Monday, 18 May 2015

कृष्ण भक्त भी और भगवान भी

कृष्ण भक्त हैं, और भगवान भी हैं। और जो भी भक्ति में प्रवेश करेगा, वह भक्तसे शुरू होगा और भगवान पर पूरा हो जाएगा
इस संबंध में थोड़ी सी बात पीछे हुई है, लेकिन हमें समझ में नहीं आती है, इसलिए फिर दूसरी तरह से लौट आती है। मैंने प्रार्थना के संबंध में जो कहा, वह थोड़ा खयाल में लेंगे तो समझ में आ जाएगा। जैसा मैंने कहा कि प्रेयर नहीं, प्रेयरफुलनेस। ऐसा भक्ति का मतलब किसी की भक्ति नहीं होती, भक्ति का मतलब है, डिवोशनल एटिटयूड। भक्ति का मतलब है, भक्त का भाव। उसके लिए भगवान होना जरूरी नहीं है। भक्ति भगवान के बिना हो सकती है, ऐसा नहीं, भक्ति के कारण भगवान दिखाई पडना शुरू हुआ है। जिन लोगों का हृदय भक्ति से भरा है, उन्हें यह जगत भगवान हो जाता है। जिनका हृदय भक्ति से नहीं भरा है, वे पूछते हैं--भगवान कहां है? वे पूछेंगे। और उन्हें बताया नहीं जा सकता, क्योंकि वह भक्त के हृदय से देखा गया जगत है। वह भक्त के मार्ग से देखा गया जगत है।
जगत भगवान नहीं है, भक्तिपूर्ण ह्रदय जगत को भगवान की तरह देख पाता है। जगत पत्थर भी नहीं है, पत्थर की तरह हृदय जगत को पत्थर की तरह देख पाता है। जगत में जो हम देख रहे हैं, वह प्रोजेक्शन है, वह हमारे भीतर जो है उसका प्रतिफलन है। जगत में वही दिखाई पड़ता है, जो हम हैं। अगर भीतर भक्ति का भाव गहरा हुआ, तो जगत भगवान हो जाता है। फिर ऐसा नहीं है कि भगवान कहीं बैठा होता है किसी मंदिर मेंय फिर जो होता है वह भगवान ही होता है।
कृष्ण भक्त हैं, और भगवान भी हैं। और जो भी भक्ति में प्रवेश करेगा, वह भक्त से शुरू होगा और भगवान पर पूरा हो जाएगा। एक दिन जब वह बाहर भगवान को देख लेगा, तो उसने खुद ऐसा क्या कसूर किया है कि उसे भीतर भगवान नहीं दिखाई पड़ेंगे! भक्त शुरू होता है भक्त की तरह, पूरा होता है भगवान की तरह। यात्रा शुरू करता है जगत को देखने की देखता है उसे जो जगत में है। भक्तिपूर्ण हृदय से, डिवोशनल माइंड से, प्रेयरफुल, भक्तिपूर्ण, भावपूर्ण, प्रार्थनापूर्ण मन से देखता है जगत को। फिर धीरे-धीरे अपने को भी उसी तरह देख पाता है, कोई उपाय नहीं रह जाता। फिर ऐसा भी हो जाता है, जैसा रामकृष्ण को एक बार हुआ। बहुत मजे की घटना है।
रामकृष्ण को एक मंदिर में पुरोहित की तरह रखा गया था, दक्षिणेशवर में। बहुत सस्ती नौकरी थी। शायद सोलह रूपये महीने की नौकरी थी। पुजारी की तरह रखा था उनको। लेकिन दस-पांच दिन में ही तकलीफ शुरू हो गई, क्योंकि ट्रस्टियों को खबर मिली कि यह आदमी तो ठीक नहीं मालूम होता। भगवान को जो भोग लगाता है, पहले खुद चख लेता है। और भगवान पर जो फूल चढ़ाता है, सूंघ लेता है। तो छिपकर ट्रस्टियों ने आकर देखा मंदिर में कि मामला क्या है? देखा कि बड़े भाव से रामकृष्ण नाचते हुए भीतर आए, भोग पहले खुद को लगाया, फिर भगवान को लगायाय फूल पहले सूंघे, फिर भगवान को सुंघाए। ट्रस्टियों ने उनको पकड़ लिया और कहा, यह क्या कर रहे हो? यह कोई ढंग है भक्ति का? रामकृष्ण ने कहा, भक्ति का ढंग होता है, यह कभी सुना नहीं। भक्त देखे हैं, भक्त सुने हैं, भक्ति का कोई ढंग होता है? कोई ढांचा, कोई डिसिप्लिन होती है? उन्होंने कहा, निकाल बाहर करेंगे! कहीं सूंघा हुआ फूल भगवान को चढ़ाया जा सकता है? रामकृष्ण ने कहा, बिना सूंघे चढ़ा कैसे सकता हूं? पता नहीं सुगंध हो भी या न हो! ट्रस्टियों ने कहा, बिना भगवान को प्रसाद लगाए तुम खुद कैसे खा लेते हो? रामकृष्ण ने कहा, मेरी मां मुझे खिलाती थी तो पहले चख लेती थी। मैं बिना चखे नहीं चढ़ा सकता। नौकरी तुम सम्हालो। अन्यथा मुझे यहां रखना है, तो मैं चखूगां, फिर चढ़ाऊंगा। पता नहीं खाने योग्य हो भी या न हो!
अब यह जो आदमी है, यह आदमी बाहर ही भगवान को कैसे देख पाएगा? बहुत जल्दी वह वक्त आ जाएगा, यह कहेगा कि भीतर भी भगवान है। तो भक्त से तो शुरु होती है यात्रा, भगवान पर पूरी होती है। ऐसा नहीं है कि बाहर कहीं किसी भगवान पर पूरी होती है, अंततरू सारी दुनिया की यात्रा करके हम अपने पर लौट आते हैं और पाते हैंरू जिसे हम खोजने गए थे वह घर में बैठा हुआ है।
कृष्ण दोनों हैं। तुम दोनों हो, सभी दोनों हैं। लेकिन भगवान से शुरू नहीं कर सकते हो तुम। भक्त से ही शुरु करना पड़ेगा। क्योंकि अगर तुमने यह कहा कि मैं भगवान हूं, तो खतरा है। ऐसे कई लोग खतरा पैदा करते हैं, जो भगवान की घोषणा तो कर देते हैं, तब ऐसे लोग अहंकेंद्रित होकर, इगोसेट्रिक होकर दूसरों को भक्त बनाने की कोशिश में लग जाते हैं। क्योंकि उनके भगवान के लिए भक्तों की जरूरत है। पर वे दूसरें में भगवान नहीं देख पाते। अपने में भगवान देखते हैं, दूसरे में भक्त देखते हैं। ऐसे गुरुडम के बहुत घेरे हैं सारी दुनिया में। यात्रा शुरु करनी पड़ेगी भक्ति से।
अब कृष्ण को भगवान माना जा सकता है, क्योंकि यह आदमी घोड़े तक की भक्ति कर सकता है। सांझ का जब घोड़े थक जाते हैं तो उन्हें ले जाता है नदी पर स्नान कराने।
 उनको नहलाता है, उनको खुरे से साफ करता है। यह आदमी भगवान होने की हैसियत रखता है। क्योंकि घोड़े को भी भगवान की तरह स्नान करवा सकता है। इस आदमी से डर नहीं है, इससे खतरा नहीं है। यह अगर भगवान की अकड़ वाला आदमी होता तो सारथी की जगह बैठ नहीं सकता। अर्जुन से कहता, बैठो नीचे, बैठने दो ऊपर! रहा मैं भगवान, तुम हो भक्त! भगवान बैठेंगे रथ में, भक्त चलाएगा।
जो अपने को भगवान घोषित करते हैं, जरा उन्हें तख्त के नीचे बिठाल कर आप तख्त पर बैठ कर देखिए, तब पता चलेगा!
भक्त से शुरु होगी यात्रा, भगवान पर पूरी होती है।

