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Tuesday, 5 May 2015

अमलतास

अमलतास के फूल झर गये धीरे से
कल तक जिसने प्यार किया
जब रूठे तो  मनुहार किया
आज वही अलि वादा अपना भूल गये
प्यार का प्रतिदान ऐसा भी है क्या
प्यास से जलते अधर दो मिल गये
माधुरी पीकर कहीं को उड़ चले
शेष  केवल रह गयी बेबस सी चाह
काँपती जाती  डगर है दूर तक
कल थे जो अपने वह न हैं यहाँ
साथ देने से भी उसको क्या मिला
हैं कहाँ वह और मंजिल है कहाँ
ठहर कर के दो पलों को सो लिया
बैठ कर छाया  में आँखें मूंदकर
स्वप्न में डूबा पथिक फिर चल पड़ा
अब किसी अनजान मंजिल के लिये
जिन पर था विश्वास उन्होंने कुचल दिया
रुँधे गले से दूब कह रही धीरे से
मीत खो गये गीत सो गये
अमलतास के फूल झर गये धीरे से

आम-आदमी की आंकाक्षाओ पर खरा उतरना है

आम-आदमी के जोश-जनून में नही है कोई शंका।
दिल्ली में आम-आदमी पार्टी का खूब बज रहा डंका।।
आम-आदमी की ताकत को, जो नेता थे गये भूल।
आम-आदमी के साहस ने उन्हे दय बार चटा दी धूल।।
गली-मुहल्लो-चैराहो पर आम आदमी की चर्चा सर्वत्र।
आम आदमी ने रच दिया, इतिहास एक विचित्र।।
आम-आदमी ही माध्यम, चुनाव में जीत-हार का।
कोरे आश्वासन झूठे वादो, के मृदुल व्यवहार का।।
लेकिन आम-आदमी का सवाल, सवाल ही रह जाता।
नेताओ से उसका, क्यो नही उत्तर भी बन पाता।।
आश्वासन के कटघरे में, खड़ा हुआ आम आदमी।
अपनी जायज मागों पर, अड़ा हुआ आम आदमी।।
अक्सर हर रोज, अपना बयान जाहिर करता है।
अपने अधिकारो की, मांग करने से नही डरता है।।
दिल्ली के मुख्यमंत्री, अब अपना कर्तव्य निभायेगे।
दिल्ली वासियो की, सभी समस्याओ को निपटायेगे।।
आमजन को मिलेगा, समय पर बिजली व पानी।
प्रशासनिक अधिकारी, नही कर पायेगे मन मानी।।
व्यवस्था-सुधारने को, तत्पर हुए है केजरीवाल।
जन लोकपाल बिल पर भी, अमल होगा तत्काल।।
स्वच्छ दिल्ली-स्वस्थ दिल्ली के साथ हो प्रशासन का सुधार।
अपराध-नियंत्रण के लिए, कमर कसे अब दिल्ली सरकार।।
आम-आदमी पार्टी को यदि अब आगे बढना है।
आम-आदमी की आंकाक्षाओ पर खरा उतरना है।।
सुशासन कैसे लाये, आम आदमी पार्टी को चुनौती है।
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि सेवक, जनता शासक होती है।।

Monday, 4 May 2015

चलना होगा साथ

जम्मू-कश्मीर के विकास पर, चलना होगा साथ
राष्टड्ढ्र के हित में करनी होगी, अब तो सारी बात।
अब आंतकवाद की गंध, न केसर क्यारी में फैले
राष्टड्ढ्र-प्रेम, विश्वास, एकता पर, न हो अब आघात।।
        अपने पांव पर आप कुल्हाड़ी मारी, कुछ दीवानो ने।
        मानवता को लज्जित कर डाला, ऐसे इंसानों ने।।
        इस सुन्दर घाटी का समुचित विकास रुक गया यूं।
        बरसों लग जायेगें इसको विकसित कर पाने में।।

