Monday, 18 May 2015

कृष्ण भक्त भी और भगवान भी

कृष्ण भक्त हैं, और भगवान भी हैं। और जो भी भक्ति में प्रवेश करेगा, वह भक्तसे शुरू होगा और भगवान पर पूरा हो जाएगा
इस संबंध में थोड़ी सी बात पीछे हुई है, लेकिन हमें समझ में नहीं आती है, इसलिए फिर दूसरी तरह से लौट आती है। मैंने प्रार्थना के संबंध में जो कहा, वह थोड़ा खयाल में लेंगे तो समझ में आ जाएगा। जैसा मैंने कहा कि प्रेयर नहीं, प्रेयरफुलनेस। ऐसा भक्ति का मतलब किसी की भक्ति नहीं होती, भक्ति का मतलब है, डिवोशनल एटिटयूड। भक्ति का मतलब है, भक्त का भाव। उसके लिए भगवान होना जरूरी नहीं है। भक्ति भगवान के बिना हो सकती है, ऐसा नहीं, भक्ति के कारण भगवान दिखाई पडना शुरू हुआ है। जिन लोगों का हृदय भक्ति से भरा है, उन्हें यह जगत भगवान हो जाता है। जिनका हृदय भक्ति से नहीं भरा है, वे पूछते हैं--भगवान कहां है? वे पूछेंगे। और उन्हें बताया नहीं जा सकता, क्योंकि वह भक्त के हृदय से देखा गया जगत है। वह भक्त के मार्ग से देखा गया जगत है।
जगत भगवान नहीं है, भक्तिपूर्ण ह्रदय जगत को भगवान की तरह देख पाता है। जगत पत्थर भी नहीं है, पत्थर की तरह हृदय जगत को पत्थर की तरह देख पाता है। जगत में जो हम देख रहे हैं, वह प्रोजेक्शन है, वह हमारे भीतर जो है उसका प्रतिफलन है। जगत में वही दिखाई पड़ता है, जो हम हैं। अगर भीतर भक्ति का भाव गहरा हुआ, तो जगत भगवान हो जाता है। फिर ऐसा नहीं है कि भगवान कहीं बैठा होता है किसी मंदिर मेंय फिर जो होता है वह भगवान ही होता है।
कृष्ण भक्त हैं, और भगवान भी हैं। और जो भी भक्ति में प्रवेश करेगा, वह भक्त से शुरू होगा और भगवान पर पूरा हो जाएगा। एक दिन जब वह बाहर भगवान को देख लेगा, तो उसने खुद ऐसा क्या कसूर किया है कि उसे भीतर भगवान नहीं दिखाई पड़ेंगे! भक्त शुरू होता है भक्त की तरह, पूरा होता है भगवान की तरह। यात्रा शुरू करता है जगत को देखने की देखता है उसे जो जगत में है। भक्तिपूर्ण हृदय से, डिवोशनल माइंड से, प्रेयरफुल, भक्तिपूर्ण, भावपूर्ण, प्रार्थनापूर्ण मन से देखता है जगत को। फिर धीरे-धीरे अपने को भी उसी तरह देख पाता है, कोई उपाय नहीं रह जाता। फिर ऐसा भी हो जाता है, जैसा रामकृष्ण को एक बार हुआ। बहुत मजे की घटना है।
रामकृष्ण को एक मंदिर में पुरोहित की तरह रखा गया था, दक्षिणेशवर में। बहुत सस्ती नौकरी थी। शायद सोलह रूपये महीने की नौकरी थी। पुजारी की तरह रखा था उनको। लेकिन दस-पांच दिन में ही तकलीफ शुरू हो गई, क्योंकि ट्रस्टियों को खबर मिली कि यह आदमी तो ठीक नहीं मालूम होता। भगवान को जो भोग लगाता है, पहले खुद चख लेता है। और भगवान पर जो फूल चढ़ाता है, सूंघ लेता है। तो छिपकर ट्रस्टियों ने आकर देखा मंदिर में कि मामला क्या है? देखा कि बड़े