एक दिन स्कूल से आकर एक बच्ची ने कहा - मुझे एक साफ़ कपड़ा चाहिए हमें डी टी (डिजाइन एंड टेक्नोलॉजी) में शॉर्ट्स सिलने हैं। वह तभी ही प्राइमरी स्कूल से सेकेंडरी में आई थी सातवीं क्लास में।
उसकी बात सुनते ही, बचपन से पनपी मानसिकता और पूर्वाग्रहों से युक्त मैं ..तुरंत पूछा, अच्छा? फिर क्लास के लड़के उस पीरियड में क्या करेंगे? अब चौंकने की बारी उस बच्ची की थी, बोली अरे जो हम करेंगे वही वे भी करेंगे, वो भी शॉर्ट्स सिलेंगे।
अब मैं अपने अतीत से वर्तमान में आई। हाँ ठीक तो है .जब क्लास एक, टीचर एक, तो पाठ अलग अलग क्यों भला।
उसके कुछ दिन बाद वह एक शॉर्ट्स बनाकर घर लाई, जिसमें उन्हें कटिंग, नाप और सिलाई के अलावा। कच्चा टांका करना, तुरपन करना, बटन लगाना आदि सभी सिखाया गया था। और यही नहीं "फ़ूड एवं टेक्नोलॉजी" एक विषय के अंतर्गत हर सप्ताह एक खाद्य पदार्थ भी बनाना सिखाया जाता था जिसकी सामग्री घर से मंगवाई जाती और छीलने, काटने से लेकर बेक करने, उबालने, सेंकने, सजाने और उस डिश की न्यूट्रीशन वैल्यू तक सारे काम सिखाये जाते हैं। फिर उनपर नंबर भी दिए जाते हैं।
इस तरह पूरी बेसिक शिक्षा के आधार पर २ साल में उन्हें, एक जिम्मेदार नागरिक और बेहतर इंसानी जिन्दगी से जुड़े सारे काम जैसे - सूप, ब्रेड, पिज़्ज़ा, केक आदि बनाना, बेसिक सिलाई, छोटी मोटी रिपेयर, और बच्चों, बुजुर्गों की सेहत की देखभाल की शिक्षा दे दी जाती है।
जिससे वह अपने काम स्वयं करने में तो सक्षम हो ही सकें, आगे अपनी रूचि के मुताबिक कैरियर चुनने में भी उन्हें मदद मिल सके। और यह काम क्लास के सभी बच्चे एक ही तरह से करते हैं फिर चाहे वे लड़के हों या लडकियां।
मुझे याद आया। हमारे भी स्कूल में होम साइंस नाम का एक विषय हुआ करता था। जिसमें यह सब सिखाया जाता था।
बस फर्क इतना था कि वह विषय सिर्फ लड़कियों के लिए था। लड़कों के लिए नहीं। न तो आठवीं तक अनिवार्य विषय के रूप में, और न ही उसके बाद वैकल्पिक या इच्छित विषय के रूप में।
यानि घर समाज तो छोडो, शिक्षा के समान अवसर और समान हक़ देने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था भी लड़कों और लड़कियों में यह भेद करती थी। और बड़ी आसानी से मान और समझ लिया गया था कि घर चलाना, बच्चे पालना, खाना बनाना या सिलाई कढ़ाई करना सिर्फ लड़कियों का काम है।
हालाँकि तब भी घरों में बेटा और बेटी की परवरिश में भेद करना बहुत कम हो गया था। खाने में लड़कों को पौष्टिकऔर लड़कियों को कुछ भी बचा- खुचा खाना देना सिर्फ दादी नानी की कहानियों में ही दिखाई पड़ता था।
परन्तु समाज और व्यवस्था में वह बहुत ही आसानी से ऐसे घुसा हुआ था कि कभी किसी को सवाल तक उठाने की जरुरत नहीं महसूस होती थी।
इसी तरह आठवीं के बाद (यू पी बोर्ड में आठवीं के बाद ही तब विषयों का विभाजन होता था/है ) जब कला और विज्ञान वर्गों के विभाजन की बात आई तो बिना एक बार भी विचारे हमने कला वर्ग चुन लिया। क्योंकि सुना था कि विज्ञान लेने से अगले साल मेंढक काटना पड़ेगा, और जिस जीव को देखने भर से अपनी रुह फ़ना होती हो उसे पकड़ कर उसकी शल्य क्रिया की बात अपने सबसे भयंकर सपने में भी नहीं सोची जा सकती थी।
परन्तु हमारी गणित की अध्यापिका को मेरा फैसला नहीं सुहाया और उन्होंने बुलाकर कहा "बाकी फैसला तुम्हारा है परन्तु तुम्हारा गणित अच्छा है अत: तुम्हें विज्ञान वर्ग लेना चाहिए"।
