प्रश्न-1 समाज में शिक्षा का उजाला फैलाने के लिए आपको यश भारती पुरस्कार दिया गया। इसके बारे में आप क्या कहेंगे?
उत्तररू सबसे पहले मैं प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव जी के साथ उत्तर प्रदेश सरकार के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ कि उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए मुझे श्यश भारती्य पुरस्कार से सम्मानित किया। निश्चित रूप से इस सम्मान को प्राप्त करने के बाद मेरी जिम्मेदारी पहले से भी ज्यादा बढ़ गई है कि मैं संतुलित एवं उद्देश्यपूर्ण शिक्षा के माध्यम से समाज को और भी अधिक सुन्दर एवं सुरक्षित बनाने के लिए प्रयासरत् रहूँ। हमारा हमेशा ये यही मानना रहा है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर को मनुष्य द्वारा अर्पित की जाने वाली समस्त सम्भव सेवाओं में से सर्वाधिक महान सेवा है - (1) बच्चों की शिक्षा (2) उनके चरित्र का निर्माण तथा (3) उनके हृदय में परमात्मा के प्रति प्रेम उत्पन्न करना। इस प्रकार शिक्षा मेरे लिए व्यवसाय का विषय नहीं बल्कि सेवा का विषय है। और मैं आपके माध्यम से अपने सम्मानित अभिभावकों को इस बात का पूर्ण विश्वास दिलाता हूँ कि मैं अपनी इस सेवा में किसी भी प्रकार से कमी नहीं आने दूगां।
प्रश्न-2 अपने शुरूआती संघर्ष से अब तक के दौर को विस्तार से बताये।
उत्तररू मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के ही एक गरीब खेतिहर किसान परिवार में अलीगढ़ जनपद के ग्राम बरसौली में 10 नवम्बर, 1936 को हुआ। मेरे पिता स्व. श्री फूलचन्द्र अग्रवाल जी गांव के लेखपाल थे और मेरी माता स्व. श्रीमती बासमती देवी जी एक धर्म परायण महिला थी। प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा मेरी गांव में ही हुई और समाज सेवा की सर्वप्रथम प्रेरणा मुझे मेरे चाचा स्व. श्री प्रभु दयाल जी से मिली जो कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। मैं बचपन से ही महात्मा गांधी जी के विचारों से बहुत प्रभावित था। मेरे चाचाजी ने मुझे गांधी जी से मिलाने का वादा किया था किन्तु आजादी के छरू महीने के अंदर ही 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी जी की हत्या कर दी गई। इस घटना ने मुझे झकझोर कर रख दिया। उस समय मैं कक्षा 6 का छात्र था। उसी समय मैंने महात्मा गांधी जी की शिक्षाओं को अपने जीवन का आदर्श बनाने का निर्णय लिया और मैंने अपने पिताजी की सहमति से अपने विद्यालय के प्रधानाचार्य को पत्र लिखकर अपना नाम जगदीश प्रसाद अग्रवाल से बदलकर श्जगदीश गाँधी्य करनेका निवेदन किया। मेरे इस निवेदन को उन्होंने मान लिया। हाईस्कूल की पढ़ाई मैंने जी.एस. इण्टर कॉलेज, सिकन्दराराव (अलीगढ़) से प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण किया। अपने कोर्स की अंग्रेजी की किताब में महात्मा गांधी द्वारा लिखित लेख श्स्टूडेन्टस एण्ड दी समर वैकेशन्स्य से प्रभावित होकर मैंने श्समाज सेवा दल्य बनाया था। यह दल गर्मियों की छुट्टियों में आसपास के गांवों में जाकर गलियों एवं नालियों आदि की सफाई करने के साथ ही गांव के अशिक्षित बच्चों को पढ़ाकर शिक्षा के प्रति उनमें रूचि पैदा करने के साथ ही गांव वालों को पर्दाप्रथा, नशाखोरी, रूढि़वादिता तथा बाल विवाह न करने के प्रति जागरूकता भी पैदा करता था। जनवरी 1952 में अलीगढ़ मे यू.