Wednesday, 8 April 2015

कितने नैचुरल ये अननैचुरल रिश्ते।

बस काफी भरी हुई है। तभी एक जोड़ा एक बड़ी सी प्राम लेकर बस में चढ़ता है।लड़की के हाथ में एक बड़ा बेबी बैग है और उसके साथ के लड़की नुमा लड़के ने वह महँगी प्राम थामी हुई है।दोनो  प्राम को सही जगह पर टिका कर बैठ जाते हैं। प्राम में एक बच्चा सोया हुआ है खूबसूरत कम्बल से लगभग पूरा ढका हुआ। सिर्फ आँख कान मुँह ही दिख रहे हैं।

तभी लड़की ने बैग खोला उसमें से इवेंट की बोतल निकाली जो आधी दूध से भरी हुई है। उसने चुपचाप बच्चे के मुँह में लगा दी और कुछ सेकेंड में ही निकाल कर बैग में रख ली , अब लड़के ने बैग खोला उसमें से एक डाइपर निकाला और बड़ी ही कुशलता से कम्बल के अन्दर ही अन्दर बदल दिया।

पहला डाइपर एक थैली में रखकर बैग की पिछली जेब में रख दिया , फिर दोनों चुप चाप बैठ गए। कुछ मिनट बाद लड़की ने फिर बैग में  हाथ डाला,फिर दूध की बोतल निकाली और फिर बच्चे के मुँह में लगा दी।फिर छोटे से मोज़े निकाले और बच्चे को पहना दिए , अब लड़के ने टोपी निकाली और पहना दी।वो जोड़ा जितनी देर बस में रहा लगातार उस बच्चे के साथ उनकी यही गतिविधियाँ बारी- बारी चलती रहीं, पर बिना एक भी शब्द बोले और बच्चा भी एक दम शांत।

जाने क्यों सब कुछ बहुत अजीब सा था फिर भी लगा कि शायद तीनी गूंगे -बहरे हैं।ये ख्याल मन में आया तो एक कुछ सहानुभूति भी हुई। फिर वह जोड़ा अगले स्टॉप पर उतर गया। उतरते ही लड़की ने बच्चे को गोद में उठा लिया और लड़का बैग को प्राम में रख चलने लगा।इत्तेफाक से हमें भी उसी जगह उतरना था।अत: तब उस बच्चे का चेहरा करीब से देख अहसास हुआ कि वह बच्चा कोई बच्चा नहीं बल्कि बच्चे के लाइफ साइज का गुड्डा है।

थोड़ी देर को जहाँ खड़े थे हम वहीँ खड़े रह गए थोड़ी देर में होश आया तो समझ में आया कि क्यों वह दोनों उस बच्चे का जरुरत से अधिक ख्याल रख रहे थे।क्यों उनमें उसके काम करने की होड़ लगी हुई थी। और क्यों वह कुछ भी नहीं बोल रहे थे।

ओह।। हे भगवान्  तो यह जोड़ा लिस्बियन है। उफ़ उनकी मनोदशा का अहसास वेदना से भर गया। एक बच्चे की ललक उस जोड़े में इस कदर थी कि ।।।और आखिर एक अप्राकृतिक रिश्ते को पूर्ण करने के लिए वे एक अप्राकृतिक बच्चा भी पाल रहे थे।वह एक तथा कथित असामान्य  जीवन जरुर जी रहे थे परन्तु अपने बच्चे को पालने के आनन्द की अनुभूति उनकी एकदम सामन्य और प्राकृतिक थी।

गर्भवती रिकी और मैरी  पोर्टास लिस्बियन बाल में।

इस बात को करीब चार साल गुजर गए ।कई दिनों तक उस जोड़े के बारे में सोचती रही, उनकी घरेलू  जिन्दगी का अहसास करने की कोशिश करती रही और आखिर में बात आई गई हो गई। परन्तु कल एक समाचार पत्र में पढ़ी खबर ने जैसे फिर इस किस्से को मेरे स्मृतिपटल पर साकार कर दिया। और फिर से ना जाने कितने ही सवाल मेरे मस्तिष्क में हलचल मचाने लगे।

खबर थी कि लन्दन में पहली बार आयोजित  "सिर्फ महिलाओं के लिए पॉश लिस्बियन बाल" में मैरी  पोर्टास (मैरी कुईन ऑफ शॉप ,एक अंग्रेजी व्यवसायी, खुदरा विशेषज्ञ, और प्रसारक, इन्हें  खुदरा और व्यापार से संबंधित टीवी शो, हाल ही में ब्रिटिश प्रधानमंत्री द्वारा ब्रिटेन की हाई स्ट्रीट बाजार के भविष्य पर एक समीक्षा का नेतृत्व करने के लिए उनकी नियुक्ति के लिए  - सबसे अधिक जाना जाता है।) अपनी गर्भवती महिला साथी फैशन  जर्नलिस्ट मलीन रिक्की के साथ हाथ में हाथ डाले पधारीं।

