Showing posts with label Osho. Show all posts
Showing posts with label Osho. Show all posts

Monday, 18 May 2015

कृष्ण भक्त भी और भगवान भी

कृष्ण भक्त हैं, और भगवान भी हैं। और जो भी भक्ति में प्रवेश करेगा, वह भक्तसे शुरू होगा और भगवान पर पूरा हो जाएगा
इस संबंध में थोड़ी सी बात पीछे हुई है, लेकिन हमें समझ में नहीं आती है, इसलिए फिर दूसरी तरह से लौट आती है। मैंने प्रार्थना के संबंध में जो कहा, वह थोड़ा खयाल में लेंगे तो समझ में आ जाएगा। जैसा मैंने कहा कि प्रेयर नहीं, प्रेयरफुलनेस। ऐसा भक्ति का मतलब किसी की भक्ति नहीं होती, भक्ति का मतलब है, डिवोशनल एटिटयूड। भक्ति का मतलब है, भक्त का भाव। उसके लिए भगवान होना जरूरी नहीं है। भक्ति भगवान के बिना हो सकती है, ऐसा नहीं, भक्ति के कारण भगवान दिखाई पडना शुरू हुआ है। जिन लोगों का हृदय भक्ति से भरा है, उन्हें यह जगत भगवान हो जाता है। जिनका हृदय भक्ति से नहीं भरा है, वे पूछते हैं--भगवान कहां है? वे पूछेंगे। और उन्हें बताया नहीं जा सकता, क्योंकि वह भक्त के हृदय से देखा गया जगत है। वह भक्त के मार्ग से देखा गया जगत है।
जगत भगवान नहीं है, भक्तिपूर्ण ह्रदय जगत को भगवान की तरह देख पाता है। जगत पत्थर भी नहीं है, पत्थर की तरह हृदय जगत को पत्थर की तरह देख पाता है। जगत में जो हम देख रहे हैं, वह प्रोजेक्शन है, वह हमारे भीतर जो है उसका प्रतिफलन है। जगत में वही दिखाई पड़ता है, जो हम हैं। अगर भीतर भक्ति का भाव गहरा हुआ, तो जगत भगवान हो जाता है। फिर ऐसा नहीं है कि भगवान कहीं बैठा होता है किसी मंदिर मेंय फिर जो होता है वह भगवान ही होता है।
कृष्ण भक्त हैं, और भगवान भी हैं। और जो भी भक्ति में प्रवेश करेगा, वह भक्त से शुरू होगा और भगवान पर पूरा हो जाएगा। एक दिन जब वह बाहर भगवान को देख लेगा, तो उसने खुद ऐसा क्या कसूर किया है कि उसे भीतर भगवान नहीं दिखाई पड़ेंगे! भक्त शुरू होता है भक्त की तरह, पूरा होता है भगवान की तरह। यात्रा शुरू करता है जगत को देखने की देखता है उसे जो जगत में है। भक्तिपूर्ण हृदय से, डिवोशनल माइंड से, प्रेयरफुल, भक्तिपूर्ण, भावपूर्ण, प्रार्थनापूर्ण मन से देखता है जगत को। फिर धीरे-धीरे अपने को भी उसी तरह देख पाता है, कोई उपाय नहीं रह जाता। फिर ऐसा भी हो जाता है, जैसा रामकृष्ण को एक बार हुआ। बहुत मजे की घटना है।
रामकृष्ण को एक मंदिर में पुरोहित की तरह रखा गया था, दक्षिणेशवर में। बहुत सस्ती नौकरी थी। शायद सोलह रूपये महीने की नौकरी थी। पुजारी की तरह रखा था उनको। लेकिन दस-पांच दिन में ही तकलीफ शुरू हो गई, क्योंकि ट्रस्टियों को खबर मिली कि यह आदमी तो ठीक नहीं मालूम होता। भगवान को जो भोग लगाता है, पहले खुद चख लेता है। और भगवान पर जो फूल चढ़ाता है, सूंघ लेता है। तो छिपकर ट्रस्टियों ने आकर देखा मंदिर में कि मामला क्या है? देखा कि बड़े भाव से रामकृष्ण नाचते हुए भीतर आए, भोग पहले खुद को लगाया, फिर भगवान को लगायाय फूल पहले सूंघे, फिर भगवान को सुंघाए। ट्रस्टियों ने उनको पकड़ लिया और कहा, यह क्या कर रहे हो? यह कोई ढंग है भक्ति का? रामकृष्ण ने कहा, भक्ति का ढंग होता है, यह कभी सुना नहीं। भक्त देखे हैं, भक्त सुने हैं, भक्ति का कोई ढंग होता है? कोई ढांचा, कोई डिसिप्लिन होती है? उन्होंने कहा, निकाल बाहर करेंगे! कहीं सूंघा हुआ फूल भगवान को चढ़ाया जा सकता है? रामकृष्ण ने कहा, बिना सूंघे चढ़ा कैसे सकता हूं? पता नहीं सुगंध हो भी या न हो! ट्रस्टियों ने कहा, बिना भगवान को प्रसाद लगाए तुम खुद कैसे खा लेते हो? रामकृष्ण ने कहा, मेरी मां मुझे खिलाती थी तो पहले चख लेती थी। मैं बिना चखे नहीं चढ़ा सकता। नौकरी तुम सम्हालो। अन्यथा मुझे यहां रखना है, तो मैं चखूगां, फिर चढ़ाऊंगा। पता नहीं खाने योग्य हो भी या न हो!
अब यह जो आदमी है, यह आदमी बाहर ही भगवान को कैसे देख पाएगा? बहुत जल्दी वह वक्त आ जाएगा, यह कहेगा कि भीतर भी भगवान है। तो भक्त से तो शुरु होती है यात्रा, भगवान पर पूरी होती है। ऐसा नहीं है कि बाहर कहीं किसी भगवान पर पूरी होती है, अंततरू सारी दुनिया की यात्रा करके हम अपने पर लौट आते हैं और पाते हैंरू जिसे हम खोजने गए थे वह घर में बैठा हुआ है।
कृष्ण दोनों हैं। तुम दोनों हो, सभी दोनों हैं। लेकिन भगवान से शुरू नहीं कर सकते हो तुम। भक्त से ही शुरु करना पड़ेगा। क्योंकि अगर तुमने यह कहा कि मैं भगवान हूं, तो खतरा है। ऐसे कई लोग खतरा पैदा करते हैं, जो भगवान की घोषणा तो कर देते हैं, तब ऐसे लोग अहंकेंद्रित होकर, इगोसेट्रिक होकर दूसरों को भक्त बनाने की कोशिश में लग जाते हैं। क्योंकि उनके भगवान के लिए भक्तों की जरूरत है। पर वे दूसरें में भगवान नहीं देख पाते। अपने में भगवान देखते हैं, दूसरे में भक्त देखते हैं। ऐसे गुरुडम के बहुत घेरे हैं सारी दुनिया में। यात्रा शुरु करनी पड़ेगी भक्ति से।
अब कृष्ण को भगवान माना जा सकता है, क्योंकि यह आदमी घोड़े तक की भक्ति कर सकता है। सांझ का जब घोड़े थक जाते हैं तो उन्हें ले जाता है नदी पर स्नान कराने।
 उनको नहलाता है, उनको खुरे से साफ करता है। यह आदमी भगवान होने की हैसियत रखता है। क्योंकि घोड़े को भी भगवान की तरह स्नान करवा सकता है। इस आदमी से डर नहीं है, इससे खतरा नहीं है। यह अगर भगवान की अकड़ वाला आदमी होता तो सारथी की जगह बैठ नहीं सकता। अर्जुन से कहता, बैठो नीचे, बैठने दो ऊपर! रहा मैं भगवान, तुम हो भक्त! भगवान बैठेंगे रथ में, भक्त चलाएगा।
जो अपने को भगवान घोषित करते हैं, जरा उन्हें तख्त के नीचे बिठाल कर आप तख्त पर बैठ कर देखिए, तब पता चलेगा!
भक्त से शुरु होगी यात्रा, भगवान पर पूरी होती है।

