यूं
तो यह दुनिया ही एक मेला है, मगर इसमें बहुत झमेला है। इसलिए झूला-सर्कस,
बांसुरी-पिपिहरी, हलवा-पराठे वाले, गंवई-शहरी मिजाज वाले, मेले में चलिए।
आपका अपना नौचंदी मेला। रोज के दुनियावी सर्कस से मन उचाट है तो यहां का
जीवंत सर्कस देखिए। नींद न आने की बीमारी है तो मेले में आइए। मन बहलेगा।
नींद भी आएगी। परंपराएं बदली हैं, मूड बदला है, लेकिन उत्सवधर्मिता बरकरार
है। रोजाना हजारों की संख्या में उमड़ने वाली भीड़ गवाह है।
गंगा-जमुनी तहजीब की खुशबू से मेला गुलजार है इन दिनों। यहां, घुसते ही तरह-तरह की आवाजें, नजारे शहर की आम जिंदगी से अलग ले आते हैं। बैलों की घंटी-घुंघरू की जगह अब मोटरों की चिल्ल-पों है, पर इस शोर में भी अलग तरह का सुकून। मेले के स्वाद का कोई मेल नहीं। यहां सॉफ्टी है, भेलपूरी है। हलवा-पराठा, खजला-नान खताई की सोंधी खुशबू है। मुंह में लार है, मगर हाथ खाली। गोलगप्पे खाकर गाल कुप्पा करने का यहां अपना आनंद है। इन्हीं दुकानों पर कुछ खाते हुए, कुछ भसकते हुए तो एकाध आगे बढ़ने को लरजते हुए चेहरे नजर आते हैं। पांच रुपये, दस रुपये की वकत अभी भी यहां दुकानों पर मिल जाएगी। हालांकि इस कीमत में भी मोलभाव करने वाले कुछ चेहरे नजर आते हैं। मेला इसलिए न छोड़िए कि आगरे से घाघरा नहीं आया है, यहां सब कुछ मिलेगा। लघु उद्योगों के तमाम हुनर बिखरे पड़े हैं। आप यहां निशानेबाजी पर हाथ आजमा सकते हैं या फिर छल्ले फेंककर किस्मत। कुछ नहीं तो तजुर्बा जरूर मिलेगा। पांच मिनट में फोटो खिंचाकर मेले की स्मृतियां संजो सकते हैं। तनाव में हैं तो दस रुपये में पूरा हंसीघर मौजूद है। सात अजूबे सुने होंगे, लेकिन इसी हंसीघर के पास लगे पोस्टर में आठवें अजूबे की तस्वीर नजर आती है- 'दुनिया का सबसे लंबा शख्स।'
प्रचार-प्रसार की गरज से टेलीविजन धारावाहिकों की बड़ी-बड़ी होर्डिग भी जहां-तहां लटकी हैं। सर्कस के करतब में जीवन संघर्ष दिखेगा, मगर उनकी दिलेरी-जांबाजी आपको नई ऊर्जा देगी। दांतों तले अंगुलिया चाहे तो आप न दबाएं। यहां कमसिन बालाओं की अदाओं पर नीयतें डोलती हैं तो अब जानवरों का कमाल न देख पाने का मलाल भी है। जोकर की हरकतें मसखरी होने के साथ ही अब थोड़ी फूहड़ हो चली हैं। शायद यह वक्त की नजाकत है। और शायद वजूद बचाए रखने की कोशिश भी।
इसी मेला मैदान में भीड़ का फायदा उठाकर ठांव-कुठांव धक्का मारते छिछोरे भी नजर आते हैं। पलटकर, चढ़ी भौहों वाली कुछ नजरें घूरती हैं। जवान खून में गुदगुदी भले होती हो, मगर बुजुर्गो को मेले की यह संस्कृति मैली लगती है। लेकिन शायद यह भी मेले के मिजाज का एक हिस्सा है, यह सोचकर कदम बढ़ते जाते हैं। कुरेदने पर 'अब वह बात कहां' की शिकायतें और अफसोस जाहिर करते झुर्रीदार चेहरे मेले के सुनहरे अतीत से मुलाकात कराती हैं।
पटेल मंडप में अलग मेला आबाद है। यहां के रंगारंग कार्यक्रम मन के सरगमी तारों को झंकृत करते हैं। आसमान छूते झूलों पर बैठकर चाहें तो शहर के साथ आंखों से चहलकदमी करें या फिर ब्रेक डांस के हिचकोलों का आनंद ले सकते हैं। बशर्ते दिल बैठने का डर न हो। मेला उजड़ जाए, इससे पहले कुछ पल जरूर गुजारिए नौचंदी मैदान में!