लगभग २०० मेहमानों और हाई क्लास सेलेब्रिटी से भरी इस हाई क्लास पार्टी का उद्देश्य हाई सोसाइटी में लिस्बिअनिज्म को सामान्य दिखाना था ।और तब पहली बार  गे अधिकारों से जुड़ा इंद्र धनुषी झंडा व्हाईट हॉल पर फहराया गया।

यहाँ यह गौरतलब है कि मैरी करीब १४ सालों से एक सामान्य शादीशुदा जीवन जी रहीं थीं। उनके पति से उनके बच्चे भी हैं और उसके बाद करीब साल से वह अपनी महिला साथी रिक्की के साथ रह रही हैं और अब यह घोषणा करती हैं कि उनकी साथी गर्भवती है और इस बच्चे का वह दोनों बेसब्री से इन्तजार कर रहीं हैं।

यूँ किसी भी इंसान का  अपनी रूचि अनुसार जीवन जीने के अधिकार को लेकर मेरे मन में कोई शंका नहीं है। हर इंसान को अपने मनपसंद साथी के साथ रहने का पूर्ण अधिकार होना चाहिए।परन्तु इस खबर ने मेरे मन में अजीब सी उथल पुथल मचा दी है  कि आखिर क्यों जो लोग एक विपरीत सामाजिक परिवेश में एक अप्राकृतिक कहा जाने वाला जीवन अपनी रूचि से स्वीकारते हैं, यह कहते हुए कि वह सामाजिक बन्धनों को नहीं मानते, उनकी जरूरतें और रुचियाँ अलग हैं, और उन्हें उनके अनुसार ही जीवन जीने दिया जाना चाहिए, वैसे ही स्वीकार किया जाना चाहिए।

फिर वही लोग शिशु जन्म और बच्चे की चाह को लेकर वही सामान्य इच्छा रखते हैं और वो भी उस हद  तक कि उसके लिए कोई भी अप्राकृतिक तरीका अपनाते हैं। इस बारे में मैंने जब कुछ जानने की कोशिश की तो ना जाने कितने ही तरह के तथ्य सामने आये, कितने ही सवाल मैंने नेट पर देखे यह जानने के लिए, कि कैसे  लिस्बियन अपने साथी को गर्भधारण करा के बच्चा पा सकते हैं ?

और मुझे आश्चर्य हुआ यह जानकार कि मेडिकल साइंस इतनी आगे बढ़ गई है कि उसके लिए कितने आसान तरीके बताये और अपनाये जाते हैं। जहाँ एक ओर  स्पर्म दान लेकर यह काम किया जाता है,यहाँ तक कि उसके लिए किसी डॉक्टर या लैबोरट्रि   की भी जरुरत नहीं समझी जाती खुद ही सीरिंज से उसे इन्सर्ट कर लिया जाता है, वहीँ स्कूलों में भी सामाजिक विषय के अंतर्गत पढाया जाता है कि किस तरह सामान सेक्स वाले लोग बच्चे का सुख ले सकते हैं।

उनके लिए ज्यादातर किराये  की कोख लेने का प्रावधान है जहाँ दोनों साथियों के स्पर्म/एग्ग के नमूने लिए जाते हैं और उन्हें बताया नहीं जाता कि होने वाला बच्चा उनमें से किसका है, जिससे कि बाद में कभी वह अलग हों तो कोई एक बच्चे पर अपना अधिकार ना जमा सके।और यह सब अब कानूनी तरीके से होता है।और सभी अधिकार  और मान्यता प्राप्त है।

कितना आसान लगता है ना सुनने में यह सब। कोई समस्या ही नहीं। बच्चा पैदा करने के लिए एक स्त्री एक पुरुष का होना जरुरी नहीं ।।जैसे बस खाद लेकर आइये खेत में डालिए और आलू प्याज की तरह उगाइये।

सभी को अपना जीवन अपनी तरह से जीने  का और हर तरह की खुशियाँ पाने अधिकार है।पर विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण नकारने वाले को आखिर ये शिशु जन्म और पालन जैसी इच्छा हो ही क्यों ?वो भी इस हद तक कि इन सब तरीकों में मुश्किल हो तो एक बेजान गुड्डे से पूरी की जाये।ऐसे जोड़ों की मानसिक स्थिति मेरी समझ में नहीं आती।

क्या कभी वे उस बच्चे के भविष्य के बारे में सोचते हैं? माना कि आज उन्हें सारे कानूनी अधिकार हासिल हैं। पर कल वह बच्चा स्कूल भी जायेगा क्या वह अपने साथियों के बीच अपने गे/लिस्बियन माता पिता को लेकर सहज हो पायेगा?

आज भी स्कूलों में समानसेक्स में रूचि रखने वाले बच्चों को अलग दृष्टि से देखा जाता है, उन्हें परेशान किया जाता है , चिढाया जाता है। यहाँ तक कि कितने ही बच्चे इस सबसे तंग आकर आत्म हत्या तक कर लेते हैं।ऐसे में ऐसे मातापिता के प्रति वह मासूम बच्चा किस स्थिति से गुजरेगा क्या कभी ये लोग सोचते होंगे?