Thursday, 14 May 2015

अब हमें विकसित होना हैं । विकास के लिए अपना समर्थन दें ।

ग़ांधी जी ने विदेशी शासको से असहयोग आंदोलन और अपनों के साथ सहयोग अभियान चलाया। हमें भी आज सहयोग अभियान की आवश्यकता है विरोध  से होने वाली हानि रोककर सम्पन्नता एवं समृद्धि की दिशा में बढ़े।
- प्रजातंत्र  है। जनता शासक है। जनप्रतिनिधियों का शासन चलाने हेतु चयन किया गया है अपने सभी जनप्रतिनिधियों का प्रत्येक माह मूल्यांकन करें। उन्हें मार्गदर्शन दें। और अपनी अभिव्यक्ति एवं सम्भावनाये हमें भेजें हम श्रम शिखर में प्रकाशित करेंगे, आप अपना विडिओ भी भेज सकते है।
श्रम शिखर के सदस्य बने सदस्यता राशी २५०/- वार्षिक
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A/c Name:  SHRAM SHIKHAR
A/C NO. :  3155197714
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BRANCH:  Ahiran East Hapur Road Meerut City
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कल्याणं करोति का नेत्र शिविर

स्याल चैरिटेबिल फाउण्डेशन ट्रस्ट मेरठ, श्री वाई.पी. कौशल, कल्याणं करोति मेरठ (पंजीकृत) एवं जिला दृष्टिड्हीनता निवारण समिति (बागपत)  के संयुक्त तत्वाधान में लैन्स की सुविधा के साथ निरूशुल्क नेत्र चिकित्सा शिविर का आयोजन महावीर सिंह पूर्व प्रधान का निवास, ग्राम- दरकावदा, ब्लाक बिनौली, (बागपत) के प्रांगण में आयोजित किया गया। जिसमें १४२ नेत्र रोगियों की जांच अभिषेक गुप्ता द्वारा की गयी, सभी नेत्र रोगियों का निरूशुल्क दवाईयां वितरित करके १५ को मोतियाबिन्द के आपरेशन हेतु चयन किया गया। सभी नेत्र रोगियों को मोतियाबिन्द के आपरेशन हेतु कल्याणं करोति, मेरठ द्वारा संचालित निरूशुल्क चिकित्सालय कैन्टोनमैन्ट जनरल अस्पताल, मेरठ छावनी में लाया गया। 
सभी ऑपरेशन डा0 सतीश नागर एवं डा0 पी0पी0 मित्तल द्वारा किये गये। चश्में के लिए २० नेत्र रोगियों की जांच श्री अभिषेक गुप्ता द्वारा की गयी और ११ को रियायती दर पर चश्में उपलब्ध कराने का निर्णय लिया गया। शिविर को सफल बनाने हेतु सर्व श्रीमतीध्श्री डी.के. अग्रवाल, ईश्वरचन्द गुप्ता, रामपाल सिंह, बिजेन्द्र उर्फ विनय, दिलबाग सिंह, महिपाल सिंह, मीता एवं विजय आदि ने विशेष योगदान दिया।
कैन्टोनमैन्ट जनरल अस्पताल, बेगमपुल, मेरठ   पिन-२५०००१
फोन रू (का0) ०१२१-२६६४७२२, (अध्यक्ष) ९४१२२०६२१०, (महामंत्री) ९४५६८३८४५६ 

ओशो सत्संग और मेडिटेशन

स्कूल ऑफ लाइफ् गोमती धारा आत्मदर्शन की स्थिति कुंज बिहार में कार्यक्रम मैं प्रोफेसर वाचपति जी ने दीप जलाया कार्यक्रम शुभारम्भ हुआ।
ओशो का प्रवचन गीता दर्शन पर हुआ परिणाम की फिकर मत कर अर्जुन तू कर्म कर यही तेरा धर्म है। कृष्ण अर्जुन तू कर्म कर यही तेरा धर्म है। कृष्ण अर्जुन का समझाते हुए कहते जो व्यक्ति अकत्र्ता होकर कार्य करता है। वह कर्म अकर्म बन जाते है। फिर वह साधक अकत्र्ता बन जाता है।
स्वामी आत्मोकमरान ने कुण्डलिनी जागरण एक घण्टे का ध्यान कराया और अन्तर स्नान का अनुभव कराये। सभी मित्रो ने सहयोग दिया। रामानन्द जी, शिवकुमार, वन्दना, मोनिका, सत्यवीर जी आदि कार्यक्रम में उपस्थित रहे।
सदड्ढ्भावना समिति (पंजी.) स्वामी आत्मो कामरान 8057982656, 8273548730

स्वामी की सोच को किया सार्थक

पिछली सदी के आठवें दशक में स्वामी चिन्मयानंद ने कांगड़ा जिले के दो हजार गांवों में गरीबी मिटाने का संकल्प लिया। इसे पूरा करने के लिए उन्होंने स्वयसेवी संस्था कार्ड (चिन्मय आर्गेनाइटेशन ऑफ रूरल डेवलपमेंट) का गठन किया। इसे चलाने के लिए उन्हें एक ऐसे नेतृत्व की तलाश थी जो उनकी सोच को अजाम तक पहुंचा सके। उनकी इस सोच को डॉ. क्षमा मेत्रेय ने साकार किया।
डॉ. क्षमा मेत्रेय नई दिल्ली के मोलाना अबुल कलाम आजाद मेडिकल कॉलेज में बाल रोग विशेषज्ञ का पद छोड़कर कार्ड की राष्टड्ढ्रीय अध्यक्ष बनीं। १९८५ में संस्था की बागडोर संभाली और कुछ महिलाओं को सिलाई मशीनें बांटकर उन्हें आत्मनिर्भर करने का प्रयास शुरू किया। आज सस्था नौ सो गांवों में साक्षरता, स्वरोजगार व स्वास्थ्य से संबंधित सेवाएं प्रदान कर रही है। वह खुद वर्ष भर में करीब २० हजार रोगियों को चिकित्सा प्रदान करती है। इन्होंने १४ हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार के साधन से जोड़ा। विधिक साक्षरता में भी संस्था अहम योगदान दे रही है। करीब ८२७ मामलों में से ६१३ सुलझाए। पर्यावरण संरक्षण में भी संस्था अहम कार्य कर रही है। ६९५ गांवों में करीब २० हजार शौचालयों का निर्माण करवाया है।
महिला दिवस को सार्थक रूप तभी दिया जा सकता है, जब पुरुष भी महिलों का सम्मान करें। सबसे पहले महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना को उजागर करना होगा। लिंग भेदभाव को समाप्त करने के लिए महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों को भी आगे आना होगा।