Thursday, 16 April 2015

सबेरा


भोर हुई आँखें जब खोलीं
धुंध दिखी हर तरफ मुझे।
वातायन खुल गया अचानक
अंग-अंग सब सिहर गये।।
कुहरे का आवरण घना था
दिखा नहीं नीला आकाश।
ठिठुर रही थी निर्धनता
जग सारा लगा मुझे उदास।।
सोच रही थी खड़ी-खड़ी
तभी प्रभाकर जाग उठे।
मंद स्मित बिखराकर देखा
अपने गगन झरोखे से।।
पूर्ब दिशा में झीनी लाली
फैल रही थी धीरे से।
थोड़ी सी ऊष्मा को पाकर
विहँग उड़ चले गिने चुने।।
धुँध छंट गयी जब कुहरे की
नभ की आभा निखर गयी।
आँगन में मेरे पाँख खोलकर
कुछ गौरैयाँ थीं फुदक रहीं।।

एक नयी किरण


अंधेरे मे आशा की एक नयी किरण
अंधेरे में होती है सबको एक उजाले की तलाश,
हर कोई चाहता है उजाला जिन्दगी में,
ढूंढता है प्रकाश चहुं ओर अपने में,
नहीं मिलता है उजाला है जब-जब उसको,
बैठ जाता है उदास और निराश अपने मन में,
       जब नहीं आती है उजाले की किरण अपने मन में,
फिर भी करता है प्रयास उसे ढूंढने में,
              यदि आशा है मन में तो उजाला भी मिल जायेगी ही,
इस आषा से ही मिलता है उजाला हर किसी को,
बड़े-बड़े काम हो जाते हैं पूरे आशा, के बल से,
फिर क्यो डगर कांप जाते है उजाला ढूंढने में।
करो निरन्तर प्रयत्न अंधेरे में भी मिलेगा उजाला,
बनोगे बुजदिल यदि तो निकलोगे कैसे अंधेरों से,
चलते जाओ साहस के बल पर यदि तुम
तो हर पग-पग पर मिल जायेगी किरण तुमको
न हिम्मत हारना कभी तुम, तभी तो मिलेगी,
उजाले में नयी नई एक किरण तुमको।

Wednesday, 15 April 2015

होली की ठिठोली


होली का रिश्ता रंगो से जितना है उससे कहीं ज्यादा रिश्तों से रिश्ता है। पति-पत्नी, देवर-भाभी, जीजा-साली, ननद-भौजाई, समधी-समधिन और भी न जाने कौन यानि हर रिश्ता होली के रंग में रंगा है। काव्य के रंगो की बौछार लायेगी होली पर्व की मस्ती भरी बहार
रंग-अबीर, गुलाल उड़ाता, होली का त्यौहार।
ईष्या-द्वेष, विरोध मिटाता, देता स्नेह व प्यार।।
होली का हुडदंग मच रहा, रंगो की बौछार।
गुंजिया खायें, फगवा गायें, राखे मृदु व्यवहार।।
ऋतुराज बंसत के आने पर, कोयलिया है बोली।
रंगों की बौछार लिये लो आ गयी है अब होली।।
ढोल-बजाते, फगवा गाते, आई मस्तो की टोली।
अपने देवर-संग कर रही भाभी आज ठिठोली।।
ढप की ताल पे नाचो-गाओं, उड़े अबीर-गुलाल।
जो होली पर रंग न खेले, रंग दो उसके गाल।।
रंग-गुलाल खूब लगाओ, मन में न रहे मलाल।
भंग का रंग जमा है चकाचक, नाचो दे-दे ताल।।
उन्माद भरा, मद माता मौसम, मन में उठी उमंग।
तन-मन झूमा गोरी का, जब भंग की चढी तंरग।।
रंग में होली कैसे खेलूंगी मैं अब सांवरिया के संग।
कही ढोल मजीरे बाज रहे, कहीं बाज रही मृंदग।।
साथियों! रंग-बिरंगे फूल खिले है, होली में।
सब रूठे-बिछड़े मीत मिले है, होली में।।
होली का त्यौहार मिलाता है, मन से मन।
जब होते सारे दूर गिले है, होली में।।