Thursday, 14 May 2015

ओशो सत्संग और मेडिटेशन

स्कूल ऑफ लाइफ् गोमती धारा आत्मदर्शन की स्थिति कुंज बिहार में कार्यक्रम मैं प्रोफेसर वाचपति जी ने दीप जलाया कार्यक्रम शुभारम्भ हुआ।
ओशो का प्रवचन गीता दर्शन पर हुआ परिणाम की फिकर मत कर अर्जुन तू कर्म कर यही तेरा धर्म है। कृष्ण अर्जुन तू कर्म कर यही तेरा धर्म है। कृष्ण अर्जुन का समझाते हुए कहते जो व्यक्ति अकत्र्ता होकर कार्य करता है। वह कर्म अकर्म बन जाते है। फिर वह साधक अकत्र्ता बन जाता है।
स्वामी आत्मोकमरान ने कुण्डलिनी जागरण एक घण्टे का ध्यान कराया और अन्तर स्नान का अनुभव कराये। सभी मित्रो ने सहयोग दिया। रामानन्द जी, शिवकुमार, वन्दना, मोनिका, सत्यवीर जी आदि कार्यक्रम में उपस्थित रहे।
सदड्ढ्भावना समिति (पंजी.) स्वामी आत्मो कामरान 8057982656, 8273548730

Sunday, 3 May 2015

ओशो सत्संग और मेडिटेशन

गोमती आत्मदर्शन की धारा में आज स्वामी देव प्रकाश एडवोकेट ने दीप प्रज्वलित किया। ओशो के १ घंटे प्रवचन का रहा। सभी साधकों ने प्रवचन श्रवणकर आत्मिक लाभ उठाया।
स्वामी आत्मो कामरान ने कीर्तन ध्यान और नादबृहय ध्यान कराया। आज ध्यान की बहुत आवश्यकता है, विक्षिप्ता और मनोरोगो से छुटकारा पाना सम्भव है। हम ध्यान रहने की कला जानते तो जीवन जीना आ गया।
नटराज ध्यान १ घंटे तक कराया हम नृत्य करना भूल गये। हमे नृत्य करना आ जायें तो जीवन में उत्सव उतरने लगता है। मीता के पैरों नाच है, चैतेन्य प्र्रभु के पैरों में नाच है। यह नाच तुम्हारे पैरों में उतर आये तो जीवन उत्सव से धन्य हो जायेगा। तब पता चल जायेगा कि जीवन क्यों मिला। निश्चित ही मन धन्यवाद देने का भाव उमड़ पड़ेगा। प्रत्येक रविवार को १२ बजे शिविर लगता है।
सद्भावना समिति (पंजी.) स्वामी आत्मो कामरान 8057982656, 8273548730

साधना और उपासना के बीच में अंतर


साधक में कुछ खोना नहीं है, पाना है और उपासक में सिवाय खोने के कुछ भी नहीं ळे
कृष्ण के व्यक्तित्व में साधना जैसा कुछ भी नहीं है। हो नहीं सकता। साधना में जो मौलिक तत्व है, वह प्रयास है, इफर्ट है। बिना प्रयास के साधना नहीं हो सकती। दूसरा जो अनिवार्य तत्व है, वह अस्मिता है, अहंकार है। बिना श्मैं्य के साधना नहीं हो सकती। करेगा कौन? कर्ता के बिना साधना कैसे होगी, कोई करेगा तभी होगी। साधना शब्द, जिनके लिए कोई परमात्मा नहीं है, आत्मा ही है, साधना शब्द उनका है। आत्मा साधेगी और पाएगी।
उपासना शब्द बिल्कुल उलटे लोगों का है। आमतौर से हम दोनों को एक साथ चलाए जाते हैं। उपासना शब्द उनका है, जो कहते हैं कि आत्मा नहीं, परमात्मा है। सिर्फ उसके पास जाना, पास बैठनाकृउप-आसन, निकट होते जाना, निकट होते जाना। और निकट होने का अर्थ है, खुद मिटते जाना, और कोई अर्थ नहीं है।
हम उससे उतने ही दूर हैं, जितने हम हैं। जीवन के परम सत्य से हमारी दूरी, हमारी डिस्टेंस उतना ही है, जितने हम हैं। जितना हमारा होना है, जितना हमारा मैं है, जितना हमारा ईगो है, जितनी हमारी आत्मा है, उतने ही हम दूर हैं। जितने हम खोते हैं और विगलित होते हैं, पिघलते हैं और बहते हैं, उतने ही हम पास होते हैं। जिस दिन हम बिलकुल नहीं रह जाते, उस दिन उपासना पूरी हो जाती है और हम परमात्मा हो जाते हैं। जैसे बर्फ पानी बन रहा हो, बस उपासना ऐसी है कि बर्फ पिघल रहा है, पिघल रहा है...
साधना क्या कर रहा है बर्फ? साधना करेगा तो और सख्त होता चला जाएगा। क्योंकि साधना का मतलब होगा कि बर्फ अपने को बचाए। साधना का मतलब होगा कि बर्फ अपने को सख्त करे। साधना का मतलब होगा कि बर्फ और क्रिस्टलाइज्ड हो जाए। साधना का मतलब होगा कि बर्फ और आत्मवान बने। साधना का मतलब होगा कि बर्फ अपने को बचाए और खोए न।
साधना का अर्थ अंततरू आत्मा हो सकता है। उपासना का अर्थ अंततरू परमात्मा है। इसलिए जो लोग साधना से जाएंगे, उनकी आखिरी मंजिल आत्मा पर रुक जाएगी। उसके आगे की बात वे न कर सकेंगे। वे कहेंगे, अंततरू हमने अपने को पा लिया। उपासक कहेगा, अंततरू हमने अपने को खो दिया। ये दोनों बातें बड़ी उलटी हैं। बर्फ की तरह पिघलेगा। उपासक और पानी की तरह खो जाएगा। साधक तो मजबूत होता चला जाएगा।
इसलिए कृष्ण के जीवन में साधना का कोई तत्व नहीं है। साधना का कोई अर्थ नहीं है। अर्थ है तो उपासना का है। उपासना की यात्रा ही उलटी हैं। उपासना का मतलब ही यह है कि हमने अपने को पा लिया, यही भूल है। हम हैं, यही गलती है। टू बी इज दि ओनली बांडेज। होना ही एकमात्र बंधन है। न होना ही एकमात्र मुक्ति है। साधक जब कहेगा तो वह कहेगा, मै मुक्त होना चाहता हूं। उपासक जब कहेगा तो वह कहेगा, मैं श्मैं्य से मुक्त होना चाहता हूं। साधक कहेगा, मैं मुक्त होना चाहता हूं। मैं मोक्ष पाना चाहता हूं। लेकिन श्मैं्य मौजूद रहेगा। उपासक कहेगा, श्मै्य से मुक्त होना है। श्मैं्य से मुक्ति पानी है। उपासक के मोक्ष का अर्थ है, श्ना-मैं्य की स्थिति। साधक के मोक्ष का मतलब है, श्मैं्य की परम स्थिति। इसलिए कृष्ण की भाषा में साधना के लिए कोई जगह नहीं हैय उपासना के लिए जगह है।
अब यह उपासना क्या है, इसे थोड़ा समझें।
पहली तो यह बात समझ लें कि उपासना साधना नहीं है, इससे समझने में आसानी बनेगी। अन्यथा भ्रांति निरंतर होती रहती है। और उपासक हममें से बहुत कम लोग होना चाहेंगे, यह भी ख्याल में ले लें। साधक हममें से सब होना चाहेंगे।
क्योंकि साधक में कुछ खोना नहीं है, पाना है। और उपासक में सिवाय खोने के कुछ भी नहीं है, पाना कुछ भी नहीं है। खोना ही पाना है, बस। उपासक कौन होना चाहेगा? इसलिए कृष्ण को मानने वाले भी साधक हो जाते हैं। कृष्ण के मानने वाले भी साधना की भाषा बोलने लगते हैं। क्योंकि वह भीतर जो अहंकार है, वह साधना की भाषा बुलवाता है। वह कहता है, साधो! पाओ! पहुंचो! उपासना बड़ी कठिन बात है, आरडुअस। इससे ्ययादा कठिन कोई बात नहीं हैकृपिघलो, मिटो, खो जाओ।
-ओशो
पुस्तकरू कृष्ण स्मृति
प्रवचन नं.12 से संकलित