भाव से रामकृष्ण नाचते हुए भीतर आए, भोग पहले खुद को लगाया, फिर भगवान को लगायाय फूल पहले सूंघे, फिर भगवान को सुंघाए। ट्रस्टियों ने उनको पकड़ लिया और कहा, यह क्या कर रहे हो? यह कोई ढंग है भक्ति का? रामकृष्ण ने कहा, भक्ति का ढंग होता है, यह कभी सुना नहीं। भक्त देखे हैं, भक्त सुने हैं, भक्ति का कोई ढंग होता है? कोई ढांचा, कोई डिसिप्लिन होती है? उन्होंने कहा, निकाल बाहर करेंगे! कहीं सूंघा हुआ फूल भगवान को चढ़ाया जा सकता है? रामकृष्ण ने कहा, बिना सूंघे चढ़ा कैसे सकता हूं? पता नहीं सुगंध हो भी या न हो! ट्रस्टियों ने कहा, बिना भगवान को प्रसाद लगाए तुम खुद कैसे खा लेते हो? रामकृष्ण ने कहा, मेरी मां मुझे खिलाती थी तो पहले चख लेती थी। मैं बिना चखे नहीं चढ़ा सकता। नौकरी तुम सम्हालो। अन्यथा मुझे यहां रखना है, तो मैं चखूगां, फिर चढ़ाऊंगा। पता नहीं खाने योग्य हो भी या न हो!
अब यह जो आदमी है, यह आदमी बाहर ही भगवान को कैसे देख पाएगा? बहुत जल्दी वह वक्त आ जाएगा, यह कहेगा कि भीतर भी भगवान है। तो भक्त से तो शुरु होती है यात्रा, भगवान पर पूरी होती है। ऐसा नहीं है कि बाहर कहीं किसी भगवान पर पूरी होती है, अंततरू सारी दुनिया की यात्रा करके हम अपने पर लौट आते हैं और पाते हैंरू जिसे हम खोजने गए थे वह घर में बैठा हुआ है।
कृष्ण दोनों हैं। तुम दोनों हो, सभी दोनों हैं। लेकिन भगवान से शुरू नहीं कर सकते हो तुम। भक्त से ही शुरु करना पड़ेगा। क्योंकि अगर तुमने यह कहा कि मैं भगवान हूं, तो खतरा है। ऐसे कई लोग खतरा पैदा करते हैं, जो भगवान की घोषणा तो कर देते हैं, तब ऐसे लोग अहंकेंद्रित होकर, इगोसेट्रिक होकर दूसरों को भक्त बनाने की कोशिश में लग जाते हैं। क्योंकि उनके भगवान के लिए भक्तों की जरूरत है। पर वे दूसरें में भगवान नहीं देख पाते। अपने में भगवान देखते हैं, दूसरे में भक्त देखते हैं। ऐसे गुरुडम के बहुत घेरे हैं सारी दुनिया में। यात्रा शुरु करनी पड़ेगी भक्ति से।
अब कृष्ण को भगवान माना जा सकता है, क्योंकि यह आदमी घोड़े तक की भक्ति कर सकता है। सांझ का जब घोड़े थक जाते हैं तो उन्हें ले जाता है नदी पर स्नान कराने।
 उनको नहलाता है, उनको खुरे से साफ करता है। यह आदमी भगवान होने की हैसियत रखता है। क्योंकि घोड़े को भी भगवान की तरह स्नान करवा सकता है। इस आदमी से डर नहीं है, इससे खतरा नहीं है। यह अगर भगवान की अकड़ वाला आदमी होता तो सारथी की जगह बैठ नहीं सकता। अर्जुन से कहता, बैठो नीचे, बैठने दो ऊपर! रहा मैं भगवान, तुम हो भक्त! भगवान बैठेंगे रथ में, भक्त चलाएगा।
जो अपने को भगवान घोषित करते हैं, जरा उन्हें तख्त के नीचे बिठाल कर आप तख्त पर बैठ कर देखिए, तब पता चलेगा!
भक्त से शुरु होगी यात्रा, भगवान पर पूरी होती है।

