Sunday, 3 May 2015

मच्छरों से छुटकारा दिलाएंगे पौधे

घर के आसपास लगे कुछ पौधे ही मच्छर के बचाव के लिए सुरक्षा कवच का काम कर सकते हैं। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च के हाल ही प्रकाशित शोध पत्र में इस बात खुलासा किया है। इसमें पाया गया है कि मच्छरों से बचने के लिए किए गए किसी भी रासयनिक छिड़काव की जगह घर के किचन गार्डन में लगे कुछ जाने-माने पौधे ही मच्छरों से मुकाबला करने के लिए काफी है। सदाबहार, सांची, गारडेनिया जैसे पौधों को हम केवल उनके खूबसूरत फूलों की वजह से जानते हैं। आयुर्वेद में कभी इनका प्रयोग डायबिटिज या फिर ब्लडप्रेशर को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है, लेकिन पहली बार इनकों मच्छरों के लार्वा खत्म करने के लिए भी बेहतर माना गया है।
शोधकर्ता अनुपम घोष के अनुसार देश में हर साल मच्छर जनित बीमारियों के बढ़ते आंकड़ों को देखते हुए इससे बचाव के लिए नये विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए। अब तक किए गए अध्ययन में यह भी देखा  गया है कि लंबे समय तक स्प्रे या फिर मच्छररोधी छिड़काव सेहत के लिए ठीक नहीं, जबकि वेक्टर बोर्न बीमारी या मच्छर जनित बीमारियों के लिए सरकार अब तक कोई कारगर वैक्सीन भी नहीं बना पाई है। यही कारण है कि शुरू से ही मच्छरों से बचाव पर अधिक ध्यान दिया जाता है। इसी क्रम में बायोलॉजिकल स्प्रे में कुछ पौधों की पत्तियों के मिश्रण को मच्छरों को दूर भगाया जा सकता है। शोध के आधार पर अब पौधों से तैयार स्प्रे को नियमित मच्छर रोधी कार्यक्रम में शामिल करने की पैरवी की जा रही है। अहम यह है कि इन पौधों को आसानी से घर पर लगाया जा सकता है।
कैसे हुआ अध्ययन
इस बावत भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और जूलॉजी विभाग क्रिश्चियन कॉलेज बाकुरा की टीम द्वारा अध्ययन किया गया। अध्ययन में क्यूलेक्स प्रजाति के १०० से अधिक मच्छरों के लार्वा को स्वच्छ पानी में रखा गया। शोध टीम में शामिल डॉ. अनुपम घोष ने बताया कि लार्वा को बढने के लिए कुछ अप्राकृतिक खाद्य सामग्री भी पानी में डाली गई। जिसमें यीस्ट पाउडर और कुत्तों को दिए जाने वाले बिस्कुट शामिल थे। लार्वा को ३१ से ३३ डिग्री सेल्सियस के तापमान पर एक हफ्ते तक रचाा गया। इससे पहले यीस्ट पॉउडर में चिकित्सीय पौधों को पत्ती से तैयार मिश्रण को मिलाया गया।