Sunday, 19 April 2015

ओशो सत्संग और मेडिटेशन


कार्यक्रम प्रारम्भ होने के अवसर पर एडवोकेट प्रकाशवीर जी ने ओशो और श्रीकृष्ण जी के सामने दीप-प्रज्वलित किया।
कार्यक्रम के सत्र में कैवल्य उपनिषेद के भाग ५ प्रवचन पूरा श्रवण कराया उस प्रवचन में ओशो कहते है। एकान्त क्या है? कैसे सुखासन में बैठके अपने शरीर ग्रविटेशन मुक्त कर उर्जावान बनायें। बुद्ध के वचन साधक के लिए कैसे महत्वपूर्ण होते है। हदय में करुणा और मैत्री, मुदिता और उपेक्षा कैसे जागे।
स्वामी आत्मो कामरान ने साधको का साधना के गहरे सूत्रों की व्याख्या की और ध्यान की सुगम विधि प्रयोगों द्वारा अनुभव कराया। कुण्डलनी, ओशो की शन्तिपात का ज्ञान कराते हुए नटराज, नादवृहम ध्यान में डूबकी लगवाई।
ओशो प्रेमी और गहरे साधक बिटटू बाबू, सत्यवीर गर्ग, वन्दना, मौनिक मैडम, राकेश कुमार त्यागी, स्वामी रामानन्द इन्सा डा0 राकेश सिंह आदि ने शिविर में सहयोग दिया। यह कार्यक्रम प्रत्येक रविवार १२ से शाम ५ बजे तक चलता है। यहां प्रातरू ६ बजे सक्रिय ध्यान और सायं ३ बजे से ७ बजे तक कार्यक्रम चलते रहते है।
सद्भावना समिति (पंजी.) स्वामी आत्मो कामरान 8057982656, 8273548730

