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Thursday, 14 May 2015

कल्याणं करोति का नेत्र शिविर

स्याल चैरिटेबिल फाउण्डेशन ट्रस्ट मेरठ, श्री वाई.पी. कौशल, कल्याणं करोति मेरठ (पंजीकृत) एवं जिला दृष्टिड्हीनता निवारण समिति (बागपत)  के संयुक्त तत्वाधान में लैन्स की सुविधा के साथ निरूशुल्क नेत्र चिकित्सा शिविर का आयोजन महावीर सिंह पूर्व प्रधान का निवास, ग्राम- दरकावदा, ब्लाक बिनौली, (बागपत) के प्रांगण में आयोजित किया गया। जिसमें १४२ नेत्र रोगियों की जांच अभिषेक गुप्ता द्वारा की गयी, सभी नेत्र रोगियों का निरूशुल्क दवाईयां वितरित करके १५ को मोतियाबिन्द के आपरेशन हेतु चयन किया गया। सभी नेत्र रोगियों को मोतियाबिन्द के आपरेशन हेतु कल्याणं करोति, मेरठ द्वारा संचालित निरूशुल्क चिकित्सालय कैन्टोनमैन्ट जनरल अस्पताल, मेरठ छावनी में लाया गया। 
सभी ऑपरेशन डा0 सतीश नागर एवं डा0 पी0पी0 मित्तल द्वारा किये गये। चश्में के लिए २० नेत्र रोगियों की जांच श्री अभिषेक गुप्ता द्वारा की गयी और ११ को रियायती दर पर चश्में उपलब्ध कराने का निर्णय लिया गया। शिविर को सफल बनाने हेतु सर्व श्रीमतीध्श्री डी.के. अग्रवाल, ईश्वरचन्द गुप्ता, रामपाल सिंह, बिजेन्द्र उर्फ विनय, दिलबाग सिंह, महिपाल सिंह, मीता एवं विजय आदि ने विशेष योगदान दिया।
कैन्टोनमैन्ट जनरल अस्पताल, बेगमपुल, मेरठ   पिन-२५०००१
फोन रू (का0) ०१२१-२६६४७२२, (अध्यक्ष) ९४१२२०६२१०, (महामंत्री) ९४५६८३८४५६ 

Monday, 11 May 2015

‘राइट टू एजुकेशन एक्ट’ के स्थान पर नया ‘राइट टू क्वालिटी एजुकेशन फॉर ऑल एक्ट’ बनाये भारत सरकार

