Wednesday, 15 April 2015

उच्च न्यायालय खण्डपीठ की मांग हड़ताल का रास्ता बदलने की समझ आई


उ0प्र0 उच्च न्यायालय खण्ड पीठ परिश्चमी उ0प्र0 में स्थापित करने की मांग के लिए नवम्बर गत वर्ष से मेरठ, सहारनपुर, बागपत, बुलन्दशहर, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर, मुज्जफरनगर व शामली की अदालतों में न्यायिक कार्य को मुरादाबाद हस्तारित अवश्य कर दिया गया है, परन्तु यह कार्य बाधित ही है। इसके विरोध मे इलाहाबाद सहित पूवचिंता में भी काम बंदी लगभग तब ही से चल रही है परन्तु वह समय-समय पर कार्य करने से अपने न्यायिक कार्य के हस्तांतरण से बचें है। श्रम-शिखर इससे पूर्व अपने सम्पादकीय में खण्ड पीठ के समाधान पर केन्द्र व प्रदेश सरकार तथा उच्च एवं उच्चतम न्यायालय स्तर पर संयुक्त समय वद्धता से समाधान  करने की अपेक्षा कर चुका है। श्रम शिखर इस पर भी आश्चर्य प्रकट कर चुका है। खण्ड पीठ की मांग के औचित्य के लिए सस्ते व जल्द न्याय के तर्क की मांग कत्र्ता वर्तमान व्यवस्था में सकारात्मकता नही देते, न ही मांग का विरोध करने वाले दूर दराज से न्याय की चैखट पर आने वालों को ही सस्ते व जल्द न्याय का एहसास कराने की सही सोच को चरितार्थ किए है। इस मांग व इसका विरोध केवल अधिवक्ता ही कर रहे है। जिनका सीधा सम्बंध इस सस्ते व जल्द न्याय दिलाने मे महत्वपूर्ण भागीदारी है।
खण्डपीठ की मांग व इसके विरोध से जिस तरह प्रदेश की जनता में यानि की बादकारियों मे नही न ही सरकार या न्याय स्तर पर दिखती है। गम्भीरता फिर भी श्रम शिखर द्वारा उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ का विरोध कत्र्ता द्वारा गत दिनों महापंचायत में यह सोच प्रबल होना की आन्दोलन का स्वरुप उग्र या हिसंक रखने के बजाए बौद्धिक तरीके से इसे निरन्तर चलाये जाने तथा अपने अधिवक्ताओं की समिति द्वारा उच्च न्यायालय की संवैधानिक स्थिति का विधिवत अध्ययन कर मत बनाने का प्रयास का निर्णय कि विभाजित न्यायपालिका न जनता के हित मे है, और नही अधिवक्ताओं के हित में निश्चय ही सराहनीय एवं अधिवक्ताओं के हित जनता के हित में है, और न ही अधिवक्ताओं तथा इस क्रान्ति एवं संस्कृति के प्रदेश उ0प्र0 की जनता की बौद्धिक प्रबुद्धता एवं समय की मांग के अनुरुप है।
उच्च न्यायालय खण्ड पीठ का मेरठ या उसके आस-पास स्थापित किए जाने से दिल्ली के लॉ फम्र्स और बड़े वकीलों को लाभ व पीठ से शक्तिक्षीण होने व दिल्ली के वकीलों की कही अधिक फीस से न्याय सस्ता होने की बजाय महंगा व स्थानीय वकीलों को हानि का एहसास इलाहाबाद क्षेत्र के अधिवक्ताओं का खण्ड पीठ की मांग करने वालों को कराने का इस महा पंचायत का निर्णय तर्क सगंत नही पर हम मानते ऐसा प्रयास होगा और पश्चिमी उ0प्र0 के वकीलों व जनता को इस प्रचार से मुकाबले के लिए तैयार होना होगा।
बैंच मांगकत्र्ताओं द्वारा आंदोलन स्थगन विरोधकत्ताओं के बौद्धिक तरीके का मुकाबला
इलाहाबाद में उच्च न्यायालय की खण्डपीठ के विरोध की महापंचायत में न्यायिक कार्य से विरत रह कर हड़ताल के तरीके से तौबा की बात कहकर बौद्धिक तरीके से विरोध की आम राय बनी, वहा खण्डपीठ की मांग करने वालों ने भी मुरादाबाद में हड़ताल के रास्ते को फिलहाल रोक देने का निर्णय फरवरी की २ तारीख मे ले लिया गया। सुना गया है यह स्थान १४ फरवरी को अलीगढ बैठक तक रोका गया है। वहा निर्णय होगा इस निर्णय का प्रमुख कारण पश्चिमी उ0प्र0 के आन्दोलनकारियों  का देश के माने हुए अधिवक्ता एवं केन्द्र सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली से मुलाकात और उच्च न्यायालय से मेरठ के न्यायिक कार्य को मुरादाबाद से वापस लाने के अलावा अधिकांशतरू युवा एंव अन्य ऐसे अधिवक्ता जिन्हे कार्यविरत से जीवन यापन प्रभाव सताने लगा था का विरोध मुख्य कारण माना जा रहा है। समाचार यहां तक है कि मुरादाबाद की बैठक मे हड़ताल जारी रखने के पक्ष घर अल्पमत से आ गये थे। मुरादाबाद मे कुछ अधिवक्ताओं का कचहरी से दुकानदारों से उत्पात के बाद की परिस्थिति भी इस हड़ताल की पक्षघर नही रह गई थी।