Thursday, 14 May 2015

अब हमें विकसित होना हैं । विकास के लिए अपना समर्थन दें ।

ग़ांधी जी ने विदेशी शासको से असहयोग आंदोलन और अपनों के साथ सहयोग अभियान चलाया। हमें भी आज सहयोग अभियान की आवश्यकता है विरोध  से होने वाली हानि रोककर सम्पन्नता एवं समृद्धि की दिशा में बढ़े।
- प्रजातंत्र  है। जनता शासक है। जनप्रतिनिधियों का शासन चलाने हेतु चयन किया गया है अपने सभी जनप्रतिनिधियों का प्रत्येक माह मूल्यांकन करें। उन्हें मार्गदर्शन दें। और अपनी अभिव्यक्ति एवं सम्भावनाये हमें भेजें हम श्रम शिखर में प्रकाशित करेंगे, आप अपना विडिओ भी भेज सकते है।
श्रम शिखर के सदस्य बने सदस्यता राशी २५०/- वार्षिक
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कल्याणं करोति का नेत्र शिविर

स्याल चैरिटेबिल फाउण्डेशन ट्रस्ट मेरठ, श्री वाई.पी. कौशल, कल्याणं करोति मेरठ (पंजीकृत) एवं जिला दृष्टिड्हीनता निवारण समिति (बागपत)  के संयुक्त तत्वाधान में लैन्स की सुविधा के साथ निरूशुल्क नेत्र चिकित्सा शिविर का आयोजन महावीर सिंह पूर्व प्रधान का निवास, ग्राम- दरकावदा, ब्लाक बिनौली, (बागपत) के प्रांगण में आयोजित किया गया। जिसमें १४२ नेत्र रोगियों की जांच अभिषेक गुप्ता द्वारा की गयी, सभी नेत्र रोगियों का निरूशुल्क दवाईयां वितरित करके १५ को मोतियाबिन्द के आपरेशन हेतु चयन किया गया। सभी नेत्र रोगियों को मोतियाबिन्द के आपरेशन हेतु कल्याणं करोति, मेरठ द्वारा संचालित निरूशुल्क चिकित्सालय कैन्टोनमैन्ट जनरल अस्पताल, मेरठ छावनी में लाया गया। 
सभी ऑपरेशन डा0 सतीश नागर एवं डा0 पी0पी0 मित्तल द्वारा किये गये। चश्में के लिए २० नेत्र रोगियों की जांच श्री अभिषेक गुप्ता द्वारा की गयी और ११ को रियायती दर पर चश्में उपलब्ध कराने का निर्णय लिया गया। शिविर को सफल बनाने हेतु सर्व श्रीमतीध्श्री डी.के. अग्रवाल, ईश्वरचन्द गुप्ता, रामपाल सिंह, बिजेन्द्र उर्फ विनय, दिलबाग सिंह, महिपाल सिंह, मीता एवं विजय आदि ने विशेष योगदान दिया।
कैन्टोनमैन्ट जनरल अस्पताल, बेगमपुल, मेरठ   पिन-२५०००१
फोन रू (का0) ०१२१-२६६४७२२, (अध्यक्ष) ९४१२२०६२१०, (महामंत्री) ९४५६८३८४५६ 

ओशो सत्संग और मेडिटेशन

स्कूल ऑफ लाइफ् गोमती धारा आत्मदर्शन की स्थिति कुंज बिहार में कार्यक्रम मैं प्रोफेसर वाचपति जी ने दीप जलाया कार्यक्रम शुभारम्भ हुआ।
ओशो का प्रवचन गीता दर्शन पर हुआ परिणाम की फिकर मत कर अर्जुन तू कर्म कर यही तेरा धर्म है। कृष्ण अर्जुन तू कर्म कर यही तेरा धर्म है। कृष्ण अर्जुन का समझाते हुए कहते जो व्यक्ति अकत्र्ता होकर कार्य करता है। वह कर्म अकर्म बन जाते है। फिर वह साधक अकत्र्ता बन जाता है।
स्वामी आत्मोकमरान ने कुण्डलिनी जागरण एक घण्टे का ध्यान कराया और अन्तर स्नान का अनुभव कराये। सभी मित्रो ने सहयोग दिया। रामानन्द जी, शिवकुमार, वन्दना, मोनिका, सत्यवीर जी आदि कार्यक्रम में उपस्थित रहे।
सदड्ढ्भावना समिति (पंजी.) स्वामी आत्मो कामरान 8057982656, 8273548730

