Tuesday, 28 April 2015

कहर के बाद करिश्मा, 3 दिन बाद मलबे से ‌जिंदा निकली महिला

नेपाल में कुदरत के कहर के बाद इसका करिश्मा भी देखने को मिल रहा है। बचावकर्मियों ने शनिवार के भारी भूकंप से जमींदोज हो चुके एक पांच मंजिला मकान के मलबे से मंगलवार को एक महिला को सुरक्षित निकाल लिया
कई और लोगों के साथ मलबे में फंसी सुनीता सितौला नाम की इस महिला ने बाहर निकलते ही कहा कि लगता है मैं किसी दूसरी दुनिया में आ गई हूं। ई-कांतिपुर की रिपोर्ट के मुताबिक अब यह महिला अपने पति और दो बेटों के साथ एक स्कूल में शरण लिए हुए है।
उसके पति और बच्चे उसे पाकर बेहद खुश हैं। ये लोग भूकंप के दौरान किसी तरह खुद को बचाने में सफल रहे थे। नेपाल में बड़ी तादाद में मकान धंस गए हैं और इनमें अब भी सैकड़ों लोग फंसे हैं।
देश में खाना, पानी, बिजली और दवाई की भारी किल्लत है और लोग और भूकंप आने के डर से खुले मैदान में अस्थायी शिविरों में रहे हैं। जहां तक नजर जाती है तंबू ही तंबू दिखाई पड़ते हैं।

मौत के मुंह से बचकर आई प्रीति ने सुनाई भूकंप की खौफनाक कहानी

झटके के सिवा कुछ अहसास नहीं हुआ। धरहरा भरभरा कर गिर पड़ा। नेपाल के ‘कुतुबमीनार’ माने जाने वाले दो सौ तीन फीट ऊंचे धरहरा मीनार के मलबे में दबने से शनिवार को ही 180 लोगों की मौत हो गई थी।
खुशबू, प्रीति और उनकी मां बुढाथोकी खुशकिस्मत रहीं। मां और दोनों बेटियों का इलाज राजधानी के सिविल अस्पताल में चल रहा है। चार्टर्ड एकाउंटेंसी की छात्रा प्रीति कैसे धरहरा से नीचे कुछ पता नहीं चला। वह यह भी नहीं कैसे और किसने उसे अस्पताल पहुंचाया।
इस प्राकृतिक आपदा में भले इन तीनों की जान बच गई लेकिन बुढ़ाथोकी के चार सगे-संबंधियों का अब तक कोई अता-पता नहीं है। बैंक में काम करने वाली खुशबू काफी सहमी है।
वह कुछ भी बता नहीं पा रही है लेकिन अपनी बहन और मां को अस्पताल में साथ देखकर हैरान भी है। मां को पहले अस्पताल के अलग वार्ड में रखा गया था।
बाद में अस्पताल निदेशक डॉ विमल थापा ने सभी को एक ही वार्ड में रखवाया। प्रीति को गंभीर चोट है। ट्यूब डाला गया है। कुछ दिन और अस्पताल में ही रहना होगा। अस्पताल के निदेशक ने कहा खुशबू और मैया को अब बेहतर हैं लेकिन तीनों खतरे से बाहर हैं।नेपाल में शनिवार को सरकारी छुट्टी रहती है। इस दिन अधिकांश लोग घूमने निकलते हैं। काठमांडू में धरहरा सभी के आकर्षण का केंद्र था। और तो और नए वर्ष पर एमाले के अध्यक्ष केपी ओली भी धरहरा गए थे।
तब से नेपाल के लोगों का आकर्षण और बढ़ा। धरहरा का निर्माण 1832 में प्रधानमंत्री भीमसेन थापा ने कराया था। इस मीनार से काठमांडू को देखने का खास आनंद था।
1934 के भूकंप मे भी नौ माले का धरहरा टूट गया था। इसका पुनर्निर्माण कराया गया था। धरहरा मे दो सौ 13 सीढ़ियां थीं। इसे 2005 से आम लोगों के लिए खोल दिया गया था।
‘अचानक धरहरा हिला और मैं नीचे गिर गई, इसके बाद मुझे कुछ पता नहीं।’ यह कहना है प्रीति का। प्रीति अपनी बड़ी बहन और मां के साथ धरहरा देखने गई थी। शनिवार को जब भूकंप आया तो तीनों धरहरा के सातवें मंजिल पर थीं।