उलझनों का यह जाल


उलझनों का जाल होता ही ऐसा,
जो आया इसमें बस फंसता ही गया,
नहीं निकाला जा सकता, इससे किसी को,
करे चाहे भी कितना प्रयत्न वह,
फिर भी असफल पाता है अपने को।
एक बार जो फंस कर गिर जाता है,
क्या इसमें से निकलेगा कोई कैसे,
उलग्नों में घिर जाने पर,
मन होता है कितना उदास और निराश।
इस जाल की जड़े होती है कितनी गहरी,?
प्रयत्न करने से भी नही उखड़ पायेगी यह, जीवन इसमें उलझता ही जाता है,
बस-पास क्या कोई आ सकता है?
धीरे-धीरे यह जीवन कितना नीरस, वे बस हो जाता है,
किये होंगे कोई कर्म तुमने ऐसे, जो ऐसे जाल में फंसते ही गये।
जो हुआ सो सहा तुमने जीवन में अपने, अब तो ले लो सुध आगे की,
जीवन की उलझनों में न जकड़ सको कभी। यदि ज्ञान, बुद्धि, विवके से तुम,
अपना जीवन निर्वाह करोगे तुम, नहीं फंसोगे ऐसे उलझनों के जाल में तुम।

Friday, 10 April 2015

कैसे कहूं...

कैसे कहूं कि कलम का पुजारी नही हूं मै।
मै प्यार बांटता हूं- अनाड़ी नही हूं मैं।।
कहानी के सभी पात्र आस-पास है रहते।
हम पर लिखो रचनाएं, कलम से मेरी कहते।।
रचनाओं से जोड़ता हूं, मै बिखरे समाज को।
मैं मसखरा नही हूं, मदारी नही हूं मैं।। १।।
प्रकृति के हंसी नजारे, कल्पना मेरी बनते।
मानवीय संवेदना भरी, रचना मेरी बनते।।
जागरूक करे लोगों को ऐसा हो कथानक।
मदहोश बना दे जो, वो खुमारी नही हूं मैं।। २।। कैसे कहूं
जो तथ्य हो, सत्य, कल्पना में ढालना है।
मार्ग-दर्शन हो युवाओ का, मेरा मानना है।।
सामाजिक समरसता, जन-जन की भावना है।
समता-मूलक अभियान पर, भारी नही हूं मैं।। ३।। कैसे कहूं
हुस्न, इश्क, शबाब न अधिक पेश हूं करता।
विविध रंगो से सजांऊ, काव्य का गुलदस्ता।।
भावनाओं की सुगंध से लबरेज हो कविता।
मात्र मनोरंजन करने का, अधिकारी नहीं हूं मैं।। ४।। कैसे कहूं
मां सरस्वती से मांगता, मै यही वरदान।
अच्छा साहित्य ही रचूं, मिलेगा सम्मान।।
जीवन में न कंरू मै, किचिंत भी अभिमान।
अश्रु जो टपके आंख से, खारी नही हूं मैं।। ५।। कैसे कहंू
वीणा पाणि की कृपा से, शोहरत मुझे मिले।
पाठकों के स्नेह की, अूल्य दौलत मुझे मिले।।
जन-जन को दे संदेश, ऐसी हो मेरी रचना।
झोली फैलाये हूं खड़ा, भिखारी नहीं हूं मैं।। ६।। कैसे कहूं