स्वामी की सोच को किया सार्थक

पिछली सदी के आठवें दशक में स्वामी चिन्मयानंद ने कांगड़ा जिले के दो हजार गांवों में गरीबी मिटाने का संकल्प लिया। इसे पूरा करने के लिए उन्होंने स्वयसेवी संस्था कार्ड (चिन्मय आर्गेनाइटेशन ऑफ रूरल डेवलपमेंट) का गठन किया। इसे चलाने के लिए उन्हें एक ऐसे नेतृत्व की तलाश थी जो उनकी सोच को अजाम तक पहुंचा सके। उनकी इस सोच को डॉ. क्षमा मेत्रेय ने साकार किया।
डॉ. क्षमा मेत्रेय नई दिल्ली के मोलाना अबुल कलाम आजाद मेडिकल कॉलेज में बाल रोग विशेषज्ञ का पद छोड़कर कार्ड की राष्टड्ढ्रीय अध्यक्ष बनीं। १९८५ में संस्था की बागडोर संभाली और कुछ महिलाओं को सिलाई मशीनें बांटकर उन्हें आत्मनिर्भर करने का प्रयास शुरू किया। आज सस्था नौ सो गांवों में साक्षरता, स्वरोजगार व स्वास्थ्य से संबंधित सेवाएं प्रदान कर रही है। वह खुद वर्ष भर में करीब २० हजार रोगियों को चिकित्सा प्रदान करती है। इन्होंने १४ हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार के साधन से जोड़ा। विधिक साक्षरता में भी संस्था अहम योगदान दे रही है। करीब ८२७ मामलों में से ६१३ सुलझाए। पर्यावरण संरक्षण में भी संस्था अहम कार्य कर रही है। ६९५ गांवों में करीब २० हजार शौचालयों का निर्माण करवाया है।
महिला दिवस को सार्थक रूप तभी दिया जा सकता है, जब पुरुष भी महिलों का सम्मान करें। सबसे पहले महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना को उजागर करना होगा। लिंग भेदभाव को समाप्त करने के लिए महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों को भी आगे आना होगा।

Monday, 11 May 2015

साईकिल ट्रैक उद्देश्यपूरक

उ0प्र0 के मुख्यमन्त्री की महत्वाकांक्षी श्साईकिल ट्रैक्य योजना प्रदेश के बड़े महानगरों में सकारात्मक हो चली है। पश्चिमी उ0प्र0 में मेरठ के बाद गाजियाबाद में भी इस के स्थान नियत होने के अलावा टेण्डर प्रक्रिया आदि के साथ बजट आवटन प्रक्रिया भी हो गई है। इस योजना को गरीब की सवारी व स्वास्थ्य की दृष्टिड्ढगत उच्चतम न्यायालय के सख्त रुख के बाद ट्रैक की व्यवस्था को राज्य सरकारों को अपनाना पड़ा। सड़क बनाकर गतिवान वाहनों की बढ़ती भीड़ ने साईकिल व पैदल चालकों के लिए समस्या बना डाली थी।
मेरठ मे सीताराम हॉस्टल मेरठ से मंगल पाण्डे नगर तक नियत किया गया है। साईकिल ट्रैक वहां गाजियाबाद में इसका स्थान हापुड़ चुंगी से विवेकानंद नगर तक प्रथम चरण शुरु हो चुका है। दूसरे चरण का नया गाजियाबाद आर ओबी से गोविन्दपुरम का भी निर्मित हो चुका है। पूरे प्रोजेक्ट पर ९ करोड़ प्राधिकरण खर्च कर रहा है। तीसरे ट्रैक पर विचार हो रहा है। यह एएलटी पलाई ओवर ब्रिज से हापुड़ चुंगी तक का है।
साईकिल ट्रैक पर आम जन यानि की दुपहिया साईकिल चालकों से जब बात की तो वह इस ट्रैक व्यवस्था से खुश नही थे। इनका कहना था कि हमे ट्रैक की उपलब्धता तो तब भी नही होगी। इन ट्रैकों पर अपेक्षा अनुरुप साईकिलिंग किया जाना संभव होगा इसमें संशय है। सड़कों के किनारे व अन्य पगडंडियों पर जिस तरह चलना दुष्कर है बड़े वाहनों के खड़े रहने या चलने के प्रयास अथवा इन पर अतिक्रमण कर कारोबार होते है उसे देखकर नही लगता की यह ट्रैक जिस लक्ष्य को लेकर बन रहे है। उनसे जनता को सुविधा मिलेगी। यह जरुर है कि प्रदेश की सरकार जिसका चुनाव चिन्ह ही साईकिल है अथवा लाभ की अपेक्षा करती हो।
साईकिल निर्माता जिन्होने अब साईकिल बनाना बंद कर दिया था या बंद करने में लगे थी वापस चेहरे पर मुस्कान ला बैठे। साईकिल मरम्मत के लगे लोग भी पुनरू इस कार्य में रुचि लेने लगे है। 
साईकिल ट्रैक प्रतीकात्मक न बने रहे
वरिष्ठ नागरिक कल्यान समिति अध्यक्ष ईआरएस गुप्ता का कहना था कि जिस शो शराबे के तहद बड़े शहरों में इक्का दुक्का साईकिल ट्रैक बन रहे है या बनाने का प्रस्ताव है इससे लोगो का स्वास्थ्य नही सुधरने वाला है। इस तरह यह प्रतीकात्मक रह जायेगे। जरुरत है सड़कों के किनारे दो और जो पटरी छोडी जाती है उसे साईकिल ट्रैक संरक्षित कर उस पर अतिक्रमण रोक कर इसके दुरुपयोग का रोका जाएं। 
साईकिल ट्रैंक तो हो गया पदैल चलने की राह भी तो
साईकिल ट्रैक पर उ0प्र0 सरकार द्वारा जिस तरह की कर्मठता का प्रदर्शन दिखाया जा रहा है। इसके बाद पैदल चलने वालों जिनमें वरिष्ठ नागरिक व महिला और बच्चों ने जिज्ञासा जाहिर की है की पैदल सड़क किनारे चलना या फिर साईकिल ट्रैक की तरह स्वास्थय बनाने हेतु घुमने की राह के लिए भी इस तरह प्रदेश सरकार सोचेगी और उपलब्ध करायेगी। आज सड़कों व अन्य रास्तों पर पदैल चलने वालों के साथ भी साईकिल चालकों से कम दुघर्टना नही होती है।
       -अतिथि सम्पादक निष्ठा अग्रवाल