मुस्कराइये कि आप नौचंदी मेले में हैं

यूं तो यह दुनिया ही एक मेला है, मगर इसमें बहुत झमेला है। इसलिए झूला-सर्कस, बांसुरी-पिपिहरी, हलवा-पराठे वाले, गंवई-शहरी मिजाज वाले, मेले में चलिए। आपका अपना नौचंदी मेला। रोज के दुनियावी सर्कस से मन उचाट है तो यहां का जीवंत सर्कस देखिए। नींद न आने की बीमारी है तो मेले में आइए। मन बहलेगा। नींद भी आएगी। परंपराएं बदली हैं, मूड बदला है, लेकिन उत्सवधर्मिता बरकरार है। रोजाना हजारों की संख्या में उमड़ने वाली भीड़ गवाह है।
गंगा-जमुनी तहजीब की खुशबू से मेला गुलजार है इन दिनों। यहां, घुसते ही तरह-तरह की आवाजें, नजारे शहर की आम जिंदगी से अलग ले आते हैं। बैलों की घंटी-घुंघरू की जगह अब मोटरों की चिल्ल-पों है, पर इस शोर में भी अलग तरह का सुकून। मेले के स्वाद का कोई मेल नहीं। यहां सॉफ्टी है, भेलपूरी है। हलवा-पराठा, खजला-नान खताई की सोंधी खुशबू है। मुंह में लार है, मगर हाथ खाली। गोलगप्पे खाकर गाल कुप्पा करने का यहां अपना आनंद है। इन्हीं दुकानों पर कुछ खाते हुए, कुछ भसकते हुए तो एकाध आगे बढ़ने को लरजते हुए चेहरे नजर आते हैं। पांच रुपये, दस रुपये की वकत अभी भी यहां दुकानों पर मिल जाएगी। हालांकि इस कीमत में भी मोलभाव करने वाले कुछ चेहरे नजर आते हैं। मेला इसलिए न छोड़िए कि आगरे से घाघरा नहीं आया है, यहां सब कुछ मिलेगा। लघु उद्योगों के तमाम हुनर बिखरे पड़े हैं। आप यहां निशानेबाजी पर हाथ आजमा सकते हैं या फिर छल्ले फेंककर किस्मत। कुछ नहीं तो तजुर्बा जरूर मिलेगा। पांच मिनट में फोटो खिंचाकर मेले की स्मृतियां संजो सकते हैं। तनाव में हैं तो दस रुपये में पूरा हंसीघर मौजूद है। सात अजूबे सुने होंगे, लेकिन इसी हंसीघर के पास लगे पोस्टर में आठवें अजूबे की तस्वीर नजर आती है- 'दुनिया का सबसे लंबा शख्स।'
प्रचार-प्रसार की गरज से टेलीविजन धारावाहिकों की बड़ी-बड़ी होर्डिग भी जहां-तहां लटकी हैं। सर्कस के करतब में जीवन संघर्ष दिखेगा, मगर उनकी दिलेरी-जांबाजी आपको नई ऊर्जा देगी। दांतों तले अंगुलिया चाहे तो आप न दबाएं। यहां कमसिन बालाओं की अदाओं पर नीयतें डोलती हैं तो अब जानवरों का कमाल न देख पाने का मलाल भी है। जोकर की हरकतें मसखरी होने के साथ ही अब थोड़ी फूहड़ हो चली हैं। शायद यह वक्त की नजाकत है। और शायद वजूद बचाए रखने की कोशिश भी।
इसी मेला मैदान में भीड़ का फायदा उठाकर ठांव-कुठांव धक्का मारते छिछोरे भी नजर आते हैं। पलटकर, चढ़ी भौहों वाली कुछ नजरें घूरती हैं। जवान खून में गुदगुदी भले होती हो, मगर बुजुर्गो को मेले की यह संस्कृति मैली लगती है। लेकिन शायद यह भी मेले के मिजाज का एक हिस्सा है, यह सोचकर कदम बढ़ते जाते हैं। कुरेदने पर 'अब वह बात कहां' की शिकायतें और अफसोस जाहिर करते झुर्रीदार चेहरे मेले के सुनहरे अतीत से मुलाकात कराती हैं।
पटेल मंडप में अलग मेला आबाद है। यहां के रंगारंग कार्यक्रम मन के सरगमी तारों को झंकृत करते हैं। आसमान छूते झूलों पर बैठकर चाहें तो शहर के साथ आंखों से चहलकदमी करें या फिर ब्रेक डांस के हिचकोलों का आनंद ले सकते हैं। बशर्ते दिल बैठने का डर न हो। मेला उजड़ जाए, इससे पहले कुछ पल जरूर गुजारिए नौचंदी मैदान में!
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नदियों की रेत से फूट सकती हैं प्रलय की लहरें

