Thursday, 2 April 2015

ये समय चुनौती का है

ये समय चुनौती का है, इसको सोकर मत खोना,
चाहे नींद झुके पलकों पर, नैनों में सपन सलोना,
सैंकड़ों हजारों बीघा,जिनके जमीन नाम,
भूल से भी  मूठ नहीं पकड़ा है  हल का,
हल के चलाने वाले, फसल उगाने वाले,
दुखी हैं कि हक नहीं उनको फसल का,
तय करो कौन है किसान जमींदार कौन,
काम का किसे है हक,किसको है फल का,
श्रम में नहाने वालो, फसल उगाने वालो,
जड़ से ख़तम करो, शोषण ये  छल का,
अब के उधार धरती पर, हमें बीज नहीं है बोना।
ये समय चुनौती का है, ं ं ं ं
अनगिन माया जाल, सैंकड़ों करें सवाल,
करना यकीन नहीं किसी ज्ञानवान का,
पादरी भी प्रेयर करे, पंडित भी मन्त्र पढ़े,
अर्थ कोई होता नहीं, मुल्ला की अजान का,
धरम को जानने को जानना जरूरी नहीं,
बाइबिल, वेद, गुरु गं्रथ औ्य कुरान का,
ये उधार धर्म आज आदमी की जिन्दगी में,
गौर से निहारिए तो  रोग है  मसान का,
जीवन पर भार हुए हैं, अब कठिन है इनको ढोना।
ये समय चुनौती का है, ं ं ं ं
गौरी-गजनी को कैसे रोक लेंगे आप गर,
घर को भरेंगे सारा देश लूट-लूट कर,
उग्रवादियों को सही मार्ग पर लाने के लिए,
देश-प्रेम हदय में भरो तो कूट-कूट कर,
प्यार से दुलार से भी, जोर से भी मार से भी,
उनको मानएंगे गए जो रूठ-रूठ कर,
चाहे पंजाब कश्मीर  खूब जोर करे,
देश को बिखरने न देंगे टूट-टूट कर,
इसके सँग में मत खेलो, यह देश नहीं है खिलौना।
ये समय चुनौती का है,

Wednesday, 1 April 2015

we are too much in the self?

We are miserable because we are too much in the self. What does it mean when I say we are too much in the self? And what exactly happens when we are too much in the self? Either you can be in existence or you can be in the self--both are not possible together. To be in the self means to be apart, to be separate. To be in the self means to become an island. To be in the self means to draw a boundary line around you. To be in the self means to make a distinction between this I am' and that I am not'. The definition, the boundary, between 'I' and 'not I' is what the self is--the self isolates. And it makes you frozen--you are no longer flowing. If you are flowing the self cannot exist. Hence people have become almost like ice-cubes. They dont have any warmth, they dont have any love--love is warmth and they are afraid of love. If warmth comes to them they will start melting and the boundaries will disappear. In love the boundaries disappear; in joy also the boundaries disappear, because joy is not cold.