Thursday, 2 April 2015

ये समय चुनौती का है

ये समय चुनौती का है, इसको सोकर मत खोना,
चाहे नींद झुके पलकों पर, नैनों में सपन सलोना,
सैंकड़ों हजारों बीघा,जिनके जमीन नाम,
भूल से भी  मूठ नहीं पकड़ा है  हल का,
हल के चलाने वाले, फसल उगाने वाले,
दुखी हैं कि हक नहीं उनको फसल का,
तय करो कौन है किसान जमींदार कौन,
काम का किसे है हक,किसको है फल का,
श्रम में नहाने वालो, फसल उगाने वालो,
जड़ से ख़तम करो, शोषण ये  छल का,
अब के उधार धरती पर, हमें बीज नहीं है बोना।
ये समय चुनौती का है, ं ं ं ं
अनगिन माया जाल, सैंकड़ों करें सवाल,
करना यकीन नहीं किसी ज्ञानवान का,
पादरी भी प्रेयर करे, पंडित भी मन्त्र पढ़े,
अर्थ कोई होता नहीं, मुल्ला की अजान का,
धरम को जानने को जानना जरूरी नहीं,
बाइबिल, वेद, गुरु गं्रथ औ्य कुरान का,
ये उधार धर्म आज आदमी की जिन्दगी में,
गौर से निहारिए तो  रोग है  मसान का,
जीवन पर भार हुए हैं, अब कठिन है इनको ढोना।
ये समय चुनौती का है, ं ं ं ं
गौरी-गजनी को कैसे रोक लेंगे आप गर,
घर को भरेंगे सारा देश लूट-लूट कर,
उग्रवादियों को सही मार्ग पर लाने के लिए,
देश-प्रेम हदय में भरो तो कूट-कूट कर,
प्यार से दुलार से भी, जोर से भी मार से भी,
उनको मानएंगे गए जो रूठ-रूठ कर,
चाहे पंजाब कश्मीर  खूब जोर करे,
देश को बिखरने न देंगे टूट-टूट कर,
इसके सँग में मत खेलो, यह देश नहीं है खिलौना।
ये समय चुनौती का है,

Tuesday, 31 March 2015

ये समय चुनौती का है


ये समय चुनौती का है, इसको सोकर मत खोना,
चाहे नींद झुके पलकों पर, नैनों में सपन सलोना,
सैंकड़ों हजारों बीघा,जिनके जमीन नाम,
भूल से भी  मूठ नहीं पकड़ा है  हल का,
हल के चलाने वाले, फसल उगाने वाले,
दुखी हैं कि हक नहीं उनको फसल का,
तय करो कौन है किसान जमींदार कौन,
काम का किसे है हक,किसको है फल का,
श्रम में नहाने वालो, फसल उगाने वालो,
जड़ से ख़तम करो, शोषण ये  छल का,
अब के उधार धरती पर, हमें बीज नहीं है बोना।
ये समय चुनौती का है, ं ं ं ं
अनगिन माया जाल, सैंकड़ों करें सवाल,
करना यकीन नहीं किसी ज्ञानवान का,
पादरी भी प्रेयर करे, पंडित भी मन्त्र पढ़े,
अर्थ कोई होता नहीं, मुल्ला की अजान का,
धरम को जानने को जानना जरूरी नहीं,
बाइबिल, वेद, गुरु गं्रथ औ्य कुरान का,
ये उधार धर्म आज आदमी की जिन्दगी में,
गौर से निहारिए तो  रोग है  मसान का,
जीवन पर भार हुए हैं, अब कठिन है इनको ढोना।
ये समय चुनौती का है, ं ं ं ं
गौरी-गजनी को कैसे रोक लेंगे आप गर,
घर को भरेंगे सारा देश लूट-लूट कर,
उग्रवादियों को सही मार्ग पर लाने के लिए,
देश-प्रेम हदय में भरो तो कूट-कूट कर,
प्यार से दुलार से भी, जोर से भी मार से भी,
उनको मानएंगे गए जो रूठ-रूठ कर,
चाहे पंजाब कश्मीर  खूब जोर करे,
देश को बिखरने न देंगे टूट-टूट कर,
इसके सँग में मत खेलो, यह देश नहीं है खिलौना।
ये समय चुनौती का है,