कृष्ण का अर्थ


कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जिस पर संसारी चीजें खिंचती हों, जो केंद्रीय चुंबक का काम करे
कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, केंद्र। कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जो आकृष्ट करे, जो आकर्षित करेय सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन, कशिश का केंद्र। कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जिस पर संसारी चीजें खिचती हों, जो केंद्रीय चुंबक का काम करे। प्रत्येक व्यक्ति का जन्म एक अर्थ में कृष्ण का जन्म है, क्योंकि हमारे भीतर जो आत्मा है, वह कशिश का केंद्र है। वह सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन है जिस पर सब चीजें खिंचती हैं और आकृष्ट होती हैं। शरीर खिंच कर उसके आस-पास निर्मित होता है, परिवार खिच कर उसके आस-पास निर्मित होता र्है, समाज खिंच कर उसके आस-पास निर्मित होता है, जगत खिंच कर उसके आस-पास निर्मित होता है। वह जो हमारे भीतर कृष्ण का केंद्र है, आकर्षण का जो गहरा बिंदु है, उसके आस-पास सब घटित होता है। तो जब भी कोई व्यक्ति जन्मता है, तो एक अर्थ में कृष्ण ही जन्मता है। वह जो बिंदु है आत्मा का, आकर्षण का, वह जन्मता है। और उसके बाद सब चीजें उसके आस-पास निर्मित होनी शुरू होती हैं। उस कृष्ण-बिंदु के आस-पास क्रिस्टोलाइजेशन शुरु होता है और व्यक्तित्व निर्मित होते हैं। इसलिए कृष्ण का जन्म एक व्यक्ति विशेष का जन्मपात्र नहीं है, बल्कि व्यक्तिमात्र का जन्म है।
अंधेरे का, कारागृह का, मृत्यु के भय का अर्थ है। लेकिन हमने कृष्ण के साथ उस क्यों जोड़ा होगा? मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जो कृष्ण की जिंदगी में घटना घटनी होगी कारागृह में, वह नहीं घटी है। मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि जो बंधन में पैदा हुए होंगे, वह नही हुए हैं। मैं इतना कह रहा हूं कि वे बंधन में हुए हो या न हुए हों, वे कारागृह में जन्मे हों या न जन्में हो, लेकिन कृष्ण जैसा व्यक्ति जब हमें उपलब्ध हो गया तो हमने कृष्ण के व्यक्तित्व के साथ वह सब समाहित कर दिया है जो कि प्रत्येक आत्मा के जन्म के साथ समाहित है।
ध्यान रहे, महापुरुषों की कथाएं जन्म की हमेशा उलटी चलती हैं। साधारण आदमी के जीवन की कथा जन्म से शुरू होती है और मृत्यु पर पूरी होती है। उसकी कथा में एक सिक्केंस होता है, जन्म से लेकर मृत्यु तक। महापुरुषों की कथाएं फिर से रिट्रास्पेक्टिवली लिखी जाती हैं। महापुरुष पहचान में आते हैं बाद में। और उनकी जन्म की कथाएं फिर बाद में लिखी जाती हैं। कृष्ण जैसा आदमी जब हमें दिखाई पड़ता है तब तो पैदा होने के बहुत बाद दिखाई पड़ता है। वर्षों बीत गए होते हैं उसे पैदा हुए। जब वह हमें दिखाई पड़ता है तब वह कोई चालीस-पचास साल की यात्रा कर चुका होता है। फिर इस महिमावान, इस अद्भुत व्यक्ति के आस-पास कथा निर्मित होती है। फिर हम चुनाव करते हैं इसकी जिंदगी का। फिर हम रीइंटरप्रीट करते हैं। फिर से हम इसके पिछले जीवन में से घटनाएं चुनते हैं, घटनाओं का अर्थ देते हैं।
इसलिए मैं आपसे कहूं कि महापुरुषों की जिंदगी कभी भी ऐतिहासिक नहीं हो पाती है, सदा काव्यात्मक हो जाती है। पीछे लौट कर निर्मित होती है। पीछे लौट कर जब हम देखते हैं तो हर चीज प्रतीक हो जाती है और दूसरे अर्थ ले लेती है, जो अर्थ घटते हुए क्षण में कभी भी न रहे होंगे। और फिर कृष्ण जैसे व्यक्तियों की जिदंगी एक बार नहीं लिखी जाती, हर सदी बार-बार लिखती है। हजारों लोग लिखते हैं। जब हजारों लोग लिखते हैं तो हजार व्याख्याएं होती चली जाती हैं। फिर धीरे-धीरे कृष्ण की जिंदगी किसी व्यक्ति की जिंदगी नहीं रह जाती। कृष्ण एक संस्था हो जाते हैं। एक इंस्टीटयूशन हो जाते हैं। फिर वे समस्त जन्मों का सारभूत हो जाते हैं। फिर मनुष्य मात्र के जन्म की कथा उनके जन्म की कथा हो जाती है।
इसलिए व्यक्तिवाची अर्थों में मैं कोई मूल्य नहीं मानता हूं। कृष्ण जैसे व्यक्ति व्यक्ति नहीं रह जाते। वे हमारे मानस के, हमारे चित्त के, हमारे कलेक्टिव माइंड के प्रतीक हो जाते हैं। और हमारे चित्त ने जितने भी जन्म देखे है, वे सब उनमें समाहित हो जाते हैं।
इसे ऐसा समझें। एक बहुत बड़े चित्रकार ने एक स्त्री का चित्र बनायाकृएक बहुत सुंदर स्त्री का चित्र। लोगों ने उससे पूछा कि यह कौन स्त्री है, जिसके आधार पर इस चित्र को बनाया? उस चित्रकार ने कहारू यह किसी स्त्री का चित्र नहीं है। यह लाखों स्त्रियां जो मैंने देखी हैं, सबका सारभूत है। इसमें आंख किसी की है, इसमें नाक किसी की, इसमें ओठ किसी के हैं, इसमें रंग किसी का है, इसमें बाल किसी के है, ऐसी स्त्री कही खोजने से नहीं मिलेगी, ऐसी स्त्री सिर्फ चित्रकार देख पाता है। और इसलिए चित्रकार की स्त्री पर बहुत भरोसा मत करना, उसको खोजने मत निकल जाना, क्योंकि जो मिलेगी वह नहीं, साधारण स्त्री मिलेगी। इसलिए दुनिया बहुत कठिनाई में पड़ जाती है क्योंकि हम जिन स्त्रियों को खोजने जाते हैं वे कहीं हैं नहीं, वे चित्रकारों की स्त्रियां हैं, कवियों की स्त्रियां हैं, वे हजारों स्त्रियों का सारभूत हैं। वे इत्र हैं हजारों स्त्रियों का। वे कहीं मिलने वाली नहीं है। वे हजारों स्त्रियां मिल-जुल कर एक हो गई हैं। वह हजारों स्त्रियों के बीच में से खोजी गई धुन है।
तो जब कृष्ण जैसा व्यक्ति पैदा होता है, तो लाखों जन्मों में जो पाया गया है, उस सबका सारभूत उसमें समा जाता है। इसलिए उसे व्यक्तिवाची मत मानना। वह व्यक्तिवाची है भी नहीं। इसलिए अगर उसे कोई इतिहास में खोज करने जाएगा तो शायद कहीं भी न पाए। कृष्ण मनुष्य मात्र के जन्म के प्रतीक बन जाते हैंकृएक विशेष मनुष्यता के, जो इस देश में पैदा हुईय इस देश की मनुष्यता ने जो अनुभव किया, वह उनमें समा जाता है। जीसस में समा जाता है किसी और देश का अनुभव, वह सब समाहित हो जाता है।
हम अपने जन्म के साथ जन्मते हैं और अपनी मृत्यु के साथ मर जाते हैं। कृष्ण के प्रतीक में जुड़ता ही चला जाता है। अनंत काल तक जुड़ता चला जाता है। उस जोड़ में कभी कोई बाधा नहीं आती। हर युग उसमें जुड़ेगा, हर युग उसमें समृद्धि करेगा, क्योंकि और अनुभव इकऋे हो गए होंगे। और वह उस कलेक्टिव आर्च टाइप में जुड़ते चले जाएंगे।
लेकिन मेरे लिए जो मतलब दिखाई पड़ता है, वह मैंने आपसे कहा। ये घटनाएं घट भी सकती हैं, ये घटनाएं न भी घटी हों। मेरे लिए घटनाओं का कोई मूल्य नहीं है। मेरे लिए मूल्य कृष्ण को समझने का है कि इस आदमी में ये घटनाएं कैसे हमने देखीं। और अगर इनको हम ठीक से देख सकें तो ये घटनाएं हमें अपने जन्म में भी दिखाई पड़ सकती है वह अपनी मृत्यु तक पहुंचते-पहुंचते अपनी मृत्यु में भी कृष्ण की मृत्यु के तालमेल को उपलब्ध हो सके।

Tuesday, 14 April 2015

शिव ने कहाः ओम् जैसी किसी ध्वनि का धीमे-धीमे गुंजार करो। जैसे-जैसे ध्वनि पूर्णध्वनि में प्रवेश करती है, वैसे-वैसे साधक भी।