मैं मानती हूँ कि उनकी अपनी स्थिति पर उनका कोई जोर नहीं। वह ऐसे हैं तो हैं। इसमें कोई बुराई नहीं। पर एक मासूम बच्चे को बिना उसके किसी दोष के इस स्थिति से दो चार होने पर मजबूर करने का क्या उनको हक़ है?

आज इस तरह के सम्बन्ध कानूनी तौर पर मान्य हैं।और काफी कुछ सामाजिक तौर पर भी उन्हें माना जाने लगा है। यह भी एक सामान्य व्यवस्था है।


फिर क्यों ये लोग अपनी अलग ही परेड निकालते हैं? खुद को अपने पहनावे, हाव भाव से सामान्य लोगों से अलग दिखाने की कोशिश करते हैं ?अपने को अलग,बताते और होते हुए भी एक सामान्य परिवार की चाह भी रखते हैं।।।क्या आपको यह सब बेहद कन्फ़्यूजिंग  नहीं लगता? मैं तो बहुत कंफ्यूज हो गई हूँ।  

शहरी भागदौड़ से टक्कर के लिए जरूरी ऊर्जा!

मैंने अपनी पिछली गाँव वाली पोस्ट में जिक्र किया था कि वहां की योजना बनाते वक़्त बच्चों के थोबड़े  सूज गए थे,और हमें समझ में आ गया था कि जब तक इन बच्चों के लायक भी किसी स्थान का चयन नहीं किया जाएगा हमारी भी गाँव यात्रा खटाई में पड़ी रहेगी। अपनी आँखों और मन को विटामिन G देने के लिए जरूरी था की उनके विटामिन M (मस्ती) का इंतजाम किया जाता।
अभी इसी विषय पर जब दिमाग , मन और जेब की मंत्रणा चल रही थी इत्तेफाकन तभी टीवी पर फिल्म मोहब्बतें (यश  चोपड़ा निर्देशित, अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ खान आदि अभिनीत) दिखाई जा रही थी ,शायद पहली बार किसी फिल्म से इतना डायरेक्ट फायदा हुआ , याद आया कि उसमें दिखाया जाने वाला गुरुकुल यहीं कहीं लन्दन के आसपास का कोई ऐतिहासिक महल है, तुरंत ही गूगल बाबा से संपर्क किया गया तो मालूम हुआ कि लन्दन से करीब 109 मील दूर ही यह लॉन्गलीट नाम की जगह है जहाँ यह भवन है, जिसका नाम भी "लॉन्गलीट हाउस" है और इसी कैंपस में है यू के का सबसे बड़ा सफारी और वहीँ पर है बच्चों के लिए एडवंचर पार्क भी।
अब बच्चों को खुश करने के लिए और एक दिन हमारी खातिर उन्हें गाँव झिलवाने के लिए इस थ्री इन वन से अच्छा उपाय हमें नहीं सूझा, शाहरुख़ खान के प्रशंसक, खुले में दुनिया के जंगली जानवर देखने का रोमांच और उसपर एडवंचर पार्क भी ,भला इससे ज्यादा आकर्षक ऑफर उनके लिए और क्या हो सकता था। अत: सर्वसम्मति से इस योजना पर फाइनल मुहर लगा दी गई। और हम निकल पड़े अपनी दो दिन की यात्रा पर। जिसमें पहला दिन बच्चों के अनुसार हमें ब्रिटेन के गांवों की ख़ाक छाननी थी और फिर दूसरे  दिन लॉन्गलीट में आनंद से गुजारना था।
अत: एक दिन प्रकृति के बीच टहल कर हमने रुख किया लॉन्गलीट का। यूँ लन्दन से करीब ढाई घंटे का  सड़क का सफ़र है परन्तु हम जहाँ से जाने वाले थे वहां से सिर्फ 45 माइल था और ज्यादा से ज्यादा डेढ़ घंटा लगने वाला था।मौसम बसंत का हो और आप यूरोप के कंट्री साईट में ड्राइव कर रहे हों तो ये डेढ़ घंटा तो जैसे यूँ बैठे और यूँ पहुंचे सा प्रतीत होता है अत : जैसे पलक झपकते ही हमें लॉन्गलीट की सीमा दिखाई देने लगी थी।
सुबह का समय था और हमने वहां की तीनो जगहों का संयुक्त, पूरे दिन का टिकट ले रखा था इसलिए निर्णय किया गया कि पहले सफारी का लुत्फ़ उठाया जाए।
सैकड़ों एकड़ भूमि पर बना यह ड्राइव थ्रू सफारी यू के का सबसे बड़ा सफारी है और कहा जाता है की अफ्रीका के खुले सफारी के बाद यही पहला भी है, जिसे 1966 में पहली बार आम जनता के लिए खोला गया, जहाँ शेर, चीता जैसे जंगली जानवर जंगल की तरह बाकी पशुओं के हाथ में हाथ डाल कर बेफिक्री से घुमा करते हैं और आप अपनी कार के बंद शीशों के एकदम सामने उन्हें उनकी हर प्रकार की प्राकृतिक अवस्था में देख सकते है।
सो हम अपनी कार लेकर उस जंगल में प्रवेश कर गए। पहले नजर आये जिराफ़, हिरन, जेब्रा जैसे शाकाहारी और मनुष्य को नुकसान न पहुँचाने वाले जीव जंतु। इसीलिए तब तक अपनी कार की खिड़कियाँ खोलकर चलने की इजाजत थी। फिर आये बन्दर, और तब सन्देश आया कि खिड़कियों के शीशे न खोले जाएँ। क्योंकि इन इंसानों के पूर्वज कहे जाने वाले जीव को उछल कूद की आदत है और लगभग सभी कारों पर बड़ी शान से वे सवारी करते जा रहे थे।