किसी भी देश का विकास उस देश के बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। भारत के संदर्भ में यह कहना गलत न होगा कि देश की कम गुणवत्ता वाली शिक्षा के कारण ही भारत ने आज उतनी प्रगति नहीं की, जितनी प्रगति अन्य देशों ने की। स्कूली शिक्षा के मामले में आज भारत चीन से 30 वर्ष पीछे है। भारत के माध्यमिक स्कूलों की जो नामांकन दर आज है वह चीन में आज से 30 वर्ष पूर्व हुआ करती थी। इसके साथ ही बच्चों के विद्वता प्रदर्शन के संदर्भ में भी भारत चीन से काफी पीछे है। इन्टरनेशनल पीसा स्टैन्डर्डराइज्ड एचीवमेंट टेस्ट 2009 में शामिल 74 देशों में चीन को जहां प्रथम स्थान मिला था वहीं भारत को 73वां स्थान मिला था। अतरू यह समय की मांग है कि अपनी शिक्षा पद्धति को विश्व स्तरीय बनाने के लिए भारत सरकार को श्राइट टू एजुकेशन्य की जगह नया श्राइट टू क्वालिटी एजुकेशन फार ऑल एक्ट्य बनाकर सारे देश में लागू करना होगा।  
स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए राइट टू एजुकेशन एक्ट (आरटीई) 2009 में 3 बड़े तरीके को अपनाया गया है। पहला, निजी स्कूलों की मान्यता के लिए बुनियादी ढांचे और अन्य निर्धारित मानक को पूरा करना (धारा 19), दूसरा, सभी निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्लूएस) के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीट आरक्षित करना (धारा 12) तथा तीसरा, सरकारी स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता को तय करना व कक्षा में छात्र-शिक्षक अनुपात को कम करते हुए अधिकतम अनुपात 30रू1 निर्धारित करना। पर व्यवहारिक रूप में शिक्षा में गुणवत्ता लाने के ये तरीके जहां एक ओर अप्रमाणिक हैं वहीं दूसरी ओर दोषपूर्ण भी लगते हैं। इस सम्बन्ध में ऐरिक हानुशेक द्वारा किये गये अध्ययन को देखा जा सकता है जिसमें 400 अध्ययनों के आधार पर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि छात्र-शिक्षक अनुपात को कम करने, अध्यापकों की योग्यताओं को बढ़ाने व स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाने का छात्रों की पढ़ाई-लिखाई से कोई सुसंगत सम्बन्ध नहीं है। 
इसके साथ ही राइट टू एजुकेशन की धारा 12 व 19 में शिक्षा में गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए किये गये प्रावधानों को लागू करने में राज्य सरकारों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा है। उन राज्यों में जहां पर शिक्षा के लिए उत्तरदायी संस्थाओं के द्वारा आरटीआई एक्ट में निजी स्कूलों की मान्यता के संबंध में दिये गये निर्धारित मानकों (स्कूल के कमरों के आकार, छात्र-शिक्षक अनुपात, फर्नीचर, स्वयं का भवन होने की अनिवार्यता, पंजीकृत संस्था होना, लाभ के बिना स्कूल को चलाने आदि) का अनुपालन कठोरता के साथ किया गया। इसके चलते बहुत कम फीस लेने वाले निजी स्कूलों के इन मानकों को पूरा न कर पाने की स्थिति में बड़ी संख्या में बंद करने के आदेश दिये गये, लेकिन इन आदेशों को कई कानूनी चुनौतियों और अदालत के स्थगन आदेश का सामना करना पड़ा है। सरकारी स्कूलों का एक बड़ा अनुपात स्वयं ही शिक्षा अधिकार अधिनियम के भौतिक बुनियादी ढांचों के नियमों पर खरा नहीं उतरता। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कुछ राज्य सरकारों (गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र) ने स्कूलों की मान्यता संबंधी मानक में, भौतिक बुनियादी ढांचों के मानदंडों के अनुपालन की अनिवार्यता के साथ ही, छात्रों के विद्वता प्रदर्शन स्तर को भी एक महत्वपूर्ण मानक मे रूप में शामिल किया है। 
इसके अलावा, भारत में बेसिक शिक्षा प्रदान करने में सरकार निजी स्कूलों पर काफी निर्भर है क्योंकि निजी स्कूल भारत के ग्रामीण इलाकों के 31 प्रतिशत (उत्तर प्रदेश में 52 प्रतिशत, हरियाणा में 54 प्रतिशत और केरल में 62 प्रतिशत) और कई अन्य राज्यों में 90 प्रतिशत या उसके ऊपर शहरी बच्चों को शिक्षा दे रहें हैं। इन परिस्थितियों में शिक्षा अधिकार अधिनियम के मान्यता संबंधी मानकों को पूरा करने में असमर्थ रहने पर यदि कई निजी स्कूलों को बंद कर दिया गया तो सरकारी स्कूलों की सीटों को बढ़ाने में अत्यधिक वित्तीय बोझ (जहां पर प्रत्येक छात्र पर 20 गुना अधिक खर्च किया जाता है, क्योंकि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को ग्रामीण क्षेत्रों के निजी स्कूलों की तुलना में 20 गुना ज्यादा वेतन मिलता है) को सहन करना असम्भव हो जायेगा। इसलिए मेरा सुझाव है कि गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र की तरह एक संशोधित शिक्षा अधिकार अधिनियम को लागू किया जाये, जिसमें स्कूलों की मान्यता के लिए निर्धारित मानक के अन्तर्गत शिक्षा की गुणवत्ता व स्कूल के छात्रों के विद्वता प्रदर्शन पर सबसे अधिक महत्व देना चाहिए।
राइट टू एजुकेशन एक्ट की धारा 12 कहती है कि राज्य निजी स्कूलों के खर्च की भरपाई इस प्रकार करेगारू (अ) स्कूल की वास्तविक फीस या (ब) सरकारी स्कूल के प्रति छात्र खर्च, इन दोनों में से जो भी कम हो। हम इस धारा के साथ सरकार को होने वाली परेशानी को समझने के लिए उत्तर प्रदेश का उदाहरण ले सकते हैं। उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूल के प्रत्येक छात्र पर 450 रूपये का खर्च अनुमानित किया गया है। (हालांकि कुछ अनुमानों के अनुसार यह 2000 रूपये प्रतिमाह है)। इसके विपरीत ग्रामीण क्षेत्रों के निजी स्कूलों की औसत फीस 90 रूपये प्रतिमाह होती है जो कि सरकारी स्कूलों के प्रत्येक बच्चे के खर्च के लिए अनुमानित 450 रूपये का 1ध्5वां भाग ही है। इस पांच गुणा अंतर की वजह से कम फीस लेने वाले प्राइवेट स्कूल जोकि उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में है, को यह प्रलोभन देते हैं कि वे बढ़ा-चढ़ा कर फीस बताये या बढ़ा-चढ़ाकर दाखिला दिलायें। कागज पर नये प्राइवेट स्कूल दिखायें या 25 प्रतिशत से अधिक आर्थिक रुप से कमजोर बच्चे ले लें। भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले इस तरह के प्रलोभन की वजह से सरकार को निजी स्कूल की भरपाई हेतु सरकारी बजट की व्यवस्था करने में कठिनाई आती है।
शहर के अधिक फीस लेने वाले निजी स्कूलों की असंतुष्टता एक मुख्य कारण यह है कि प्रतिपूर्ति की अधिकतम सीमा (शहर के उच्च फीस वाले निजी स्कूल के लिए) बहुत कम है, जो कि उत्तर प्रदेश में प्रतिमाह 450 रूपये, उत्तराखण्ड में 860 रूपये, दिल्ली में 1190 रूपये निर्धारित है। सरकार को चाहिए कि प्रत्येक बच्चे पर आने वाले इस खर्च को निर्धारित करने के लिए पारदर्शी गणना करें। कुछ अनुमानों के अनुसार उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों के प्रत्येक प्राइमरी बच्चे पर खर्च 2000 रूपये व उच्च प्राथमिक के प्रत्येक बच्चे पर 2500 रूपये का खर्च अनुमानित है। निजी स्कूलों को इस बात का भी भय होता है कि उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर 25 प्रतिशत बच्चों के लिए स्कूल की वर्दी, किताबें, स्टेशनरी, कम्प्यूटर, शैक्षिक यात्रा व फर्नीचर आदि की व्यवस्था पर भी अतिरिक्त खर्च वहन करना पड़ेगा। इसके साथ ही एक अन्य कारण के रूप में प्रतिपूर्ति की कठिन प्रक्रिया से भ्रष्ट्राचार व देर से भुगतान मिलने की सम्भावना है। उन राज्यों में जहां धारा 12 को लागू हुए 2-3 वर्ष हो चुके है और वहां देर से प्रतिपूर्ति करने पर पीडि़त निजी स्कूलों को जुर्माने के रूप में अतिरिक्त भुगतान की कोई व्यवस्था नहीं है, निजी स्कूल और भी अधिक डरे हुए हैं। 
निष्कषर्रू
श्राइट टू एजुकेशन एक्ट्य जो कि सभी को एक समान श्गुणवत्तापूर्ण शिक्षा्य का अवसर नहीं प्रदान करता है, को एक नये श्राइट टू क्वालिटी एजुकेशन फॅार ऑल्य (सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार अधिनियम) से विस्थापित कर दिया जाये। यह कहाँ का न्याय होगा कि हम आर्थिक रूप से कमजोर केवल 25 प्रतिशत बच्चों को ही निजी स्कूलों में दाखिला दिलाकर उन्हें गुणात्मक शिक्षा प्रदान करने का अवसर प्रदान करें? वास्तव में यह हमारे संविधान के अनुच्छेद 21(ए) की मूल भावना के भी विपरीत होगा। इसलिए सरकार को चाहिए कि वे आर्थिक रूप से कमजोर 25 प्रतिशत बच्चों की पढ़ाई के लिए निजी स्कूलों को प्रतिपूर्ति के रूप में दी जाने वाली धनराशि को देने की बजाय उस धनराशि का उपयोग भारत के कोने-कोने में सरकारी स्कूलों की स्थापना एवं शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने में करे। इससे केवल 25 प्रतिशत भाग्यशाली बच्चों के स्थान पर 100 प्रतिशत बच्चों को अपना भाग्य बनाने का एक समान अवसर प्राप्त होगा। इसके लिए सरकार को गाँवों के साथ ही शहरों में भी सरकारी स्कूलों की संख्या को बढ़ाते हुए उसमें गुणात्मक शिक्षा देने की व्यवस्था सुनिश्चित करना होगा। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता को सुधारने का मतलब यह नहीं है कि केवल भौतिक सुविधाओं की उपलब्धि हो (जैसा कि आर.टी.आई. एक्ट में बताया गया है) बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि शिक्षक की योग्यता के साथ ही बच्चों के विद्वता प्रदर्शन के प्रति भी उनकी जबावदेही तय हो। इसलिए आज हमें एक ऐसे एक्ट की आवश्यकता है जो कि स्कूलों की गुणवत्ता को बढ़ाने पर केन्द्रित हो। जिसके अन्तर्गत यह सुनिश्चित किया जाये कि अच्छा वेतन पाने वाले सरकारी शिक्षक नियमित रुप से स्कूल आये, अपने शैक्षिक कार्य को पूरा समय दे, बच्चों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए सर्वश्रेष्ठ कदम उठाये, जिससे बच्चों की शैक्षिक विद्वता के अच्छे परिणाम सामने आये व भारत की युवा पीढ़ी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में और भी अधिक सक्षम बनें।
- प्रोफेसर गीता किंग्डन, 
चेयर ऑफ एजुकेशन इकोनोमिक्स एण्ड इन्टरनेशनल डेवलपमेन्ट, 
यू.सी.एल. इन्स्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन, यूनिवर्सिटी ऑफ लन्दन