पी. स्वीपर यूनियन के आह्वान पर लगातार 24 दिनों तक चली हड़ताल के समय समाज सेवा दल के 50 सदस्यों ने सफाई अभियान चलाकर 90 ट्रक कूड़ा-करकट, गंदगी तथा मैला निकालकर शहर को साफ-सुथरा किया। इस काम से प्रभावित होकर जिला प्रशासन की ओर से प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल महामहिम श्री के.एम. मुंशी के कर कमलों द्वारा समाज सेवा दल को पुरस्कार के रूप में रू 04,600ध्- की धनराशि दी गई। इस पैसे से मैंने जी.एस. इण्टर कालेज, सिकन्दरामउ (अलीगढ) में समाज सेवा सदन का एक कमरा बनवाया। इण्टर की पढ़ाई मैंने मथुरा के चम्पा अग्रवाल कालेज से की। इस दौरान मैंने श्अच्छे विद्यार्थी बनो्य आन्दोलन चलाया। जब मैं 12वीं क्लास में था तो इस वर्ष पिताजी ने मुझे सर्दियों के लिए गर्म कपड़े बनवाने के लिए पैसे भेजे, जिससे मैंने अपने लिए टाट के मोटे कपड़े बनवाने के बाद बचे हुए शेष पैसे स्कूल के एक गरीब जमादार की दो बेटियों के विवाह के लिए दे दिया। इस वर्ष विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री के.एन. गर्ग ने मुझे विद्यालय का श्सर्वश्रेष्ठ छात्र्य घोषित किया।
जुलाई, 1955 में एक सन्दूक सर पर रखकर मैंने उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ विश्वविद्यालय का रूख किया। यहाँ पर मैंने बी0काम0 में प्रवेश लिया। आर्थिक तंगी व रहने का कोई ठिकाना न होनेे के कारण मैंने लखनऊ विश्वविद्यालय के समीप ही गोमती नगदी के किनारे बने एक मन्दिर में शरण ली। पेट की भूख को शांत करने के लिए मैंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया। इसके बदले में बच्चे मेरे लिए अपने घर से रोटियां लाते थे। इसके साथ आर्थिक तंगी से जूझते हुए मैंने अखबार बेचकर भी अपनी पढ़ाई एवं खाने-पीने की व्यवस्था की। लखनऊ विश्वविद्यालय में भी मैंने अपने सहपाठियों के सहयोग से शिक्षा में सुधार लाने व समाज सेवा के कामों को जारी रखा। अपने इन्हीं कामों की वजह से ही मैं वर्ष 1957 में लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ का उपाध्यक्ष एवं वर्ष 1958 में एम0कॉम0 द्वितीय वर्ष का छात्र रहते हुए भारी बहुमत से श्अध्यक्ष्य चुना गया। इन दोनों ही चुनावों में बिना पैसे के मैंने छात्रों से व्यक्तिगत सम्पर्क करते हुए भारी जीत हासिल की। मेरे व्यक्तिगत आमंत्रण पर छात्र संघ के शपथ ग्रहण समारोह में तत्कालीन प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू मुख्य अतिथि के रूप में पधारे थे।
इसी बीच जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारदानन्द सरस्वती जी के लखनऊ में आयोजित एक आध्यात्मिक सत्संग में मेरी मुलाकात भारती जी से हुई। उस समय भारती जी लखनऊ विश्वविद्यालय में ही एम.एड. की छात्रा थी। आध्यात्मिक प्रवृत्ति के होने के कारण ही हम दोनों एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हुए। हम दोनों ही बच्चों की शिक्षा के माध्यम से समाज के उत्थान व भलाई के लिए काम करने के इच्छुक थे। फलस्वरूप 15 जनवरी, 1959 को हम दोनों परिणय सूत्र से बंध गये। हमारे दहेजरहित एवं सादगीपूर्ण विवाह में प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल महामहिम श्री वी.वी. गिरि, जो बाद में चलकर भारत के राष्ट्रपति भी बनें, के साथ ही प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री श्री सम्पूर्णानंद जी एवं प्रदेश मंत्रिमण्डल के अनेक सदस्य, विश्वविद्यालय के शिक्षक एवं छात्र आदि भी भारी संख्या में पधारे थे। इस विवाह समारोह में 2 रूपये की मिश्री मगांकर सभी लोगों का मुँह मीठा कराया गया था। 