हमने भी बड़ी कोशिश की, कि इनमें से कोई हमारी भी कार की छत पर विराजमान हो जाये परन्तु शायद हमारी कार के अंदर वे अपनी ही प्रजाति के दो, उन से भी खतरनाक जीवों से डर गए और पास नहीं फटके , आखिर उन्हें वहीँ छोड़ कर हम आगे  बढ़े । और फिर ऐसे ही कुछ छोटे बड़े जानवरों को निहारते , पुचकारते , खिलाते हम पहुंचे जंगल के राजा के दरबार  में , जहाँ प्रवेश करने से पहले खतरे और सुरक्षा की हिदायतों के अलावा थे दो बड़े बड़े लोहे की सलाखों के गेट, जो कि एक- एक करके ऐसे खुलते हैं जैसे बता रहे हों कि सावधान! अब आप खतरनाक ज़ोन में प्रवेश करने वाले हैं। और फिर शुरू होता है वह दृश्य जिसे देखकर खुद अपनी ही आँखों पर यकीन नहीं होता, निमग्न अपनी ही धुन में ,बेफिक्र  घूमते , खाते ,सोते , निहारते जंगल के वे जीव जिन्हें यूँ खुला देख सांस अटक जाए , इतने खूबसूरत लगते हैं कि अपनी कार से उतर कर उनके साथ खेलने को जी कर आये। सबसे ज्यादा कारों का कारवां वहीँ देखने को मिलता है। हर कोई जितना हो सके वहां रुक कर उन दृश्यों को आँखों में भर लेना चाहता है।, परन्तु पार्क में अभी और भी बहुत कुछ देखना बाकी था अत : सभी धीरे धीरे आगे बढ़ते जा रहे थे और फिर उसके बाद चीता , हाथी , गैंडा आदि सभी जंगल वासियों से मिलते मिलाते हम उनकी गृह सीमा से बाहर आ गए।
अब बारी थी एड्वंचर पार्क की - जिसमें बच्चों के झूलों , पार्क , खाने पीने के स्टाल के अलावा मुख्य आकर्षण था - "एनीमल किंगडम" जहाँ दुनिया के दुर्लभ जीवों को करीब से देखा जा सकता है, और एक बड़ी सी झील में विचरते सी लायन को देखने के लिए क्रूज की सैर की जा सकती है । उस नौका विहार के दौरान उन सी लायंस  का नौका से दर्शकों द्वारा फेंकी गई मछलियों को पाने के लिए उछल उछल कर आना , एक  दूसरे  से टक्कर लेना और अपनी मार्मिक सी गुर्राहट में खाने के लिए चिल्लाना एक अजीब सा रोमांच पैदा करता है। 
इसके अलावा बच्चों के लिए भूल भुलैया , जंगल की सैर करने के लिए छोटी सी रेलगाड़ी और "आसमान के शिकारी " नामक एक शानदार पक्षियों का एक शो भी होता है और यह सब मिलकर पिछले ६ ०  वर्षों से एक पारिवारिक पिकनिक के लिए बेहतरीन और सर्वप्रिय जगह के रूप में इस जगह की पहचान बनी हुई है।
अत: इन सभी जगहों का  आनंद  लेने के बाद जब हम बाहर निकले तो वहां बर्गर , पिज़्ज़ा  आदि खाद्य पदार्थों के स्टाल और कुछ कैफ़े से आती हुई सुगंध ने पेट के चूहों को भी कूदने का मौक़ा दे दिया अत: उन्हें शांत करने के पश्चात हमने प्रवेश किया उस महल में जिसे देखने के लिए हम अब तक बेताब थे और जो एक तरफ बड़ी खूबसूरत झील , दूसरी तरफ लंबा हरा मैदान और अपनी उत्कृष्ट वास्तु कला से हमें सुबह से ही लुभा रहा था।
करीब 900 एकड़ भूरी मिट्टी के मैदान पर बना यह "लॉन्ग लीट हाउस" ब्रिटेन में उच्च एलिज़ाबेटन वास्तुकला का सबसे अच्छा उदाहरण है और आम जनता के देखने के लिए खुले सबसे सुंदर और आलीशान घरों में से एक माना जाता है।
1568 में सर जॉन थायेन द्वारा बनाया गया, लॉन्ग लीट हाउस, बाथ के सप्तम मार्कीस (राजकुमार) अलेक्जान्द्र थाएन का घर है। जिसका दौरा 1575 में एलिजाबेथ प्रथम ने किया और उनके हस्ताक्षर वहां रखी एक पुस्तक में अब भी दृष्टिगत हैं। यह पहला ऐसा शानदार घर था जिसे 1 अप्रैल 1949 को पूरी तरह से व्यावसायिक आधार पर जनता के लिए खोला गया।
महल में प्रवेश करते ही एक तरफ कुछ राजसी पोशाक लटकी हुई दिखाई देती हैं जो कि दर्शकों के लिए हैं। जिसे पहन कर यदि वे चाहें तो पूरे महल के दर्शन कर सकते हैं और बेशक कुछ समय के लिए ही सही खुद के एक राजसी परिवार का सदस्य होने का मुगालता पाल सकते हैं। अत: यह कसर हमने भी नहीं छोड़ी और एक अच्छा सा गाउन लटका के आगे प्रस्थान किया। अब शुरू होते थे राजसी परिवार की भव्यता को दर्शाते वे बड़े बड़े आलिशान कमरे जिनमें शामिल हैं बड़े बड़े पुस्तकालय , खाने के  कमरे जो भव्य बर्तनों से सजे हुए थे , बैठने , सोने और नहाने के कमरे , श्रृंगार गृह , आलीशान लॉबीज़ और सलून जो अपने भव्य इतिहास के साथ अपनी अनुपम बनावट की कहानी भी कहते चलते है।
महल की दीवार पर बने बड़े पारिवारिक वृक्ष के अलावा  एक जगह ऐसी भी है,जो एक अनुचर के वध की गाथा कहती है। एक किंवदंती के  अनुसार वेमाउथ की दूसरी वेसकाउनटेस लूसिया कॉरट्रेट जिसे "ग्रे लेडी" के नाम से जाना जाता है, की आत्मा इस महल में निवास करती है जो अपने उस वफादार अनुचर को ढूंढती है, जिसका इस जगह पर क़त्ल कर के दफना दिया गया था। और बाद में इस महल की मरम्मत के दौरान एक कंकाल और शुरूआती सत्रहवी शताब्दी के कुछ कपडे इस जगह से बरामद हुए थे, माना जाता है कि वे इसी अनुचर के ही थे।
इस तरह इस महल की भव्यता और इतिहास को देख - समझ कर ब्रिटेन के एक भूतिया महल को देखने की भी इच्छा पूर्ति के साथ हम इस आलिशान घर से जब बाहर निकले तो उन राजसी चोगों को उतार कर वापस करते हुए एक युग से वापस वर्तमान में दाखिल होने का एहसास लिए हुए थे।
और इसी एहसास के साथ वहां की एक दूकान से एक सुविनियर खरीद कर हमने वापसी का रास्ता ले लिया।
इस सिर्फ एक दिन में हमने गुजारा था बेहद खुशनुमा, रोमांचकारी और मनोरंजक समय जो आगे कुछ महीनो के लिए शहरी भाग दौड़ से टक्कर लेने के लिए जरूरी ऊर्जा देने के लिए काफी था ।