रेल यात्रियों को और अधिक सुविधाओं का प्रयास

रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा के कथनानुसार रेलवे में यात्री सुविधाएं और बढाने का काम प्राथमिकता के आधार पर किया जायेगा। इसके लिये तेजी से जरुरी प्रक्रियाएं चल रही है इसका यात्रियों को जल्दी ही असर दिखाई देगा।
१. जिन रेलगडियों में २४ से कम कोच लगाये जा रहे है उनमें साधारण श्रेणी के दो कोच बढाये जायेगे जिस से बिना आरक्षण लिये लोगों की रेल यात्रा आसान हो सके।
२. वाराणी के मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन से नई दिल्ली तक नई रेलगाड़ी चलाई गई है जिसका नं0 १२५८१ है। यह यात्रा मार्ग में ज्ञानपुर रोड़, इलाहाबाद ज0, कानपुर सैन्ट्रल तथा गाजियाबाद जं0 पर रुकेगी। इसमें सामान्य 
श्रेणी के ६, शयनयान श्रेणी के आठ, ए.सी. ढ्ढढ्ढढ्ढ के तीन, ए.सी. ढ्ढढ्ढ के एक, प्रथम सह द्वितीय ए.सी. श्रेणी का एक तथा एस एल आर के दो कोचो सहित कुल २१ कोच लगाये जायेंगे।
३. मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन के सौदर्यीकरण के लिये ३० करोड़ रु. आंवटित किये गये है जिससे आने वाले समय में यहां यात्रियों को और बेहतर सुविधाएं मिल सकेगी। इसके अलावा वाराणसी  सिटी, सारनाथ, लोहटा रेलवे स्टेशन के विकास हेतु अनेक परियोजनाएं स्वीकृत की गई।
४. लखनऊ-छपरा वायां वाराणसी साप्ताहिक एक्सप्रेस ट्रेन नम्बर- १५०५४  लखनऊ से सोमवार-बुधवार, शुक्रवार रात्रि ९ बजे चलकर अगले दिन मध्यान्ह १२.१५ पर छपरा पहुंचेगी तथा छपरा ट्रेन नम्बर- १५०५३ छपरा से मंगलवार, वीरवार एवं शनिवार रात्रि ७.३५ पर प्रस्थान कर अगले दिन सुबह ९.०० बजे लखनऊ पहुंचेगी। यात्रा विराम बादशाह नगर, गोमती नगर, फैजाबाद, अयोध्या, शाहगंज, जौनपुर, वाराणसी, ओडिहार, गाजीपुर सिटी एवं बलिया है। इसमें कुल १८ कोच है। इसमें साधारण श्रेणी ६, शयनयान ७, ए.सी. ढ्ढढ्ढढ्ढ २, ए.सी. ढ्ढढ्ढ १ तथा एस.एल.आर. के २ कोच होगे।   

Wednesday, 6 May 2015

बैंक हड़ताल से आमजन चिंतित वेतन सुविधा में केन्द्रकर्मी बराबर?


मुम्बई (महाराष्टड्ढ्र) केन्द्र सरकार व बैकों के संगठन आईबीए द्वारा यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन (यूएफबीयू) की बैक कार्मिकों की वेतन व अन्य समस्याओं के समाधान में ढुलमुल रुप अपनाने से बढते टकराव के कारण २५ से २८ फरवरी तक चार दिवसीय हड़ताल पर उद्यम व आम जन में चिंता बढ़ गई है। वित्तीय वर्ष १४-१५ के समाप्ति के पूर्व माह में बैकों की बंदी अर्थव्यवस्था को गड़बडा देगी।
फोरम के अध्यक्ष के के नायर कहते है कि बैंक कार्मियों के बीच दरार पैदा करने के प्रयास सफल न होगे बल्कि इस प्रयासों से बैंककर्मी अधिक सबल होकर अपनी समस्याओं को सरकार या आईबीए को न ही बल्कि जनता के समक्ष रखेगे। जनता की शाक्ति हो उन्हे समझाएंगी।
बैंक आफ बड़ौदा के के एक जिम्मेदार वरिष्ठ प्रबन्धक संजय अग्रवाल एवं इसी बैंक के निदेशक प्रेम मक्कड़ कहते है कि बैंक देश की अर्थव्यवस्था की रीढ है फिर भी इस क्षेत्र की उपेक्षा को बैंक कर्मी को केन्द्र सरकार के कार्मिकों से कम वेतन पर जिम्मेदारियां अधिक यह अन्तर ४०-४५ प्रतिशत कम है। अखिल भारतीय बैंक अधिकारी संघ के अध्यक्ष एस एस सिसौदिया ने उम्मीद जाहिर की कि सरकार व आईबीए द्वारा २१ से २४ जनवरी की हड़ताल को टालने के लिए जो सकारात्मकता दिखाई थी उसे ढुलमुलता को समय रहते खत्म किया जायेगा।
देश में सरकार द्वारा जो विकास की अपेक्षा की है उसे लाने मे बैंक भूमिका अग्रणी है वह बैंक कार्मियों की अपने केन्द्र कर्मी के समकक्षता लाना होगा। यूं जिम्मेदारी देखते हुए अपर स्तर सुविधाओं में मिलना चाहिए। 
सातंवा वेतन आयोग पर केन्द्र चुप्पी से असमजस्य
पूर्ववती भारत सरकार द्वारा गत वर्ष सातंवा वेतन आयोग गठन की घोषणा की गई थी, वर्तमान केन्द्र सरकार की इस पर चुप्पी ने केन्द्र व राज्य कर्मचारियों मे बैचनी बढा रही है और इनके स्तर पर भी आन्दोलन की तैयारी का समाचार है। बैंक कार्मिकों के वेतन व केन्द्र सरकार के कार्मिक वेतन मानों में अन्तर की दिवार न बढे इसके लिए जरुरी है कि बैंक व केन्द्र कार्मिकों के वेतन पुनरीक्षण का कार्य साथ हो या फिर केन्द्र सरकार वेतन वृद्धि व सुविधाओं के निर्धारण के मापदण्ड नियत करें, तब ही प्रधानमन्त्री का सबका साथ सबका विकास का आवाहन रास्ता पा सकता है,यह विचार श्रमशिखर के पाठक एवं चितंक नई दिल्ली के प्रमुख व्यवसायी, चितंक श्री रवि प्रकाश मित्तल व्यक्त किए। श्री मित्तल समय-समय पर केन्द्र सरकार स्तर पर अपने विचारों से अवगत कराते रहते है। उन्होने बैंक, बिजली व सरकारी कार्मिकों के आन्दोलनों की स्थिति लाये जाने को बेहतर सरकार की स्थिति में नही लाता। हड़ताल की स्थिति आपसी विश्वास को परिलक्षित करती है, जबकि काम कराने व करने वाले के बीच सबसे अहम है।
श्रमशिखर से बातचीत में श्रमशिखर के हमारों पाठकों ने बैंक या केन्द्र कर्मचारियों की समस्याओं बनें रह कर उन्हे टालने की प्रकृति या फिर निजी क्षेत्र को समस्याओं के समाधान की बढती प्रकृति को अहितकर बताया। सरकारी व निजी के प्रतिस्पर्धा में रहना देश हित में है।