Monday, 11 May 2015

साईकिल ट्रैक उद्देश्यपूरक

उ0प्र0 के मुख्यमन्त्री की महत्वाकांक्षी श्साईकिल ट्रैक्य योजना प्रदेश के बड़े महानगरों में सकारात्मक हो चली है। पश्चिमी उ0प्र0 में मेरठ के बाद गाजियाबाद में भी इस के स्थान नियत होने के अलावा टेण्डर प्रक्रिया आदि के साथ बजट आवटन प्रक्रिया भी हो गई है। इस योजना को गरीब की सवारी व स्वास्थ्य की दृष्टिड्ढगत उच्चतम न्यायालय के सख्त रुख के बाद ट्रैक की व्यवस्था को राज्य सरकारों को अपनाना पड़ा। सड़क बनाकर गतिवान वाहनों की बढ़ती भीड़ ने साईकिल व पैदल चालकों के लिए समस्या बना डाली थी।
मेरठ मे सीताराम हॉस्टल मेरठ से मंगल पाण्डे नगर तक नियत किया गया है। साईकिल ट्रैक वहां गाजियाबाद में इसका स्थान हापुड़ चुंगी से विवेकानंद नगर तक प्रथम चरण शुरु हो चुका है। दूसरे चरण का नया गाजियाबाद आर ओबी से गोविन्दपुरम का भी निर्मित हो चुका है। पूरे प्रोजेक्ट पर ९ करोड़ प्राधिकरण खर्च कर रहा है। तीसरे ट्रैक पर विचार हो रहा है। यह एएलटी पलाई ओवर ब्रिज से हापुड़ चुंगी तक का है।
साईकिल ट्रैक पर आम जन यानि की दुपहिया साईकिल चालकों से जब बात की तो वह इस ट्रैक व्यवस्था से खुश नही थे। इनका कहना था कि हमे ट्रैक की उपलब्धता तो तब भी नही होगी। इन ट्रैकों पर अपेक्षा अनुरुप साईकिलिंग किया जाना संभव होगा इसमें संशय है। सड़कों के किनारे व अन्य पगडंडियों पर जिस तरह चलना दुष्कर है बड़े वाहनों के खड़े रहने या चलने के प्रयास अथवा इन पर अतिक्रमण कर कारोबार होते है उसे देखकर नही लगता की यह ट्रैक जिस लक्ष्य को लेकर बन रहे है। उनसे जनता को सुविधा मिलेगी। यह जरुर है कि प्रदेश की सरकार जिसका चुनाव चिन्ह ही साईकिल है अथवा लाभ की अपेक्षा करती हो।
साईकिल निर्माता जिन्होने अब साईकिल बनाना बंद कर दिया था या बंद करने में लगे थी वापस चेहरे पर मुस्कान ला बैठे। साईकिल मरम्मत के लगे लोग भी पुनरू इस कार्य में रुचि लेने लगे है। 
साईकिल ट्रैक प्रतीकात्मक न बने रहे
वरिष्ठ नागरिक कल्यान समिति अध्यक्ष ईआरएस गुप्ता का कहना था कि जिस शो शराबे के तहद बड़े शहरों में इक्का दुक्का साईकिल ट्रैक बन रहे है या बनाने का प्रस्ताव है इससे लोगो का स्वास्थ्य नही सुधरने वाला है। इस तरह यह प्रतीकात्मक रह जायेगे। जरुरत है सड़कों के किनारे दो और जो पटरी छोडी जाती है उसे साईकिल ट्रैक संरक्षित कर उस पर अतिक्रमण रोक कर इसके दुरुपयोग का रोका जाएं। 
साईकिल ट्रैंक तो हो गया पदैल चलने की राह भी तो
साईकिल ट्रैक पर उ0प्र0 सरकार द्वारा जिस तरह की कर्मठता का प्रदर्शन दिखाया जा रहा है। इसके बाद पैदल चलने वालों जिनमें वरिष्ठ नागरिक व महिला और बच्चों ने जिज्ञासा जाहिर की है की पैदल सड़क किनारे चलना या फिर साईकिल ट्रैक की तरह स्वास्थय बनाने हेतु घुमने की राह के लिए भी इस तरह प्रदेश सरकार सोचेगी और उपलब्ध करायेगी। आज सड़कों व अन्य रास्तों पर पदैल चलने वालों के साथ भी साईकिल चालकों से कम दुघर्टना नही होती है।
       -अतिथि सम्पादक निष्ठा अग्रवाल

मन मोह लेता है ‘मनीप्लांट’

मनीप्लांट के पौधे लगभग सभी घरों में लगाए जाते हैं। यह क्यारियों, गमलों, डिब्बों आदि में लगाया जा सकता है। बहुत से लोगों का मानना है कि मनीप्लांट का पौधा घर में लगाने से सुख-समृद्धि भी आती है। मनीप्लांट को छांव वाले स्थान पर लगाना चाहिए। समय-समय पर इसकी सूखी शाखाओं और पत्तियों की काट-छांट करते रहना चाहिए। इससे पौधे की सुंदरता और निखर जाती है। अगर मनीप्लांट गमलों में लगे हैं तो साल-डेढ़ साल के अंतराल पर इन्हें दूसरे गमलों में लगा देना चाहिए।
मनीप्लांट के पौधों को समय.समय पर गोबर की खाद व नई मिट्टी देते रहना चाहिए। दो-तीन महीने के अंतराल पर इसके पौधों में चुटकीभर डीएपी व यूरिया खाद डालने से पत्तियां हरी बनी रहती हैं। इसकी पत्तियों के आकार-प्रकार एवं रंग के आधार पर मनीप्लांट को कई भागों में विभाजित किया गया है। इसकी कुछ प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं।
गोल्डन पोथो- हल्के पीले धब्बों युक्त पत्तियों वाली यह प्रजाति काफी लोकप्रिय है। दरवाजे के आसपास लटकती इसकी पत्तियां सबका मन मोह लेती हैं।
मार्बल क्वीन- इसकी पत्तियां सुंदर, सफेद संगमरमरी रंग एवं हल्के हरे धब्बों वाली होती हैं।
मेक्रोफिला- मनीप्लांट की यह काफी लोकप्रिय किस्म है। इसकी पत्तियां बड़े आकार की और पीले धब्बों वाली होती हैं।
ग्रीन ब्यूटी- इसकी पत्तियां चिकनी हरे रंग की होती हैं।
सिल्वर मून- इसका यह नाम इसकी चमकीली क्रीम रंग की आकर्षक धब्बों वाली पत्तियों के कारण पड़ा।

‘राइट टू एजुकेशन एक्ट’ के स्थान पर नया ‘राइट टू क्वालिटी एजुकेशन फॉर ऑल एक्ट’ बनाये भारत सरकार