आखिर यह गृह विज्ञान किसके लिए?

एक दिन स्कूल से आकर एक बच्ची ने कहा - मुझे एक साफ़ कपड़ा चाहिए हमें डी टी (डिजाइन एंड टेक्नोलॉजी) में शॉर्ट्स सिलने हैं। वह तभी ही प्राइमरी स्कूल से सेकेंडरी में आई थी  सातवीं क्लास में।
उसकी बात सुनते ही,  बचपन से पनपी मानसिकता और पूर्वाग्रहों से युक्त मैं ..तुरंत पूछा,  अच्छा? फिर क्लास के लड़के उस पीरियड में क्या करेंगे? अब चौंकने की बारी उस बच्ची की थी,  बोली अरे जो हम करेंगे वही वे भी करेंगे,  वो भी शॉर्ट्स सिलेंगे।
अब मैं अपने अतीत से वर्तमान में आई। हाँ ठीक तो है .जब क्लास एक,  टीचर एक,  तो पाठ अलग अलग क्यों भला।
उसके कुछ दिन बाद वह एक शॉर्ट्स बनाकर घर लाई,  जिसमें उन्हें कटिंग,  नाप और सिलाई के अलावा। कच्चा टांका करना,  तुरपन करना,  बटन लगाना आदि सभी सिखाया गया था। और यही नहीं "फ़ूड एवं टेक्नोलॉजी" एक विषय के अंतर्गत हर सप्ताह एक खाद्य पदार्थ भी बनाना सिखाया जाता था जिसकी सामग्री घर से मंगवाई जाती और छीलने,  काटने से लेकर बेक करने,  उबालने, सेंकने, सजाने और उस डिश की न्यूट्रीशन वैल्यू तक सारे काम सिखाये जाते हैं। फिर उनपर नंबर भी दिए जाते हैं।
इस तरह पूरी बेसिक शिक्षा के आधार पर २ साल में उन्हें,  एक जिम्मेदार नागरिक और बेहतर इंसानी जिन्दगी से जुड़े सारे काम जैसे - सूप,  ब्रेड,  पिज़्ज़ा,  केक आदि बनाना,  बेसिक सिलाई,  छोटी मोटी रिपेयर, और बच्चों,  बुजुर्गों की सेहत की देखभाल की शिक्षा दे दी जाती है।
जिससे वह अपने काम स्वयं करने में तो सक्षम हो ही सकें,  आगे अपनी रूचि के मुताबिक कैरियर चुनने में भी उन्हें मदद मिल सके। और यह काम क्लास के सभी बच्चे एक ही तरह से करते हैं फिर चाहे वे लड़के हों या लडकियां।
मुझे याद आया। हमारे भी स्कूल में होम साइंस नाम का एक विषय हुआ करता था। जिसमें यह सब सिखाया जाता था।
बस फर्क इतना था कि वह विषय सिर्फ लड़कियों के लिए था। लड़कों के लिए नहीं। न तो आठवीं तक अनिवार्य विषय के रूप में,  और न ही उसके बाद वैकल्पिक या इच्छित विषय के रूप में।
यानि घर समाज तो छोडो,  शिक्षा के समान अवसर और समान हक़ देने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था भी लड़कों और लड़कियों में यह भेद करती थी। और बड़ी आसानी से मान और समझ लिया गया था कि घर चलाना,  बच्चे पालना,  खाना बनाना या सिलाई  कढ़ाई  करना सिर्फ लड़कियों का काम है।
हालाँकि तब भी घरों में बेटा और बेटी की परवरिश में भेद करना बहुत कम हो गया था। खाने में लड़कों को पौष्टिकऔर लड़कियों को कुछ भी बचा- खुचा खाना देना सिर्फ दादी नानी की कहानियों में ही दिखाई पड़ता था।
परन्तु समाज और व्यवस्था में वह बहुत ही आसानी से ऐसे घुसा हुआ था कि कभी किसी को सवाल तक उठाने की जरुरत नहीं महसूस होती थी।
इसी तरह  आठवीं के बाद (यू पी बोर्ड में  आठवीं के बाद ही तब विषयों का विभाजन होता था/है ) जब कला और विज्ञान वर्गों के विभाजन की बात आई तो बिना एक बार भी विचारे हमने कला वर्ग चुन लिया। क्योंकि सुना था कि विज्ञान लेने से अगले साल मेंढक काटना पड़ेगा,  और जिस जीव को देखने भर से अपनी रुह फ़ना होती हो उसे पकड़ कर उसकी शल्य क्रिया की बात अपने सबसे भयंकर सपने में भी नहीं सोची जा सकती थी।
