Friday, 3 April 2015

बिजली-पानी के बिल भरने की सुविधा भी मिलेगी पंचायत में

ग्राम पंचायतों को और अधिकार संपन्न बनाने के लिए राज्यों को निर्देश दिए गए हैं। इससे जहां ग्राम विकास की योजनाओं का सफलतापूर्वक संचालन किया जा सकेगा, वहीं शहरी क्षेत्रों की योजनाओं का लाभ भी समय से लोगों तक पहुंच जाएगा। स्थानीय प्रशासन का दायित्व भी इन्हीं लघु इकाइयों को सौंपे जाने की योजना है। देश की लगभग ढाई लाख पंचायतों में लघु सचिवालय बनाने की योजना पूर्ववर्ती संप्रग सरकार के कार्यकाल में ही काफी हद तक सिरे चढ़ चुकी है। पंचायती राज मंत्रालय की इस योजना के लागू होने पर पांच लाख लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
पंचायती राज मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ग्रामीण सड़कें, गली, नाली, पेयजल, संपर्क मार्ग, नाले, बांध, जल संरक्षण, मृदा संरक्षण, बागवानी, पुराने ताल-तलैया और पोखरों के पुनरोद्धार की योजना को पंचायतें ही संचालित कर रही हैं। लेकिन, पेशेवर व तकनीक की कमी से इसमें कई तरह की मुश्किलें भी पेश आ रही हैं। योजना के मुताबिक ग्रामीणों के छोटे-बड़े काम पंचायतों में ही होने लगेंगे। इनमें ब्लाक और तहसील मुख्यालयों पर होने वाले जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र, राशन कार्ड, मनरेगा जॉब कार्ड, बिजली-पानी के कनेक्शन और उनके बिल भुगतान की सुविधा शामिल है। निश्चित समय पर वहां सरकारी बाबू भी मिलने लगेंगे, जमीन संबंधी दस्तावेज और उनकी नकल देने वाले पटवारी भी वहीं उपलब्ध होंगे। सरकार इस दिशा में पहल कर चुकी है। इसके लिए पंचायत स्तर पर पंचायत भवनों के निर्माण का काम भी बहुत हद तक हो चुका है।
ग्रामीण विकास की योजनाओं के संचालन के लिए सरकार का जोर पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत बनाने पर है। वर्तमान मोदी सरकार भी गांव के विकास में पंचायत की भूमिका को और मजबूत करने के उपाय कर रही है। इस बाबत राज्यों को निर्देश दे दिए गए हैं।