Monday, 4 May 2015

मेरठ मेडिकल कॉलेज में स्थायी प्रधानाचार्य

मेरठ। प्रदेश के कुछ मेडिकल कॉलेजों में मेडिकल काउंसिल आफ इडिया के द्वारा नियत मानकों के पूरा न होने तथा प्रदेश सरकार प्रमुख उपलब्धियों में एक सहारनपुर मेडिकल कॉलेज का अभी तक विघिवत कार्य की शुरुआत न होने व समूह श्ग्य की भर्तियों को कार्य न होने पर मुख्यमन्त्री की नाराजगी प्रदेश के स्वास्थय यहा निदेशक  शिक्षा डा0 के.के. गुप्ता को भारी पड़ी। डा0 गुप्ता को इस पद से हटा कर वापस मेरठ मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य के दायित्व निर्वहन के लिए भेजा गया है। इस वापसी को डा0 गुप्ता की पदावत कहां जा रहा है। इसके विपरीत इसे उनकी इच्छा भी कह रहे है ताकि वह अपनी गडबड निजी प्रैक्टिस को रास्ते पर ला सके।
डा0 गुप्ता द्वारा तत्काल प्रधानाचार्य का दायित्व सम्भाल लिया गया। डा0 गुप्ता के स्थान पर स्वास्थय महानिदेशक शिक्षा पद मुख्यमन्त्री द्वारा अपने निर्वाचन क्षेत्र कन्नौज के मेडिकल कॉलेज प्रधानाचार्य वी.एन. त्रिपाठी को दिया गया ताकि प्रदेश में बढ़ रहे स्वाइन फ्लू की चुनौती में यह बदलाव से असफलता के असर को प्रभावहीन करने का प्रयास किया।
डा0 गुप्ता को वापस मेरठ मेडिकल कॉलेज प्रधानाचार्य का दायित्व देने के लिए दलील इस कॉलेज में एडोक्रायोनोलॉजी विभाग होने व उसके दायित्व को के स्थान पर गत ढाई वर्ष से व्यवस्था न होने पर एमसीआई द्वारा आपत्ति करना बताया जा रहा है। डॉ0 गुप्ता अगले वर्ष सेवानिवृत्ति पूरी कर रहे है। इसके बाद यह शिक्षण कार्य सरकार की चिकित्सा शिक्षक उम्र बढाने के लाभ के अन्तर्गत कार्य कर सकेगें, परन्तु प्रधानाचार्य नियमित की जरुरत अगले वर्ष होगी। इसके लिए स्थाई प्रधानाचार्य खोज अभी से शुरु होगी संशय है।
सद्भावना समिति वरिष्ठ नागरिक फोरम ने अपेक्षा कि है लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज मेरठ को भविष्य का स्थाई प्रधानाचार्य समय रहते दिए जाने की व्यवस्था प्रदेश सरकार करेगी। इस मेडिकल कॉलेज में डा0 उषा शर्मा के बाद से कुछ अवधि छोड़ अस्थाई प्रधानाचार्य लम्बे अन्तराल तक रहने की व्यवस्था में कॉलेज में गड़बडियों से इसकी शाख गिरी है। अस्थाई प्रधानाचार्य पद पर बनें रहने की कुछ लोगो की चाह से जबरदस्त गुटबाजी चल रही है। जिसमें सरकार द्वारा नई-नई व्यवस्थाओं के किए जाने के बाद भी कॉलेज छात्रों व जनता को उनका लाभ दिलाने में पिछड़ा है। स्वयं मेडिकल छात्र व जूनियरों में अनुशासनहीनता बढ रही है। कॉलेज के पास जिस तरह अतिक्रमण बढ रहा है। वह एक दिन इस कॉलेज के ्रप्रर्यावरण व कानून व्यवस्था के लिए भयकर चुनौती होगा।
व्यवस्था तो एॅडोक्रायोलांजी शिक्षण व चिकित्सा
डा0 गुप्ता की मेरठ वापसी का एक कारण प्रदेश में आगरा के बाद एॅडोक्रायोलाजी चिकित्सा व शिक्षण विषय की व्यवस्था होने व इसके शिक्षण कराने व इस मेडिकल कॉलेज में इसकी चिकित्सा हेतु चिकित्सक की व्यवस्था न होना भी कहा गया है। इस विषय के अध्ययन कर चुके छात्र चिकित्सकों व पढाई करने वाले छात्र चिकित्सकों का कहना है कि इस चिकित्सा अध्ययन व विभाग को नई व्यवस्था पर अभी से ध्यान देना होगा ताकि निकट भविष्य में इनकी सेवानिवृति व अपनी नीजि प्रैक्टिस की चाह के अवरोध से निजात मिल सके।

Sunday, 3 May 2015

मच्छरों से छुटकारा दिलाएंगे पौधे

घर के आसपास लगे कुछ पौधे ही मच्छर के बचाव के लिए सुरक्षा कवच का काम कर सकते हैं। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च के हाल ही प्रकाशित शोध पत्र में इस बात खुलासा किया है। इसमें पाया गया है कि मच्छरों से बचने के लिए किए गए किसी भी रासयनिक छिड़काव की जगह घर के किचन गार्डन में लगे कुछ जाने-माने पौधे ही मच्छरों से मुकाबला करने के लिए काफी है। सदाबहार, सांची, गारडेनिया जैसे पौधों को हम केवल उनके खूबसूरत फूलों की वजह से जानते हैं। आयुर्वेद में कभी इनका प्रयोग डायबिटिज या फिर ब्लडप्रेशर को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है, लेकिन पहली बार इनकों मच्छरों के लार्वा खत्म करने के लिए भी बेहतर माना गया है।
शोधकर्ता अनुपम घोष के अनुसार देश में हर साल मच्छर जनित बीमारियों के बढ़ते आंकड़ों को देखते हुए इससे बचाव के लिए नये विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए। अब तक किए गए अध्ययन में यह भी देखा  गया है कि लंबे समय तक स्प्रे या फिर मच्छररोधी छिड़काव सेहत के लिए ठीक नहीं, जबकि वेक्टर बोर्न बीमारी या मच्छर जनित बीमारियों के लिए सरकार अब तक कोई कारगर वैक्सीन भी नहीं बना पाई है। यही कारण है कि शुरू से ही मच्छरों से बचाव पर अधिक ध्यान दिया जाता है। इसी क्रम में बायोलॉजिकल स्प्रे में कुछ पौधों की पत्तियों के मिश्रण को मच्छरों को दूर भगाया जा सकता है। शोध के आधार पर अब पौधों से तैयार स्प्रे को नियमित मच्छर रोधी कार्यक्रम में शामिल करने की पैरवी की जा रही है। अहम यह है कि इन पौधों को आसानी से घर पर लगाया जा सकता है।
कैसे हुआ अध्ययन
इस बावत भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और जूलॉजी विभाग क्रिश्चियन कॉलेज बाकुरा की टीम द्वारा अध्ययन किया गया। अध्ययन में क्यूलेक्स प्रजाति के १०० से अधिक मच्छरों के लार्वा को स्वच्छ पानी में रखा गया। शोध टीम में शामिल डॉ. अनुपम घोष ने बताया कि लार्वा को बढने के लिए कुछ अप्राकृतिक खाद्य सामग्री भी पानी में डाली गई। जिसमें यीस्ट पाउडर और कुत्तों को दिए जाने वाले बिस्कुट शामिल थे। लार्वा को ३१ से ३३ डिग्री सेल्सियस के तापमान पर एक हफ्ते तक रचाा गया। इससे पहले यीस्ट पॉउडर में चिकित्सीय पौधों को पत्ती से तैयार मिश्रण को मिलाया गया।

कल्याणं करोति का नेत्र शिविर

स्व0 पं0 हरस्वरूप शर्मा जी की पुण्य स्मृति में, तन्मय ट्रस्ट, कल्याणं करोति मेरठ (पंजीकृत) एवं जिला दृष्टिड्ढहीनता निवारण समिति (मेरठ)  के संयुक्त तत्वाधान में लैन्स की सुविधा के साथ निरूशुल्क नेत्र चिकित्सा शिविर का आयोजन राधा गोविन्द पब्लिक स्कूल, कॉपरेटिव सोसाईटी के पीछे, खरखौदा, (मेरठ) के प्रांगण में आयोजित किया गया। जिसमें १५५ नेत्र रोगियों की जांच डा0 पी.पी. मित्तल द्वारा की गयी, सभी नेत्र रोगियों का निरूशुल्क दवाईयां वितरित करके १४ के मोतियाबिन्द के आपरेशन हेतु चयन किया गया। सभी नेत्र रोगियों को मोतियाबिन्द के आपरेशन हेतु कल्याणं करोति, मेरठ द्वारा संचालित निरूशुल्क नेत्र चिकित्सालय कैन्टोनमैन्ट जनरल अस्पताल, मेरठ छावनी में लाया गया।
सभी आपरेशन डा0 पी0पी0 मित्तल द्वारा किये गये। चश्में के लिए ६२ नेत्र रोगियों की जांच श्री संजय कुमार द्वारा की गयी और २३ को रियायती दर पर चश्में उपलब्ध कराने का निर्णय लिया गया। शिविर को सफल बनाने हेतु सर्व श्रीमतीध्श्री तिलकराज अरोड़ा, ईश्वरचन्द गुप्ता, डा0 (कु0) सरोजनी वासन, ब्रहमदत्त शर्मा, शैलजा दत्त, प्रशान्त शर्मा,   मीता एवं विजय आदि ने विशेष योगदान दिया।
कैन्टोनमैन्ट जनरल अस्पताल, बेगमपुल, मेरठ   पिन-२५०००१
फोन: (का0) ०१२१-२६६४७२२, (अध्यक्ष) ९४१२२०६२१०, (महामंत्री) ९४५६८३८४५६ म्उंपसरू ााउउममतनज/हउंपसण्बवउ