हमारा मानना है कि पश्चिमी उ0प्र0 के अधिवक्ताओं का आन्दोलन स्थगन का निर्णय सभी दृष्टि से सराहनीय है, परन्तु इन्हे भी इलाहाबाद के अधिवक्ताओं की भांति उच्च न्यायालय की संवैधानिकता का गहराई के अध्ययन कराकर पहला काम खण्ड पीठ के स्थान की लड़ाई छोडकर केवल-केवल खण्ड पीठ के औचित्य को प्रमुखता देते हुए पश्चिमी उ0प्र0 मे सहारनपुर से आगरा-मुरादाबाद, अलीगढ़ सभी को एक मंच पर लाकर केन्द्रिय संघर्ष समिति का अध्यक्षता गैर अधिवक्ता भी हो सकता है। इस समिति में अधिवक्ता, जनप्रतिनिधि, सामाजिक-व्यापारिक, औद्योगिक व मजदूर आदि प्रतिनिधित्व हो। इसके अलावा जनपद स्तर व तहसील स्तर पर समिति बनाकर इस मुद्दे को विस्तृत स्तर दिया जाये और इसे आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा या चुनाव का मुद्दा बनाने से जोडने हेतु मतदाताओं के पास जाया जाये न कि सरकारों से गुहार लगाई जाये।
अपने स्तर पर सस्ते व सुलभ न्याय के प्रयास
श्रम शिखर के माध्यम से सस्ते व सुलभ न्याय दिलाने हेतु खण्ड पीठ की मांग करने वालों से यह अपेक्षा की जा चुकी है कि वह वर्तमान व्यवस्था में निचली अदालतों से इस अपेक्षा एवं तथ्य को साकार कराने का प्रयास करें। निचली अदालतों में ही फीस आदि की बढ़ोतरी व अन्य खर्चों के अलावा आये दिन तारीख पर तारीख या कार्य बाधाओ द्वारा न्याय में देरी व बढते खर्च को कम कराने मे महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन अधिवक्ताओ द्वारा हो सकती है तथा संघर्ष समिति व बार एसोसिएशन प्रयास कर सकती है यदि ऐसा अभियान बौद्धिक प्रयास के अन्तर्गत होता है तो जनता व वादकारी निश्चय ही इस मांग से जुड़ सकते है। ऐसी ही अपेक्षा हम खण्ड पीठ का विरोध करने वालों से करते है कि उच्च न्यायालय के अधिवक्ता प्रयास करें की प्रदेश के दूर दराज के लोगों को सस्ते व सुलभ तथा कम समय में न्याय दिलाने का अहसास वादकारियों एवं जनता को दिलाने मे अपने बौद्धिक प्रयास के अन्र्तगत लगें तो मांग करने वाले पिछड़े धकले जा सकते है। इलाहाबाद के अधिवक्ता कितना ही समझाने का प्रयास करें की दिल्ली के महंगे अधिवक्ता न्याय को महंगा कर देगें या स्थानीय अधिवक्ताओं का कार्य प्रभावित होने से खण्डपीठ की मांग का औचित्य हितकर नही इस पर विश्वास नही होगा।
प्रदेश बंटवारा सोच न बढ़ जाये
यह भी सच है कि प्रदेश सरकार व केन्द्र सरकारों द्वारा इस मांग की अनदेखी व मन्त्री विधायको के क्षेत्रवाद अनुसार बयान या समर्थन एक दिन बृहत स्वरुप प्रदेश के बटंवारे की मंाग करने वालों को बल न दे दें। वर्तमान मे ही खण्ड पीठ की मांग तीन क्षेत्रों मे कन्द्रित है मेरठ, आगरा व बुदेल खण्ड पीठ की मांगे कर रहे है। प्रदेश के राजनीतिक के कुछ दल उत्तर प्रदेश के चार हिस्से करने व छोटे राज्यों की बात करने रहे है। इस बार उ0प्र0 विधानसभा चुनाव में प्रदेश बटंवारे का मुद्दा कही बड़े स्वरुप मे न उभर जाये।
इलाहाबाद ही महा पंचायत मे खण्ड पीठ की मांग के विरोध में उच्च न्यायालय स्तर न्यायिक हित न होने की बात कही गई है जबकि प्रदेश में लखनऊ पीठ सुचारु रुप से कार्य कर रही है तथा इससे उच्च न्यायालय हित प्रभावित नही फिर एक से अधिक पीठ गठन से प्रभावित होगा यह समझ से परे व तार्किक न होकर स्वार्थ परक अधिक लगती है।
उ0प्र0 उच्च न्यायालय की खण्ड पीठ की मांग नही हो रही, बल्कि उच्चतम न्यायालय की खण्ड पीठ दक्षिण मे होने की बात भी उठती रही है। यह बाद दिगर है यह आन्दोलन से नही बल्कि बौद्धिकता से हो रही है और इस बारे में केन्द्र सरकार व उच्चतम न्यायालय तथा विधि मन्त्रालय स्तर पर कमीशन आदि माध्यमों से विचार हो रहा है। हमें ऐसी भी जानकारी है कि देश में अन्य प्रदेश है। जहां एक से अधिक उच्च न्यायालय पीठ है तथा मुवेबिल खण्ड पीठ के भी सुझाव है।
दिल्ली चुनाव के बाद गम्भीरता दिखाये केन्द्र सरकार
केन्द्रीय मन्त्री अरुण जेटली द्वारा पश्चिम उ0प्र0 अधिवक्ताओं को खण्ड पीठ की मांग पर दिल्ली चुनाव के बाद विचार का जो आश्वासन दिया गया है। उस पर कायम रहते खण्डपीठ व आये दिन न्यायिक कार्य से विरत होने की स्थिति को अजाम देकर आश्वासन पर विश्वास की परम्परा बनानी चाहिए। ऐसी हमारी अपेक्षा है।

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