भोर हुई आँखें जब खोलीं
धुंध दिखी हर तरफ मुझे।
वातायन खुल गया अचानक
अंग-अंग सब सिहर गये।।
कुहरे का आवरण घना था
दिखा नहीं नीला आकाश।
ठिठुर रही थी निर्धनता
जग सारा लगा मुझे उदास।।
सोच रही थी खड़ी-खड़ी
तभी प्रभाकर जाग उठे।
मंद स्मित बिखराकर देखा
अपने गगन झरोखे से।।
पूर्ब दिशा में झीनी लाली
फैल रही थी धीरे से।
थोड़ी सी ऊष्मा को पाकर
विहँग उड़ चले गिने चुने।।
धुँध छंट गयी जब कुहरे की
नभ की आभा निखर गयी।
आँगन में मेरे पाँख खोलकर
कुछ गौरैयाँ थीं फुदक रहीं।।
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