Thursday, 14 May 2015

ओशो सत्संग और मेडिटेशन

स्कूल ऑफ लाइफ् गोमती धारा आत्मदर्शन की स्थिति कुंज बिहार में कार्यक्रम मैं प्रोफेसर वाचपति जी ने दीप जलाया कार्यक्रम शुभारम्भ हुआ।
ओशो का प्रवचन गीता दर्शन पर हुआ परिणाम की फिकर मत कर अर्जुन तू कर्म कर यही तेरा धर्म है। कृष्ण अर्जुन तू कर्म कर यही तेरा धर्म है। कृष्ण अर्जुन का समझाते हुए कहते जो व्यक्ति अकत्र्ता होकर कार्य करता है। वह कर्म अकर्म बन जाते है। फिर वह साधक अकत्र्ता बन जाता है।
स्वामी आत्मोकमरान ने कुण्डलिनी जागरण एक घण्टे का ध्यान कराया और अन्तर स्नान का अनुभव कराये। सभी मित्रो ने सहयोग दिया। रामानन्द जी, शिवकुमार, वन्दना, मोनिका, सत्यवीर जी आदि कार्यक्रम में उपस्थित रहे।
सदड्ढ्भावना समिति (पंजी.) स्वामी आत्मो कामरान 8057982656, 8273548730

स्वामी की सोच को किया सार्थक

पिछली सदी के आठवें दशक में स्वामी चिन्मयानंद ने कांगड़ा जिले के दो हजार गांवों में गरीबी मिटाने का संकल्प लिया। इसे पूरा करने के लिए उन्होंने स्वयसेवी संस्था कार्ड (चिन्मय आर्गेनाइटेशन ऑफ रूरल डेवलपमेंट) का गठन किया। इसे चलाने के लिए उन्हें एक ऐसे नेतृत्व की तलाश थी जो उनकी सोच को अजाम तक पहुंचा सके। उनकी इस सोच को डॉ. क्षमा मेत्रेय ने साकार किया।
डॉ. क्षमा मेत्रेय नई दिल्ली के मोलाना अबुल कलाम आजाद मेडिकल कॉलेज में बाल रोग विशेषज्ञ का पद छोड़कर कार्ड की राष्टड्ढ्रीय अध्यक्ष बनीं। १९८५ में संस्था की बागडोर संभाली और कुछ महिलाओं को सिलाई मशीनें बांटकर उन्हें आत्मनिर्भर करने का प्रयास शुरू किया। आज सस्था नौ सो गांवों में साक्षरता, स्वरोजगार व स्वास्थ्य से संबंधित सेवाएं प्रदान कर रही है। वह खुद वर्ष भर में करीब २० हजार रोगियों को चिकित्सा प्रदान करती है। इन्होंने १४ हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार के साधन से जोड़ा। विधिक साक्षरता में भी संस्था अहम योगदान दे रही है। करीब ८२७ मामलों में से ६१३ सुलझाए। पर्यावरण संरक्षण में भी संस्था अहम कार्य कर रही है। ६९५ गांवों में करीब २० हजार शौचालयों का निर्माण करवाया है।
महिला दिवस को सार्थक रूप तभी दिया जा सकता है, जब पुरुष भी महिलों का सम्मान करें। सबसे पहले महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना को उजागर करना होगा। लिंग भेदभाव को समाप्त करने के लिए महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों को भी आगे आना होगा।