रेल यात्रा में तत्काल मदद हैल्प

ट्रेनों में सफर के दौरान सुरक्षा संबंधी खतरों से बचने और तुरन्त मदद पाने के लिए पीआरएस सिस्टम से जारी होने वाले सभी रेल टिकटों पर निम्नलिखित तत्काल नंबर और सूचनाएं प्रिन्ट की जाएंगीरू- १. आपात स्थिति में संपर्क किए जाने वाले व्यक्ति का नाम व फोन नंबर दर्ज करें। २. खतरे की स्थिति उत्पन्न हेाने पर रेलवे सुरक्षा हैल्पलाइन नंबर डायल करें रू- तत्काल मदद नं0 रू १८२

मिलावटखोरों की शिकायत करें

मेरठ मंडल के आयुक्त आलोक सिन्हा ने चिकित्सा-स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा आदि विभागों के अधिकारियों को कड़ा निर्देश दिया है कि वे होली तक मिलावटखोर मैडिकल स्टोरों, दूध की डेयरियों, हलवाइयों के खिलाफ ऐसा शिकंजा कसें कि ये लोग मिलावट न कर पाएं। साथ ही यह भी निर्देश दिया कि निम्न हैल्पलाइन नंबर सभी विकास खंडों और सरकारी भवनों पर अंकित करा दें, ताकि जनता मिलावट खोरों की शिकायत कर सके रू- १८०० १८० ५५३३

स्वच्छ भारत अभियान, चढ़े परवान

प्रधानमंत्री के ‘स्वच्छ भारत’ अभियान से स्वयं को बड़ा प्रतिष्ठित व ख्याति प्राप्त समझने वाले लोग भी जुडने की घोषणा करते आ रहे है। क्या अपना दोहरा चरित्र जीने वाले इन लोगो से पूछा गया कि वे कहां-कहां सफाई-अभियान में लोगो को जागरूक करने गये। एक दिन हाथ में झाडू लेकर सफाई नही हो सकती। लोगो को समझाये कि वे सफाई की आदत बनाये यहां तो लोग अपने घर को साफ कर कूड़ा सडक पर बिखेर देते है। नाली में थूकने के बजाय सडक के बीच में थूकना अपनी शान समझते है। पान व गुटका खाकर लोग सार्वजनिक स्थलो की दीवारो पर आधुनिक पेन्टिंग बना देते है। ऐसे लेागो को कौन समझा सकता है, कानून का पालन करवा सकता है सफाई के लिए सभी को सचेत होना होगा। पश्चिम के लोग खुद ही पहल करते है। उनके कानून भी सख्त है पकड़े गये तो भारी जुर्माना अदा करना ही पड़ेगा।
पॉलीथीन सफाई का सबसे बड़ा दुश्मन हैं। यह पर्यावरण के लिए घातक है। उसी के प्रयोग से नाली, सीवर तो चोक होते ही है। यह नदियो के लिए भी गंभीर समस्या है। पॉलीथीन का बढ़ता प्रयोग हमारी धरा की जल शोषण की क्षमता क्षीण कर रहा है। जिससे कृषि जगत पर भी एक अदृश्य काला साया मंडरा रहा है। नगरों में ही नही देहातो में भी हवा में उड़ता, बिखरा पॉलीथीन इस बात को बार-बार समझा रहा है कि मेरा उपयोग बड़ा घातक है इसका प्रयोग रोको किन्तु इस ओर न तो हम देखना चाहते है और न ही कुछ करना चाहते है। आज जिस थोड़ी सुविधा के लिए हम पोलीथीन की पन्नियों का प्रयोग करते है यही सुविधा हमारे बच्चों के लिए घातक है। स्वच्छता अभियान सफल बनाने के लिये हम दृढ संकल्प ले।
 यमुना को प्रदूषण मुक्त करने हेतु राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एन.जी.टी.) की सार्थक पहल सचमुच प्रशसनीय है।
अब यमुना नदी में कूड़ा या धार्मिक सामग्री डालते पाये जाने पर ५०० रु. का जुर्माना देना होगा तथा निर्माण सामग्री फैकना भी प्रतिबंधित होगा ऐसा करने वालों पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण के अध्यक्ष न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार ने ५०,००० रु. का जुर्माना लगाने का निर्देश यमुना को प्रदूषण मुक्त करने हेतेु सार्थक पहल है। 

Wednesday, 29 April 2015

राजस्थान में खनन माफिया चट कर गए पहाड़ भी

राजस्थान के मेवात क्षेत्र में खनन माफियाओं का खौफ किस कदर बढ़ता जा रहा है इसकी बानगी तब देखने को मिली जब प्रदेश के खुफिया विभाग के अतिरिक्त महानिदेशक (एडीजी) उत्कल रंजन साहू ने अलवर के एसपी विकास कुमार को हाल ही चिट्ठी लिखकर खनन माफियाओं से सतर्क रहने को कहा. चिट्ठी में कहा गया था, ''अलवर में अपराधियों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान से खनन माफियाओं और मेव कट्टर पंथियों में नाराजगी है. उनसे आपकी सुरक्षा को खतरा हो सकता है. '' दरअसल कुमार ने अलवर में अवैध खनन के खिलाफ सघन अभियान चला रखा है. जनवरी 2014 से अब तक उन्होंने अवैध खनन के खिलाफ एक हजार से अधिक कार्रवाई की और सात सौ से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है. फिर भी अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली जिले में अवैध खनन का काला कारोबार थमने का नाम नहीं ले रहा है. यहां खनन माफियाओं की आपस में या पुलिस से आए दिन हिंसक झड़पें होने लगी हैं.
बीती 2 अप्रैल को भरतपुर जिले के पहाड़ी थाना क्षेत्र के नागल क्रेसर जोन में खनन माफियाओं के दो गुटों में हुई झड़प में दो लोगों की मौत हो गई थी जबकि पांच अन्य घायल हो गए थे. इस घटना के कुछ ही दिन पहले, 18 मार्च को करौली जिले के मासलपुर थाना क्षेत्र में खनन रोकने गई पुलिस पर खनन माफियाओं ने हमला कर दिया था. यहां से पुलिस ने पत्थरों से भरा एक ट्रक और खनन मशीन जब्त की थी. अवैध खनन के मुख्य केंद्र अलवर में तीन साल में खनन माफिया ने पचास से ज्यादा बार पुलिस और वन विभाग के दल पर हमला किया है. 16 फरवरी को अलवर के ही राजगढ़ क्षेत्र में अवैध खनन की रोकथाम के लिए चलाए जा रहे ऑपरेशन ग्रीन अभियान के दौरान झोपड़ी नांगल गांव के पास अवैध खनन कर पत्थर ले जा रहे दो ट्रैक्टर चालकों ने वन विभाग की सरकारी गाड़ी को पचास फुट तक घसीट दिया था.

सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद बेहद हिंसक हो चुके खनन माफिया अलवर स्थित अरावली की पहाडिय़ों में अवैध खनन लगातार जारी रखे हुए हैं. अवैध खनन की वजह से ही भिवाड़ी, टपूकड़ा, तिजारा और किशनगढ़बास क्षेत्र से पहाडिय़ां गायब होती जा रही हैं. अलवर में डीएफओ रह चुके पी.काथिरवेल के आकलन के मुताबिक भिवाड़ी क्षेत्र में खनन माफियाओं ने बीते 15 साल में 50 हजार करोड़ रु. का अवैध खनन किया है और खनन इसी रफ्तार से जारी रहा तो इस क्षेत्र के पहाड़ तीन साल में खत्म हो जाएंगे. वन विभाग की ही एक रिपोर्ट बताती है कि टपूकड़ा क्षेत्र के चूहड़पुर, उधनवास, उलावट, ग्वालदा, इंदौर, सारे कलां, सारे खुर्द, खोहरी कलां, मायापुर, छापुर, नाखनौल, कहरानी, बनबन, झिवाणा, निंबाड़ी में हरियाणा के माफिया भी व्यापक स्तर पर फैले हुए हैं. और यहां के करीब एक हजार हैक्टेयर इलाके में पहाड़ खत्म हो चुके हैं. यहां पहाड़ों के खत्म होने के कगार पर पहुंचने के बाद माफियाओं ने तिजारा और किशनगढ़बास में अपना कारोबार फैलाया और नीमली, बाघोर, देवता, मांछा क्षेत्र के पहाड़ों में खनन शुरू कर दिया है.

काथिरवेल के मुताबिक, 1998 से 2003 के बीच एक हजार वाहनों से प्रति दिन दो ट्रिप के हिसाब से छह हजार करोड़ रु. का अवैध खनन हुआ. इसी तरह 2003 से 2008 के बीच 12 हजार करोड़ रु. और 2008 से 2013 के बीच 30 हजार करोड़ रु.का अवैध खनन हुआ है.

खनन रोकने में सबसे बड़ी परेशानी है इस कारोबार से जुड़े लोगों के पास भारी मात्रा मंड विस्फोटक और अवैध हथियारों का होना, जिनके मुकाबले पुलिस के संसाधन पर्याप्त नहीं हैं. धौलपुर के एसपी राजेश सिंह कहते हैं, ''खनन माफिया के लोग गुट बनाकर चलते हैं. ये लोग खनन के रास्ते में आने वाले की जान लेने से परहेज नहीं करते चाहे वह कितना बड़ा अधिकारी ही क्यों न हो. ''

हिंसक रुख अख्तियार कर चुके खनन माफिया के हौसले इतने बुलंद हैं कि अब उनके डंपर पुलिस चौकी, थानों और वन विभाग की चौकियों के सामने से बेखौफ निकलते हैं. और अपने खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाने से वे डरते नहीं.

बूस्टर सीजन -4 का फाइनल नौ जून को

आबूलेन पीपीपी कांफ्रेंस हॉल के निकट स्थित बीट्स ऑफ डांस के डांस बूस्टर सीजन-4 का ऑडीशन मेरठ रॉकर्स एकेडमी में किया गया। ऑडीशन में बच्चों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। बीट्स ऑफ डांस के डायरेक्टर समीर खुर्शीद ने बताया कि डांस बूस्टर सीजन का तीसरा और आखिरी ऑडीशन तीन मई को होगा। इसका फाइनल नौ जून को होगा। इस मौके पर डांस इंडिया डांस की कोरियोग्राफर गीता कपूर बच्चों के हुनर को परखेंगी। दूसरे ऑडीशन में जज के रूप में दिव्या जैन, मीता, समीर खुर्शीद रहे।

दुश्मन मिले सबेरे लेकिन मतलबी यार न मिले

नौचंदी के पटेल मंडप में मंगलवार रात लखनऊ से पहुंचे भोजपुरी अवध गायक सुरेश कुशवाहा एंड ग्रुप ने रंगारंग प्रस्तुति पेश करते हुए समां बांध दिया। कलाकारों के ग्रुप ने भोजपुरी गीतों के साथ नृत्य कर दर्शकों की तालियां बटोरीं।
शुभारंभ विशाल कुमार ने साई भजन से किया। भोजपुरी गायक सुरेश ने मंच संभाला और भोजपुरी स्टाइल में भगवान शिव की स्तुति का गुणगान किया। 'रटन कहने लगी राम ही राम' गीत के बाद सुरेश ने 'दुश्मन मिले सबेरे लेकिन मतलबी यार न मिले' गीत गाकर प्रेम भावना से रहने का संदेश दिया। समाज में बढ़ती जा रही दहेज प्रथा को 'दूल्हे का मुंह जैसे फैजाबादी बंडा, दहेज में मां-बाप मांगे हीरो-होंडा' से बयां कर दहेज लोभियों को करारा जवाब दिया। 'यदि घर-घर के रगड़े-झगड़े आपस में मिट जाएंगे, गांधी के पुजारी खद्दर वाले कहां जाएंगे' गीत सुनाकर राजनीति के गिरते स्तर पर तीखा कटाक्ष किया। इसके बाद गायिका जया ने मंच संभाला। उन्होंने 'रेलिया बैरन पिया को लिया जाए रे, दीन भर चाहे जहां रही हो हमार पिया' गीत की नृत्य के साथ रंगारंग प्रस्तुति दी। भोजपुरी कलाकारों के ग्रुप में आफाक वारसी ने ढोलक, लालधर वर्मा ने आर्गन, सिबले ने बैन्जों के अलावा पैड पर शिवम व जयनाथ यादव ने झींका पर सुरीले संगीत से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।

Tuesday, 28 April 2015

पूरी तरह अभी भी पटरी पर नहीं आई सफाई व्यवस्था

नगर निगम के सफाई कर्मचारियों की हड़ताल खत्म होने के बाद शहर की सफाई व्यवस्था अभी भी पूरी तरह पटरी पर लौटती नहीं दिख रही है। ग्यारह दिन की हड़ताल जब रविवार को टूटी तो अफसरों ने राहत की सांस ली थी। मंगलवार को नगर निगम कर्मचारी सुबह से सफाई करने के लिए जुटे। सफाई एवं खाद्य निरीक्षकों की अगुवाई में टीमें बनकर चलीं। मुख्य सड़कों के साथ ही चौराहों पर अभियान चलाया गया। कई कालोनियों से भी कूड़े का उठान हुआ।
यहां हुई सफाई
मंगलवार को बेगमपुल, हापुड़ अड्डा, गांधी आश्रम, तेजगढ़ी चौराहा, बच्चा पार्क, घंटाघर, रेलवे रोड चौराहा, मेट्रो प्लाजा आदि मुख्य चौराहों के साथ ही सड़कों पर सफाई की गयी। सड़कों पर मिट्टी व कूड़े को इकट्ठा कर ट्रालियों व निगम गाड़ियों से उठान किया गया। इसके अलावा मोहल्लों में भी सफाई की सुध ली गयी। हालांकि कई मोहल्ले मंगलवार को भी सफाई की बाट जोहते रहे। साकेत, मानसरोवर कालोनी, शास्त्रीनगर, जागृति विहार, अजंता कालोनी, दामोदर कालोनी, प्रेमप्रयाग, गंगानगर, पंचशील कालोनी, बैंक कालोनी, सूरजकुंड, फूलबाग कालोनी, नेहरूरनगर आदि क्षेत्रों के कई मुहल्लों में सफाई कर्मी दिखे। पुराना इकट्ठे कूड़े का उठान किया गया। वहीं इन कालोनियों के कुछ मोहल्लों के साथ ही शहर के कई इलाकों में गंदगी के अंबार लगे रहे। नगर आयुक्त एसके दुबे ने कहा कि सफाई व्यवस्था पटरी पर आ गयी है, एक-दो दिन में व्यवस्था सामान्य हो जाएगी।

