Friday, 10 April 2015

कैसे कहूं...

कैसे कहूं कि कलम का पुजारी नही हूं मै।
मै प्यार बांटता हूं- अनाड़ी नही हूं मैं।।
कहानी के सभी पात्र आस-पास है रहते।
हम पर लिखो रचनाएं, कलम से मेरी कहते।।
रचनाओं से जोड़ता हूं, मै बिखरे समाज को।
मैं मसखरा नही हूं, मदारी नही हूं मैं।। १।।
प्रकृति के हंसी नजारे, कल्पना मेरी बनते।
मानवीय संवेदना भरी, रचना मेरी बनते।।
जागरूक करे लोगों को ऐसा हो कथानक।
मदहोश बना दे जो, वो खुमारी नही हूं मैं।। २।। कैसे कहूं
जो तथ्य हो, सत्य, कल्पना में ढालना है।
मार्ग-दर्शन हो युवाओ का, मेरा मानना है।।
सामाजिक समरसता, जन-जन की भावना है।
समता-मूलक अभियान पर, भारी नही हूं मैं।। ३।। कैसे कहूं
हुस्न, इश्क, शबाब न अधिक पेश हूं करता।
विविध रंगो से सजांऊ, काव्य का गुलदस्ता।।
भावनाओं की सुगंध से लबरेज हो कविता।
मात्र मनोरंजन करने का, अधिकारी नहीं हूं मैं।। ४।। कैसे कहूं
मां सरस्वती से मांगता, मै यही वरदान।
अच्छा साहित्य ही रचूं, मिलेगा सम्मान।।
जीवन में न कंरू मै, किचिंत भी अभिमान।
अश्रु जो टपके आंख से, खारी नही हूं मैं।। ५।। कैसे कहंू
वीणा पाणि की कृपा से, शोहरत मुझे मिले।
पाठकों के स्नेह की, अूल्य दौलत मुझे मिले।।
जन-जन को दे संदेश, ऐसी हो मेरी रचना।
झोली फैलाये हूं खड़ा, भिखारी नहीं हूं मैं।। ६।। कैसे कहूं

No comments:

Post a Comment