Monday, 11 May 2015

साईकिल ट्रैक उद्देश्यपूरक

उ0प्र0 के मुख्यमन्त्री की महत्वाकांक्षी श्साईकिल ट्रैक्य योजना प्रदेश के बड़े महानगरों में सकारात्मक हो चली है। पश्चिमी उ0प्र0 में मेरठ के बाद गाजियाबाद में भी इस के स्थान नियत होने के अलावा टेण्डर प्रक्रिया आदि के साथ बजट आवटन प्रक्रिया भी हो गई है। इस योजना को गरीब की सवारी व स्वास्थ्य की दृष्टिड्ढगत उच्चतम न्यायालय के सख्त रुख के बाद ट्रैक की व्यवस्था को राज्य सरकारों को अपनाना पड़ा। सड़क बनाकर गतिवान वाहनों की बढ़ती भीड़ ने साईकिल व पैदल चालकों के लिए समस्या बना डाली थी।
मेरठ मे सीताराम हॉस्टल मेरठ से मंगल पाण्डे नगर तक नियत किया गया है। साईकिल ट्रैक वहां गाजियाबाद में इसका स्थान हापुड़ चुंगी से विवेकानंद नगर तक प्रथम चरण शुरु हो चुका है। दूसरे चरण का नया गाजियाबाद आर ओबी से गोविन्दपुरम का भी निर्मित हो चुका है। पूरे प्रोजेक्ट पर ९ करोड़ प्राधिकरण खर्च कर रहा है। तीसरे ट्रैक पर विचार हो रहा है। यह एएलटी पलाई ओवर ब्रिज से हापुड़ चुंगी तक का है।
साईकिल ट्रैक पर आम जन यानि की दुपहिया साईकिल चालकों से जब बात की तो वह इस ट्रैक व्यवस्था से खुश नही थे। इनका कहना था कि हमे ट्रैक की उपलब्धता तो तब भी नही होगी। इन ट्रैकों पर अपेक्षा अनुरुप साईकिलिंग किया जाना संभव होगा इसमें संशय है। सड़कों के किनारे व अन्य पगडंडियों पर जिस तरह चलना दुष्कर है बड़े वाहनों के खड़े रहने या चलने के प्रयास अथवा इन पर अतिक्रमण कर कारोबार होते है उसे देखकर नही लगता की यह ट्रैक जिस लक्ष्य को लेकर बन रहे है। उनसे जनता को सुविधा मिलेगी। यह जरुर है कि प्रदेश की सरकार जिसका चुनाव चिन्ह ही साईकिल है अथवा लाभ की अपेक्षा करती हो।
साईकिल निर्माता जिन्होने अब साईकिल बनाना बंद कर दिया था या बंद करने में लगे थी वापस चेहरे पर मुस्कान ला बैठे। साईकिल मरम्मत के लगे लोग भी पुनरू इस कार्य में रुचि लेने लगे है। 
साईकिल ट्रैक प्रतीकात्मक न बने रहे
वरिष्ठ नागरिक कल्यान समिति अध्यक्ष ईआरएस गुप्ता का कहना था कि जिस शो शराबे के तहद बड़े शहरों में इक्का दुक्का साईकिल ट्रैक बन रहे है या बनाने का प्रस्ताव है इससे लोगो का स्वास्थ्य नही सुधरने वाला है। इस तरह यह प्रतीकात्मक रह जायेगे। जरुरत है सड़कों के किनारे दो और जो पटरी छोडी जाती है उसे साईकिल ट्रैक संरक्षित कर उस पर अतिक्रमण रोक कर इसके दुरुपयोग का रोका जाएं। 
साईकिल ट्रैंक तो हो गया पदैल चलने की राह भी तो
साईकिल ट्रैक पर उ0प्र0 सरकार द्वारा जिस तरह की कर्मठता का प्रदर्शन दिखाया जा रहा है। इसके बाद पैदल चलने वालों जिनमें वरिष्ठ नागरिक व महिला और बच्चों ने जिज्ञासा जाहिर की है की पैदल सड़क किनारे चलना या फिर साईकिल ट्रैक की तरह स्वास्थय बनाने हेतु घुमने की राह के लिए भी इस तरह प्रदेश सरकार सोचेगी और उपलब्ध करायेगी। आज सड़कों व अन्य रास्तों पर पदैल चलने वालों के साथ भी साईकिल चालकों से कम दुघर्टना नही होती है।
       -अतिथि सम्पादक निष्ठा अग्रवाल

मन मोह लेता है ‘मनीप्लांट’