https://www.facebook.com/shramshikhar
गंगा-जमुनी तहजीब की खुशबू से मेला गुलजार है इन दिनों। यहां, घुसते ही तरह-तरह की आवाजें, नजारे शहर की आम जिंदगी से अलग ले आते हैं। बैलों की घंटी-घुंघरू की जगह अब मोटरों की चिल्ल-पों है, पर इस शोर में भी अलग तरह का सुकून। मेले के स्वाद का कोई मेल नहीं। यहां सॉफ्टी है, भेलपूरी है। हलवा-पराठा, खजला-नान खताई की सोंधी खुशबू है। मुंह में लार है, मगर हाथ खाली। गोलगप्पे खाकर गाल कुप्पा करने का यहां अपना आनंद है। इन्हीं दुकानों पर कुछ खाते हुए, कुछ भसकते हुए तो एकाध आगे बढ़ने को लरजते हुए चेहरे नजर आते हैं। पांच रुपये, दस रुपये की वकत अभी भी यहां दुकानों पर मिल जाएगी। हालांकि इस कीमत में भी मोलभाव करने वाले कुछ चेहरे नजर आते हैं। मेला इसलिए न छोड़िए कि आगरे से घाघरा नहीं आया है, यहां सब कुछ मिलेगा। लघु उद्योगों के तमाम हुनर बिखरे पड़े हैं। आप यहां निशानेबाजी पर हाथ आजमा सकते हैं या फिर छल्ले फेंककर किस्मत। कुछ नहीं तो तजुर्बा जरूर मिलेगा। पांच मिनट में फोटो खिंचाकर मेले की स्मृतियां संजो सकते हैं। तनाव में हैं तो दस रुपये में पूरा हंसीघर मौजूद है। सात अजूबे सुने होंगे, लेकिन इसी हंसीघर के पास लगे पोस्टर में आठवें अजूबे की तस्वीर नजर आती है- 'दुनिया का सबसे लंबा शख्स।'
प्रचार-प्रसार की गरज से टेलीविजन धारावाहिकों की बड़ी-बड़ी होर्डिग भी जहां-तहां लटकी हैं। सर्कस के करतब में जीवन संघर्ष दिखेगा, मगर उनकी दिलेरी-जांबाजी आपको नई ऊर्जा देगी। दांतों तले अंगुलिया चाहे तो आप न दबाएं। यहां कमसिन बालाओं की अदाओं पर नीयतें डोलती हैं तो अब जानवरों का कमाल न देख पाने का मलाल भी है। जोकर की हरकतें मसखरी होने के साथ ही अब थोड़ी फूहड़ हो चली हैं। शायद यह वक्त की नजाकत है। और शायद वजूद बचाए रखने की कोशिश भी।
इसी मेला मैदान में भीड़ का फायदा उठाकर ठांव-कुठांव धक्का मारते छिछोरे भी नजर आते हैं। पलटकर, चढ़ी भौहों वाली कुछ नजरें घूरती हैं। जवान खून में गुदगुदी भले होती हो, मगर बुजुर्गो को मेले की यह संस्कृति मैली लगती है। लेकिन शायद यह भी मेले के मिजाज का एक हिस्सा है, यह सोचकर कदम बढ़ते जाते हैं। कुरेदने पर 'अब वह बात कहां' की शिकायतें और अफसोस जाहिर करते झुर्रीदार चेहरे मेले के सुनहरे अतीत से मुलाकात कराती हैं।
पटेल मंडप में अलग मेला आबाद है। यहां के रंगारंग कार्यक्रम मन के सरगमी तारों को झंकृत करते हैं। आसमान छूते झूलों पर बैठकर चाहें तो शहर के साथ आंखों से चहलकदमी करें या फिर ब्रेक डांस के हिचकोलों का आनंद ले सकते हैं। बशर्ते दिल बैठने का डर न हो। मेला उजड़ जाए, इससे पहले कुछ पल जरूर गुजारिए नौचंदी मैदान में!
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