अब असमंजस की स्थिति हमारे लिए थी। मैं गणित लेना चाहती थी, परन्तु उसके लिए विज्ञान वर्ग लेना जरूरी था, और विज्ञान लिया तो मेंढक काटना जरूरी था। थोड़े हाथ पैर इधर उधर मारे तो पता चला कि, कला वर्ग के साथ भी कुछ स्कूलों में गणित विषय का ऑप्शन है। जब यह मालूम किया ज्ञान लेकर अध्यापिका के पास पहुंचे, तो पता लगा कि यह ऑप्शन सिर्फ लड़कों और लड़कों के स्कूल के लिए है। क्योंकि वहां होम साइंस विषय नहीं है . अत: इसके बदले वह कला वर्ग में होते हुए भी गणित का चुनाव कर सकते हैं। जिससे आगे जाकर वह चाहें तो कॉमर्स में अपना कैरियर बना सकें। गुस्सा तो बहुत आया।
पर कर कुछ नहीं पाए, मेंढक से अपने डर से पार पाया नहीं गया तो कला वर्ग में ख़ुशी ख़ुशी रम गए. परन्तु बाद में जब होम साइंस लेकर आगे पढने के लिए दूसरे किसी विश्व विद्यालय में पता किया तो पता चला कि आगे इस विषय में सिर्फ विज्ञान वर्ग की छात्राओं को ही प्रवेश मिलता है, क्योंकि यह होम "साइंस " है होम "आर्ट" नहीं ...अजीब औ गरीब बवाल था। मुझे पता नही कि तब भी वह लड़कों के लिए उपलब्ध था या नहीं। पर लड़कियों के लिए ज्यादती थी. यानि कि जबरदस्ती उन्हें वह विषय पढाया जाता था, जिसे कि बाद में वह लेकर आगे पढ़ कर उसमें कैरियर नहीं बना सकतीं थीं.बस घरेलू काम काज के लिए यह विषय उनके लिए अनिवार्य था।
उस समय न तो इतनी समझ थी न इतना हौसला कि इस मुद्दे पर लड़ सकते अत: घर, दोस्तों में ही गुस्सा निकाल कर रह गए।
परन्तु सवाल वहीं के वहीं रह गए - कि आखिर जो विषय विज्ञान के अंतर्गत आता है, जिसमें घर परिवार की देख भाल, व्यवस्था, सेहत, बुजुर्गों की देखभाल, पौष्टिक खाद्य पदार्थ, सफाई, वगैरह वगैरह जैसे जीवन के लिए अनिवार्य विषय सिखाये -पढाये जाते हैं वह सिर्फ लड़कियों के लिए ही अनिवार्य क्यों है? क्या यह जिम्मेदारी समाज की बाकी आधी जनसंख्या की नहीं? क्या उन्हें इस विषय की बेसिक जानकारी नहीं होनी चाहिए? फिर आखिर क्यों उनके लिए अनिवार्य तो छोडिये, एक वैकल्पिक विषय के रूप में भी यह ऑप्शन नहीं होता।
घर, समाज, परिवार की तो बात ही क्या, सामान अधिकारों की शिक्षा देने वाले हमारे शिक्षा संस्थान तक इस मामले में लड़का और लड़की में मूल भेदभाव करते हैं। और शुरू से ही वह बच्चों में इस आधार पर उनके कामों का विभाजन कर देते हैं। फिर क्यों दोष दें हम समाज के उन ठेकेदारों को को जो कहते हैं कि "लड़की हो, ज्यादा उड़ो मत, घर में बैठो और घर बार संभालो, हमारे लिए खाना बनाओ और बच्चे पालो। यह तुम्हारा काम है।
फिर क्यों दोष दें हम उन लड़कों को जो शादी के लिए अब भी "गृह कार्य में निपुण लड़की" का विज्ञापन देते है। आखिर इस भेदभाव का बीज तो उनमें बचपन से ही डाल दिया जाता है।
मुझे नहीं पता, आज भी किसी स्कूल, कॉलेज या विश्व विद्यालय में यह विषय लड़कों के लिए खुला है या नहीं, या कहीं है भी तो, कोई लड़का इस विषय को लेकर पढता होगा इसमें मुझे संदेह है। परन्तु इतना अवश्य है कि यदि हमें एक सभ्य और पढ़े लिखे समाज का गठन करना है तो एक बेसिक और अनिवार्य विषय के तहत इस विषय को लड़के और लड़कियों को सामान रूप से पढाया जाना चाहिए।
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