‘‘ओम जैसी किसी ध्वनि का धीमे-धीमे गुंजार करो।्य्य उदाहरण के लिए ओम् को लो। यह आधारभूत ध्वनियों में से एक है। अ उ और म-ये तीन ध्वनियां ओम् में सम्मिलित हैं। ये तीनों बुनियादी ध्वनियां हैं। अन्य सभी ध्वनियां इनसे ही निष्पन्न, इनसे ही बनी और इनका ही मिश्रण हैं। ये तीनों बुनियादी हैं जैसे भौतिकी के लिए इलेक्ट्रोन, न्यूट्रान और पाजीट्रान बुनियादी हैं। इस बात को गहराई से समझना होगा।...
ध्वनि का उच्चारण एक सूक्ष्म विज्ञान है पहले तुम्हें ओम् का उच्चारण जोर से बाहर-बाहर करना है। दूसरे भी इसे सुन सकेंगे। जोर से उच्चार शुरू करना अच्छा है। क्यों ? क्योंकि जब तुम जोर से उच्चार करते हो तो तुम भी उसे साफ-साफ सुनते हो। जब भी तुम कुछ कहते हो तो दूसरों से कहते होय वह तुम्हारी आदत बन गई है। जब भी तुम बात करते हो तो दूसरों से करते हो। और तुम स्वयं को बोलते हुए तभी सुनते हो जब तुम दूसरों से बात करते होते हो। इसलिए एक स्वाभाविक आदत से आरंभ करना अच्छा है।
ओम् ध्वनि का उच्चार करो, और फिर धीरे-धीरे उस ध्वनि के साथ लयबद्ध अनुभव करो। जब ओम् का उच्चार करो तो उससे आपूरित हो जाओ, भर जाओ। और सब कुछ भूल जाओय ओम् ही बन जाओ, ध्वनि ही बन जाओ। और ध्वनि ही बन जाना बहुत आसान है क्योंकि ध्वनि तुम्हारे शरीर में, तुम्हारे मन में, तुम्हारे पूरे स्नायु संस्थान में गूंजने लगती है। ओम् की अनुगूंज को अनुभव करो। ओम् का उच्चार करो और अनुभव करो कि तुम्हारा पूरा शरीर उससे भर गया, शरीर का प्रत्येक कोश उससे गूंज उठा है।
उच्चार करना लयबद्ध होना भी है। ध्वनि के साथ लयबद्ध होओय ध्वनि ही बन जाओ।
और तब तुम अपने और ध्वनि के बीच गहरी लयबद्धता अनुभव करोगेय तब तुममें उसके लिए गहरा अनुराग पैदा होगा। यह ओम् की ध्वनि इतनी ही सुंदर और संगीतमय है। जितना ही तुम उसका उच्चार करोगे उतने ही तुम उसकी सूक्ष्म मिठास से भर जाओगे। ऐसी ध्वनियां हैं जो बहुत तीखी और कठोर हैं। ओम् एक बहुत मीठी ध्वनि है और यह शुद्धतम है। इसका उच्चार करो और इससे आपूरित हो जाओ।
जब तुम ओम् की ध्वनि के साथ लयबद्ध अनुभव करने लगो, तब तुम इसका जोर से उच्चार करना बंद कर सकते हो। अब ओंठ बंद कर लो और ओम् का उच्चार भीतर ही करो, लेकिन पहले भीतर जोर से उच्चार करो, ताकि ध्वनि तुम्हारे पूरे शरीर में फैल जाए, उसके प्रत्येक हिस्से को, एक-एक कोशिका को छूए। तुम इससे अधिक प्राणवान, अधिक जीवंत हुआ अनुभव करोगे। तुम स्वयं में एक नवजीवन प्रवेश करता हुआ अनुभव करोगे।
तुम्हारा शरीर एक वाद्य की तरह है। उसे लयबद्धता की जरूरत हैय और जब लयबद्धता खंडित होती है, तो तुम अड़चन में पडते हो। यही कारण है कि जब तुम संगीत सुनते हो, तो तुम्हें अच्छा लगता है? संगीत और क्या है सिवाय लयबद्ध सुर-ताल के?
जब तुम्हारे आसपास संगीत होता है तो तुम इतना सुख-चैन क्यों अनुभव करते हो? और शोरगुल और अराजकता के बीच तुम्हें बेचैनी क्यों लगती है? कारण है कि तुम स्वयं गहरे रूप से संगीतमय हो। तुम एक वाद्य यंत्र हो और यह यंत्र प्रतिध्वनि करता है।
अपने भीतर ओम् का उच्चार करो और तुम अनुभव करोगे कि तुम्हारा पूरा शरीर उसके साथ नृत्य करने लगा है। तब तुम्हें महसूस होगा कि तुम्हारा पूरा शरीर उसमें नहा रहा हैय उसका पोर-पोर इस स्नान से शुद्ध हो रहा है। लेकिन जैसे-जैसे इसकी प्रतीत प्रगाढ़ हो, जैसे-जैसे यह ध्वनि ज्यादा से ज्यादा तुम्हारे भीतर प्रवेश करे वैसे-वैसे उच्चार को धीमा करते जाओ। क्योंकि ध्वनि जितनी धीमी होगी, उतनी ही वह गहराई प्राप्त करेगी। यह होमियोपैथी की खुराक जैसी हैय जितनी छोटी खुराक उतनी ही गहरी उसकी पैठ होती है। गहरे जाने के लिए तुम्हें सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हो कर जाना होगा।

Saturday, 11 April 2015

ओशो सत्संग और मेडिटेशन


कुंज विहार गोमती आत्मदर्शन की धारा में ओशो का दैनिक कार्यक्रम शुरु हुआ। भाजपा के कार्यकत्र्ता राकेश कुमार त्यागी जी ने दीप प्रज्वलित किया।
कैवल्य उपनिषद पर प्रबन्धन भाग ५ - कैवल्य एक को जानने कि लिय एकान्त व सिद्धासन और मेरुदण्ड सिर और गले को एक सीध में गुरु को स्मरणकर हदय की गुफा में प्रवेश कर ही आत्मसात कर सकते हैं।
एक-एक शब्द का समझ श्एकान्त्य ऐसा नही कि घर छोड़कर चले जाये और बाजार भरी भीड़ में रहते हुए अपने को अकेले करते वही एकान्त में है। जंगल मै या और कही भागकर कभी भी एकान्त नही हो पाता।
स्वामी आत्मो कामरान ने नाद हदय ध्यान कराया और ध्यान करने के सूत्रों की व्याख्या की। साधको ने ध्यान की गंगा में डुबकी लगायी। सतत् ध्यान करने का संकल्प लिया।
प्रतिदिन कार्यक्रम सद्भावना समिति द्वारा कुज विहार में चलाये जा रहे है। स्त्रोतो और ध्यान करने वाले गोमती आत्मदर्शन की धारा में डुबकी लगाने लगातार आते जाते रहते है।
सद्भावना समिति (पंजी.) स्वामी आत्मो कामरान 8057982656, 8273548730

Friday, 10 April 2015

जीवन का केंद्र: धन, यश या ध्यान?