किसी भी देश का विकास उस देश के बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। भारत के संदर्भ में यह कहना गलत न होगा कि देश की कम गुणवत्ता वाली शिक्षा के कारण ही भारत ने आज उतनी प्रगति नहीं की, जितनी प्रगति अन्य देशों ने की। स्कूली शिक्षा के मामले में आज भारत चीन से 30 वर्ष पीछे है। भारत के माध्यमिक स्कूलों की जो नामांकन दर आज है वह चीन में आज से 30 वर्ष पूर्व हुआ करती थी। इसके साथ ही बच्चों के विद्वता प्रदर्शन के संदर्भ में भी भारत चीन से काफी पीछे है। इन्टरनेशनल पीसा स्टैन्डर्डराइज्ड एचीवमेंट टेस्ट 2009 में शामिल 74 देशों में चीन को जहां प्रथम स्थान मिला था वहीं भारत को 73वां स्थान मिला था। अतरू यह समय की मांग है कि अपनी शिक्षा पद्धति को विश्व स्तरीय बनाने के लिए भारत सरकार को श्राइट टू एजुकेशन्य की जगह नया श्राइट टू क्वालिटी एजुकेशन फार ऑल एक्ट्य बनाकर सारे देश में लागू करना होगा।  
स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए राइट टू एजुकेशन एक्ट (आरटीई) 2009 में 3 बड़े तरीके को अपनाया गया है। पहला, निजी स्कूलों की मान्यता के लिए बुनियादी ढांचे और अन्य निर्धारित मानक को पूरा करना (धारा 19), दूसरा, सभी निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्लूएस) के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीट आरक्षित करना (धारा 12) तथा तीसरा, सरकारी स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता को तय करना व कक्षा में छात्र-शिक्षक अनुपात को कम करते हुए अधिकतम अनुपात 30रू1 निर्धारित करना। पर व्यवहारिक रूप में शिक्षा में गुणवत्ता लाने के ये तरीके जहां एक ओर अप्रमाणिक हैं वहीं दूसरी ओर दोषपूर्ण भी लगते हैं। इस सम्बन्ध में ऐरिक हानुशेक द्वारा किये गये अध्ययन को देखा जा सकता है जिसमें 400 अध्ययनों के आधार पर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि छात्र-शिक्षक अनुपात को कम करने, अध्यापकों की योग्यताओं को बढ़ाने व स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाने का छात्रों की पढ़ाई-लिखाई से कोई सुसंगत सम्बन्ध नहीं है। 
इसके साथ ही राइट टू एजुकेशन की धारा 12 व 19 में शिक्षा में गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए किये गये प्रावधानों को लागू करने में राज्य सरकारों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा है। उन राज्यों में जहां पर शिक्षा के लिए उत्तरदायी संस्थाओं के द्वारा आरटीआई एक्ट में निजी स्कूलों की मान्यता के संबंध में दिये गये निर्धारित मानकों (स्कूल के कमरों के आकार, छात्र-शिक्षक अनुपात, फर्नीचर, स्वयं का भवन होने की अनिवार्यता, पंजीकृत संस्था होना, लाभ के बिना स्कूल को चलाने आदि) का अनुपालन कठोरता के साथ किया गया। इसके चलते बहुत कम फीस लेने वाले निजी स्कूलों के इन मानकों को पूरा न कर पाने की स्थिति में बड़ी संख्या में बंद करने के आदेश दिये गये, लेकिन इन आदेशों को कई कानूनी चुनौतियों और अदालत के स्थगन आदेश का सामना करना पड़ा है। सरकारी स्कूलों का एक बड़ा अनुपात स्वयं ही शिक्षा अधिकार अधिनियम के भौतिक बुनियादी ढांचों के नियमों पर खरा नहीं उतरता। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कुछ राज्य सरकारों (गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र) ने स्कूलों की मान्यता संबंधी मानक में, भौतिक बुनियादी ढांचों के मानदंडों के अनुपालन की अनिवार्यता के साथ ही, छात्रों के विद्वता प्रदर्शन स्तर को भी एक महत्वपूर्ण मानक मे रूप में शामिल किया है। 
इसके अलावा, भारत में बेसिक शिक्षा प्रदान करने में सरकार निजी स्कूलों पर काफी निर्भर है क्योंकि निजी स्कूल भारत के ग्रामीण इलाकों के 31 प्रतिशत (उत्तर प्रदेश में 52 प्रतिशत, हरियाणा में 54 प्रतिशत और केरल में 62 प्रतिशत) और कई अन्य राज्यों में 90 प्रतिशत या उसके ऊपर शहरी बच्चों को शिक्षा दे रहें हैं। इन परिस्थितियों में शिक्षा अधिकार अधिनियम के मान्यता संबंधी मानकों को पूरा करने में असमर्थ रहने पर यदि कई निजी स्कूलों को बंद कर दिया गया तो सरकारी स्कूलों की सीटों को बढ़ाने में अत्यधिक वित्तीय बोझ (जहां पर प्रत्येक छात्र पर 20 गुना अधिक खर्च किया जाता है, क्योंकि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को ग्रामीण क्षेत्रों के निजी स्कूलों की तुलना में 20 गुना ज्यादा वेतन मिलता है) को सहन करना असम्भव हो जायेगा। इसलिए मेरा सुझाव है कि गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र की तरह एक संशोधित शिक्षा अधिकार अधिनियम को लागू किया जाये, जिसमें स्कूलों की मान्यता के लिए निर्धारित मानक के अन्तर्गत शिक्षा की गुणवत्ता व स्कूल के छात्रों के विद्वता प्रदर्शन पर सबसे अधिक महत्व देना चाहिए।
राइट टू एजुकेशन एक्ट की धारा 12 कहती है कि राज्य निजी स्कूलों के खर्च की भरपाई इस प्रकार करेगारू (अ) स्कूल की वास्तविक फीस या (ब) सरकारी स्कूल के प्रति छात्र खर्च, इन दोनों में से जो भी कम हो। हम इस धारा के साथ सरकार को होने वाली परेशानी को समझने के लिए उत्तर प्रदेश का उदाहरण ले सकते हैं। उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूल के प्रत्येक छात्र पर 450 रूपये का खर्च अनुमानित किया गया है। (हालांकि कुछ अनुमानों के अनुसार यह 2000 रूपये प्रतिमाह है)। इसके विपरीत ग्रामीण क्षेत्रों के निजी स्कूलों की औसत फीस 90 रूपये प्रतिमाह होती है जो कि सरकारी स्कूलों के प्रत्येक बच्चे के खर्च के लिए अनुमानित 450 रूपये का 1ध्5वां भाग ही है। इस पांच गुणा अंतर की वजह से कम फीस लेने वाले प्राइवेट स्कूल जोकि उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में है, को यह प्रलोभन देते हैं कि वे बढ़ा-चढ़ा कर फीस बताये या बढ़ा-चढ़ाकर दाखिला दिलायें। कागज पर नये प्राइवेट स्कूल दिखायें या 25 प्रतिशत से अधिक आर्थिक रुप से कमजोर बच्चे ले लें। भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले इस तरह के प्रलोभन की वजह से सरकार को निजी स्कूल की भरपाई हेतु सरकारी बजट की व्यवस्था करने में कठिनाई आती है।
शहर के अधिक फीस लेने वाले निजी स्कूलों की असंतुष्टता एक मुख्य कारण यह है कि प्रतिपूर्ति की अधिकतम सीमा (शहर के उच्च फीस वाले निजी स्कूल के लिए) बहुत कम है, जो कि उत्तर प्रदेश में प्रतिमाह 450 रूपये, उत्तराखण्ड में 860 रूपये, दिल्ली में 1190 रूपये निर्धारित है। सरकार को चाहिए कि प्रत्येक बच्चे पर आने वाले इस खर्च को निर्धारित करने के लिए पारदर्शी गणना करें। कुछ अनुमानों के अनुसार उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों के प्रत्येक प्राइमरी बच्चे पर खर्च 2000 रूपये व उच्च प्राथमिक के प्रत्येक बच्चे पर 2500 रूपये का खर्च अनुमानित है। निजी स्कूलों को इस बात का भी भय होता है कि उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर 25 प्रतिशत बच्चों के लिए स्कूल की वर्दी, किताबें, स्टेशनरी, कम्प्यूटर, शैक्षिक यात्रा व फर्नीचर आदि की व्यवस्था पर भी अतिरिक्त खर्च वहन करना पड़ेगा। इसके साथ ही एक अन्य कारण के रूप में प्रतिपूर्ति की कठिन प्रक्रिया से भ्रष्ट्राचार व देर से भुगतान मिलने की सम्भावना है। उन राज्यों में जहां धारा 12 को लागू हुए 2-3 वर्ष हो चुके है और वहां देर से प्रतिपूर्ति करने पर पीडि़त निजी स्कूलों को जुर्माने के रूप में अतिरिक्त भुगतान की कोई व्यवस्था नहीं है, निजी स्कूल और भी अधिक डरे हुए हैं। 
निष्कषर्रू
श्राइट टू एजुकेशन एक्ट्य जो कि सभी को एक समान श्गुणवत्तापूर्ण शिक्षा्य का अवसर नहीं प्रदान करता है, को एक नये श्राइट टू क्वालिटी एजुकेशन फॅार ऑल्य (सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार अधिनियम) से विस्थापित कर दिया जाये। यह कहाँ का न्याय होगा कि हम आर्थिक रूप से कमजोर केवल 25 प्रतिशत बच्चों को ही निजी स्कूलों में दाखिला दिलाकर उन्हें गुणात्मक शिक्षा प्रदान करने का अवसर प्रदान करें? वास्तव में यह हमारे संविधान के अनुच्छेद 21(ए) की मूल भावना के भी विपरीत होगा। इसलिए सरकार को चाहिए कि वे आर्थिक रूप से कमजोर 25 प्रतिशत बच्चों की पढ़ाई के लिए निजी स्कूलों को प्रतिपूर्ति के रूप में दी जाने वाली धनराशि को देने की बजाय उस धनराशि का उपयोग भारत के कोने-कोने में सरकारी स्कूलों की स्थापना एवं शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने में करे। इससे केवल 25 प्रतिशत भाग्यशाली बच्चों के स्थान पर 100 प्रतिशत बच्चों को अपना भाग्य बनाने का एक समान अवसर प्राप्त होगा। इसके लिए सरकार को गाँवों के साथ ही शहरों में भी सरकारी स्कूलों की संख्या को बढ़ाते हुए उसमें गुणात्मक शिक्षा देने की व्यवस्था सुनिश्चित करना होगा। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता को सुधारने का मतलब यह नहीं है कि केवल भौतिक सुविधाओं की उपलब्धि हो (जैसा कि आर.टी.आई. एक्ट में बताया गया है) बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि शिक्षक की योग्यता के साथ ही बच्चों के विद्वता प्रदर्शन के प्रति भी उनकी जबावदेही तय हो। इसलिए आज हमें एक ऐसे एक्ट की आवश्यकता है जो कि स्कूलों की गुणवत्ता को बढ़ाने पर केन्द्रित हो। जिसके अन्तर्गत यह सुनिश्चित किया जाये कि अच्छा वेतन पाने वाले सरकारी शिक्षक नियमित रुप से स्कूल आये, अपने शैक्षिक कार्य को पूरा समय दे, बच्चों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास के लिए सर्वश्रेष्ठ कदम उठाये, जिससे बच्चों की शैक्षिक विद्वता के अच्छे परिणाम सामने आये व भारत की युवा पीढ़ी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में और भी अधिक सक्षम बनें।
- प्रोफेसर गीता किंग्डन, 
चेयर ऑफ एजुकेशन इकोनोमिक्स एण्ड इन्टरनेशनल डेवलपमेन्ट, 
यू.सी.एल. इन्स्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन, यूनिवर्सिटी ऑफ लन्दन