1 जुलाई, 1959 को मैंने भारती जी के साथ मिलकर किराये के मकान 12 स्टेशन रोड पर ही सिटी मोन्टेसरी स्कूल की नींव डाली। शुरू के 15 दिनों तक एक भी बच्चा स्कूल में प्रवेश के लिए नहीं आया। 16 जुलाई को भारती जी ने हमारे एक पड़ोसी श्री सोहन लाल अग्रवाल की पत्नी श्रीमती जसोदा देवी अग्रवाल से प्रार्थना की कि वह अपने परिवार के बच्चों को उनके स्कूल में दाखिला करा दें। श्रीमती अग्रवाल हम दोनों की बच्चों की शिक्षा के प्रति लगन तथा समर्पण भाव से काफी प्रभावित थीं उन्होंने अपने ईश्वरीय परिवार से 5 बच्चों को इस स्कूल में पढने के लिए भेज दिया और इन्हीं बच्चों से सिटी मोन्टेसरी स्कूल की नींव पड़ी। महात्मा गांधी के सपनों को पूरा करने के लिए हमारे विद्यालय ने प्रारम्भ से ही श्जय जगत्य को ध्येय वाक्य के रूप में अपनाया है। सिटी मोन्टेसरी स्कूल की विशिष्ट शिक्षा पद्धति पर विश्वास करते हुए ही लखनऊ की जनता ने सिटी मोन्टेसरी स्कूल को गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में स्थान दिलवाया। सी.एम.एस. की विशिष्ट एवं विस्तृत शिक्षा पद्धति को अत्यधिक पसंद किये जाने के कारण ही भारत सरकार के मानव संसाधन विभाग द्वारा सी.एम.एस. को वर्ष 2002 में श्यूनेस्को प्राइज फॉर पीस एजूकेशन्य के लिए नामित किया। यह पहला अवसर था जब किसी विद्यालय को भारत सरकार द्वारा यूनेस्को प्राइज फॉर पीस एजूकेशन के लिए नामित किया गया था। यूनेस्को महानिदेशक और यूनेस्को प्रतिनिधि प्रो0 एम. तौफीक द्वारा 12 जून, 2002 को भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय विभाग मंत्री को भेजे गये एक पत्र के माध्यम से सी0एम0एस0 की शांति एवं सहिष्णुता के विश्वव्यापी मूल्यों को बढ़ावा देने के प्रयास के लिए वर्ष 2002 के श्प्राइज फॉर पीस एजूकेशन्य पुरस्कार के लिए चयनित किये जाने की आधिकारिक सूचना दी गई। 23 सितम्बर, 2002 को पेरिस में यूनेस्को मुख्यालय में आयोजित एक भव्य समारोह में सी0एम0एस0 को 30,000 अमेरिकी डॉलर के श्यूनेस्को प्राइज फॉर पीस एजूकेशन्य से सम्मानित किया गया।
प्रश्न-3 विश्व शांति का संदेश देने का जो आपका अभियान है। आप उसमें कितना सफल हुए हैं।
उत्तररू जब मैं केवल 9 वर्ष का था उसी समय द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा 6 अगस्त 1945 को जापान के हिरोशिमा नगर तथा 9 अगस्त 1945 को नागासाकी शहर पर परमाणु बम गिराया गया था। इन परमाणु बमों के कारण हुए महाविनाश से मेरा मन तड़पकर रह गया था। उसी समय मैंने दुनियाँ से युद्धों को समाप्त करके विश्व में एकता एवं शांति की स्थापना का संकल्प लिया था। मेरी इस संकल्प को और अधिक मजबूती प्रदान की राजा महेन्द्र प्रताप जी ने। अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान एक बार मैं उनसे मिलने गया था। उस समय उन्होंने मुझे एक पत्रिका दी थी जिसका नाम था श्संसार संघ्य। इस पत्रिका में छपे लेखों ने भी मेरे मन में श्संसार संघ्य बनाकर श्विश्व एकता्य स्थापित करने की ज्योति जलाई। सिटी मोन्टेसरी स्कूल ने अपनी परिकल्पना के अनुरूप बच्चों को उद्देश्यपूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए जिस मार्ग को चुना उसकी सफलता का यह तथ्य स्वयं