जीवन का केंद्र धन नहीं होगा, यश नहीं होगा, संसार नहीं होगा। जीवन का केंन्द्र ध्यान होगा, धर्म होगा, परमात्मा होगा-ऐसे निर्णय का नाम ही संन्यास है
संन्यास का अर्थ ही यही है कि मैं निर्णय लेता हूं कि अब से मेरे जीवन का केंद्र ध्यान होगा। और कोई अर्थ ही नहीं है संन्यास का। जीवन का केंद्र धन नहीं होगा, यश नहीं होगा, संसार नहीं होगा। जीवन का केंन्द्र ध्यान होगा, धर्म होगा, परमात्मा होगा-ऐसे निर्णय का नाम ही संन्यास है। जीवन के केंद्र को बदलने की प्रक्रिया संन्यास है। वह जो जीवन के मंदिर में हमने प्रतिष्ठा कर रखी है - इंद्रियों की, वासनाओं की, इच्छाओं की, उनकी जगह मुक्ति की, मोक्ष की, निर्वाण की, प्रभु-मिलन की, मूर्ति की प्रतिष्ठा ध्यान है।
तो जो व्यक्ति ध्यान को जीवन के और कामों में एक काम की तरह करता है, चैबीस घंटों में बहुत कुछ करता है, घंटे भर ध्यान भी कर लेता है-निश्चित ही उस व्यक्ति के बजाय जो व्यक्ति अपने चैबीस घंटे के जीवन को ध्यान को समर्पित करता है, चाहे दुकान पर बैठेगा तो ध्यानपूर्वक, चाहे भोजन करेगा तो ध्यानपूर्वक, चाहे बात करेगा किसी के साथ तो ध्यानपूर्वक, रास्ते पर चलेगा तो ध्यानपूर्वक, रात सोने जाएगा तो ध्यानपूर्वक, सुबह में बिस्तर से उठेगा तो ध्यानपूर्वक-ऐसे व्यक्ति का अर्थ है संन्यासी, जो ध्यान को अपने चैबीस घंटों पर फैलाने की आकांक्षा से भर गया है।
निश्चित ही संन्यास ध्यान के लिए गति देगा। और ध्यान संन्यास के लिए गति देता है। ये संयुक्त घटनाएं है। और मनुष्य के मन का नियम है कि निर्णय लेते ही मन बदलना शुरू हो जाता है। आपने भीतर एक निर्णय किया कि आपके मन में परिवर्तन होना शुरू हो जाता है। वह निर्णय ही परिवर्तन के लिए क्रिस्टलाइजेशन बन जाता है।
कभी बैठे-बैठे इतना ही सोचें कि चोरी करनी है, तो तत्काल आप दूसरे आदमी हो जाते हैं-तत्काल! चोरी करनी है इसका निर्णय आपने लिया कि चोरी के लिए जो मदद रूप है, वह मन आपको देना शुरु कर देता है सुझाव कि क्या करें, क्या न करें, कैसे कानून से बचे, क्या होगा, क्या नहीं होगा!
 एक निर्णय मन में बना कि मन उसके पीछे काम करना शुरु कर देता है। मन आपका गुलाम है। आप जो निर्णय ले लेते हैं, मन उसके लिए सुविधा शुरू कर देता है कि जब चोरी करनी ही है तो कब करें, किस प्रकार करें कि फंस न जाएं, मन इसका इंतजाम जुटा देता है।
जैसे ही किसी ने निर्णय लिया कि मैं संन्यास लेता हूं कि मन संन्यास के लिए भी सहायता पहुंचाना शुरू कर देता है। असल में निर्णय न लेने वाला आदमी ही मन के चक्कर में पड़ता है। जो आदमी निर्णय लेने की कला सीख जाता है, मन उसका गुलाम हो जाता है। वह जो अनिर्णयात्मक स्थिति है वही मन है। इनडिसीसिवनेस इज माइंड। निर्णय की क्षमता, डिसीसिवनेस ही मन से मुक्ति हो जाती है। वह जो निर्णय है, संकल्प है, बीच में खड़ा हो जाता है, मन उसके पीछे चलेगा। लेकिन जिसके पास कोई निर्णय नहीं है, संकल्प नहीं है, उसके पास सिर्फ मन होता है। और उस मन से बहुत पीड़ित और परेशान होते हैं।
संन्यास का निर्णय लेते ही जीवन का रूपांतरण शुरू हो जाता है। संन्यास के बाद तो होगा ही, निर्णय लेते ही जीवन का रूपांतरण शुरू हो जाता है।
और ध्यान रहे, आदमी बहुत अनूठा है। उसका अनूठापन ऐसा है कि कोई अगर आपसे कहे कि दो हजार, या दो करोड़ या अरब तारे हैं, तो आप बिल्कुल मान लेते हैं। लेकिन अगर किसी दीवार पर नया पेंट किया गया हो और लिखा हो कि ताजा पेंट है, छूना मत, तो छूकर देखते ही हैं कि है भी ताजा कि नही!
जब तक अंगुली खराब न हो जाए तब तक मन नहीं मानता। सूरज को बिना सोचे मान लेते हैं और दीवार पर पेंट नया हो तो छूकर देखने का मन होता है। जितनी दूर की बात हो उतनी बिना दिक्कत के आदमी मान लेता है। जितनी निकट की बात हो उतनी दिक्कत खड़ी होती है।
संन्यास आपके सर्वाधिक निकट की बात है। उससे निकट की और कोई बात नहीं है। अगर जो विवाह करेंगे तो वह भी दूर की बात है। क्योंकि उसमें दूसरा सम्मिलित है, इनवाल्व्ड है। आप अकेले नहीं है। संन्यास अकेली घटना है जिसमें आप अकेले ही हैं, कोई दूसरा सम्मिलित नहीं है। बहुत निकट की बात है। उसमें आप बड़ी परेशानी में हैं। उस निर्णय को लेकर बड़ी कठिनाई होती है मन को।
जितनी बड़ी भीड़ हो हम उतना जल्दी निर्णय ले लेते हैं। अगर दस हजार आदमी एक मस्जिद को जलाने जा रहे हैं तो हम बिलकुल मजे से उसमें चले जाते हैं। यदि दस हजार आदमी मंदिर में आग लगा रहे हैं तो हम बराबर सम्मिलित हो जाते हैं। दस हजार लोग हैं, रिस्पांसिबिलिटी, जिम्मेवारी फैली हुई है, आप अकेले जिम्मेवार नहीं है, दस हजार आदमी साथ हैं। अगर कल बात हुई तो आप कहेंगे कि इतनी बड़ी भीड़ थी, मेरा होना न होना न के बराबर था। नहीं भी होता मैं तो भी मंदिर जलने वाला ही था। मैं तो खड़ा था, चला गया। जिम्मेवारी मालूम नहीं पड़ती।
लेकिन संन्यास ऐसी घटना है जिसमें सिर्फ तुम ही जिम्मेवार हो, और कोई नहींय ओनली यू आर रिस्पांसिबल, नो वन इल्स। इसलिए निर्णय करने में बड़ी मुश्किल होती है। अकेले ही हैं, किसी दूसरे पर जिम्मेवारी डाली नहीं जा सकती। किसी से आप यह नहीं कह सकते कि भीड़ की वजह से, तुम्हारी वजह से मैं लेता हूं। इसलिए निर्णय को हम टालते चले जाते हैं। अकेला आदमी जिस दिन निर्णय लेने में समर्थ हो जाता है उसी दिन आत्मा की शक्ति जागनी शुरू होती है, भीड़ के साथ चलने से कभी कोई आत्मा की शक्ति नहीं जगती।
-ओशो

Wednesday, 1 April 2015

we are too much in the self?