रेल यात्रियों को और अधिक सुविधाओं का प्रयास

रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा के कथनानुसार रेलवे में यात्री सुविधाएं और बढाने का काम प्राथमिकता के आधार पर किया जायेगा। इसके लिये तेजी से जरुरी प्रक्रियाएं चल रही है इसका यात्रियों को जल्दी ही असर दिखाई देगा।
१. जिन रेलगडियों में २४ से कम कोच लगाये जा रहे है उनमें साधारण श्रेणी के दो कोच बढाये जायेगे जिस से बिना आरक्षण लिये लोगों की रेल यात्रा आसान हो सके।
२. वाराणी के मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन से नई दिल्ली तक नई रेलगाड़ी चलाई गई है जिसका नं0 १२५८१ है। यह यात्रा मार्ग में ज्ञानपुर रोड़, इलाहाबाद ज0, कानपुर सैन्ट्रल तथा गाजियाबाद जं0 पर रुकेगी। इसमें सामान्य 
श्रेणी के ६, शयनयान श्रेणी के आठ, ए.सी. ढ्ढढ्ढढ्ढ के तीन, ए.सी. ढ्ढढ्ढ के एक, प्रथम सह द्वितीय ए.सी. श्रेणी का एक तथा एस एल आर के दो कोचो सहित कुल २१ कोच लगाये जायेंगे।
३. मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन के सौदर्यीकरण के लिये ३० करोड़ रु. आंवटित किये गये है जिससे आने वाले समय में यहां यात्रियों को और बेहतर सुविधाएं मिल सकेगी। इसके अलावा वाराणसी  सिटी, सारनाथ, लोहटा रेलवे स्टेशन के विकास हेतु अनेक परियोजनाएं स्वीकृत की गई।
४. लखनऊ-छपरा वायां वाराणसी साप्ताहिक एक्सप्रेस ट्रेन नम्बर- १५०५४  लखनऊ से सोमवार-बुधवार, शुक्रवार रात्रि ९ बजे चलकर अगले दिन मध्यान्ह १२.१५ पर छपरा पहुंचेगी तथा छपरा ट्रेन नम्बर- १५०५३ छपरा से मंगलवार, वीरवार एवं शनिवार रात्रि ७.३५ पर प्रस्थान कर अगले दिन सुबह ९.०० बजे लखनऊ पहुंचेगी। यात्रा विराम बादशाह नगर, गोमती नगर, फैजाबाद, अयोध्या, शाहगंज, जौनपुर, वाराणसी, ओडिहार, गाजीपुर सिटी एवं बलिया है। इसमें कुल १८ कोच है। इसमें साधारण श्रेणी ६, शयनयान ७, ए.सी. ढ्ढढ्ढढ्ढ २, ए.सी. ढ्ढढ्ढ १ तथा एस.एल.आर. के २ कोच होगे।   

Wednesday, 6 May 2015

वरिष्ठ नागरिकों के लिए आयोग बनाने पर विचार करेगी सरकार

नई दिल्ली। केंद्र सरकार अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों, बच्चों और महिलाओं की तर्ज पर वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक आयोग गठित करने पर विचार कर सकती है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान सदस्यों के सवालों के जवाब में बताया, श्मैं कोई आश्वासन नहीं दे सकता कि सरकार वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक आयोग गठित करेगी। लेकिन हम इस पर विचार कर सकते हैं।्य
वह बीजद के भतृहरि मेहताब के सवाल का जवाब दे रहे थे जिन्होंने सवाल किया था कि क्या सरकार अल्पसंख्यकों, पिछड़ों, महिलाओं और बच्चों की तर्ज पर वरिष्ठ नागरिकों के लिए भी कोई आयोग गठित करने पर विचार कर रही है? गहलोत ने कहा कि सरकार अनुसूचित जातियों-जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्गों, मादक पदार्थों की लत के शिकार लोगों के कल्याण के लिए विभिन्न योजनाओं को क्रियान्वित करने के मकसद से गैर सरकारी संगठनों को अनुदान प्रदान करती है। उन्होंने बताया कि एनजीओ द्वारा धन की हेराफेरी साबित होने पर मंत्रालय एनजीओ को काली सूची में डालने के लिए पहल करता है।
गहलोत ने बताया कि इस प्रकार के मामलों में 87 एनजीओ को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और दस एनजीओ को काली सूची में डाला गया।

बैंक हड़ताल से आमजन चिंतित वेतन सुविधा में केन्द्रकर्मी बराबर?