साक्षी है कि वर्ष 1959 में जिस विद्यालय को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपनों को पूरा करने के लिए श्जय जगत्य के ध्येय वाक्य को अपनाते हुए मात्र 5 छात्रों से शुरू किया गया था उस विद्यालय में वर्तमान में लगभग 50,000 से अधिक बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। नोबेल शान्ति पुरस्कार से सम्मानित नेल्सन मण्डेला ने कहा है कि श्श्संसार में शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है जो दुनियाँ को बदल सकती है।्य्य इस प्रकार विश्व एकता एवं विश्व शांति की शिक्षा के द्वारा हम अपने बच्चों के मन मस्तिष्क में शांति रूपी बीज को बोते जा रहे हैं। इन 55 वर्षों में हमारी विद्यालय से संतुलित एवं उद्देश्यपूर्ण शिक्षा प्राप्त करके विश्व के कई देशों में विश्व शांति एंव एकता की ज्योति को फैलाते जा रहे हैं। इसके साथ ही साथ हमारे विद्यालय द्वारा आयोजित किये जाने वाले 30 अंतर्राष्ट्रीय शैक्षणिक सम्मेलनों में आने वाले देश-विदेश के बच्चों के मन मस्तिष्क में विश्व शांति एवं विश्व एकता के बीज भी बोये जा रहे हैं।
सिटी मोन्टेसरी स्कूल द्वारा बच्चों को दी जा रही विश्व एकता एवं विश्व शांति की शिक्षा की सफलता का प्रमाण हमको मिले विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से स्वयं सिद्ध है जिसमें सी.एम.एस. को यूनेस्को द्वारा 30,000 अमरीकी डालर का अंतर्राष्ट्रीय शान्ति शिक्षा पुरस्कार-2002 के साथ ही आई.सी.एस.सी. काउन्सिल द्वारा प्रदत्त श्डेरोजियो अवार्ड्य, जर्मनी की संस्था द्वारा विश्व के श्न्यूक्लिर फ्री फ्यूचर्य का श्स्पेशल अचीवमेन्ट अवार्ड्य, स्वीडन की संस्था द्वारा श्राइट्स ऑफ दी चाइल्ड्य का अवार्ड, पोलेण्ड की ऐकेडमी ऑफ साइन्सेज द्वारा श्फ्रेण्ड आफ यंग फिजीसिस्ट अवार्ड्य, वल्र्ड पीस प्रेयर सोसाइटी जापान द्वारा पीस रिप्रेसेन्टेटिव लखनऊ सम्मान, साम्प्रदायिक सौहार्द के लिये वारिस अली शाह श्कौमी एकता्य पुरस्कार, एशियन नोबेल प्राइज कहे जाने वाले फिलीपीन्स के अत्यन्त प्रतिष्ठित सम्मान श्श्गुसी पीस प्राइज्य्य से सम्मानित किया जा चुका है। इसके साथ ही मेरे द्वारा बच्चों के अधिकारों व विश्व एकता व विश्व शांति हेतु किये जा रहे अथक प्रयासों के लिए रूस की प्रख्यात श्बक्सीर स्टेट पोडागोगिकल यूनिवर्सिटी्य, ऊफा द्वारा श्डॉक्टर ऑफ फिलॉसिफी्य की उपाधि दी गई। इस अवसर पर विश्वविद्यालय ने कहा है कि श्श्इस विश्वविद्यालय ने एक मत होकर आपको पी.एच.डी. की मानद उपाधि देने का निश्चय किया है और यह सम्मान आपके 50 वर्षो से अधिक समय से शिक्षा के माध्यम से सम्पूर्ण मानव जाति की सेवा के लिए दिया जा रहा है जिसमें विशेषकर आपके उस योगदान के लिए जिसके अन्तर्गत आप शिक्षा के माध्यम से दुनियाँ भर की वर्तमान पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित करने तथा आगे जन्म लेने वाली पीढियों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए प्रयासरत् हैं।्य्य इसके साथ ही अर्जेन्टीना की दो प्रख्यात विश्वविद्यालयों श्यूनिवर्सिटी ऑफ ऐनेट्री रिओस्य द्वारा एवं यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ मेन्डोजा्य द्वारा श्डाक्टरेट की मानद उपाध्यि से भी सम्मानित किया जा चुका है।
