Friday, 17 April 2015

जिला आपदा प्रबन्धन के २०१३ के फैसलों का क्या हुआ?


वर्ष २०१३ मई माह में मेरठ के खडौली में शनिवार को अमोनिया गैस रिसाव के बाद तत्कालीन जिलाधिकारी रणदीप रिनवा की अध्यक्षता से आपदा प्रबन्धन की बैठक में निर्णय लिया गया था कि दंगा नियत्रण योजना की तर्ज पर आपदा प्रबन्धन योजना थानावार बनेगी। अति खतरनाक कारखाने चिन्हित होंगे। माल, बड़े कॉम्पलेक्स, सिनेमाघरों वनिजी अस्पतालों की जांच कर देखा जायेगा कि उनके यहां ज्वलनशील पदार्थ का प्रयोग या बिक्री तो नही हो रही है। ऐसा होना पाये जाने पर सुरक्षा के लिए क्या किया जा रहा है। इसका अनुश्रवण कर व्यवस्था बनाने की बात हुई थी।
इस बैठक में जिलाधिकारी द्वारा सहायक निदेशक कारखाना को सभी कारखानों को पंजीकृत कर उन्हे श्रेणी वृद्ध करने अतिखतरनाक व खतरनाक कारखानों को नोटिस देकर आउटसाइड या ऑफ साइड आपातकालीन योजना तैयार कराने की बात की गई थी। ऐसा होने पर उन कारखानों को सील करने का निर्णय भी हुआ था। स्वास्थय विभाग को ऐसे हादसे आपात स्थिति से निबटने की व्यवस्था के निर्देश भी थे।
घटना घटित के बाद उससे दहशत एवं इस तरह की घटना घटित न होने या घटना घटित मे फेल व्यवस्था के उत्तरदायित्व से बचने को इन निर्णयों से मरहम लगाया गया। इसके बाद जानकारी अनुसार न कारखाने श्रेणी वृद्ध हुए नही किन्ही को नोटिस या सील की स्थिति से गुजारा गया। कारखाना अपंजीकृत अभी भी सैकड़ों बेरोक टोकघनी आबादी मे चल रहे है। लोगों के स्वास्थय के प्रति खिलवाद व प्रदूषण को आमंत्रण खुला है।
वर्ष १४ के बाद गैस रिसाव हो या फिर इन दिनों स्वाइन फ्लू से निपटने में स्वास्थय विभाग को या फिर इसके कारणों सक्रामंकता फैलने से रोकने हेतु शोर व वायु प्रदूर्षण से राहत अथवा जगह-जगह गंदे पानी का भरा रहना किसी ओर भी आपदा प्रबन्धन सक्रिय नही। नागरिकों को चंद प्रभावी जिम्मेदारों की मनमर्जी के सामने नतमस्तक होने को विवश है।
नये विकसित क्षेत्रों में ही अधिकृत कारखाने
या कॉम्पलेक्स माल असुरक्षित
पुराने विकसित क्षेत्रों में सुरक्षा की व्यवस्थाओं व पर्यावरण को घत्ता बताई जा रही है ऐसा नही, नये विकसित क्षेत्रों कालोनियों में भी सुरक्षा के प्रर्याप्त प्रबन्ध व पर्यावरण को घत्ता बनाने का काम निर्मिक रूप से जारी है। इन क्षेत्रों में सबसे बड़ी समस्या ड्रेनेज को ओर पूरी तरह आंखें बन्द की हुई है। इसके बाद अग्निशमन या फिर अन्य तरीकों से किसी घटना से निपटने की अनेदखी खुल्लम खुला जारी है। निजी क्षेत्र को छोड भी दे स्वयं सुव्यवस्थित विकास कराने की सरकारी एजेसी प्राधिकरण व आवास विकास की विकसित कालोनी या क्षेत्र अथवा औद्योगिक क्षेत्रो द्वारा ही उपेक्षा करती जा रही है। आपदा प्रबन्धन इकाई हरकत में तब जब की घटना घटित होकर बड़ी संख्या में प्रभावित होना हो जाता है।
विकास या स्मार्ट सिटी तब ही जब सुरक्षा व प्रदूषण सोच महत्वपूर्ण बनें
देश व प्रदेश की सरकार विकास व स्मार्ट सिटी-आदर्श ग्राम आदि के लोलीपोप जनता को थमाकर उनके प्रति अपने को सर्वाधिक हितैषी प्रदर्शित करने में लगे है। विकास का अभिप्राय औद्योगिक विकास व इसके लिए विदेशियों को देश में एफ डी आई के माध्यम से प्रवेश समझा जा रहा है जबकि जनमानस को सुरक्षा, प्रदूषण से मुक्ति व तथा कत्र्तव्यों के प्रति गम्भीरता विकसित होना अधिक जरुरी है।
आपदा से निबटने हेतु जन-जन जागृति अधिक जरूरी
आपदा प्रबन्ध स्तर पर अपनी सक्रियता बनाये रखने के लिए यह भी आवश्यक है कि वह जनता को भी अपने स्तर पर निपटने के लिए जागरुक करें। गैस रिसाव की स्थिति हो या स्वाइन फ्लू जैसी बिमारी से जूझने की स्थानीय समस्या इसके प्रति गलत धारणा व निपटने के संसाधनों का निषकर्य रहना भी है। आपदा प्रबन्ध की कडियों का तालमेल अभाव तो समय पर व्यवस्था अपेक्षा अनुरुप न परिणाम मिलना है, इसमे जन सहयोग जागरुकता की कमी के कारण अपेक्षा अनुरूप न मिलना भी है। आपदा न होने की स्थिति मे यह जन जागृति का सक्रिय रुप से चालित रखना है।
पाठ्यक्रम में आपदा प्रबन्धन
आपदा से निपटने या मानव द्वारा पैदा की जाने वाली आपदाओं से निपटने के लिए युवाओं के योगदान हेतु आवश्यक है स्कूल कॉलेजों में पाठ्यक्रम से आपदा प्रबन्धन शामिल किया जाये। इसके लिए चल चित्र व इलक्ट्रोनिक मीडिया आदि की भूमिका बढाई जानी चाहिए।         अतिथि सम्पादक - श्रीमती मेघा अग्रवाल  

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