कल्याणं करोति का नेत्र शिविर

स्व0 पं0 हरस्वरूप शर्मा जी की पुण्य स्मृति में, तन्मय ट्रस्ट, कल्याणं करोति मेरठ (पंजीकृत) एवं जिला दृष्टिड्ढहीनता निवारण समिति (मेरठ)  के संयुक्त तत्वाधान में लैन्स की सुविधा के साथ निरूशुल्क नेत्र चिकित्सा शिविर का आयोजन राधा गोविन्द पब्लिक स्कूल, कॉपरेटिव सोसाईटी के पीछे, खरखौदा, (मेरठ) के प्रांगण में आयोजित किया गया। जिसमें १५५ नेत्र रोगियों की जांच डा0 पी.पी. मित्तल द्वारा की गयी, सभी नेत्र रोगियों का निरूशुल्क दवाईयां वितरित करके १४ के मोतियाबिन्द के आपरेशन हेतु चयन किया गया। सभी नेत्र रोगियों को मोतियाबिन्द के आपरेशन हेतु कल्याणं करोति, मेरठ द्वारा संचालित निरूशुल्क नेत्र चिकित्सालय कैन्टोनमैन्ट जनरल अस्पताल, मेरठ छावनी में लाया गया।
सभी आपरेशन डा0 पी0पी0 मित्तल द्वारा किये गये। चश्में के लिए ६२ नेत्र रोगियों की जांच श्री संजय कुमार द्वारा की गयी और २३ को रियायती दर पर चश्में उपलब्ध कराने का निर्णय लिया गया। शिविर को सफल बनाने हेतु सर्व श्रीमतीध्श्री तिलकराज अरोड़ा, ईश्वरचन्द गुप्ता, डा0 (कु0) सरोजनी वासन, ब्रहमदत्त शर्मा, शैलजा दत्त, प्रशान्त शर्मा,   मीता एवं विजय आदि ने विशेष योगदान दिया।
कैन्टोनमैन्ट जनरल अस्पताल, बेगमपुल, मेरठ   पिन-२५०००१
फोन: (का0) ०१२१-२६६४७२२, (अध्यक्ष) ९४१२२०६२१०, (महामंत्री) ९४५६८३८४५६ म्उंपसरू ााउउममतनज/हउंपसण्बवउ

ओशो सत्संग और मेडिटेशन

गोमती आत्मदर्शन की धारा में आज स्वामी देव प्रकाश एडवोकेट ने दीप प्रज्वलित किया। ओशो के १ घंटे प्रवचन का रहा। सभी साधकों ने प्रवचन श्रवणकर आत्मिक लाभ उठाया।
स्वामी आत्मो कामरान ने कीर्तन ध्यान और नादबृहय ध्यान कराया। आज ध्यान की बहुत आवश्यकता है, विक्षिप्ता और मनोरोगो से छुटकारा पाना सम्भव है। हम ध्यान रहने की कला जानते तो जीवन जीना आ गया।
नटराज ध्यान १ घंटे तक कराया हम नृत्य करना भूल गये। हमे नृत्य करना आ जायें तो जीवन में उत्सव उतरने लगता है। मीता के पैरों नाच है, चैतेन्य प्र्रभु के पैरों में नाच है। यह नाच तुम्हारे पैरों में उतर आये तो जीवन उत्सव से धन्य हो जायेगा। तब पता चल जायेगा कि जीवन क्यों मिला। निश्चित ही मन धन्यवाद देने का भाव उमड़ पड़ेगा। प्रत्येक रविवार को १२ बजे शिविर लगता है।
सद्भावना समिति (पंजी.) स्वामी आत्मो कामरान 8057982656, 8273548730

रेल यात्रा में तत्काल मदद हैल्प

ट्रेनों में सफर के दौरान सुरक्षा संबंधी खतरों से बचने और तुरन्त मदद पाने के लिए पीआरएस सिस्टम से जारी होने वाले सभी रेल टिकटों पर निम्नलिखित तत्काल नंबर और सूचनाएं प्रिन्ट की जाएंगीरू- १. आपात स्थिति में संपर्क किए जाने वाले व्यक्ति का नाम व फोन नंबर दर्ज करें। २. खतरे की स्थिति उत्पन्न हेाने पर रेलवे सुरक्षा हैल्पलाइन नंबर डायल करें रू- तत्काल मदद नं0 रू १८२

मिलावटखोरों की शिकायत करें

मेरठ मंडल के आयुक्त आलोक सिन्हा ने चिकित्सा-स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा आदि विभागों के अधिकारियों को कड़ा निर्देश दिया है कि वे होली तक मिलावटखोर मैडिकल स्टोरों, दूध की डेयरियों, हलवाइयों के खिलाफ ऐसा शिकंजा कसें कि ये लोग मिलावट न कर पाएं। साथ ही यह भी निर्देश दिया कि निम्न हैल्पलाइन नंबर सभी विकास खंडों और सरकारी भवनों पर अंकित करा दें, ताकि जनता मिलावट खोरों की शिकायत कर सके रू- १८०० १८० ५५३३

