणामों पर समाधान स्वरूप मे आवाजे बंद हो जाती है वह दबाव धन से हो या अन्य ताकत। इसे कहने में सकोच नही कि आज टावर लगाने व लगवाने को कमाई का धंधा बना डाला है। चंद लोगों की इच्छा पूर्ति आवाज न उठा पाने वालों के लिए जी का जजाल बनी है।
उच्चतम न्यायालय स्तर से मोबाइल व बिजली की उच्च क्षमता टावरों की तरंगों से मानव जाति का स्वास्थय ही प्रभावित नही बल्कि पशु-पक्षी व अन्य जीव-जन्तु के साथ-साथ उपज तक प्रभावित है।
तकनीक के नाम पर तरंगों का बढता इस्तेमाल चुनौती भी
भारत वर्ष जिसमें आध्यात्मिक तरंगों का संचार प्रधान रहा है, अब औद्योगिक विकास के नाम पर विद्युत तरंगों से इस देश की धरा अटती जा रही है उसमे इस देश की योग्यता की प्रतिभा तो प्रभावित हो ही रही है इस देश का अमन चैन के साथ-साथ यहां के इंसान व अन्य जीव जन्तु व होने वाली उपज तक वास्तविकता खो रहे है व नई-नई बिमारियों की चपेट में आ रहे है। इस देश में अस्थमा, कैंसर यहां तक भी नेत्र ज्योति व नाक तथा कान सभी प्रभावित है। इसे पर केन्द्रीय जन सूचना आयोग का पर्यावरण मन्त्रालय को नोटिस कोई चमत्कार करेगा विचार ना अनुचित है। उच्चतम न्यायालय के प्रयास प्रभावित नही कर सके। इसे तो देश की जनता की जागृति ही निजात दिला सकती है। देर सवेर हमें जागना होगा व विश्व स्वास्थय संगठन की चेतावनी के प्रति सजग होकर हमारे स्वास्थय व हमारी जीस व पशु-पक्षियों व जीव-जन्तुओं के साथ विद्युत तरंगों का खिलवाड करने वालों को भगाना होगा जैसे की देश से हमे गुलाम बनाने वालों को भगाया था। इस बार विदेशी ही नही बल्कि अपने बीच के अधिक है जिन्हे उनकी ओकात बतलानी होगी, जैसे की देश की ६५ वर्ष के शासकों को देश की जनता ने गत वर्ष भगाया है।
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