अभियान चला शराबी चालकों की धरपकड़

शराब पीकर दोपहिया और चौपहिया वाहनों को ड्राइव करने वाले लोगों की अब खैर नहीं है। ट्रैफिक पुलिस ने मंगलवार रात से अभियान चलाया। पुलिस का अभियान बेगमपुल और जीरोमाइल के अलावा कई मुख्य चौराहें पर चला, जिसमें करीब दो दर्जन से अधिक वाहनों के चालन और कई वाहन सीज किए गए।
वाहन चेकिंग के अभियान की कमान खुद ट्रैफिक सीओ बीएस वीर कुमार ने संभाल रखी थी। चार टीएसआई और पुलिसकर्मियों को जगह-जगह लगाकर वाहनों की घेराबंदी की गई। कई कारों में शराब की बोतलें, सोड़ा और नमकीन के पैकेट मिले। वहीं दोपहिया वाहन चालकों के मुंह में एलकोहल मीटर लगाकर जांच की गई। जिन वाहन चालकों की जांच में शराब पीना आया, उनका चालान काटा गया और जिनके पास वाहन के कागजात नहीं थे, उनको सीजा किया गया। बेगमपुल पर चेकिंग में एक बाइक चालक को रोका गया, लेकिन उसने बाइक तेज कर दी। घेराबंदी कर चालक को दबोचकर सड़क पर उसकी धुनाई की गई। पुलिस चेकिंग को देख कई वाहन चालक को काफी दूर से ही वापस हो गए।

मदद को बढ़ाए हाथ

मेरठ : नेपाल में आए भूकंप में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए विभिन्न स्थानों पर शोक सभाएं हुई। इस दौरान लोगों ने दो मिनट का मौन धारण कर श्रद्धांजलि दी और मृतकों के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की।

भारतीय बौद्ध महासभा की ओर से बुद्ध विहार में लोगों ने दो मिनट का मौन धारण कर श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान महेंद्र सिंह, ललित बौद्ध, रवि कुमार, पवन कुमार, यशपाल, श्री पाल आदि मौजूद थे। नोबल पब्लिक स्कूल में छात्र-छात्राओं ने कैंडल मार्च निकालकर दो मिनट का मौन धारण किया। श्रद्धांजलि देने वालों में प्रिंसिपल संतोष मेहता, अनिल चौधरी और अमित चौधरी शामिल रहे। डा. भीमराव अंबेडकर कल्याणकारी सेवा संस्थान के कार्यालय पर बैठक हुई, जिसमें आपदा में मारे गए लोगों को दो मिनट का मौन धारण कर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। मोहन लाल सहगल, डा. सेवा राम कैन, जौहरी मल, रीना गौतम कैली, चतर सिंह, ज्योति प्रसाद जाटव आदि उपस्थित रहे।

उधर, भूकंप पीड़ितों की आर्थिक मदद के लिए अब अधिवक्ता भी आगे आ गए हैं। उन्होंने बुधवार से पीड़ित परिवारों की मदद के लिए धनराशि एकत्र करने का निर्णय लिया। जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव कुमार त्यागी व महामंत्री संदीप चौधरी ने बताया कि भूकंप पीड़ितों की आर्थिक मदद के लिए बुधवार से कचहरी में धनराशि एकत्र करेंगे। धनराशि डीएम पंकज यादव को सौंपी जाएगी।

सड़क पर रहने वाले बच्चे बना रहे अपना बजट

दिल्ली सरकार इन दिनों जनता से बजट तैयार करने के लिए रायशुमारी कर रही है। यह रायशुमारी वो मोहल्ला सभाओं के माध्यम से कर रही है।
दिल्ली सरकार का ये तरीका सड़क पर रहने वाले कुछ बच्चों को इतना भा गया है कि उन बच्चों को बजट से क्या चाहिए इसका पूरा मेमोरंडम तैयार कर डाला है।
इन बच्चों ने राय ‌मश्विरे करके एक मसौदा तैयार किया है जिसमें उन्होंने ये लिखा है कि बच्चों को केजरीवाल सरकार से क्या उम्मीदें हैं।
बता दें कि ये बच्चे स्ट्रीट चिल्ड्रेन की एक फेडरेशन 'बढ़ते कदम' से जुड़े हैं। शनिवार को जब सरकार दिल्ली में मोहल्ला सभाओं की श्रंखला आयोजित कर रही थी तब ये बच्चे खुद एक-दूसरे सलाह मश्विरा कर खुद के अनुभव के आधार पर अपना बजट बनाने में लगे हुए थे।
ये सभी बच्चे अपने अपने-अपने चार्ट और मार्करों के साथ अपना प्लान बनाने बैठे थे ताकि वो सरकार के बजट बनाने की प्रक्रिया में सहायता कर सकें। जब मुशरत परवीन से पूछा गया कि उस जैसे लगभग 16 साल के बच्चों की क्या जरूरत है तो अपनी मां के साथ घरों में काम करने वाली मुशरत बोली कि 'सर्वे जरूरी है।'
मुशरत की बात का समर्थन करते हुए बेघर लोगों के लिए बने रैनबसेरे में रहने वाली ज्योति कहती है कि ‌अगर सर्वे होगा तो वो और बच्चों से मिल पाएंगे और उन्हें समझा पाएंगे कि कमाई के लिए पढ़ाई कितनी जरूरी है।
इन बच्चों ने न केवल यह सुझाया है कि सर्वे होने चाह‌िए बल्कि इन लोगों ने सर्वे किस तरह से किए जाएंगे उसका पूरा विस्तार में खाका भी तैयार कर लिया है। इसमें उन्होंने बताया है कि कैसे 11 जिलों में ये सर्वे होंगे और इस वक्त वो सर्वे पर कितना खर्च आएगा उसे तैयार करने में लगे हैं।
चांदनी जो शहीद कैंप वेस्ट दिल्ली में रहती है सीएम से और रैनबसेरों की मांग करने वाली है। ये बच्चे जब बजट तैयार कर रहे थे तो इनके बहस का जो सबसे बड़ा मुद्दा था वो बच्चों के लिए और रैनबसेरों की मांग का ही था।
दूसरा जो मुद्दा सबसे अहम था वो स्वास्थ्य का सामने आया। वर्तमान समय में अगर उन्हें किसी का साथ न मिले तो उन्हें स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध नहीं होती।
कूड़ा बिनने वाले बच्चों में कुत्ता काटने की समस्या आम बात है। लेकिन अगर वो इसके इलाज के लिए सरकारी अस्पताल जाते हैं तो या तो उन्हें भगा दिया जाता है या उनका इलाज करने से मना कर दिया जाता है।
इन बच्चों ने ही बताया कि कई ऐसे बच्चे रेबीज के शिकार हो जाते हैं बल्कि कई मर भी जाते हैं। वेटर का काम करने वाले चंदन ने बोला कि वो दिल्ली सरकार से कम से कम बच्चों के लिए चार अस्पताल बनाने को कहेंगे ताकि उन्हें सही इलाज मिल सके।

कहर के बाद करिश्मा, 3 दिन बाद मलबे से ‌जिंदा निकली महिला

नेपाल में कुदरत के कहर के बाद इसका करिश्मा भी देखने को मिल रहा है। बचावकर्मियों ने शनिवार के भारी भूकंप से जमींदोज हो चुके एक पांच मंजिला मकान के मलबे से मंगलवार को एक महिला को सुरक्षित निकाल लिया
कई और लोगों के साथ मलबे में फंसी सुनीता सितौला नाम की इस महिला ने बाहर निकलते ही कहा कि लगता है मैं किसी दूसरी दुनिया में आ गई हूं। ई-कांतिपुर की रिपोर्ट के मुताबिक अब यह महिला अपने पति और दो बेटों के साथ एक स्कूल में शरण लिए हुए है।
उसके पति और बच्चे उसे पाकर बेहद खुश हैं। ये लोग भूकंप के दौरान किसी तरह खुद को बचाने में सफल रहे थे। नेपाल में बड़ी तादाद में मकान धंस गए हैं और इनमें अब भी सैकड़ों लोग फंसे हैं।
देश में खाना, पानी, बिजली और दवाई की भारी किल्लत है और लोग और भूकंप आने के डर से खुले मैदान में अस्थायी शिविरों में रहे हैं। जहां तक नजर जाती है तंबू ही तंबू दिखाई पड़ते हैं।