युपी की बदहाली और समाजवादियों-सामाजिक कार्यकर्ताओ का दायित्व

उत्तर प्रदेश के हालात दिन प्रतिदिन बाद से बदतर होते जा रहे है। सियासत की चक्की में आम जन की बात दीगर है,  प्रशासनिक अधिकारी और विपक्षी दलों के नेता भी पिसते जा रहे है।उत्तर प्रदेश में सत्ता धारी बहुजन समाज पार्टी के हितो के विपरीत बात करने वाले अधिकारी पागल तक करार दिये जा रहे है,  कोई पागल हो या ना हो इतने यंत्रणा के बाद पागल होने की पूरी सम्भावना उत्पन्न हो ही जाती है। तानाशाही व नौकर शाही के दो पाटो के बीच बेचारा लोकतंत्र,  मतदाता पिसता ही जा रहा है।
लोकतान्त्रिक मूल्यों की स्थापित मान्यताओ की परवाह किये बिना जन आकांझाओ  की अवहेलना करते हुये सरकारों का दमन कारी रवैय्या अपने चरमोत्कर्ष पे है।उत्तर प्रदेश की बसपा और केंद्र  की कांग्रेस दोनों  सरकारों का दमन चक्र आम जन की भावनाओ को दरिंदगी से कुचलता ही जा रहा है। लोकतंत्र में निर्वाचित सरकारों का जन विरोधी यह चरित्र शर्मनाक और लोकतंत्र को ख़त्म करने वाला चरित्र है। जनविरोधी तानाशाही सरकारों के कारण ही आज आम जन का विश्वास लोकतान्त्रिक व्यवस्था से डगमगा रहा है।
आज हालात यह है की उत्तर प्रदेश में हर एक वर्ग बहुजन समाज पार्टी की कार गुजारियो से त्रस्त है। बसपा सरकार की गलत नीतिओ के खिलाफ जनता में जो आक्रोश दिखना चाहिए था,  अनवरत जारी सरकारी लूट,  दमन,  शोषण,  मनमानेपन के खिलाफ उबाल आना चाहिए था,  आखिर वो उबाल,  जनता का आक्रोश लगातार सड़क पर दिखाई क्यूँ नहीं दे रहा है? आम जन त्रस्त है, यह सत्य है लेकिन संघर्ष से वास्ता नहीं रखना चाहती,  आखिर क्यूँ? समाजवादी विचारक डॉ राम मनोहर लोहिया ने जनता की मनोदशा पे कहा था---- हिंदुस्तान जैसे देश में साधारण जनता यांकी गरीब आदमी क्रांति को इतना नहीं समझेगा,  जितना कि राहत वाली राजनीति को।
वह बराबरी को इतना नहीं समझेगा,  जितना कि बख्शीश को। उसको अगर थोडा बहुत पैसा मिलता रहे जीतने कि उसको आकांझा है  तो वह इसे ज्यादा पसंद करेगा,  चाहे वह पैसा और समाज में उसका स्थान बहुत निचे दर्जे का हो, लेकिन कुछ मिला तो सही।जहाँ आदमी बहुत भूखा, बहुत नंगा है, बहुत दबा और गिरा हुआ है, वहां वह थोड़ी-बहुत छोटी-मोटी राहत की चीजों से प्रसन्न हो जाया करता है और उसको बराबरी की इच्छा कोई ऐसे सपने के जगत की काल्पनिक चीज मालूम होती है कि उसके लिए वह कुछ बहुत चिंता या सोच विचार करने को तैयार नहीं होता। ऐसा देखा गया है, लेकिन यह खाली तुलनात्मक बात कह रहा हूँ। ऐसा ना समझना कि हमेशा के लिए एक भूखे और बहुत गरीब देश का गरीब आदमी क्रांति के बजाय राहत की राजनीति को, बराबरी के बजाय बख्शीश वाली नीति को पसंद करेगा। अगर ऐसा हो तो संसार में बदलाव कभी आ ही नहीं सकता। समय बीतते-बीतते ठोकर खाते-खाते दूसरी बातें भी दिमाग में आने लगती है।
शायद अब वो वक़्त आ गया है हिंदुस्तान की राजनीति में जिसकी तरफ, जिसके कभी ना कभी आने की बात डॉ लोहिया ने कही थी। आज तमाम संगठन जनता की आवाज़ बन के उभरे है, जनता में विश्वास की उमंग जगी है। भारत स्वाभिमान आन्दोलन की बाबा राम देव की अगुआई में  जनजागरण यात्रा,  अन्ना हजारे के अनशन, लाल कृष्ण आडवानी की लोकनायक जय प्रकश नारायण की जन्म स्थली से शुरु हुई रथ यात्रा, युवा समाजवादी अखिलेश यादव की क्रांति यात्रा ने जनता की भावनाओ को उद्वेलित व जागृत करने का अनूठा काम किया है।
उत्तर प्रदेश में समाजवादी आन्दोलन के आशा के केंद्र बिंदु बन चुके समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने डॉ लोहिया के विचारो के आधार पे मुद्दों की राजनीति की सकारात्मक शुरुआत की है जो उनके प्रति बन रहे जन आकर्षण का प्रमुख कारक है।आज जुल्म के खिलाफ लड़ने व एकजुट होने का समय आ गया है। कांग्रेस भ्रस्टाचार की जननी है इसको राजनीतिक नेपथ्य में करने और उत्तर प्रदेश को बसपा की माया सरकार से निजात दिलाने के किये सभी समाजवादियो और सामाजिक कार्यकर्ताओ को गैर कांग्रेसी गठबंधन बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। डॉ लोहिया को मानने वालो, समाज हित में काम करने वालो, सरकारों के तानाशाही तरीको से त्रस्त जनों को देश-प्रदेश की सरकारों को उखाड़ फैकने की मुहिम में जुट जाना होगा और समाजवादी मूल्यों की सरकार बनाने के लिए अपना सर्वस्व लगाना पड़ेगा।