मनीप्लांट के पौधे लगभग सभी घरों में लगाए जाते हैं। यह क्यारियों, गमलों, डिब्बों आदि में लगाया जा सकता है। बहुत से लोगों का मानना है कि मनीप्लांट का पौधा घर में लगाने से सुख-समृद्धि भी आती है। मनीप्लांट को छांव वाले स्थान पर लगाना चाहिए। समय-समय पर इसकी सूखी शाखाओं और पत्तियों की काट-छांट करते रहना चाहिए। इससे पौधे की सुंदरता और निखर जाती है। अगर मनीप्लांट गमलों में लगे हैं तो साल-डेढ़ साल के अंतराल पर इन्हें दूसरे गमलों में लगा देना चाहिए।
मनीप्लांट के पौधों को समय.समय पर गोबर की खाद व नई मिट्टी देते रहना चाहिए। दो-तीन महीने के अंतराल पर इसके पौधों में चुटकीभर डीएपी व यूरिया खाद डालने से पत्तियां हरी बनी रहती हैं। इसकी पत्तियों के आकार-प्रकार एवं रंग के आधार पर मनीप्लांट को कई भागों में विभाजित किया गया है। इसकी कुछ प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं।
गोल्डन पोथो- हल्के पीले धब्बों युक्त पत्तियों वाली यह प्रजाति काफी लोकप्रिय है। दरवाजे के आसपास लटकती इसकी पत्तियां सबका मन मोह लेती हैं।
मार्बल क्वीन- इसकी पत्तियां सुंदर, सफेद संगमरमरी रंग एवं हल्के हरे धब्बों वाली होती हैं।
मेक्रोफिला- मनीप्लांट की यह काफी लोकप्रिय किस्म है। इसकी पत्तियां बड़े आकार की और पीले धब्बों वाली होती हैं।
ग्रीन ब्यूटी- इसकी पत्तियां चिकनी हरे रंग की होती हैं।
सिल्वर मून- इसका यह नाम इसकी चमकीली क्रीम रंग की आकर्षक धब्बों वाली पत्तियों के कारण पड़ा।

‘राइट टू एजुकेशन एक्ट’ के स्थान पर नया ‘राइट टू क्वालिटी एजुकेशन फॉर ऑल एक्ट’ बनाये भारत सरकार