हमारा मानना है कि शिक्षा ही वह उपकरण है जिसके माध्यम से सारे विश्व में सामाजिक परिवर्तन लाया जा सकता है। और यूनेस्को के श्विश्व शान्ति शिक्षा्य पुरस्कार के साथ ही कई अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कारों से स्कूल होने के नाते तथा सी.एम.एस. की विचारधारा, सी0एम0एस0 की शिक्षा के उद्देश्य तथा शिक्षा के दर्शन के अनुसार यह स्कूल विश्व की मानवजाति की एकता, सर्व-धर्म एकता और विश्वशांति की शिक्षा के प्रति एवं बालकों के सुरक्षित भविष्य के लिए पूरी तरह से समर्पित है। मैं आपको इस बात का विश्वास दिलाता हूँ कि मै विश्व के 2.4 अरब बालकों (भारत के 40 करोड़ बच्चों सहित) को तथा भविष्य में आने वाली पीढियों को सुरक्षित एवं शांतिपूर्ण विरासत देने के लिए मैं अपनी जिंदगी की अन्तिम सांस तक प्रयासरत् रहूगां।
प्रश्न-4 आज के दौर की शिक्षा के बारे में क्या कहेंगे।
उत्तररू आज विद्यालयों में बच्चों की एकांकी शिक्षा अर्थात केवल भौतिक शिक्षा हो रही है जबकि (1) मनुष्य एक भौतिक प्राणी है, (2) सामाजिक प्राणी है तथा (3) वह एक आध्यात्मिक प्राणी भी है। इसलिए मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए उसे सर्वश्रेष्ठ (1) भौतिक शिक्षा के साथ ही साथ (2) मानवीय एवं (3) आध्यात्मिक शिक्षा भी देनी चाहिए। प्रारम्भिक काल में षिक्षालयों में बालक को बाल्यावस्था से भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार की शिक्षा संतुलित रूप से मिलती थी। उस समय मानव जीवन सुन्दर, सुखी तथा एकता से भरपूर था। किन्तु 20वीं सदी में विश्व के सभी देशों के स्कूलों ने बच्चों को अपने-अपने देश से तो प्रेम करने की शिक्षा तो दी लेकिन उन्होंने बच्चों को शिक्षा के द्वारा सारे विश्व से प्रेम करना नहीं सिखाया। इसलिए 21वीं सदी की शिक्षा का स्वरूप विश्वव्यापी तथा मानव कल्याण होना चाहिए जिससे सारी मानव जाति से प्रेम करने वाले विश्व नागरिक विकसित हो सकें और जिनके प्रयास से सारे विश्व में शांति एवं एकता की स्थापना हो सके। इस प्रकार यूनेस्को के श्विश्व शान्ति शिक्षा्य पुरस्कार के साथ ही कई अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कारों से स्कूल होने के नाते तथा सी.एम.एस. की विचारधारा, सी0एम0एस0 की शिक्षा के उद्देश्य तथा शिक्षा के दर्शन के अनुसार यह स्कूल विश्व की मानवजाति की एकता, सर्व-धर्म एकता और विश्वशांति की शिक्षा के प्रति एवं बालकों के सुरक्षित भविष्य के लिए पूरी तरह से समर्पित है ताकि विश्व के 2.4 अरब बालकों (भारत के 40 करोड़ बच्चों सहित) को तथा भविष्य में आने वाली पीढियों को सुरक्षित एवं शांतिपूर्ण विरासत दी जा सके। सी0एम0एस0 का मानना है कि विद्यालय के चार दीवारों के बीच में ही कल के भविष्य का निर्माण किया जाता है। ऐसे में प्रत्येक बच्चे को विश्व का प्रकाश बनाने के लिए उसे - (क) बच्चों को श्सार्वभौमिक जीवन-मूल्य्य (ठ्ठद्ब1द्गह्म्ह्यड्डद्य ङ्कड्डद्यह्वद्गह्य) (ख) बच्चों को श्विश्वव्यापी चिंतन्य (त्रद्यशड्ढड्डद्य ठ्ठस्रद्गह्म्ह्यह्लड्डठ्ठस्रद्बठ्ठद्द) (ग) बच्चों को श्विश्व की सेवा के लिए्य (स्द्गह्म्1द्बष्द्ग ह्लश ह्लद्धद्ग ङ्खशह्म्द्यस्र) तथा (घ) बच्चों को श्सभी चीजों में उत्कृष्ट्य (श्व3ष्द्गद्यद्यद्गठ्ठष्द्ग द्बठ्ठ ड्डद्यद्य ह्लद्धद्बठ्ठद्दह्य) बनाने की शिक्षा देनी चाहिए।
प्रश्न-5 आपकी बड़ी शैक्षणिक संस्था मानी जाती है। आपके विद्यालय की वर्तमान में कितनी शाखायें हैं व कुल कितने बच्चे हैं।