मौत के मुंह से बचकर आई प्रीति ने सुनाई भूकंप की खौफनाक कहानी

झटके के सिवा कुछ अहसास नहीं हुआ। धरहरा भरभरा कर गिर पड़ा। नेपाल के ‘कुतुबमीनार’ माने जाने वाले दो सौ तीन फीट ऊंचे धरहरा मीनार के मलबे में दबने से शनिवार को ही 180 लोगों की मौत हो गई थी।
खुशबू, प्रीति और उनकी मां बुढाथोकी खुशकिस्मत रहीं। मां और दोनों बेटियों का इलाज राजधानी के सिविल अस्पताल में चल रहा है। चार्टर्ड एकाउंटेंसी की छात्रा प्रीति कैसे धरहरा से नीचे कुछ पता नहीं चला। वह यह भी नहीं कैसे और किसने उसे अस्पताल पहुंचाया।
इस प्राकृतिक आपदा में भले इन तीनों की जान बच गई लेकिन बुढ़ाथोकी के चार सगे-संबंधियों का अब तक कोई अता-पता नहीं है। बैंक में काम करने वाली खुशबू काफी सहमी है।
वह कुछ भी बता नहीं पा रही है लेकिन अपनी बहन और मां को अस्पताल में साथ देखकर हैरान भी है। मां को पहले अस्पताल के अलग वार्ड में रखा गया था।
बाद में अस्पताल निदेशक डॉ विमल थापा ने सभी को एक ही वार्ड में रखवाया। प्रीति को गंभीर चोट है। ट्यूब डाला गया है। कुछ दिन और अस्पताल में ही रहना होगा। अस्पताल के निदेशक ने कहा खुशबू और मैया को अब बेहतर हैं लेकिन तीनों खतरे से बाहर हैं।नेपाल में शनिवार को सरकारी छुट्टी रहती है। इस दिन अधिकांश लोग घूमने निकलते हैं। काठमांडू में धरहरा सभी के आकर्षण का केंद्र था। और तो और नए वर्ष पर एमाले के अध्यक्ष केपी ओली भी धरहरा गए थे।
तब से नेपाल के लोगों का आकर्षण और बढ़ा। धरहरा का निर्माण 1832 में प्रधानमंत्री भीमसेन थापा ने कराया था। इस मीनार से काठमांडू को देखने का खास आनंद था।
1934 के भूकंप मे भी नौ माले का धरहरा टूट गया था। इसका पुनर्निर्माण कराया गया था। धरहरा मे दो सौ 13 सीढ़ियां थीं। इसे 2005 से आम लोगों के लिए खोल दिया गया था।
‘अचानक धरहरा हिला और मैं नीचे गिर गई, इसके बाद मुझे कुछ पता नहीं।’ यह कहना है प्रीति का। प्रीति अपनी बड़ी बहन और मां के साथ धरहरा देखने गई थी। शनिवार को जब भूकंप आया तो तीनों धरहरा के सातवें मंजिल पर थीं।

मुस्कराइये कि आप नौचंदी मेले में हैं

यूं तो यह दुनिया ही एक मेला है, मगर इसमें बहुत झमेला है। इसलिए झूला-सर्कस, बांसुरी-पिपिहरी, हलवा-पराठे वाले, गंवई-शहरी मिजाज वाले, मेले में चलिए। आपका अपना नौचंदी मेला। रोज के दुनियावी सर्कस से मन उचाट है तो यहां का जीवंत सर्कस देखिए। नींद न आने की बीमारी है तो मेले में आइए। मन बहलेगा। नींद भी आएगी। परंपराएं बदली हैं, मूड बदला है, लेकिन उत्सवधर्मिता बरकरार है। रोजाना हजारों की संख्या में उमड़ने वाली भीड़ गवाह है।
गंगा-जमुनी तहजीब की खुशबू से मेला गुलजार है इन दिनों। यहां, घुसते ही तरह-तरह की आवाजें, नजारे शहर की आम जिंदगी से अलग ले आते हैं। बैलों की घंटी-घुंघरू की जगह अब मोटरों की चिल्ल-पों है, पर इस शोर में भी अलग तरह का सुकून। मेले के स्वाद का कोई मेल नहीं। यहां सॉफ्टी है, भेलपूरी है। हलवा-पराठा, खजला-नान खताई की सोंधी खुशबू है। मुंह में लार है, मगर हाथ खाली। गोलगप्पे खाकर गाल कुप्पा करने का यहां अपना आनंद है। इन्हीं दुकानों पर कुछ खाते हुए, कुछ भसकते हुए तो एकाध आगे बढ़ने को लरजते हुए चेहरे नजर आते हैं। पांच रुपये, दस रुपये की वकत अभी भी यहां दुकानों पर मिल जाएगी। हालांकि इस कीमत में भी मोलभाव करने वाले कुछ चेहरे नजर आते हैं। मेला इसलिए न छोड़िए कि आगरे से घाघरा नहीं आया है, यहां सब कुछ मिलेगा। लघु उद्योगों के तमाम हुनर बिखरे पड़े हैं। आप यहां निशानेबाजी पर हाथ आजमा सकते हैं या फिर छल्ले फेंककर किस्मत। कुछ नहीं तो तजुर्बा जरूर मिलेगा। पांच मिनट में फोटो खिंचाकर मेले की स्मृतियां संजो सकते हैं। तनाव में हैं तो दस रुपये में पूरा हंसीघर मौजूद है। सात अजूबे सुने होंगे, लेकिन इसी हंसीघर के पास लगे पोस्टर में आठवें अजूबे की तस्वीर नजर आती है- 'दुनिया का सबसे लंबा शख्स।'
प्रचार-प्रसार की गरज से टेलीविजन धारावाहिकों की बड़ी-बड़ी होर्डिग भी जहां-तहां लटकी हैं। सर्कस के करतब में जीवन संघर्ष दिखेगा, मगर उनकी दिलेरी-जांबाजी आपको नई ऊर्जा देगी। दांतों तले अंगुलिया चाहे तो आप न दबाएं। यहां कमसिन बालाओं की अदाओं पर नीयतें डोलती हैं तो अब जानवरों का कमाल न देख पाने का मलाल भी है। जोकर की हरकतें मसखरी होने के साथ ही अब थोड़ी फूहड़ हो चली हैं। शायद यह वक्त की नजाकत है। और शायद वजूद बचाए रखने की कोशिश भी।
इसी मेला मैदान में भीड़ का फायदा उठाकर ठांव-कुठांव धक्का मारते छिछोरे भी नजर आते हैं। पलटकर, चढ़ी भौहों वाली कुछ नजरें घूरती हैं। जवान खून में गुदगुदी भले होती हो, मगर बुजुर्गो को मेले की यह संस्कृति मैली लगती है। लेकिन शायद यह भी मेले के मिजाज का एक हिस्सा है, यह सोचकर कदम बढ़ते जाते हैं। कुरेदने पर 'अब वह बात कहां' की शिकायतें और अफसोस जाहिर करते झुर्रीदार चेहरे मेले के सुनहरे अतीत से मुलाकात कराती हैं।
पटेल मंडप में अलग मेला आबाद है। यहां के रंगारंग कार्यक्रम मन के सरगमी तारों को झंकृत करते हैं। आसमान छूते झूलों पर बैठकर चाहें तो शहर के साथ आंखों से चहलकदमी करें या फिर ब्रेक डांस के हिचकोलों का आनंद ले सकते हैं। बशर्ते दिल बैठने का डर न हो। मेला उजड़ जाए, इससे पहले कुछ पल जरूर गुजारिए नौचंदी मैदान में!
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