We are miserable because we are too much in the self. What does it mean when I say we are too much in the self? And what exactly happens when we are too much in the self? Either you can be in existence or you can be in the self--both are not possible together. To be in the self means to be apart, to be separate. To be in the self means to become an island. To be in the self means to draw a boundary line around you. To be in the self means to make a distinction between this I am' and that I am not'. The definition, the boundary, between 'I' and 'not I' is what the self is--the self isolates. And it makes you frozen--you are no longer flowing. If you are flowing the self cannot exist. Hence people have become almost like ice-cubes. They dont have any warmth, they dont have any love--love is warmth and they are afraid of love. If warmth comes to them they will start melting and the boundaries will disappear. In love the boundaries disappear; in joy also the boundaries disappear, because joy is not cold.

Nothing is guaranteed

The seed cannot know what is going to happen, the seed has never known the flower. And the seed cannot even believe that he has the potentiality to become a beautiful flower. Long is the journey, and it is always safer not to go on that journey because unknown is the path, nothing is guaranteed. Nothing can be guaranteed. Thousand and one are the hazards of the journey, many are the pitfalls - and the seed is secure, hidden inside a hard core. But the seed tries, it makes an effort; it drops the hard shell which is its security, it starts moving. Immediately the fight starts: the struggle with the soil, with the stones, with the rocks. And the seed was very hard and the sprout will be very, very soft and dangers will be many. There was no danger for the seed, the seed could have survived for millennia, but for the sprout many are the dangers. But the sprout starts towards the unknown, towards the sun, towards the source of light, not knowing where, not knowing why. Great is the cross to be carried, but a dream possesses the seed and the seed moves. The same is the path for man. It is arduous. Much courage will be needed.

Watch the waves in the ocean

Watch the waves in the ocean. The higher the wave goes, the deeper is the wake that follows it. One moment you are the wave, another moment you are the hollow wake that follows. Enjoy both--dont get addicted to one. Dont say: I would always like to be on the peak. It is not possible. Simply see the fact: it is not possible. It has never happened and it will never happen. It is simply impossible--not in the nature of things. Then what to do? Enjoy the peak while it lasts and then enjoy the valley when it comes. What is wrong with the valley? What is wrong with being low? It is a relaxation. A peak is an excitement, and nobody can exist continuously in an excitement.

we go alone

This has been said again and again, down through the ages. All the religious people have been saying this; 'We come alone into this world, we go alone.' All togetherness is illusory. The very idea of togetherness arises because we are alone, and the aloneness hurts. We want to drown our aloneness in relationship..... Thats why we become so much involved in love. Try to see the point. Ordinarily you think you have fallen in love with a woman or with a man because she is beautiful, he is beautiful. That is not the truth. The truth is just the opposite: you have fallen in love because you cannot be alone. You were going to fall. You were going to avoid yourself somehow or other. And there are people who dont fall in love with women or men--then they fall in love with money. They start moving into money or into a power trip, they become politicians. That too is avoiding your aloneness. If you watch man, if you watch yourself deeply, you will be surprised--all your activities can be reduced to one single source. The source is that you are afraid of your aloneness. Everything else is just an excuse. The real cause is that you find yourself very alone.

Saturday, 28 March 2015

दवा और विश्वास


अगर होम्योपैथी पर तुम्हें भरोसा है तो एलोपैथी तुम्हें ठीक न कर पाएगी। अगर एलोपैथी पर तुम्हें भरोसा है तो होम्योपैथी तुम्हें ठीक न कर पाएगी। तुम्हारा भरोसा ही तुम्हे ठीक करता है। इसीलिए तो राख भी दे देता है कोई तो कभी काम कर जाती है...