उत्तररू सिटी मोन्टेसरी स्कूल ने अपनी परिकल्पना के अनुरूप बच्चों को उद्देश्यपूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए जिस मार्ग को चुना उसकी सफलता का यह तथ्य स्वयं साक्षी है कि वर्ष 1959 में जिस विद्यालय को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं बिनोवा भावे जी के सपने को पूरा करने के लिए श्जय जगत्य के ध्येय वाक्य को अपनाते हुए मात्र 5 छात्रों से शुरू किया गया था उस विद्यालय में वर्तमान में लगभग 50,000 से अधिक बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इस विद्यालय की विचारधारा और विस्तृत एवं अनूठी शिक्षा पद्धति को लखनऊ की जनता के द्वारा अत्यधिक पसंद किये जाने के कारण ही वर्ष 1999 में सी0एम0एस0 को एक ही शहर में सबसे अधिक बच्चों वाले विद्यालय के रूप में श्गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में दर्ज किया गया। जनता की उत्तरोत्तर मांग पर इस विद्यालय को नगर के विभिन्न क्षेत्रों में 20 शाखाओं में चलाया जा रहा है।
प्रश्न-6 आप भी विधायक रहे हैं। वर्तमान जनप्रतिनिधियों की दशा और गिरती राजनीति व्यवस्था में क्या कहेंगे।
उत्तररू वर्ष 1969 से 1974 तक मैं उत्तर प्रदेष विधान सभा का सदस्य रहा हूँ। मैं प्रदेश के अलीगढ़ जनपद की सिकन्दरा राव सीट से निर्दलीय विधायक था। विधायक रहते हुए ही मैं वर्ष 1974 में एक शैक्षिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए इंग्लैण्ड गया था। वहाँ पर मैंने श्री ओ.पी. शबी तथा कुछ भारतीय मूल के निवासियों के सहयोग से श्इंडिया इण्टरनेशनल क्लब्य की स्थापना लंदन में की। इसी क्लब के सहयोग से मैंने 17 से 19 दिसम्बर, 1974 तक श्श्शिक्षा द्वारा विश्व शांत्य्यि विषय पर तीन दिवसीय श्इण्टरनेशनल यूथ कांफ्रेस्य विक्टोरिया हाल, लंदन में आयोजित की। इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में विश्व के 47 देशें के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था। उस समय की राजनीति एवं वर्तमान राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव हो चुका है। और हमारा ऐसा मानना है कि जब तक हम अपनी बाल एवं युवा पीढ़ी को सर्वोत्तम भौतिक शिक्षा के साथ ही उन्हें मानवीय और आध्यात्मिक शिक्षा नहीं देंगे तब तक परिवार, समाज और देश को सुन्दर एवं सुरक्षित बनाने की हमारी परिकल्पना निरर्थक ही सिद्ध होगी। ऐसा नहीं है कि आज सभी जनप्रतिनिधियों की हमारे समाज में प्रतिष्ठा घटी है। आज भी हमारे देश की राजनीति में ऐसे कई नाम हैं जिनको हमारे देश की जनता बहुत ही सम्मान देती है। हाँ अब यह जरूर है कि राजनीति में आने वाले लोगों के चरित्र का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। हमारा जनप्रतिनिधि ऐसा होना चाहिए जो कि अपने राष्ट्र के साथ ही साथ पूरे विश्व को सुन्दर व सुरक्षित बनाने के लिए अपना योगदान दें।
प्रश्न-7 आपकी सरलता से लोग प्रभावित रहते हैं। अपने जीवनचर्या के बारे में बताइये कि लोगों को उसका फायदा मिले।