मुम्बई (महाराष्टड्ढ्र) केन्द्र सरकार व बैकों के संगठन आईबीए द्वारा यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन (यूएफबीयू) की बैक कार्मिकों की वेतन व अन्य समस्याओं के समाधान में ढुलमुल रुप अपनाने से बढते टकराव के कारण २५ से २८ फरवरी तक चार दिवसीय हड़ताल पर उद्यम व आम जन में चिंता बढ़ गई है। वित्तीय वर्ष १४-१५ के समाप्ति के पूर्व माह में बैकों की बंदी अर्थव्यवस्था को गड़बडा देगी।
फोरम के अध्यक्ष के के नायर कहते है कि बैंक कार्मियों के बीच दरार पैदा करने के प्रयास सफल न होगे बल्कि इस प्रयासों से बैंककर्मी अधिक सबल होकर अपनी समस्याओं को सरकार या आईबीए को न ही बल्कि जनता के समक्ष रखेगे। जनता की शाक्ति हो उन्हे समझाएंगी।
बैंक आफ बड़ौदा के के एक जिम्मेदार वरिष्ठ प्रबन्धक संजय अग्रवाल एवं इसी बैंक के निदेशक प्रेम मक्कड़ कहते है कि बैंक देश की अर्थव्यवस्था की रीढ है फिर भी इस क्षेत्र की उपेक्षा को बैंक कर्मी को केन्द्र सरकार के कार्मिकों से कम वेतन पर जिम्मेदारियां अधिक यह अन्तर ४०-४५ प्रतिशत कम है। अखिल भारतीय बैंक अधिकारी संघ के अध्यक्ष एस एस सिसौदिया ने उम्मीद जाहिर की कि सरकार व आईबीए द्वारा २१ से २४ जनवरी की हड़ताल को टालने के लिए जो सकारात्मकता दिखाई थी उसे ढुलमुलता को समय रहते खत्म किया जायेगा।
देश में सरकार द्वारा जो विकास की अपेक्षा की है उसे लाने मे बैंक भूमिका अग्रणी है वह बैंक कार्मियों की अपने केन्द्र कर्मी के समकक्षता लाना होगा। यूं जिम्मेदारी देखते हुए अपर स्तर सुविधाओं में मिलना चाहिए। 
सातंवा वेतन आयोग पर केन्द्र चुप्पी से असमजस्य
पूर्ववती भारत सरकार द्वारा गत वर्ष सातंवा वेतन आयोग गठन की घोषणा की गई थी, वर्तमान केन्द्र सरकार की इस पर चुप्पी ने केन्द्र व राज्य कर्मचारियों मे बैचनी बढा रही है और इनके स्तर पर भी आन्दोलन की तैयारी का समाचार है। बैंक कार्मिकों के वेतन व केन्द्र सरकार के कार्मिक वेतन मानों में अन्तर की दिवार न बढे इसके लिए जरुरी है कि बैंक व केन्द्र कार्मिकों के वेतन पुनरीक्षण का कार्य साथ हो या फिर केन्द्र सरकार वेतन वृद्धि व सुविधाओं के निर्धारण के मापदण्ड नियत करें, तब ही प्रधानमन्त्री का सबका साथ सबका विकास का आवाहन रास्ता पा सकता है,यह विचार श्रमशिखर के पाठक एवं चितंक नई दिल्ली के प्रमुख व्यवसायी, चितंक श्री रवि प्रकाश मित्तल व्यक्त किए। श्री मित्तल समय-समय पर केन्द्र सरकार स्तर पर अपने विचारों से अवगत कराते रहते है। उन्होने बैंक, बिजली व सरकारी कार्मिकों के आन्दोलनों की स्थिति लाये जाने को बेहतर सरकार की स्थिति में नही लाता। हड़ताल की स्थिति आपसी विश्वास को परिलक्षित करती है, जबकि काम कराने व करने वाले के बीच सबसे अहम है।
श्रमशिखर से बातचीत में श्रमशिखर के हमारों पाठकों ने बैंक या केन्द्र कर्मचारियों की समस्याओं बनें रह कर उन्हे टालने की प्रकृति या फिर निजी क्षेत्र को समस्याओं के समाधान की बढती प्रकृति को अहितकर बताया। सरकारी व निजी के प्रतिस्पर्धा में रहना देश हित में है।

Tuesday, 5 May 2015

अमलतास

अमलतास के फूल झर गये धीरे से
कल तक जिसने प्यार किया
जब रूठे तो  मनुहार किया
आज वही अलि वादा अपना भूल गये
प्यार का प्रतिदान ऐसा भी है क्या
प्यास से जलते अधर दो मिल गये
माधुरी पीकर कहीं को उड़ चले
शेष  केवल रह गयी बेबस सी चाह
काँपती जाती  डगर है दूर तक
कल थे जो अपने वह न हैं यहाँ
साथ देने से भी उसको क्या मिला
हैं कहाँ वह और मंजिल है कहाँ
ठहर कर के दो पलों को सो लिया
बैठ कर छाया  में आँखें मूंदकर
स्वप्न में डूबा पथिक फिर चल पड़ा
अब किसी अनजान मंजिल के लिये
जिन पर था विश्वास उन्होंने कुचल दिया
रुँधे गले से दूब कह रही धीरे से
मीत खो गये गीत सो गये
अमलतास के फूल झर गये धीरे से

आम-आदमी की आंकाक्षाओ पर खरा उतरना है

आम-आदमी के जोश-जनून में नही है कोई शंका।
दिल्ली में आम-आदमी पार्टी का खूब बज रहा डंका।।
आम-आदमी की ताकत को, जो नेता थे गये भूल।
आम-आदमी के साहस ने उन्हे दय बार चटा दी धूल।।
गली-मुहल्लो-चैराहो पर आम आदमी की चर्चा सर्वत्र।
आम आदमी ने रच दिया, इतिहास एक विचित्र।।
आम-आदमी ही माध्यम, चुनाव में जीत-हार का।
कोरे आश्वासन झूठे वादो, के मृदुल व्यवहार का।।
लेकिन आम-आदमी का सवाल, सवाल ही रह जाता।
नेताओ से उसका, क्यो नही उत्तर भी बन पाता।।
आश्वासन के कटघरे में, खड़ा हुआ आम आदमी।
अपनी जायज मागों पर, अड़ा हुआ आम आदमी।।
अक्सर हर रोज, अपना बयान जाहिर करता है।
अपने अधिकारो की, मांग करने से नही डरता है।।
दिल्ली के मुख्यमंत्री, अब अपना कर्तव्य निभायेगे।
दिल्ली वासियो की, सभी समस्याओ को निपटायेगे।।
आमजन को मिलेगा, समय पर बिजली व पानी।
प्रशासनिक अधिकारी, नही कर पायेगे मन मानी।।
व्यवस्था-सुधारने को, तत्पर हुए है केजरीवाल।
जन लोकपाल बिल पर भी, अमल होगा तत्काल।।
स्वच्छ दिल्ली-स्वस्थ दिल्ली के साथ हो प्रशासन का सुधार।
अपराध-नियंत्रण के लिए, कमर कसे अब दिल्ली सरकार।।
आम-आदमी पार्टी को यदि अब आगे बढना है।
आम-आदमी की आंकाक्षाओ पर खरा उतरना है।।
सुशासन कैसे लाये, आम आदमी पार्टी को चुनौती है।
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि सेवक, जनता शासक होती है।।

अपने लिए आप ही जिम्मेदार हैं जनाब!