देखो, दुनिया में कितनी पैथीज हैं! एलोपैथी है, आयुर्वेद है, यूनानी है, होम्यिोपैथी है, नेचरोपैथी है, एक्युपंक्चर है, हजार..। कौन ठीक है? अब तो वैज्ञानिक भी संदिग्ध हो गए हैं कि कुछ साफ मामला नहीं है कौन ठीक है। क्योंकि सभी इलाजों से मरीज ठीक होते पाये जाते हैं। एलोपैथी से भी ठीक हो जाता है, आयुर्वेद से भी ठीक हो जाता है-मरीज बड़े अनूठे हैं, कोई एक सिद्धांत को मान कर नहीं चलते मालूम होता है, बीमारी भी बड़ी अजीब है-तो पश्चिम में बहुत से प्रयोग किए गये जिसको वे प्लेसबो कहते हैं। एक मरीज को एलोपैथी की दवा दी जाती है। उसी बीमारी के दूसरे मरीज को सिर्फ पानी दिया जाता है। और बताया नहीं जाता कि किसको दवा दी जा रही है, किसको पानी दिया जा रहा है। बड़ी हैरानी है, सत्तर परसेंट दोनों ठीक हो जाते हैं! पानी जिसको मिलता है, वह भी उतना ही ठीक हो जाता हैय जिसको दवा मिलती है, वह भी उतना ही ठीक हो जाता है।
तो ऐसा लगता है कि आदमी ठीक होना चाहता है इसलिए ठीक हो जाता है। और जिसका जिस पर भरोसा हो। अगर होमियोपैथी पर तुम्हें भरोसा है तो एलोपैथी तुम्हें ठीक न कर पाएगी। अगर एलोपैथी पर तुम्हें भरोसा है तो होमियोपैथी तुम्हें ठीक न कर पाएगी। तुम्हारा भरोसा ही तुम्हे ठीक करता है। इसीलिए तो राख भी दे देता है कोई तो कभी काम कर जाती है।
मैं एक साधु को जानता हूं। उन्होंने मुझे कहा। ग्रामीण हिस्से में रहते हैं। बड़े सरल आदमी हैं। बेपढ़ा-लिखा इलाका है। आदिवासी हैं सब आस-पास बस्तर में जहां उनका निवास है। बेपढ़े-लिखे लोग, जंगली लोग हैं। उन्होंने मुझे कहा कि एक दफे एक आदमी आया। लगता था कि वह क्षय रोग से बीमार है। उनको औषधि का थोड़ा ज्ञान है। तो उन्होंने कुछ दवा-अब वहां कुछ था नहीं लिखने कोय ईंट का एक टुकड़ा पड़ा थाय उस ईट के टुकड़े पर ही उन्होंने लिख दिया कि तुम जाकर बाजार से और ये दवा ले लेना।
वह आदमी गैर पढ़ा-लिखा। वह कुछ समझा नहीं कि क्या मामला है। वह घर गया, उसने समझा कि यह ईंट दवा है, उसको घोंट-घोंट कर वह पी गया। जब तीन महीने में बिल्कुल ठीक हो गया तब वह आया कि थोड़ी औषधि और दे देंय ऐसे तो मैं बिल्कुल ठीक हो गया। उन्होंने कहा, भई औषधि तो बाजार में मिलेगी। उसने कहा, बाजार जाने की क्या जरूरत? आपने दी थी वह काम कर गई। उन्होंने पूछा, क्या किया तुमने? उसने कहा कि हम तो घोल-घोल कर पी गए उसको और बिलकुल ठीक हो गए हैं। और बिल्कुल ठीक था, चंगा खड़ा था।
तो वह साधु मुझसे कह रहे थे कि फिर मैंने उचित न समझा कि वह ईंट थी और उसको पीने से टी.बी. ठीक नहीं होती। लेकिन जब ठीक हो ही गई तो अब कुछ कहना ठीक नहीं है, अब चुप ही रह जाना उचित है। और एक ईंट के टुकड़े पर वही मंत्र लिख कर दे दिया जो पहले लिखा था- वही दवाई का नाम। क्योंकि उसने कहा कि मंत्र लिख देना आप। ईंट तो हमारे गांव में भी है, लेकिन मंत्रसिक्त बात ही और है।
अब तो प्लेसबो पर सारी दुनिया में प्रयोग हुए हैं। और पाया गया है कि कोई भी दवा हो, सत्तर प्रतिशत मरीज तो ठीक होते ही हैं। इसलिए दवा का कोई बड़ा सवाल नहीं मालूम पड़ता।
क्या ज्ञान है? बुद्ध ने ज्ञान की परिभाषा की हैरू जिससे काम चल जाए। यह समझ में आती है परिभाषा। ज्ञान का यह अर्थ नहीं कि यह सत्य हैय ज्ञान का इतना ही अर्थ है कि जिससे काम चल जाए। वही ज्ञान है, कामचलाऊ ज्ञान है। जब काम न चले तो अज्ञान हो जाता है वही। जब काम ने चले तो अज्ञान हो जाता है वही। जब काम चला देता है तो ज्ञान हो जाता है वही।
डाक्टरों को पता है कि जब भी कोई नयी दवा निकलती है तो पहले तीन चार महीने बहुत काम करती है, फिर धीरे-धीरे असर कम होने लगता है। दवा वहींय असर क्यों कम होने लगता है? पहले जब दवा निकलती है, नयी दवा, तो तीन-चार महीने तो ऐसा काम करती है जादू का कि लगता है कि अब इससे बेहतर दवा इस बीमारी के लिए नहीं हो सकेगी। क्योंकि डॉक्टर भी नये के भरोसे से भरा होता हैय मरीज भी नयी दवा के भरोसे से भरा होता है। और जब मरीज शुरु में ठीक होते हैं तो दूसरे मरीजों में भी संक्रामक खबर फैल जाती है कि यह दवा काम करती है, लेकिन फिर धीरे-धीरे असर कम होने लगता है। दवा वहीय असर क्यों कम होने लगता है? पहले जब दवा निकलती है, नयी दवा, तो तीन-चार महीने तो ऐसा काम करती है जादू का कि लगता कि अब इससे बेहतर दवा इस बीमारी के लिए नहीं हो सकेगी। क्योंकि डॉक्टर भी नये के भरोसे से भरा होता हैय मरीज भी नयी दवा के भरोसे से भरा होता है। और जब मरीज शुरू में ठीक होते हैं तो दूसरे मरीजों में भी संक्रामक खबर फैल जाती है कि यह दवा काम करती है।
लेकिन फिर धीरे-धीरे उत्साह तो सभी चीजों में क्षीण हो जाता है। चार-छह महीने में डॉक्टर का उत्साह भी क्षीण हो जाता है। एकाध-दो मरीज ऐसे भी निकल आते हैं जिनको तुम ठीक ही नहीं कर सकते। उनके कारण दवा पर भरोसा गिर जाता है। जिद्दी तो सब जगह होते हैं। तीस परसेंट लोग जिद्दी होते हैं हर चीज में। बीमारी में सौ में से सत्तर आदमी जिद्दी नहीं होते, तीस आदमी जिद्दी होते हैं। वे किसी चीज में भरोसा नहीं उनका। वे पक्के नास्तिक है हर चीज में। हर चीज को वे इनकार की भाषा में देखते हैं। इस कारण उन पर कोई परिणाम नहीं होता। जैसे ही वे आदमी आ गये, और उन पर परिणाम न हुआ, मरीजों में भी खबर पहुंच जाती है कि अब काम न हो सकेगा। यह दवा भी गई। तब तत्क्षण दूसरी दवा खोजनी पड़ती है।
जो काम करे वह ज्ञान। मगर यह तो बड़ी कमजोर परिभाषा हुई। ज्ञान की परिभाषा तो होनी चाहिए-जो सदा है वही ज्ञान। लेकिन वैसा ज्ञान तो मनुष्य के पास नहीं है। वैसा ज्ञान तो तभी उपलब्ध होता है जब तुम अपनी मनुष्यता को भी छोड़ कर अतिक्रमण कर जाते हो। और तुम्हारी जानकारियां सिर्फ अज्ञान को छिपाने के उपाय है। उससे तुम जी लेते हो सुविधा से। लेकिन सुविधा से जी लेने का नाम जीवन रहस्य को जान लेना नहीं है।
यह दूसरी बात। और तीसरी बातय फिर हम सूत्र में प्रवेश करें।
जब भी तुम किसी चीज को जानते हो तो जानने का अर्थ ही होता है कि तुममें और जिसे तुम जान रहे हो एक फासला है। वहां तुम बैठो हो, मैं तुम्हें देख रहा हूँ। यहां मैं बैठा हूं, तुम मुझे देख रहे हो। अगर हम बहुत करीब आ जाएं तो देखना कम होने लगेगा। अगर हम अपने चेहरे बिल्कुल करीब कर लें, तो हम देख ही न पाएंगे। अगर हम दोनों की आंखें इतने करीब आ जाएं कि एक-दूसरे को छूने लगें, तो फिर कुछ भी न दिखाई पड़ेगा। ज्ञान के लिए फासला चाहिए, दूरी चाहिए। और यही अड़चन है। क्योंकि जिससे हम दूर हैं उसे हम जान कैसे सकेंगे? इंद्रियां उसे ही जान सकती हैं जो दूर है। और परमात्मा को, सत्य को जानने का एक ही उपाय है कि वह इतने पास आ जाए, इतने पास आ जाए कि हम और उसके बीच कोई भी रत्ती भर का फासला न रहे। तो परमात्मा को इंद्रियों से न जाना जा सकेगा। क्योंकि इंद्रियां तो दूर को ही जान सकती हैं। अतींद्रिय अनुभव से ही परमात्मा को जाना जा सकेगा। लेकिन तुम्हारा तो सार ज्ञान इंदियों का है। कुछ तुमने आंख से जाना है, कुछ हाथ से जाना है, कुछ कान से जाना है। लेकिन सब जाना है इंद्रियों से। इंद्रियां मन के द्वार हैं। जो-जो इंद्रियां जान कर लाती हैं, मन को दे देती हैं। मन ज्ञानी बन जाता है। मन के पीछे छिपी है तुम्हारी चेतना।
ओशो