उत्तररू लखनऊ की सारी जनता जानती है कि हमारा जीवन एक खुली किताब की तरह है। मैंने सदैव ही अपने जीवन में सादगी को ज्यादा महत्व दिया है। श्सादा जीवन एवं उच्च विचार्य को महत्व देते हुए मैं एक किराये के मकान में रहता हूँ, हमारे पास अपना निजी मकान नहीं है। न ही हमारे पास बुढ़ापे के लिए कोई धन सम्पत्ति है। हमारा मानना है कि बच्चों की सर्वोत्तम शिक्षा ही परमात्मा की सबसे बड़ी पूजा है। इस प्रकार बच्चों की शिक्षा के माध्यम से धन कमाना हमारा उद्देश्य नहीं है, अपितु बच्चों की शिक्षा के माध्यम से समाज की सेवाभावना ही हमारा उद्देश्य है। मेरी दिनचर्या सुबह 5.00 सोकर उठने से शुरू होकर रात में 11.00 बजे तक चलती रहती है। सुबह 5 बजे मैं योग के लिए जाता हूँ। खाने में मैं डाक्टर की सलाह पर केवल सादा भोजन ही ग्रहण करता हूँ। दिन-रात बच्चों की शिक्षा के लिए अलग-अलग कामों में लगे रहना ही मेरी दिनचर्या है। विद्यालय की 20 शाखाओं के संचालन के साथ ही साथ 30 अंतर्राष्ट्रीय समारोहों की व्यवस्था आदि में कम समय निकल जाता है, कुछ पता ही नहीं चलता हैं
प्रश्न-8 आप कई विश्वस्तरीय कार्यक्रम आयोजित करते है। उसके बारे में बतायें।
उत्तररू सी0एम0एस0 द्वारा आयोजित किये जाने वाले 30 अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों में देश-विदेश से पधारे प्रतिभागी छात्रों के साथ प्रतिस्पद्र्धा करने के लिए सी0एम0एस0 के छात्र अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की तैयारी करते हैं। इस प्रकार सी0एम0एस0 के सभी शाखाओं के छात्रों में चुनी जाने वाली टीम में शामिल होने की होड़ लग जाती है, जिससे सी0एम0एस0 का लगभग प्रत्येक छात्र लाभान्वित होता है। इस प्रकार सी0एम0एस0 में वर्ष भर विभिन्न विषयों की जोरदार तैयारी का शैक्षिक वातावरण भी निर्मित होता है। इन अंतर्राष्ट्रीय समारोहों में प्रतिभाग हेतु विश्व के अनेक देशों से आने वाले सभी प्रतिभागियों को सी0एम0एस0 के आदर्श वाक्य श्जय जगत्य एवं भारत की संस्कृति और सभ्यता के साथ ही श्वसुधैव कुटुम्बकम््य की विचारधारा से भी परिचित कराया जाता है। इस प्रकार इन प्रतियोगिताओं के माध्यम से यह एक ऐसा अद्भुत मंच बन जाता है जिसमें विश्व के अनेक देशों की संस्कृति और सभ्यता के साथ ही भारत की संस्कृति एवं सभ्यता का समागम भी होता है जो छात्रों के लिये अनुपम उपलब्धि का अवसर प्रदान करता है। वास्तव में इस प्रकार के कार्यक्रम छात्रों के मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालते हैं और इस विचार को दृढ़ करते है कि मानवता एक है, विश्व एक है और यह पृथ्वी तथा प्रकृति सभी का पोषण समान रूप से करती है। ऐसे विचार भविष्य में श्विश्व एकता्य तथा श्विश्व शांत्यि के उद्देश्य में सहायक होंगे। ऐसे आयोजनों से एक अन्तर्राष्ट्रीय मंच तो उपलब्ध होता ही है साथ ही आत्मविश्वास एवं विभिन्न विषयों का सर्वोच्च विश्व स्तरीय ज्ञान तथा बुद्धिमत्ता से लबालब छात्र अनेक राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार तथा स्कॉलरशिप जीतने का कीर्तिमान बना रहे हैं।
बच्चों में न्याय एवं कानून के प्रति सम्मान उत्पन्न करने तथा विश्व में एकता एवं शांति की स्थापना के लिए सी.एम.एस. द्वारा प्रतिवर्ष विश्व के मुख्य न्यायाधीशों का अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन भी आयोजित किया जाता है। अभी तक 14 अंतराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया जा चुका है जिसमें 109 देशों के 688 मुख्य न्यायाधीश एवं न्यायाधीश प्रतिभाग कर चुके हैं। इस प्रकार इस सभी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के माध्यम से मेरा उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से सारे विश्व में एकता एवं शांति की स्थापना करना है।