परन्तु हमारी गणित की अध्यापिका को मेरा फैसला नहीं सुहाया और उन्होंने बुलाकर कहा "बाकी फैसला तुम्हारा है परन्तु तुम्हारा गणित अच्छा है अत: तुम्हें विज्ञान वर्ग लेना चाहिए"।
अब असमंजस की स्थिति हमारे लिए थी। मैं  गणित लेना चाहती थी,  परन्तु उसके लिए विज्ञान वर्ग लेना जरूरी था,  और विज्ञान लिया तो मेंढक काटना जरूरी था। थोड़े हाथ पैर इधर उधर मारे तो पता चला कि,  कला वर्ग के साथ भी कुछ स्कूलों में गणित विषय का  ऑप्शन है। जब यह मालूम किया ज्ञान लेकर अध्यापिका के पास पहुंचे,  तो पता लगा कि यह  ऑप्शन  सिर्फ लड़कों और लड़कों के स्कूल के लिए है। क्योंकि वहां होम साइंस विषय नहीं है . अत: इसके बदले वह कला वर्ग में होते हुए भी गणित का चुनाव कर सकते हैं। जिससे आगे जाकर वह चाहें तो कॉमर्स में अपना कैरियर बना सकें। गुस्सा तो बहुत आया।
पर कर कुछ नहीं पाए,  मेंढक   से अपने डर से पार पाया नहीं गया तो कला वर्ग में ख़ुशी ख़ुशी रम गए. परन्तु बाद में जब होम साइंस लेकर आगे पढने के लिए दूसरे  किसी  विश्व विद्यालय में पता किया तो पता चला कि आगे इस विषय में सिर्फ विज्ञान वर्ग की छात्राओं को ही प्रवेश मिलता है,  क्योंकि यह होम "साइंस " है होम "आर्ट" नहीं ...अजीब  औ  गरीब बवाल था। मुझे पता नही कि तब भी वह लड़कों के लिए उपलब्ध था या नहीं। पर लड़कियों के लिए ज्यादती थी. यानि कि जबरदस्ती उन्हें वह विषय पढाया जाता था,  जिसे कि बाद में वह लेकर आगे पढ़ कर उसमें कैरियर  नहीं बना सकतीं थीं.बस  घरेलू काम काज के लिए यह विषय उनके लिए अनिवार्य था।
उस समय न तो इतनी समझ थी न इतना हौसला कि इस मुद्दे पर लड़ सकते अत: घर,  दोस्तों में ही गुस्सा निकाल कर रह गए।
परन्तु सवाल वहीं के वहीं रह गए - कि आखिर जो विषय विज्ञान के अंतर्गत आता है,  जिसमें घर परिवार की देख भाल,  व्यवस्था,  सेहत,  बुजुर्गों की देखभाल,  पौष्टिक खाद्य पदार्थ,  सफाई,  वगैरह वगैरह जैसे जीवन के लिए अनिवार्य विषय सिखाये -पढाये जाते हैं वह सिर्फ लड़कियों के लिए ही अनिवार्य क्यों है? क्या यह जिम्मेदारी समाज की बाकी आधी  जनसंख्या की नहीं? क्या उन्हें इस विषय की बेसिक जानकारी नहीं होनी चाहिए? फिर आखिर क्यों उनके लिए अनिवार्य तो छोडिये,  एक वैकल्पिक विषय के रूप में भी यह ऑप्शन नहीं होता।
घर,  समाज,  परिवार की तो बात ही क्या,  सामान अधिकारों की शिक्षा देने वाले हमारे शिक्षा संस्थान तक इस मामले में लड़का और लड़की में मूल भेदभाव करते हैं। और शुरू से ही वह बच्चों में इस आधार पर उनके कामों का विभाजन कर देते हैं। फिर क्यों दोष दें हम समाज के उन ठेकेदारों को को जो कहते हैं कि "लड़की हो,  ज्यादा उड़ो मत,  घर में बैठो और घर बार  संभालो,  हमारे लिए खाना बनाओ और बच्चे पालो। यह तुम्हारा काम है।
फिर क्यों दोष दें हम उन लड़कों को जो शादी के लिए अब भी "गृह कार्य में निपुण लड़की" का विज्ञापन देते है। आखिर इस भेदभाव का बीज तो उनमें बचपन से ही डाल दिया जाता है।
मुझे नहीं पता,  आज भी किसी स्कूल, कॉलेज या  विश्व विद्यालय में यह विषय लड़कों के लिए खुला है या नहीं,  या कहीं है भी तो,  कोई लड़का इस विषय को लेकर पढता होगा इसमें मुझे संदेह है। परन्तु इतना अवश्य है कि यदि हमें एक सभ्य और पढ़े लिखे समाज का गठन करना है तो एक बेसिक और अनिवार्य विषय के तहत इस विषय को लड़के और लड़कियों को सामान रूप से पढाया जाना चाहिए।