किसी भी देश का विकास उस देश के बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। भारत के संदर्भ में यह कहना गलत न होगा कि देश की कम गुणवत्ता वाली शिक्षा के कारण ही भारत ने आज उतनी प्रगति नहीं की, जितनी प्रगति अन्य देशों ने की। स्कूली शिक्षा के मामले में आज भारत चीन से 30 वर्ष पीछे है। भारत के माध्यमिक स्कूलों की जो नामांकन दर आज है वह चीन में आज से 30 वर्ष पूर्व हुआ करती थी। इसके साथ ही बच्चों के विद्वता प्रदर्शन के संदर्भ में भी भारत चीन से काफी पीछे है। इन्टरनेशनल पीसा स्टैन्डर्डराइज्ड एचीवमेंट टेस्ट 2009 में शामिल 74 देशों में चीन को जहां प्रथम स्थान मिला था वहीं भारत को 73वां स्थान मिला था। अतरू यह समय की मांग है कि अपनी शिक्षा पद्धति को विश्व स्तरीय बनाने के लिए भारत सरकार को श्राइट टू एजुकेशन्य की जगह नया श्राइट टू क्वालिटी एजुकेशन फार ऑल एक्ट्य बनाकर सारे देश में लागू करना होगा।  
स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए राइट टू एजुकेशन एक्ट (आरटीई) 2009 में 3 बड़े तरीके को अपनाया गया है। पहला, निजी स्कूलों की मान्यता के लिए बुनियादी ढांचे और अन्य निर्धारित मानक को पूरा करना (धारा 19), दूसरा, सभी निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्लूएस) के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीट आरक्षित करना (धारा 12) तथा तीसरा, सरकारी स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता को तय करना व कक्षा में छात्र-शिक्षक अनुपात को कम करते हुए अधिकतम अनुपात 30रू1 निर्धारित करना। पर व्यवहारिक रूप में शिक्षा में गुणवत्ता लाने के ये तरीके जहां एक ओर अप्रमाणिक हैं वहीं दूसरी ओर दोषपूर्ण भी लगते हैं। इस सम्बन्ध में ऐरिक हानुशेक द्वारा किये गये अध्ययन को देखा जा सकता है जिसमें 400 अध्ययनों के आधार पर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि छात्र-शिक्षक अनुपात को कम करने, अध्यापकों की योग्यताओं को बढ़ाने व स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाने का छात्रों की पढ़ाई-लिखाई से कोई सुसंगत सम्बन्ध नहीं है। 
इसके साथ ही राइट टू एजुकेशन की धारा 12 व 19 में शिक्षा में गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए किये गये प्रावधानों को लागू करने में राज्य सरकारों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा है। उन राज्यों में जहां पर शिक्षा के लिए उत्तरदायी संस्थाओं के द्वारा आरटीआई एक्ट में निजी स्कूलों की मान्यता के संबंध में दिये गये निर्धारित मानकों (स्कूल के कमरों के आकार, छात्र-शिक्षक अनुपात, फर्नीचर, स्वयं का भवन होने की अनिवार्यता, पंजीकृत संस्था होना, लाभ के बिना स्कूल को चलाने आदि) का अनुपालन कठोरता के साथ किया गया। इसके चलते बहुत कम फीस लेने वाले निजी स्कूलों के इन मानकों को पूरा न कर पाने की स्थिति में बड़ी संख्या में बंद करने के आदेश दिये गये, लेकिन इन आदेशों को कई कानूनी चुनौतियों और अदालत के स्थगन आदेश का सामना करना पड़ा है। सरकारी स्कूलों का एक बड़ा अनुपात स्वयं ही शिक्षा अधिकार अधिनियम के भौतिक बुनियादी ढांचों के नियमों पर खरा नहीं उतरता। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कुछ राज्य सरकारों (गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र) ने स्कूलों की मान्यता संबंधी मानक में, भौतिक बुनियादी ढांचों के मानदंडों के अनुपालन की अनिवार्यता के साथ ही, छात्रों के विद्वता प्रदर्शन स्तर को भी एक महत्वपूर्ण मानक मे रूप में शामिल किया है। 
इसके अलावा, भारत में बेसिक शिक्षा प्रदान करने में सरकार निजी स्कूलों पर काफी निर्भर है क्योंकि निजी स्कूल भारत के ग्रामीण इलाकों के 31 प्रतिशत (उत्तर प्रदेश में 52 प्रतिशत, हरियाणा में 54 प्रतिशत और केरल में 62 प्रतिशत) और कई अन्य राज्यों में 90 प्रतिशत या उसके ऊपर शहरी बच्चों को शिक्षा दे रहें हैं। इन परिस्थितियों में शिक्षा अधिकार अधिनियम के मान्यता संबंधी मानकों को पूरा करने में असमर्थ रहने पर यदि कई निजी स्कूलों को बंद कर दिया गया तो सरकारी स्कूलों की सीटों को बढ़ाने में अत्यधिक वित्तीय बोझ (जहां पर प्रत्येक छात्र पर 20 गुना अधिक खर्च किया जाता है, क्योंकि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को ग्रामीण क्षेत्रों के निजी स्कूलों की तुलना में 20 गुना ज्यादा वेतन मिलता है) को सहन करना असम्भव हो जायेगा। इसलिए मेरा सुझाव है कि गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र की तरह एक संशोधित शिक्षा अधिकार अधिनियम को लागू किया जाये, जिसमें स्कूलों की मान्यता के लिए निर्धारित मानक के अन्तर्गत शिक्षा की गुणवत्ता व स्कूल के छात्रों के विद्वता प्रदर्शन पर सबसे अधिक महत्व देना चाहिए।