भूकंप का झटका जलप्रलय का भी कारण बन सकता है। जोन चार में शुमार मेरठ समेत देश की दर्जनभर शहर नदियों में समा सकते हैं। वैज्ञानिक रिपोर्ट के मुताबिक भूकंप की वजह से नदियों पर धारा बदलने का खतरा है। नदियों के बेसिन क्षेत्र में नीचे की मिट्टी नाजुक एवं रेतीली जमीन से पानी का सैलाब फूट सकता है। एनसीआर क्षेत्र में अगले 50 वर्ष के अंदर भयावह भूकंप के संकेत हैं। रेतीली जमीन के बीच से अगर पृथ्वी की ऊर्जा निकली तो वह तबाही का कारण बनेगी। नदियों की बेसिन में बसे शहर जलमग्न हो सकते हैं।

भूगर्भशास्त्र के मुताबिक उत्तर प्रदेश गंगेटिक प्लेन में बसा हुआ है। यह चार शेल्फ एरिया में बंटा है। सभी चार शेल्फ एरिया एक दूसरे से उभारों के साथ मिले हुए हैं। इनमें होने वाली कोई भी हलचल क्षेत्र में बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है। इंडियन प्लेट धीरे-धीरे यूरेशियन प्लेट के नीचे खिसक रही हैं, जिससे हिमालय हर वर्ष पांच मिमी उठ रहा है। पृथ्वी के अंदर टकराने वाली प्लेटों की मोटाई पचास से सौ किमी तक आंकी गई है, जिनके आपस में टकराने की वजह से भारी पैमाने पर ऊर्जा रिलीज होती है। यही ऊर्जा जिस भी क्षेत्र से निकलेगी, वहां भयावह नुकसान होगा। अगर यह क्षेत्र बेसिन हुआ तो नदियां धाराएं बदलकर शहरों में घुस जाएंगी। नदियों की रेतीली जमीन से पानी फटकर ऊपर आ सकता है। बनारस हिन्दू विवि, इलाहाबाद विवि एवं आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों की रिपोर्ट के मुताबिक नई दिल्ली, श्रीनगर, जम्मू, अमृतसर, मेरठ, जालंधर, बरेली, बनारस एवं कानपुर जैसे शहर जलप्रलय की भेंट चढ़ सकते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक मेरठ और भुज की स्थितियों में जबरदस्त समानता है। भुज साबरमती की बेसिन में होने की वजह से उसके नीचे की मिटटी अत्यंत मुलायम है। इसी प्रकार मेरठ समेत पश्चिमी उप्र -गंगा जमुना की बेसिन में है,और यहां भी जमीन के नीचे की मिट्टी बेहद मुलायम है। उच्च तीव्रता का भूकंप आने की स्थिति में नीचे की नाजुक मिट्टी खिसक जाएगी, और जमीन के अंदर का जलभंडार पूरी तरह ऊपर आ जाएगा। इसमें बड़े पैमाने पर मानव आबादी भी जमीन में समा सकती है

कूड़े से अटा शहर, हाईकोर्ट में चमन बना देने का दावा

हड़ताल समाप्त होने के बाद सफाईकर्मियों ने सोमवार से शहर की सफाई का कार्य शुरू किया। पहले दिन शाम तक लगभग 900 टन कूड़ा उठाया गया, लेकिन फिर भी शहर दस फीसदी भी साफ नहीं हो सका।

मेरठ शहर में 11 दिन की हड़ताल के बाद सोमवार से सफाई कर्मियों ने सफाई कार्य शुरू किया। पहले दिन अधिकांश कर्मचारी अपनी बीट पर पहुंच गए तथा दोपहर तक सफाई की। नगर निगम के तीनों डिपो से सभी गाड़ियां निकली तथा शाम पांच बजे तक दौड़ी। नगर स्वास्थ्य अधिकारी डा. प्रेम सिंह ने बताया कि पहले दिन शहर में 900 टन कूड़ा उठाया गया। जबकि रोजाना 600 टन कूड़ा निगम की गाड़ियां उठाती हैं। उन्होंने बताया कि शहर को साफ करने में अभी लगभग दो से तीन दिन का समय लगेगा। शहर में अभी कूड़े के ढेर लगे हैं। सोमवार से सफाई कार्य शुरू हुआ है। खुद निगम अफसरों का कहना है कि शहर के हालात सामान्य करने में अभी दो से तीन दिन का समय लगेगा। वहीं तमाम सच्चाई को झुठलाते हुए प्रमुख सचिव नगर विकास, जिलाधिकारी व नगर आयुक्त तीनों पक्षकारों की ओर से सोमवार को नगर आयुक्त एस के दुबे द्वारा हाईकोर्ट में अनुपालन आख्या जमा कराई। दरअसल, 21 अप्रैल को मेरठ शहर में हड़ताल तथा उससे बने महामारी फैलने के हालात के खिलाफ दायर जनहित याचिका में सुनवाई करके मुख्य न्यायाधीश ने उक्त तीनों अधिकारियों को 48 घंटे में शहर साफ करके तथा जनता के संकट का समाधान करके रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया था। उसी आदेश की अनुपालन आख्या में नगर आयुक्त ने 11 दिन तक चली हड़ताल का जिक्र तक नहीं किया। वहीं, उन्होंने कोर्ट के सामने दावा किया कि पूरे शहर में सफाई कराकर चूना और फिनायल का छिड़काव करा दिया गया है। रिपोर्ट में दावा किया है कि कोर्ट के आदेश का पूर्णतया पालन करा दिया गया है। नगर आयुक्त के इस दावे से याचिकाकर्ता लोकेश खुराना नाराज हैं। उन्होंने कहा है कि अफसरों के इस सफेद झूठ की पोल कोर्ट में खोली जाएगी।