वीके सिंह ने मीडिया को कहा 'Presstitutes'

विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह उस समय नए विवाद में फंस गए जब उन्होंने यमन से लोगों को निकालने के अभियान की तुलना हाल में पाकिस्तानी मिशन के अपने दौरे से कर दी। उन्होंने बाद में ट्विटर पर टिप्पणी करते हुए मीडिया को Presstitutes कह दिया। भारतीयों को निकालने के अभियान के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने जिबूती में कहा, 'सच बताऊं तो यमन में (बाहर निकालने का) अभियान पाकिस्तानी दूतावास जाने से कम रोमांचक है। कांग्रेस सहित राजनीतिक दलों की ओर से उनकी टिप्पणियों पर कड़ी प्रतिक्रिया आने पर उन्होंने एक टीवी चैनल को जिम्मेदार ठहराया।
उन्होंने देर रात एक ट्वीट में कहा, 'दोस्तों आप ‘प्रेसटीट्यूट्स’ से क्या उम्मीद करते हैं?' उन्होंने कहा कि पिछली बार टीवी एंकर ने सोचा कि स्पेलिंग में ‘ई’ की जगह ‘ओ’ है। हालांकि अधिकारियों ने यहां कहा कि मंत्री व्यंग्य कस रहे थे और उनकी टिप्पणियां मीडिया के संबंध में थीं।
वीके सिंह ने अपने ट्वीट से ऐसे मीडिया संस्थानों पर निशाना साधा है जो पाकिस्तान दिवस में शामिल होने को लेकर उन पर हमला कर रहे थे।
गौरतलब है कि मार्च 2015 में पाकिस्तान दिवस पर वीके सिंह पाकिस्तान दूतावास में आयोजित कार्यक्रम में पहुंचे थे। बवाल मचने के बाद उन्होंने इसे लेकर ट्विउटर पर कई ट्वीट भी किए थे और इसे एक ड्यूटी बताया था। 

गर्भवती महिलाओं व वरिष्ठ नागरिकों को ट्रेन में निचली सीटों का कोटा बढा

नई दिल्ली। भारतीय रेल ने ट्रेनों के स्लीपर डिब्बों में वरिष्ठ नागरिकों और गर्भवती महिलाओं के लिए निचली सीटों का कोटा बढाने का फैसला किया है। इस बारे जारी एक बयान में रेलवे ने कहा कि प्रति डिब्बे दो निचली सीटों का कोटा बढाकर चार किया जाएगा। बयान में कहा गया है कि तृतीय श्रेणी वातानुकूलित और द्वितीय श्रेणी वातानुकूलित डिब्बों में कोटे में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।
मौजूदा कंप्यूटराइज्ड यात्री आरक्षण प्रणाली में निचली सीटें स्वाभाविक रुप से 60 साल से ज्यादा उम्र वाले पुरुष यात्रियों और 45 साल से ज्यादा आयु की महिला यात्रियों को आवंटित करने का प्रावधान है, बशर्ते टिकट बुक किए जाने के समय सीटें उपलब्ध हों।
बयान के अनुसार टिकट जांच करने वाले स्टाफ को निर्देश दिया गया है कि वे उन वरिष्ठ नागरिकों और शारीरिक रूप से अशक्त लोगों की मदद करें जिन्हें बीच की या उपर की सीटें आवंटित की गयी हैं। ट्रेनों में नीचे की बर्थ खाली होने पर ऐसी सीटें पहले इन यात्रियों को दी जाएं।

