Wednesday, 15 April 2015

होली की ठिठोली


होली का रिश्ता रंगो से जितना है उससे कहीं ज्यादा रिश्तों से रिश्ता है। पति-पत्नी, देवर-भाभी, जीजा-साली, ननद-भौजाई, समधी-समधिन और भी न जाने कौन यानि हर रिश्ता होली के रंग में रंगा है। काव्य के रंगो की बौछार लायेगी होली पर्व की मस्ती भरी बहार
रंग-अबीर, गुलाल उड़ाता, होली का त्यौहार।
ईष्या-द्वेष, विरोध मिटाता, देता स्नेह व प्यार।।
होली का हुडदंग मच रहा, रंगो की बौछार।
गुंजिया खायें, फगवा गायें, राखे मृदु व्यवहार।।
ऋतुराज बंसत के आने पर, कोयलिया है बोली।
रंगों की बौछार लिये लो आ गयी है अब होली।।
ढोल-बजाते, फगवा गाते, आई मस्तो की टोली।
अपने देवर-संग कर रही भाभी आज ठिठोली।।
ढप की ताल पे नाचो-गाओं, उड़े अबीर-गुलाल।
जो होली पर रंग न खेले, रंग दो उसके गाल।।
रंग-गुलाल खूब लगाओ, मन में न रहे मलाल।
भंग का रंग जमा है चकाचक, नाचो दे-दे ताल।।
उन्माद भरा, मद माता मौसम, मन में उठी उमंग।
तन-मन झूमा गोरी का, जब भंग की चढी तंरग।।
रंग में होली कैसे खेलूंगी मैं अब सांवरिया के संग।
कही ढोल मजीरे बाज रहे, कहीं बाज रही मृंदग।।
साथियों! रंग-बिरंगे फूल खिले है, होली में।
सब रूठे-बिछड़े मीत मिले है, होली में।।
होली का त्यौहार मिलाता है, मन से मन।
जब होते सारे दूर गिले है, होली में।।

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