सच यह है कि आपके जीवन के लिए आपके सिवा और कोई जिम्मेदार नहीं हो सकता है। अपनी सेहत, अपनी खुशियों, करियर में प्रगति, वित्तीय सुरक्षा, रिश्तों में सकारात्मकता, समय के सदुपयोग और मन की शांति आदि के लिए आप ही जिम्मेदार हैं। जिस दिन आप यह समझ लेंगे, उसी दिन से अपने जीवन में प्रगति की ओर आपके कदम खुद-ब-खुद ही बढ़ जाएंगे। याद रखिए कि आज आप जिन स्थितियों का अनुभव कर रहे हैं, वे सब अतीत में आपने ही चनी थीं। इसमें दूसरों की राय पर आगे बढना भी शामिल  हो सकता है। अगर आप बेहतर परिणाम चाहते हैं, तो आज से ही बेहतर चयन करना सीख लें।
अगर अपको लगता है कि जीवन या कोई स्थिति अपने-आप ही बेहतर में बदलेगी, तो निश्चित मानिए कि आपको निराशा ही हाथ लगेगी। आपको खुद इसके लिए कुछ करना होगा। इसीलिए अपने जीवन में बदलाव लाने की जिम्मेदारी लें। पूरी जिम्मेदारी। अपने जीवन के खुद मालिक बनें। उसका खाका खुद तैयार करें, ताकि वह आपके सपनों, लक्ष्यों और आकांक्षाओं का आईना बन सकें। इसके लिए आज से ही इन तीन बातों को अपनाएं...
दूसरों को दोष देना आज से बंद
बचपन से ही आप अपनी खामियों के लिए किसी दूसरे को दोष देते आए हैं। हालांकि अपने माता-पिता, टीचर, सहकर्मियों, अधिकारियों, सरकार, मौसम किस्मत, सितारे, ग्रह और कुंडली जैसी चीजों पर दोष मढ़कर आपको मिला कुछ नहीं। और न ही कभी मिल सकता है। इन पर आपका नियंत्रण है क्या? आप उस पर ध्यान लगाएं, जिस पर आपका नियंत्रण है- वह हैं आप स्वयं।
अब बस भी करो बहानें
हर बार जब आप किसी असमर्थता के लिए कोई बहाना लगाते हैं, बेहतरी का एक मौका गंवा रहे होते हैं। साथ ही आप एक ढीले-ढीले या अव्यावसायिक नजरिए वाले व्यक्ति की छवि अपने लिए गढ़ते हैं। अधिकतर लोग बहाने इसलिए गढ़ते हैं, क्योंकि उन्हें असफल होने से डर लगता है। पर अगर इस डर का सामना करें तो असफल होने से डर बंद हो जाएगा। आसान स्थितियों के बजाय अपने लिए कुछ चुनौतीपूर्ण चुनने की हिम्मत बंधेगी। जैसे ही आप कुछ चुनौतीपूर्ण अपने हाथ में लेंगे, आपका खुद पर तो विश्वास बढ़ेगा ही, दूसरे भी आप पर विश्वास करेेंगे। इस तरह नए अवसर आप तक पहुंचेंगे।
शिकायत क्यों और किससे?
सच मानिए कि शिकायती शख्सियतें किसी को पसंद नहीं आतीं। शिकायत करने से आपकी और दूसरों की शक्ति भी जाया होती है। यह सच है कि कभी-कभी अपने आक्रोश को अभिव्यक्त करने का मन जरूर करता है। इसके बारे में बात करना एक स्वस्थ तरीका है। या फिर इसकी चर्चा करके इसमें सुधार करने वाले बिंदुओं को पहचानकर उस दिशा में कुछ करना बहुत फायदेमंद है। पर हर वक्त शिकायत करते रहकर आप एक पीडि़त की छवि तैयार करते हैं।
मैंने देखा है कि लोग जैसे ही अपने कर्मों और जीवन की जिम्मेदारी खुद लेना शुरू करते हैं, वे बहुत ऊर्जावान हो जाते हैं, उनमें प्रेरणात्मक नजरिया बढ़ जाता है और संकल्प की दृढ़ता भी बढ़ती है। इसीलिए आज से ही अगले तीस दिनों का लक्ष्य यह बनाएं कि आप किसी को दोष नहीं देंगे, शिकायत नहीं करेंगे और बहाने नहीं बनाएंगे। जब आप अपनी जिम्मेदारी लेना शुरू करेंगे, तो आपको ये सात अनुभव जरूर होंगेरू-
१. आजादी का आनंद रू अपने जीवन में खड़ी चुनौतियों के कारणों और उनके समाधान की खोज जब आप अपने अंदर करेंगे तो आपको एक अलग ही आजादी का अनुभव होगा। आपको महसूस होगा कि आप सोच-समझकर खुद का जीवन खुद ही संवार सकने में समर्थ हैं।
२. स्थायी प्रेरणा रू कठिन समय का सामना करने के लिए हम सबको प्रेरणा की जरूरत होती है। जब आप खुद के भीतर देखते हुए जीना शुरू करेंगे, जब आपको प्रेरणा का कभी खत्म न होने वाला स्त्रोत मिल जाएगा। अंतर्मन से उठने वाली प्रेरणा से जीवन उत्साह और आनंद से भर जाएगा।
३. बेहतर नियंत्रण रू जब आप अपने जीवन की कमान खुद संभालेंगे तो खुद का चयन होगा, खुद के चुने हुए कर्म होंगे, खुद के सीचे निर्णय होंगे। और इन सबसे आप खुद को ज्यादा सामथ्र्यवान और नियंत्रण में अनुभव करेंगे।
४. निजी शक्ति रू यह अनुभव सकारात्मकता का होगा। यह वह भावना है, जिसमें आपको अपने विकास, पालन-पोषण आदि के लिए स्वयं के संपूर्ण होने का एहसास होता है। यह भावना लक्ष्य तक पहुंचाने में ईधन का काम करती है।
५. नयेपन का आगाज रू जब आप मन से शांत होते हैं, आजाद होते हैं और नए विचारों के लिए मन खुला रखे होते हैं, तो जीवन में कई श्अरे वाह्य कहने वाले मौके आते हैं। खुद की जिम्मेदारी खुद लेने की प्रक्रिया में हर दिन आपका अपनी रचनात्मकता के प्रति आत्मविश्वास बढ़ता है।
६. नजरिए का विस्तार रू अब तक आपको अपने अनुभवों की सीखों से ही काम लेना आता है, जबकि कई अन्य तरीके भी संसार से भरे पड़े हैं। जब आप उनके प्रति खुलेंगे तो सोच का दायरा भी बढ़ेगा।
७. मन की शांति रू यह तो हर किसी को चाहिए। जब आप शिकायत व बहानों का सहारा लेते हैं तो नकारात्मकता से खुद को जला रहे होते हैं।
इससे उलझनें बढ़ती हैं। जब खुद की जिम्मेदारी खुद लेना शुरू करते हैं, तो श्क्या हुआ, किसने किया्य जैसे प्रश्नों में फंसने के बजाय श्आगे क्या करना है्य सोचते हैं।
कुछ बातों पर विचार करें
२ अगर आप शिकायत करना या बहाने बनाना छोड़ दें तो अपने बारे में क्या राय बनेगी और कैसा महसूस होगा?
      -आगामी अंक में जारी....
२ अपने जीवन की हर चीज के लिए खुद जिम्मेदारी लेने पर क्या होगा? इससे आपको फायदा कैसे होगा?
२ इस आदत को विकसित करने और उसे बनाए रखने के लिए आपको क्या करना होगा?

Monday, 4 May 2015

रेल सफर में तत्काल मदद को हैल्पलाइन

राजकीय रेलवे पुलिस ने ३ मार्च को निम्नलिखित हैल्पलाइन सेवा का शुभारंभ किया है, जिसके जरिये उत्तर प्रदेश राज्य की सीमा के अंदर रेल सफर में यात्री चोरी, लूट, डकैती, मारपीट, छेड़खानी, हत्या, जहरखुरानी जैसे मुश्किल हालात में डायल कर शिकायत दर्ज करा कर मदद ले सकते हैंरू-  हैल्पलाइनरू १५१२

स्टेशन आने से पहले जगाएगी अलर्ट सुविधा

ट्रेन में रात के समय सफर करने वाले बहुत से यात्रियों को गंतव्य स्टेशन आने से पहले उठने में काफी परेशानी होती है। कई बार तो आंख न खुल पाने से ट्रेन आगे निकल जाती है और उन्हें वापस आने में बहुत दिक्कत झेलनी पड़ती है। इस परेशानी का निराकरण करने के लिए रेलवे ने १३९ पर फोन कर वेकअॅप कॉल-डेस्टिनेशन alert  की निम्नलिखित नई सुविधा कुछ ही दिन पहले शुरू की है। इससे गंतव्य स्टेशन आने से पहले ही मोबाइल पर अलार्म बज उठेगा
पहले alert  टाइप करें, फिर PNR Number टाइप करें, फिर १३९ पर Send करें और इसके बाद PNR Number एक्टिवेट हो जाएगा।    

‘आप’ के ट्रैक पर देर से दौड़ेगी की बजट की गाड़ी

आम आदमी पार्टी की सरकार दिल्ली का बजट पेश करने में किसी तरह की हड़बड़ी के मूड में नहीं है। दिल्ली डॉयलॉग कमीशन की टास्क फोर्स गठित होने और उसकी सिफारिश आने का इंतजार किया जाएगा।
जिन 10 विधान सभा में जनता के सुझाव से बजट का प्रावधान किया जाना हैए वह प्रक्रिया भी इस दौरान पूरी की जाएगी। हालांकि लेखानुदान से सरकार खर्चों में कटौती की शुरुआत कर सकती है। दिल्ली सरकार का बजट 37 हजार करोड़ रुपये का है। वित्त वर्ष में लोकसभा और विस का चुनाव आने से बेशक प्रोजेक्ट पूरे नहीं हो पाए, खर्चे कम हुए लेकिन वसूली में 4300 करोड़ रुपये की कमी हुई। अधिकारी बता रहे हैं कि लेखानुदान में कटौती बहुत जरूरी है। लेखानुदान इसलिए लेना है ताकि कर्मियों के वेतन व अन्य खर्चों की व्यवस्था की जा सके। सूत्र बताते हैं कि लेखानुदान तीन महीने का लिया जाएगा। इसके लिए विस का सत्र मार्च के अंतिम सप्ताह में दो दिन का होगा। इसकी तैयारी योजना व वित्त विभाग के अधिकारियों ने शुरू भी कर दी है।
सरकार का पूर्ण बजट मई में आएगा। तब तक दिल्ली डॉयलॉग कमीशन में दिए गए मोबाइल पर सरकार, वाई-फाई और सीसीटीवी वाली दिल्ली, अनधिकृत कॉलोनी नियमन, झुग्गी झोपड़ी पुनर्वास, जॉब और जॉब सिक्योरिटी जैसे विषयों को दिल्ली के पूर्ण बजट में शामिल किए जाने की तैयारी है।