खाकी हो या सेना वर्दी बजे बिक्री के नियम है पर

 नियम के अनुसार कैप, ब्रैज या बेल्ट की बिक्री से पूर्व उस सेवा में होने की पुष्टिड्ढ दुकानदार को करनी है कि ग्राहक उस सेवा मे है जिसका बैज या बेल्ट या कैप खरीद रहा है। इसको लिए परिचय कार्ड व तैनाती स्थान से लिख हुआ अनुमति पत्र दुकानदार के लिए लेना अनिवार्य है। खाकी की आड़ में गत वर्ष सितम्बर से मेरठ में ही दस घटनाएं पुलिस वर्दी में हो चुकी है। दिसम्बर माह में ही ४ व जन0 मे दो व फरवरी इस वर्ष लगातार ३ व ४ को घटनाएं हो चुकी है।
पुलिस की वर्दी की सर्तकता हेतु मेरठ रेज पुलिस प्रमुख द्वारा दुकानदारों पर ही बात डाल दी है कि निर्देश दिए जा रहे है वर्दी आई कार्ड देखकर दें। इसमें दुकानदार क्या करेगा कि कहा जाये की भाई के लिए वर्दी गिफ्ट करनी है वर्दी दे दो आई कार्ड नही।
 बेहतर हो दुकानदार पुलिस व सेना वर्दी का लिखित में रिकॉर्ड रखें तथा सेना व पुलिस स्तर से अनुमति देने व आई कार्ड से वर्दी खरीद कराई जाये। पुरानी वर्दी बाजार में बिक्री बंद हो तथा सेवानिवृत्त उपरान्त खाकी या सेना चिन्हित रंग का इस्तेमाल निजी सुरक्षा में रुके। बिजली उपकेन्द्र में रात्री प्रवेश हेतु सख्त प्रबन्ध किए जाये। रात्रि मे दो हथियार युक्त सुरक्षा गार्ड अनिवार्य हो।

पुलिसवर्दी में होती बिजली सप्लाई छिन्न-बिन्न

पुलिसवर्दी में ही हापुड़ जनपद के हापुड़ कोतवाली क्षेत्र के आनन्द विहार स्थित के बिजली घर पर ५ एम वी के ट्रांस फार्मर से बिजली घर मे करीब ३० लाख का कापर लूट ले गये। बिजलीघर पर मौजूद बिजली विभाग का एसएसओ व एक अन्य कर्मचारी को गन पाइंट पर बधंक बनाने का समाचार है। इस घटना की सूचना के घंटो बाद मौके पर एक सिपाही होमगार्ड के साथ पहुंचना घटना की गम्भीरता को दिखाता है। चार पांच घंटे कर्मचारी बधक रहे और बदमाशों ने ट्रांस फार्मर खोल कर उससे कोपर निकाला। पुलिस ने एमएसओ व मौैजूद कर्मचारी से पूछताछ हेतु थाने बैठाया व पुलिस जल्द खुलाये की बात किए है। इसके अगले दिन औरगाबाद में नीली बती लगी गार्ड से बिजली घर लूट का प्रयास रात्री में किया गया।
पुलिसवर्दी की आसान उपलब्धता एवं उसे पहनकर वारदात करने का खौफ में सरकार-शासन-प्रशासन पुलिस व बिजली व अन्य विभाग या जनता का न सोचना तथा यूं ही लुटवाते रहना या लूटते रहना चलता रहेगा या फिर वास्तविक रूप में पुलिस के कार्य करने पर भी बदमाश उन्हे मानकर उसके कार्य वाधित करना मजदूरी न होगी तो क्या करना होगा। कुछ मामलों में जब पुलिस की बदमाश समझ कर घेरा बंदी हुई है तो सरकारी कार्य में बाधा के मुकदमेां की कार्यवाही तो बेधड़क होती है परन्तु पुलिसवर्दी पहन बदमाशों की कार्यवाही के मामलों में लीपा पोती कब तक चलेगी, यह गम्भीर चितंन करना होगा। सभव है कही अनदेखी असहनीय स्थिति न बना दें। अनधिकृत पुलिसवर्दी या मिलट्री ड्रेस या चिन्ह उनमें वाहनों पर भी अंकित करना संज्ञेय अपराध बनाया जाना जरूरी है इसमें लाल नीली बत्ती या हूटर भी है। हमारा मानना है इसकी निगरानी कत्र्ताओं की अनदेखी भी अपराध श्रेणी में रखा जाये उन्हे जबाव देही बनाया जाये। षडयंत्र की संज्ञा में रखा जाये।