Monday, 30 March 2015

गंगोत्री से गंगा सागर तक

भागीरथ की कठिन तपस्या , आखिर रंग लाई थी।
ज्येष्ठ मास दश्मी को मागंगे पृथ्वी पर आई थी।।
आगे-आगे चले भागीरथ, पीछे गंगा की थी धारा।
जहां से होकर निकली गंगा, तीर्थ बन गया प्यारा।।
गंगोत्री से गंगा सागर तक, गंगा मां की महिमा।
ठंडे मीठे पवित्र जल से है, विश्व में इनकी गरिमा।।
गंगोत्री से गंगा सागर तक, अनेक तीर्थस्थल न्यारे।
कपिल मुनि के आश्रम में, शापित सभी पिटर तारे।।
ऋषिकेश, हरिद्वार, शुक्रताल, शिववल्लभ गढ़मुक्तेश्वर।
तीर्थराज प्रयाग,वाराणसी, हरिहर क्षेत्र मनोहर।।
भागीरथ के नाम पर गंगा, भागीरथी भी कहलाती।
इसकी सुन्दर अविरल धारा, गंगोत्री से है आती।।
उत्तराखंड में पंच प्रयागों का है अद्भुत संगम।
कल-कल करती मंदाकिनी का है, दृश्य मनोरथ।।
वह स्थान जहां पर ऋषियों ने धोय थे अपने केश।
ऐसे पावनधाम को, हम सब कहते है ऋषिकेश।।
स्वर्गाश्रम, लक्ष्मणझूला का भी दृश्य निराला है।
ईशवानंद झूले पर चढे यात्री, फेरे शिव की माला है।।
हर की पौड़ी हरिद्वरार में, लगता कुम्भ का मेला है।
तीर्थयात्री हर कोने से आते, दृश्य बड़ा अलबेला है।।
शुकदेव मुिन ने राजा परीक्षित को, भगवत कथा सुनाई।
जनपद मुज्जफरनगर में श्शुक्रताल्य विलक्षण तीर्थ है भाई।।
शिवगणों ने स्नानकर, जहां अपने शाप से मुक्ति पाई।
शिववल्लभ तीर्थनगरी ही अब गढमुक्तेश्वर कलाई।।
शिव के त्रिशूल पर बसी हुई है, अद्भुत नगरी काशी।
कुछ लोग बनारस भी कहते इसे, वही है वाराणसी।।
गज-ग्राह का यही हुआ था, एक अद्भुत संग्राम।
सोन नदी के तट पर, हरिहर क्षेत्र है अनुपम धाम।।
पश्चिमी बंगाल में हुगली नाम से, गंगा का सागर से हुआ मिलन।
सारे तीर्थ बार-बार, गंगा सागर एक बार कहते है सज्जन।।
बंगलादेश में पद्मा नदी भी गंगा की ही धारा है।
बंगाल की खाड़ी में गिरने का उसका सुन्दर नजारा है।।
गंगा, गीता, गायत्री ये तीनो भारत भूमिकी पहचान।
इनकी अनुपम प्रतिष्ठा से, विदेशों मे है भारत का मान।।
गंगाजल को अब हमने निर्मल और पवित्र यदि रखना है।
औद्योगिक रसायन, कूड़ा-कचरा के प्रदूषण से मुक्त करना है।।
अब नमामि गंगें का प्रधानमंत्री ने रखा है एकदम ध्यान।
आओ हम सब सफल बनाये उनका यह सुन्दर अभियान।।
पोलीथीन, प्लास्टिक के कचरे से कितना बढता है प्रदूषण।
कूड़े के ढेर में गुम हो रहे शहर, करना है सही निवारण।।
           - सुमनपाल सिंह, उप सम्पादक