राइट टू एजुकेशन एक्ट की धारा 12 कहती है कि राज्य निजी स्कूलों के खर्च की भरपाई इस प्रकार करेगारू (अ) स्कूल की वास्तविक फीस या (ब) सरकारी स्कूल के प्रति छात्र खर्च, इन दोनों में से जो भी कम हो। हम इस धारा के साथ सरकार को होने वाली परेशानी को समझने के लिए उत्तर प्रदेश का उदाहरण ले सकते हैं। उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूल के प्रत्येक छात्र पर 450 रूपये का खर्च अनुमानित किया गया है। (हालांकि कुछ अनुमानों के अनुसार यह 2000 रूपये प्रतिमाह है)। इसके विपरीत ग्रामीण क्षेत्रों के निजी स्कूलों की औसत फीस 90 रूपये प्रतिमाह होती है जो कि सरकारी स्कूलों के प्रत्येक बच्चे के खर्च के लिए अनुमानित 450 रूपये का 1ध्5वां भाग ही है। इस पांच गुणा अंतर की वजह से कम फीस लेने वाले प्राइवेट स्कूल जोकि उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में है, को यह प्रलोभन देते हैं कि वे बढ़ा-चढ़ा कर फीस बताये या बढ़ा-चढ़ाकर दाखिला दिलायें। कागज पर नये प्राइवेट स्कूल दिखायें या 25 प्रतिशत से अधिक आर्थिक रुप से कमजोर बच्चे ले लें। भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले इस तरह के प्रलोभन की वजह से सरकार को निजी स्कूल की भरपाई हेतु सरकारी बजट की व्यवस्था करने में कठिनाई आती है।
शहर के अधिक फीस लेने वाले निजी स्कूलों की असंतुष्टता एक मुख्य कारण यह है कि प्रतिपूर्ति की अधिकतम सीमा (शहर के उच्च फीस वाले निजी स्कूल के लिए) बहुत कम है, जो कि उत्तर प्रदेश में प्रतिमाह 450 रूपये, उत्तराखण्ड में 860 रूपये, दिल्ली में 1190 रूपये निर्धारित है। सरकार को चाहिए कि प्रत्येक बच्चे पर आने वाले इस खर्च को निर्धारित करने के लिए पारदर्शी गणना करें। कुछ अनुमानों के अनुसार उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों के प्रत्येक प्राइमरी बच्चे पर खर्च 2000 रूपये व उच्च प्राथमिक के प्रत्येक बच्चे पर 2500 रूपये का खर्च अनुमानित है। निजी स्कूलों को इस बात का भी भय होता है कि उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर 25 प्रतिशत बच्चों के लिए स्कूल की वर्दी, किताबें, स्टेशनरी, कम्प्यूटर, शैक्षिक यात्रा व फर्नीचर आदि की व्यवस्था पर भी अतिरिक्त खर्च वहन करना पड़ेगा। इसके साथ ही एक अन्य कारण के रूप में प्रतिपूर्ति की कठिन प्रक्रिया से भ्रष्ट्राचार व देर से भुगतान मिलने की सम्भावना है। उन राज्यों में जहां धारा 12 को लागू हुए 2-3 वर्ष हो चुके है और वहां देर से प्रतिपूर्ति करने पर पीडि़त निजी स्कूलों को जुर्माने के रूप में अतिरिक्त भुगतान की कोई व्यवस्था नहीं है, निजी स्कूल और भी अधिक डरे हुए हैं। 
निष्कषर्रू
श्राइट टू एजुकेशन एक्ट्य जो कि सभी को एक समान श्गुणवत्तापूर्ण शिक्षा्य का अवसर नहीं प्रदान करता है, को एक नये श्राइट टू क्वालिटी एजुकेशन फॅार ऑल्य (सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार अधिनियम) से विस्थापित कर दिया जाये। यह कहाँ का न्याय होगा कि हम आर्थिक रूप से कमजोर केवल 25 प्रतिशत बच्चों को ही निजी स्कूलों में दाखिला दिलाकर उन्हें गुणात्मक शिक्षा प्रदान करने का अवसर प्रदान करें? वास्तव में यह हमारे संविधान के अनुच्छेद 21(ए) की मूल भावना के भी विपरीत होगा। इसलिए सरकार को चाहिए कि वे आर्थिक रूप से कमजोर 25 प्रतिशत बच्चों की पढ़ाई के लिए निजी स्कूलों को प्रतिपूर्ति के रूप में दी जाने वाली धनराशि को देने की बजाय उस धनराशि का उपयोग भारत के कोने-कोने में सरकारी स्कूलों की स्थापना एवं शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने में करे। इससे केवल 25 प्रतिशत भाग्यशाली बच्चों के स्थान पर 100 प्रतिशत बच्चों को अपना भाग्य बनाने का एक समान अवसर प्राप्त होगा। इसके लिए सरकार को गाँवों के साथ ही शहरों में भी सरकारी स्कूलों की संख्या को बढ़ाते हुए उसमें गुणात्मक शिक्षा देने की व्यवस्था सुनिश्चित करना होगा। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता को सुधारने का मतलब यह नहीं है कि केवल भौतिक सुविधाओं की उपलब्धि हो (जैसा कि आर.टी.आई. एक्ट में बताया गया है) बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि शिक्षक की योग्यता के साथ ही बच्चों के विद्वता प्रदर्शन के प्रति भी उनकी जबावदेही तय हो। इसलिए आज हमें एक ऐसे एक्ट की आवश्यकता है जो कि स्कूलों की गुणवत्ता को बढ़ाने पर केन्द्रित हो। जिसके अन्तर्गत यह सुनिश्चित किया जाये कि अच्छा वेतन पाने वाले सरकारी शिक्षक नियमित रुप से स्कूल आये, अपने शैक्षिक कार्य को पूरा समय दे, बच्चों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए सर्वश्रेष्ठ कदम उठाये, जिससे बच्चों की शैक्षिक विद्वता के अच्छे परिणाम सामने आये व भारत की युवा पीढ़ी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में और भी अधिक सक्षम बनें।
- प्रोफेसर गीता किंग्डन, 
चेयर ऑफ एजुकेशन इकोनोमिक्स एण्ड इन्टरनेशनल डेवलपमेन्ट, 
यू.सी.एल. इन्स्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन, यूनिवर्सिटी ऑफ लन्दन