यह पब्लिक है सब जानती है

भाजपा के रणनीतिकार आप को बहुत हल्के में लेते हुए मान रहे थे कि मोदी की सदाबाहर लोक प्रियता के बूते पार्टी लगातार राज्यों के विधानसभा चुनाव जीतती रहेगी। अहंकार के चलते नेतृत्व ने मान लिया था कि मोदी के राजनीतिक व्यक्तित्व के सामने कोई चुनौती नही है लेकिन भारतीय मतदाता जानते है कि राजनेताओ को है लेकिन भारतीय मतदाता जानते है कि राजनेताओ को कब वास्तविकता से अवगत कराया जाये। प्रधानमंत्री ने दिल्ली के विधानसभा चुनाव को अपने व्यक्तित्व पर जनमत बना दिया था, मतदाताओ ने उन्हे दो टूक आभास करा दिया कि उन्होने मतदाताओं के समर्थन का गलत अनुमान लगाया था।
लोकतंत्र में शासक जनता है जनप्रतिनिधि सेवक है। उन्हें जनता का दिल जीतने के लिये जनहित में योजनाएं बनाना उन्हे कार्यन्वित करना होगा। क्योकि यह पब्लिक है, सब जानती है।

मेरठ मेडिकल कॉलेज में स्थायी प्रधानाचार्य

मेरठ। प्रदेश के कुछ मेडिकल कॉलेजों में मेडिकल काउंसिल आफ इडिया के द्वारा नियत मानकों के पूरा न होने तथा प्रदेश सरकार प्रमुख उपलब्धियों में एक सहारनपुर मेडिकल कॉलेज का अभी तक विघिवत कार्य की शुरुआत न होने व समूह श्ग्य की भर्तियों को कार्य न होने पर मुख्यमन्त्री की नाराजगी प्रदेश के स्वास्थय यहा निदेशक  शिक्षा डा0 के.के. गुप्ता को भारी पड़ी। डा0 गुप्ता को इस पद से हटा कर वापस मेरठ मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य के दायित्व निर्वहन के लिए भेजा गया है। इस वापसी को डा0 गुप्ता की पदावत कहां जा रहा है। इसके विपरीत इसे उनकी इच्छा भी कह रहे है ताकि वह अपनी गडबड निजी प्रैक्टिस को रास्ते पर ला सके।
डा0 गुप्ता द्वारा तत्काल प्रधानाचार्य का दायित्व सम्भाल लिया गया। डा0 गुप्ता के स्थान पर स्वास्थय महानिदेशक शिक्षा पद मुख्यमन्त्री द्वारा अपने निर्वाचन क्षेत्र कन्नौज के मेडिकल कॉलेज प्रधानाचार्य वी.एन. त्रिपाठी को दिया गया ताकि प्रदेश में बढ़ रहे स्वाइन फ्लू की चुनौती में यह बदलाव से असफलता के असर को प्रभावहीन करने का प्रयास किया।
डा0 गुप्ता को वापस मेरठ मेडिकल कॉलेज प्रधानाचार्य का दायित्व देने के लिए दलील इस कॉलेज में एडोक्रायोनोलॉजी विभाग होने व उसके दायित्व को के स्थान पर गत ढाई वर्ष से व्यवस्था न होने पर एमसीआई द्वारा आपत्ति करना बताया जा रहा है। डॉ0 गुप्ता अगले वर्ष सेवानिवृत्ति पूरी कर रहे है। इसके बाद यह शिक्षण कार्य सरकार की चिकित्सा शिक्षक उम्र बढाने के लाभ के अन्तर्गत कार्य कर सकेगें, परन्तु प्रधानाचार्य नियमित की जरुरत अगले वर्ष होगी। इसके लिए स्थाई प्रधानाचार्य खोज अभी से शुरु होगी संशय है।
सद्भावना समिति वरिष्ठ नागरिक फोरम ने अपेक्षा कि है लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज मेरठ को भविष्य का स्थाई प्रधानाचार्य समय रहते दिए जाने की व्यवस्था प्रदेश सरकार करेगी। इस मेडिकल कॉलेज में डा0 उषा शर्मा के बाद से कुछ अवधि छोड़ अस्थाई प्रधानाचार्य लम्बे अन्तराल तक रहने की व्यवस्था में कॉलेज में गड़बडियों से इसकी शाख गिरी है। अस्थाई प्रधानाचार्य पद पर बनें रहने की कुछ लोगो की चाह से जबरदस्त गुटबाजी चल रही है। जिसमें सरकार द्वारा नई-नई व्यवस्थाओं के किए जाने के बाद भी कॉलेज छात्रों व जनता को उनका लाभ दिलाने में पिछड़ा है। स्वयं मेडिकल छात्र व जूनियरों में अनुशासनहीनता बढ रही है। कॉलेज के पास जिस तरह अतिक्रमण बढ रहा है। वह एक दिन इस कॉलेज के ्रप्रर्यावरण व कानून व्यवस्था के लिए भयकर चुनौती होगा।
व्यवस्था तो एॅडोक्रायोलांजी शिक्षण व चिकित्सा
डा0 गुप्ता की मेरठ वापसी का एक कारण प्रदेश में आगरा के बाद एॅडोक्रायोलाजी चिकित्सा व शिक्षण विषय की व्यवस्था होने व इसके शिक्षण कराने व इस मेडिकल कॉलेज में इसकी चिकित्सा हेतु चिकित्सक की व्यवस्था न होना भी कहा गया है। इस विषय के अध्ययन कर चुके छात्र चिकित्सकों व पढाई करने वाले छात्र चिकित्सकों का कहना है कि इस चिकित्सा अध्ययन व विभाग को नई व्यवस्था पर अभी से ध्यान देना होगा ताकि निकट भविष्य में इनकी सेवानिवृति व अपनी नीजि प्रैक्टिस की चाह के अवरोध से निजात मिल सके।

बेंगलुरु दुनिया में सबसे सस्ता शहर


इकोनोमिक इंटेलीजेंस यूनिट द्वारा तैयार श्वल्र्डवाइट कॉस्ट ऑफ लिविंग रिपोर्ट, २०१५्य के अनुसार, न्यूयार्क को आधार मानकर, १३३ शहरों को शामिल कर, १६० सेवाओंध्उत्पादों की कीमतों को ध्यान में रखकर, यह घोषणा की गई है कि भारत की सूचना प्रौद्योगिकी का केंद्र बेंगलुरु और पाकिस्तान की वित्तीय राजधानी कराची को संयुक्त रूप से १३३ वें स्थान पर रखकर दुनिया के सबसे सस्ते शहरों में शुमार किया गया है। यहां गुजर-बसर करना काफी सस्ता है। इसके बाद मुंबई को १३० वां, चैन्नई को१२९ वां और नई दिल्ली को १२८ वां स्थान दिया गया है। दुनिया के सबसे महंगे शहरों में सिंगापुर दूसरे वर्ष भी शीर्ष पर है। उसके बाद, पेरिस, ओस्लो, ज्यूरिख और सिडनी का नंबर आता है।