Nothing is guaranteed

The seed cannot know what is going to happen, the seed has never known the flower. And the seed cannot even believe that he has the potentiality to become a beautiful flower. Long is the journey, and it is always safer not to go on that journey because unknown is the path, nothing is guaranteed. Nothing can be guaranteed. Thousand and one are the hazards of the journey, many are the pitfalls - and the seed is secure, hidden inside a hard core. But the seed tries, it makes an effort; it drops the hard shell which is its security, it starts moving. Immediately the fight starts: the struggle with the soil, with the stones, with the rocks. And the seed was very hard and the sprout will be very, very soft and dangers will be many. There was no danger for the seed, the seed could have survived for millennia, but for the sprout many are the dangers. But the sprout starts towards the unknown, towards the sun, towards the source of light, not knowing where, not knowing why. Great is the cross to be carried, but a dream possesses the seed and the seed moves. The same is the path for man. It is arduous. Much courage will be needed.

Watch the waves in the ocean

Watch the waves in the ocean. The higher the wave goes, the deeper is the wake that follows it. One moment you are the wave, another moment you are the hollow wake that follows. Enjoy both--dont get addicted to one. Dont say: I would always like to be on the peak. It is not possible. Simply see the fact: it is not possible. It has never happened and it will never happen. It is simply impossible--not in the nature of things. Then what to do? Enjoy the peak while it lasts and then enjoy the valley when it comes. What is wrong with the valley? What is wrong with being low? It is a relaxation. A peak is an excitement, and nobody can exist continuously in an excitement.

we go alone

This has been said again and again, down through the ages. All the religious people have been saying this; 'We come alone into this world, we go alone.' All togetherness is illusory. The very idea of togetherness arises because we are alone, and the aloneness hurts. We want to drown our aloneness in relationship..... Thats why we become so much involved in love. Try to see the point. Ordinarily you think you have fallen in love with a woman or with a man because she is beautiful, he is beautiful. That is not the truth. The truth is just the opposite: you have fallen in love because you cannot be alone. You were going to fall. You were going to avoid yourself somehow or other. And there are people who dont fall in love with women or men--then they fall in love with money. They start moving into money or into a power trip, they become politicians. That too is avoiding your aloneness. If you watch man, if you watch yourself deeply, you will be surprised--all your activities can be reduced to one single source. The source is that you are afraid of your aloneness. Everything else is just an excuse. The real cause is that you find yourself very alone.