रेल यात्रियों को और अधिक सुविधाओं का प्रयास

रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा के कथनानुसार रेलवे में यात्री सुविधाएं और बढाने का काम प्राथमिकता के आधार पर किया जायेगा। इसके लिये तेजी से जरुरी प्रक्रियाएं चल रही है इसका यात्रियों को जल्दी ही असर दिखाई देगा।
१. जिन रेलगडियों में २४ से कम कोच लगाये जा रहे है उनमें साधारण श्रेणी के दो कोच बढाये जायेगे जिस से बिना आरक्षण लिये लोगों की रेल यात्रा आसान हो सके।
२. वाराणी के मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन से नई दिल्ली तक नई रेलगाड़ी चलाई गई है जिसका नं0 १२५८१ है। यह यात्रा मार्ग में ज्ञानपुर रोड़, इलाहाबाद ज0, कानपुर सैन्ट्रल तथा गाजियाबाद जं0 पर रुकेगी। इसमें सामान्य 
श्रेणी के ६, शयनयान श्रेणी के आठ, ए.सी. ढ्ढढ्ढढ्ढ के तीन, ए.सी. ढ्ढढ्ढ के एक, प्रथम सह द्वितीय ए.सी. श्रेणी का एक तथा एस एल आर के दो कोचो सहित कुल २१ कोच लगाये जायेंगे।
३. मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन के सौदर्यीकरण के लिये ३० करोड़ रु. आंवटित किये गये है जिससे आने वाले समय में यहां यात्रियों को और बेहतर सुविधाएं मिल सकेगी। इसके अलावा वाराणसी  सिटी, सारनाथ, लोहटा रेलवे स्टेशन के विकास हेतु अनेक परियोजनाएं स्वीकृत की गई।
४. लखनऊ-छपरा वायां वाराणसी साप्ताहिक एक्सप्रेस ट्रेन नम्बर- १५०५४  लखनऊ से सोमवार-बुधवार, शुक्रवार रात्रि ९ बजे चलकर अगले दिन मध्यान्ह १२.१५ पर छपरा पहुंचेगी तथा छपरा ट्रेन नम्बर- १५०५३ छपरा से मंगलवार, वीरवार एवं शनिवार रात्रि ७.३५ पर प्रस्थान कर अगले दिन सुबह ९.०० बजे लखनऊ पहुंचेगी। यात्रा विराम बादशाह नगर, गोमती नगर, फैजाबाद, अयोध्या, शाहगंज, जौनपुर, वाराणसी, ओडिहार, गाजीपुर सिटी एवं बलिया है। इसमें कुल १८ कोच है। इसमें साधारण श्रेणी ६, शयनयान ७, ए.सी. ढ्ढढ्ढढ्ढ २, ए.सी. ढ्ढढ्ढ १ तथा एस.एल.आर. के २ कोच होगे।   

Wednesday, 6 May 2015

वरिष्ठ नागरिकों के लिए आयोग बनाने पर विचार करेगी सरकार

नई दिल्ली। केंद्र सरकार अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों, बच्चों और महिलाओं की तर्ज पर वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक आयोग गठित करने पर विचार कर सकती है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान सदस्यों के सवालों के जवाब में बताया, श्मैं कोई आश्वासन नहीं दे सकता कि सरकार वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक आयोग गठित करेगी। लेकिन हम इस पर विचार कर सकते हैं।्य
वह बीजद के भतृहरि मेहताब के सवाल का जवाब दे रहे थे जिन्होंने सवाल किया था कि क्या सरकार अल्पसंख्यकों, पिछड़ों, महिलाओं और बच्चों की तर्ज पर वरिष्ठ नागरिकों के लिए भी कोई आयोग गठित करने पर विचार कर रही है? गहलोत ने कहा कि सरकार अनुसूचित जातियों-जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्गों, मादक पदार्थों की लत के शिकार लोगों के कल्याण के लिए विभिन्न योजनाओं को क्रियान्वित करने के मकसद से गैर सरकारी संगठनों को अनुदान प्रदान करती है। उन्होंने बताया कि एनजीओ द्वारा धन की हेराफेरी साबित होने पर मंत्रालय एनजीओ को काली सूची में डालने के लिए पहल करता है।
गहलोत ने बताया कि इस प्रकार के मामलों में 87 एनजीओ को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और दस एनजीओ को काली सूची में डाला गया।