मन मोह लेता है ‘मनीप्लांट’

मनीप्लांट के पौधे लगभग सभी घरों में लगाए जाते हैं। यह क्यारियों, गमलों, डिब्बों आदि में लगाया जा सकता है। बहुत से लोगों का मानना है कि मनीप्लांट का पौधा घर में लगाने से सुख-समृद्धि भी आती है। मनीप्लांट को छांव वाले स्थान पर लगाना चाहिए। समय-समय पर इसकी सूखी शाखाओं और पत्तियों की काट-छांट करते रहना चाहिए। इससे पौधे की सुंदरता और निखर जाती है। अगर मनीप्लांट गमलों में लगे हैं तो साल-डेढ़ साल के अंतराल पर इन्हें दूसरे गमलों में लगा देना चाहिए।
मनीप्लांट के पौधों को समय.समय पर गोबर की खाद व नई मिट्टी देते रहना चाहिए। दो-तीन महीने के अंतराल पर इसके पौधों में चुटकीभर डीएपी व यूरिया खाद डालने से पत्तियां हरी बनी रहती हैं। इसकी पत्तियों के आकार-प्रकार एवं रंग के आधार पर मनीप्लांट को कई भागों में विभाजित किया गया है। इसकी कुछ प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं।
गोल्डन पोथो- हल्के पीले धब्बों युक्त पत्तियों वाली यह प्रजाति काफी लोकप्रिय है। दरवाजे के आसपास लटकती इसकी पत्तियां सबका मन मोह लेती हैं।
मार्बल क्वीन- इसकी पत्तियां सुंदर, सफेद संगमरमरी रंग एवं हल्के हरे धब्बों वाली होती हैं।
मेक्रोफिला- मनीप्लांट की यह काफी लोकप्रिय किस्म है। इसकी पत्तियां बड़े आकार की और पीले धब्बों वाली होती हैं।
ग्रीन ब्यूटी- इसकी पत्तियां चिकनी हरे रंग की होती हैं।
सिल्वर मून- इसका यह नाम इसकी चमकीली क्रीम रंग की आकर्षक धब्बों वाली पत्तियों के कारण पड़ा।