क्या ब्याज दरें बढ़ाने के सिवा महंगाई का कोई इलाज नहीं है

रिजर्व बैंक से आई ब्याज दरें बढ़ाने की खबर पर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने जिस अंदाज में टिप्पणी की, वह आम आदमी की चिंताओं के प्रति सरकारी प्रतिष्ठान के उपेक्षाभाव को ही प्रकट नहीं करती, यह भी दिखाती है कि हमारा सत्ता तंत्र जमीनी हकीकतों से किस कदर कट गया है। श्री अहलुवालिया ने रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में की गई बढ़ोत्तरी को 'गुड न्यूज़' करार दिया था। बढ़ती ब्याज दरों और महंगाई का दंश झेल रहे गरीब और मध्यवर्गीय समुदाय के लिए इससे बड़ा मजाक और कोई नहीं हो सकता।
माना कि रिजर्व बैंक की पहली चिंता मुद्रास्फीति है, माना कि रिजर्व बैंक के गवर्नर दुव्वुरी सुब्बाराव की एक निर्मम अर्थशास्त्री तथा कुशल प्रशासक की छवि है और इसीलिए पिछले दिनों उन्हें एक्सटेंशन भी मिला है, लेकिन पिछले अठारह महीनों में बारहवीं बार जनता को कड़वी घुट्टी पिलाने से पहले उन्हें थोड़ा संवेदनशील होकर सोचने की जरूरत थी। मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिए ब्याज दरें बढ़ाना ही एकमात्र विकल्प नहीं है। दूसरे, भले ही आर्थिक तरक्की का लाभ आम नागरिकों तक किसी न किसी रूप में पहुंच रहा हो, इस तरह के प्रत्यक्ष आर्थिक आघात झेलने की उनकी क्षमता का आखिर कोई तो अंत है! दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था सिर्फ 25 बेसिस प्वाइंट्स की बढ़ोत्तरी से हिल जाती है और यहां प्रति व्यक्ति आय के मामले में दुनिया में 129वें नंबर पर आने वाले हम भारतीय पिछले डेढ़ साल में साढ़े तीन फीसदी बढ़ोत्तरी झेल चुके हैं। अब तो बस कीजिए!
जिसे श्री अहलुवालिया ने 'गुड न्यूज़' करार दिया, वह हर कर्जदार व्यक्ति को व्याकुल करने वाली खबर है। कर्जदार ही क्यों, परोक्ष रूप से किसी न किसी रूप में हर व्यक्ति को प्रभावित करेगी क्योंकि इसका सबसे बड़ा असर आर्थिक, व्यावसाियक, कारोबारी तथा औद्योगिक गतिविधियों पर पड़ेगा। हालांकि अब आम आदमी यह मानकर चलने लगा है कि रिजर्व बैंक जब भी मौद्रिक नीति की समीक्षा करेगा, उसके लिए एक 'गुड न्यूज़' जरूर पेश करेगा, लेकिन इस बार की 'गुड न्यूज़' ने कुछ ज्यादा ही झटका दिया है क्योंकि यह मौजूदा आर्थिक धारणा (सेन्टीमेंट) के अनुकूल नहीं है।
रैपो रेट को सवा आठ और रिवर्स रैपो को सवा सात फीसदी पर ले जाने की रिजर्व बैंक की घोषणा पर उद्योग तथा व्यापारिक संगठनों ने जिस तरह निराशाजनक प्रतिक्रिया की है, वैसा हमारी उदारीकृत, पूंजीवाद.उन्मुख, बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के दौर में अरसे बाद देखने को मिला है। कारण, क्या उद्योगपति, क्या सेवा प्रदाता, क्या व्यापारी, क्या जमीन.जायदाद कारोबारी, क्या वाहन कंपनियां, क्या उपभोक्ता सामग्री निर्माता और क्या उन सबका उपभोक्ता॰॰॰ रिजर्व बैंक के पिछले फैसले पहले ही सबकी कमर तोड़ चुके हैं। निराशा की यह देशव्यापी धारणा सरकार से पूरी तरह छिपी नहीं रह सकती। मौद्रिक समीक्षा से ठीक पहले वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी का यह कथन कि शायद अब और ब्याज दरें बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी तथा हम मुद्रास्फीति को दूसरे तरीकों से काबू करने की कोशिश करेंगे, उसकी ओर इशारा करता है। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कह दिया कि भई अंतिम फैसला तो रिजर्व बैंक को ही करना है। सरकार बड़ी सफाई से दोष रिजर्व बैंक के सिर मढ़कर बच निकलती है। लेकिन क्या रिजर्व बैंक ये सभी कदम एकतरफा तौर पर उठा रहा है
यह करें तो उलझन, वह करें तो समस्या
सरकार की उलझनें समझ में आती हैं। रिजर्व बैंक हर बार ब्याज दर बढ़ाने की घोषणा करते हुए इन चिंताओं को दोहराता भी है। उसकी सबसे बड़ी चिंता है मुद्रास्फीति। यह महज एक आर्थिक समस्या ही नहीं है, राजनैतिक और सामाजिक भी है। महंगाई के कारण लोगों में धीरे.धीरे सरकार विरोधी भावना पैदा हो रही है। समस्या यह है कि महंगाई रोकने के लिए मौद्रिक कदम उठाए जाएं तो आवासीय तथा वाहन ऋण लेने वाले लोग, कारोबारी तथा उद्यमी उबल पड़ते हैं और ब्याज दरें स्थिर रखी जाएं या घटा दी जाएं तो महंगाई सिर उठाने लगती है जिससे आम आदमी का गुस्सा आसमान छूने लगता है। विपक्ष की भारी आलोचना और जन आक्रोश के बावजूद अगर सरकार ब्याज दरें बढ़ाती जा रही है तो इसलिए कि वह महंगाई के भूत को किसी भी तरह काबू कर लेना चाहती है।
यहां तक कि राजनैतिक जोखिम उठाकर भी। मगर यह भूत है कि काबू में आता ही नहीं। मुद्रास्फीति से सरकार कितनी भयभीत है, यह उसकी इस नीति से स्पष्ट है कि अगर रिजर्व बैंक के कदमों से आर्थिक विकास (जीडीपी) की वृद्धि दर थोड़ी.बहुत घटती भी है तो देखा जाएगा लेकिन सबसे पहले महंगाई पर लगाम लगाना जरूरी है। इसे सरकार का दुभ्राग्य कहें या फिर 'अल्पदृष्टि' पर आधारित उपायों की सीमा, कि एक के बाद एक कठोर कदम उठाने के बावजूद मुद्रास्फीति नौ फीसदी के आसपास बरकरार है। वह खतरे के निशान से नीचे आने का नाम नहीं ले रही। दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था में धीमापन आना शुरू हो गया है।
ऐसे में रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय, और कारोबार, सेवा, उद्योग, परिवहन, आयात.नियरत, वाणिज्य, कर, पेट्रोलियम आदि का जिम्मा संभालने वाले दूसरे मंत्रालय और विभाग वैकल्पिक रास्तों की तलाश में क्यों नहीं जुटते डेढ़ साल से अर्थव्यवस्था को बढ़ी ब्याज दरों का इन्जेक्शन लगाने के बावजूद यदि बीमार की हालत ठीक नहीं हो रही तो शायद उसे होम्योपैथी या आयुवेर्द की जरूरत हो क्या 'ब्याज दर' कोई संजीवनी बूटी है जिसके अतिरिक्त और कोई उपाय किया ही नहीं जा सकता ऐसा नहीं है। महंगाई को प्रभावित करने वाले पहलू और भी हैं, जिन पर या तो सरकार का ध्यान जाता नहीं या फिर उसके पास इन्हें अनुशासित करने की इच्छाशक्ति नहीं है।
विकल्पों को भी देखिए