स्वच्छ भारत अभियान, चढ़े परवान

प्रधानमंत्री के ‘स्वच्छ भारत’ अभियान से स्वयं को बड़ा प्रतिष्ठित व ख्याति प्राप्त समझने वाले लोग भी जुडने की घोषणा करते आ रहे है। क्या अपना दोहरा चरित्र जीने वाले इन लोगो से पूछा गया कि वे कहां-कहां सफाई-अभियान में लोगो को जागरूक करने गये। एक दिन हाथ में झाडू लेकर सफाई नही हो सकती। लोगो को समझाये कि वे सफाई की आदत बनाये यहां तो लोग अपने घर को साफ कर कूड़ा सडक पर बिखेर देते है। नाली में थूकने के बजाय सडक के बीच में थूकना अपनी शान समझते है। पान व गुटका खाकर लोग सार्वजनिक स्थलो की दीवारो पर आधुनिक पेन्टिंग बना देते है। ऐसे लेागो को कौन समझा सकता है, कानून का पालन करवा सकता है सफाई के लिए सभी को सचेत होना होगा। पश्चिम के लोग खुद ही पहल करते है। उनके कानून भी सख्त है पकड़े गये तो भारी जुर्माना अदा करना ही पड़ेगा।
पॉलीथीन सफाई का सबसे बड़ा दुश्मन हैं। यह पर्यावरण के लिए घातक है। उसी के प्रयोग से नाली, सीवर तो चोक होते ही है। यह नदियो के लिए भी गंभीर समस्या है। पॉलीथीन का बढ़ता प्रयोग हमारी धरा की जल शोषण की क्षमता क्षीण कर रहा है। जिससे कृषि जगत पर भी एक अदृश्य काला साया मंडरा रहा है। नगरों में ही नही देहातो में भी हवा में उड़ता, बिखरा पॉलीथीन इस बात को बार-बार समझा रहा है कि मेरा उपयोग बड़ा घातक है इसका प्रयोग रोको किन्तु इस ओर न तो हम देखना चाहते है और न ही कुछ करना चाहते है। आज जिस थोड़ी सुविधा के लिए हम पोलीथीन की पन्नियों का प्रयोग करते है यही सुविधा हमारे बच्चों के लिए घातक है। स्वच्छता अभियान सफल बनाने के लिये हम दृढ संकल्प ले।
 यमुना को प्रदूषण मुक्त करने हेतु राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एन.जी.टी.) की सार्थक पहल सचमुच प्रशसनीय है।
अब यमुना नदी में कूड़ा या धार्मिक सामग्री डालते पाये जाने पर ५०० रु. का जुर्माना देना होगा तथा निर्माण सामग्री फैकना भी प्रतिबंधित होगा ऐसा करने वालों पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण के अध्यक्ष न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार ने ५०,००० रु. का जुर्माना लगाने का निर्देश यमुना को प्रदूषण मुक्त करने हेतेु सार्थक पहल है। 