सफाई न हो तो यहां शिकायत करें

नगर स्वास्थ्य अधिकारी डा. प्रेम सिंह ने शहर की जनता से कूड़ा डलावघर में डालने की अपील की। साथ ही उन्होंने कहा कि यदि किसी क्षेत्र में सफाई नहीं होती है तो शहर की जनता नगर निगम के नंबर 0121-2515133, नगर आयुक्त कैंप ऑफिस के नंबर 0121-2660045 पर अथवा नगर स्वास्थ्य अधिकारी के मोबाइल नंबर 9412700550 पर शिकायत दर्ज करा सकती है।

प्रेम सिंह के समर्थन में आए मनोनीत पार्षद

सफाई कर्मचारी जहां नवनियुक्त नगर स्वास्थ्य अधिकारी डा. प्रेम सिंह को हटाने की मांग कर रहे हैं वहीं डा. प्रेम सिंह के समर्थन में नगर निगम के मनोनीत पार्षद उतर आए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, नगर विकास मंत्री आजम खां को पत्र भेजकर डा. प्रेम सिंह को न हटाने की मांग की है। पत्र में अफजाल सैफी, नरेश मलिक, राजीव शर्मा, नरेंद्र यादव, रामदत्त शर्मा, ज्योत्सना गुर्जर, आस मोहम्मद, सुनीता सिंह, अनीता राणा आदि मनोनीत पार्षदों के हस्ताक्षर हैं।

Monday, 27 April 2015

नेपाली तबाही कुछ कहती है

धरती डोली। एक नहीं, कई झटके आए। नेपाल में तबाही हुई। दुनिया की सबसे ऊँची चोटी - माउंट एवरेस्ट को जीतने निकले 18 पर्वतारोहियों को मौत ने खुद जीत लिया। जैसे-जैसे प्रशासन और मीडिया की पहुँच बढ़ती गई, मौतों का आँकड़ा बढ़ता गया। इसका कुछ दर्द तिब्बत, असम, बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश ने भी झेला। दहशत में रात, दिल्लीवासियों ने भी गुजारी। जरूरी है कि हम सभी इससे दुखी हों। यमन की तरह, नेपाल के मोर्चे पर भारत सरकार मुस्तैद दिखी।
इस बार आपदा प्रबन्धन निगरानी की कमान, हमारे प्रधानमन्त्री जी ने खुद सम्भाली। एयरटेल ने नेपाल में फोन करना मुफ्त किया। बीएसएनएल ने तीन दिन के लिये नेपाल कॉल रेट, लोकल किया। स्वामी रामदेव बाल-बाल बचे। सोशल मीडिया पर लोगों ने सभी की सलामती के लिये दुआ माँगी। मीडिया ने भी जानकारी और दुआओं के लिये अपना दिल खोल दिया।

14 साल से कम उम्र के बच्चे भी कर सकेंगे काम

सरकार बाल मजदूरी में संशोधन की तैयारी कर रही है। ऐसी खबर है कि संसद के चालू सत्र में सरकार बाल मजदूरी रोकथाम अधिनियम में जो संशोधन प्रस्तावित है उसे पास कराना चाहती है।
इस संशोधन में प्रावधान है कि 14 साल से कम उम्र के बच्चे को भी उसके पारिवारिक कारोबार में काम करने की अनुमति दी जाएगी बशर्ते कि उसकी पढ़ाई प्रभावित न हो। इसमें प्रावधान है कि अगर बाल स्कूल से आने के बाद या छुट्टियों के दौरान या तकनीकी संस्थान से लौटने के बाद अपने परिवार की खेतों, वनों या घर पर होने वाले किसी काम में सहायता करता है तो प्रतिबंध उन पर लागू नहीं होगा लेकिन 14 से 18 साल की उम्र के बच्चों को खतरनाक उद्योगों में काम करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। श्रम मंत्रालय के अनुसार पारिवारिक कारोबार को छोड़कर बड़े या अन्य छोटे संगठनों में बाल मजदूरी के मौजूदा प्रावधान लागू रहेंगे। शीघ्र ही इससे संबंधित विधेयक को संसद में पेश किया जाएगा।