मुद्रास्फीति की समस्या को सिर्फ रिजर्व बैंक के हवाले कर देने की बजाए अगर उसमें केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों की भी भूमिका हो तो विकल्प और भी कई निकल सकते हैं। आवासीय क्षेत्र में मांग घटानी है तो परियोजनाओं की संख्या सीमित की जा सकती है। दैनिक उपयोग की चीजों की कीमतें बढ़ने के पीछे काफी हद तक पेट्रोलियम पदाथों की बढ़ी हुई कीमतें जिम्मेदार हैं। अगर सरकार कुछ और समय तक पेट्रोलियम क्षेत्र में सब्सिडी के संदभ्र में नरमी बरतती रहे तो महंगाई प्रभावित हो सकती है।
लेकिन सरकार ने तो ब्याज दरों के साथ.साथ पेट्रोलियम पदाथर्ों की कीमतें भी बढ़ाई हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने की नीतिगत मजबूरी समझ में आती है, पेट्रोलियम सप्लाई कंपनियों को होने वाले घाटे संबंधी चिंताएं भी जायज हैं, लेकिन अगर महंगाई पर काबू पाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है तो पेट्रोलियम के भावों और सब्सिडी के मुद्दे पर 'गो स्लो' की नीति अपनाई जा सकती है। मजबूरी में ही सही। अस्थायी रूप से ही सही।
भारत में यकायक पैदा हुई महंगाई को कई अर्थशास्त्री वायदा कारोबार के प्रतिफल के रूप में भी देखते हैं। गेहूं, चावल, दालों आदि के वायदा भावों में तेजी राष्ट्रीय स्तर पर इन पदाथर्ों के भावों को प्रभावित करने लगी है। सोने.चांदी की भी यही स्थिति है। आप भले ही ब्याज दरें बढ़ाते रहिए, वायदा कारोबारी ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए जरूरी चीजों के भावों को बढ़ाने में लगे रहेंगे तो ब्याज दरें भला क्या करेंगी। वायदा कारोबार के प्रभावी नियमन की दिशा में कदम उठाए जाने चाहिए।
बहुत जल्द, रिटेल बाजार में विदेशी कंपनियों का आगमन भी भावों को प्रभावित कर सकता है। आशंका है कि वे बड़े पैमाने पर सामग्री खरीदेंगी और बाजार में कृत्रिम तेजी पैदा करेंगी। बाजार का खुलना, नए क्षेत्रों में अवसरों का सामने आना, वैश्वीकरण आदि सब कुछ ठीक है, लेकिन सीमा के भीतर ही। भारत की प्रति व्यक्ति आय आज भी चालीस हजार रुपए के आसपास है। यह अमेरिका या यूरोप नहीं है, जहां ब्रांडिंग, पैकेजिंग, प्रचार और ग्लैमर भावों से ज्यादा महत्वपूण्र हो जाते हैं। हमसे चालीस गुना प्रति व्यक्ति आय से लैस वहां का उपभोक्ता बढ़ी.चढ़ी कीमतों का असर झेल सकता है, इसलिए वहां ये फार्मूले चल सकते हैं, यहां नहीं।
देश में सब्जियों, फलों आदि की सप्लाई.चेन व्यवस्था को बेहतर बनाए जाने की जरूरत है। देश के एक हिस्से में कोई खास अनाज, फल या सब्जी बहुत सस्ती होती है और दूसरे हिस्से में बहुत महंगी। समस्या त्वरित परिवहन और भंडारण से जुड़ी हो सकती है। जमाखोरी और कालाबाजारी महंगाई को बढ़ाने वाले पारंपरिक कारक हैं। इमरजेंसी के दौरान महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए इन्हें खास तौर पर निशाना बनाया गया था और इसके नतीजे भी निकले थे। ऐसा फिर क्यों नहीं किया जा सकता भारत में सावर्जनिक वितरण प्रणाली एक तरह का वरदान है। गांव.गांव में फैला हुए इसके नेटवर्क को मजबूत, परिणामोन्मुख और भ्रष्टाचार.कालाबाजारी से मुक्त बनाया जा सके तो क्या कुछ नहीं हो सकता। लेकिन यह सब रिजर्व बैंक के उठाए पारंपरिक कदमों से नहीं होने वाला। कमान केंद्र सरकार को ही संभालनी होगी।