साधना और उपासना के बीच में अंतर


साधक में कुछ खोना नहीं है, पाना है और उपासक में सिवाय खोने के कुछ भी नहीं ळे
कृष्ण के व्यक्तित्व में साधना जैसा कुछ भी नहीं है। हो नहीं सकता। साधना में जो मौलिक तत्व है, वह प्रयास है, इफर्ट है। बिना प्रयास के साधना नहीं हो सकती। दूसरा जो अनिवार्य तत्व है, वह अस्मिता है, अहंकार है। बिना श्मैं्य के साधना नहीं हो सकती। करेगा कौन? कर्ता के बिना साधना कैसे होगी, कोई करेगा तभी होगी। साधना शब्द, जिनके लिए कोई परमात्मा नहीं है, आत्मा ही है, साधना शब्द उनका है। आत्मा साधेगी और पाएगी।
उपासना शब्द बिल्कुल उलटे लोगों का है। आमतौर से हम दोनों को एक साथ चलाए जाते हैं। उपासना शब्द उनका है, जो कहते हैं कि आत्मा नहीं, परमात्मा है। सिर्फ उसके पास जाना, पास बैठनाकृउप-आसन, निकट होते जाना, निकट होते जाना। और निकट होने का अर्थ है, खुद मिटते जाना, और कोई अर्थ नहीं है।
हम उससे उतने ही दूर हैं, जितने हम हैं। जीवन के परम सत्य से हमारी दूरी, हमारी डिस्टेंस उतना ही है, जितने हम हैं। जितना हमारा होना है, जितना हमारा मैं है, जितना हमारा ईगो है, जितनी हमारी आत्मा है, उतने ही हम दूर हैं। जितने हम खोते हैं और विगलित होते हैं, पिघलते हैं और बहते हैं, उतने ही हम पास होते हैं। जिस दिन हम बिलकुल नहीं रह जाते, उस दिन उपासना पूरी हो जाती है और हम परमात्मा हो जाते हैं। जैसे बर्फ पानी बन रहा हो, बस उपासना ऐसी है कि बर्फ पिघल रहा है, पिघल रहा है...
साधना क्या कर रहा है बर्फ? साधना करेगा तो और सख्त होता चला जाएगा। क्योंकि साधना का मतलब होगा कि बर्फ अपने को बचाए। साधना का मतलब होगा कि बर्फ अपने को सख्त करे। साधना का मतलब होगा कि बर्फ और क्रिस्टलाइज्ड हो जाए। साधना का मतलब होगा कि बर्फ और आत्मवान बने। साधना का मतलब होगा कि बर्फ अपने को बचाए और खोए न।
साधना का अर्थ अंततरू आत्मा हो सकता है। उपासना का अर्थ अंततरू परमात्मा है। इसलिए जो लोग साधना से जाएंगे, उनकी आखिरी मंजिल आत्मा पर रुक जाएगी। उसके आगे की बात वे न कर सकेंगे। वे कहेंगे, अंततरू हमने अपने को पा लिया। उपासक कहेगा, अंततरू हमने अपने को खो दिया। ये दोनों बातें बड़ी उलटी हैं। बर्फ की तरह पिघलेगा। उपासक और पानी की तरह खो जाएगा। साधक तो मजबूत होता चला जाएगा।
इसलिए कृष्ण के जीवन में साधना का कोई तत्व नहीं है। साधना का कोई अर्थ नहीं है। अर्थ है तो उपासना का है। उपासना की यात्रा ही उलटी हैं। उपासना का मतलब ही यह है कि हमने अपने को पा लिया, यही भूल है। हम हैं, यही गलती है। टू बी इज दि ओनली बांडेज। होना ही एकमात्र बंधन है। न होना ही एकमात्र मुक्ति है। साधक जब कहेगा तो वह कहेगा, मै मुक्त होना चाहता हूं। उपासक जब कहेगा तो वह कहेगा, मैं श्मैं्य से मुक्त होना चाहता हूं। साधक कहेगा, मैं मुक्त होना चाहता हूं। मैं मोक्ष पाना चाहता हूं। लेकिन श्मैं्य मौजूद रहेगा। उपासक कहेगा, श्मै्य से मुक्त होना है। श्मैं्य से मुक्ति पानी है। उपासक के मोक्ष का अर्थ है, श्ना-मैं्य की स्थिति। साधक के मोक्ष का मतलब है, श्मैं्य की परम स्थिति। इसलिए कृष्ण की भाषा में साधना के लिए कोई जगह नहीं हैय उपासना के लिए जगह है।
अब यह उपासना क्या है, इसे थोड़ा समझें।
पहली तो यह बात समझ लें कि उपासना साधना नहीं है, इससे समझने में आसानी बनेगी। अन्यथा भ्रांति निरंतर होती रहती है। और उपासक हममें से बहुत कम लोग होना चाहेंगे, यह भी ख्याल में ले लें। साधक हममें से सब होना चाहेंगे।
क्योंकि साधक में कुछ खोना नहीं है, पाना है। और उपासक में सिवाय खोने के कुछ भी नहीं है, पाना कुछ भी नहीं है। खोना ही पाना है, बस। उपासक कौन होना चाहेगा? इसलिए कृष्ण को मानने वाले भी साधक हो जाते हैं। कृष्ण के मानने वाले भी साधना की भाषा बोलने लगते हैं। क्योंकि वह भीतर जो अहंकार है, वह साधना की भाषा बुलवाता है। वह कहता है, साधो! पाओ! पहुंचो! उपासना बड़ी कठिन बात है, आरडुअस। इससे ्ययादा कठिन कोई बात नहीं हैकृपिघलो, मिटो, खो जाओ।
-ओशो
पुस्तकरू कृष्ण स्मृति
प्रवचन नं.12 से संकलित