बिजली विभाग में अनुबन्ध सेवा-निवृत्त रखना भ्रष्ट्राचार है

उ०प्र० पावर कारपोरेशन द्वारा राजस्व वसूली व बिजली चोरी रोकने तथा विद्युत हानियों पर नियंत्रण व बिजली आपूर्ति की निरन्तरता हेतु जरूरत के हिसाब से नियमित स्टाफ कम होने को देखते हुए समय-समय पर अनुबन्ध पर परिचालन एवं कार्यालय में कार्य हेेतु सेवा निवृत कार्मिकों की व्यवस्था की हुई है। इस व्यवस्था को बनाये दस वर्ष से अधिक हो गए है पर न संतोष जनक बिजली आपूर्ति है, न ही अपेक्षित राजस्व वसूली व विद्युत हानियों मे कमी या बिजली चोरी रूकी है। इन दस वर्षों में बढा है तो भ्रष्टड्ढाचार व इन माध्यमों को कुछ स्तर पर अतिरिक्त आय का माध्यम बना लिया गया है। यह आरोप विद्युत उपभोक्ता सेवा समिति व बिजली कामगारों के प्रमुख संगठन विद्युत मजूदर पंचायत उ0प्र0 का है। अनुबन्ध स्टाफ मे कम मजदूरी वह भी समय पर नही तथा.... अनुबन्धित स्टाफ में खेल है कि अनुबन्ध से कम मजदूरी भुगतान व अनुबन्ध की शर्त फण्ड, बीमा व अन्य प्रदत्त सुविधाएं तथा परिचय कार्ड या नियुक्ति पत्र सभी की अनेदखी इसके ऊपर मजदूरी महीनों भुगतान नहीं, इसके लिए भी आन्दोलन का दुघर्टना में आसानी से कार्मिक होने से इंकारी। अनुबन्धित कार्मिकों के द्वारा उपभोक्ता व विभाग से लूट। बिजली मुफ्त में जलाना अलग। गुनाहगारी पर उस स्थान से हटा देना। वह दूसरे स्थान पर विभाग में खुले काम  पर लग जाता है ऐसे भ्रष्टड्ढाचार पर कार्यवाही।  सेवा निवृत को रखने के मानक नही जो है खुल्ला उल्लंघन-भ्रष्टड्ढाचार की गंध सेवा निवृत कार्मिकों, अधिकारियों को संविदा नाम पर रखने के यूं तो मानक नहीं, व्यवस्था खुले रूप से नही-नही अवदेन की सार्वजनिकता। व्यवस्था है, मानकता है अधिकारी से निकटता। इसका परिणाम बनाई गई  व्यवस्था कि जो कार्मिक जिस कार्य व इकाई से सेवा निवृत हुआ है उस स्थान व कार्य पर नही रखा जाता उसका रास्ता निकाला कि आवेदन व सस्ंतुति अन्य स्थान से कार्य उस स्थान पर जहां से सेवा निवृत है तथा कार्य सेवा मे रहते किया है। व्यवस्था का दुरूपयोग ऐसा की पेंशन कार्य हेतु एक इकाई में एक नियमित दो-तीन संविदा व एक-दो अन्यत्र माध्यम से। लिपिक कार्य मानेदय में बढ़ोतरी नही अन्य पद संविदा मानदेय में भारी बढ़ोत्तरी जली विभाग में गजब का खेल की सेवा निवृति बाद अधिकारी व कार्यालय अधीक्षक व लेखाकार, लेखाधिकारी पदोन्नत पद पर सविंदा सभी के मानेदय में भारी बढ़ोत्तरी दोहरा माप दण्ड। अधिकारी सेवा निवृत को सविंदा पूरे वर्ष जबकि लिपिको आदि की कुछ की अप्रैल से सितम्बर व कुछ की सितम्बर से आगे इकाईयां सभी से अप्रैल से कार्य करा रही है तथा सस्ंतुति पूरे वर्ष की है। संविदा व्यवस्था के अनुसार कार्य के अनुसार अल्प समय का प्राविधान है। इस वर्ष संविदा सेवा निवृत ४-५ माह बाद पिछली तारीखों से करने वह भी करने के तरीके पर भ्रष्टड्ढाचार इस व्यवस्था में बढने से इंकार पीडित नही कर रहे है।  जांच हो समाजवादी युवजन सभा व विद्युत उपभोक्ता सेवा समिति ने मेरठ प्रबन्धन निदेशक स्तर से सेवा निवृत कार्मिकों को दोहरी नीति से मानदेय भुगतान, संविदा पर रखने की व्यवस्था व अनुबंध पर परिचालन रखने उन्हे भुगतान व उन अनुबन्ध द्वारा स्टाफ देने वाली एजेन्सी के श्रम विभाग में पंजीकरण आदि की जांच ३ या साल से कराने की मांग की गई है। किराये के वाहनों के कर्मशियल टैक्स चोरी जांच होनी चाहिए की बिजली विभाग में किराये के वाहनों को रखने में कार्मिशियल टैक्स अदा न करने वाले वाहनों को रखे जो रहे है। इनसे इन टैक्स चोरी को कराई जा रही है। अनुबन्ध वाहनों पर व विभाग के लोगों द्वारा अपने वाहनों पर उ०प्र० सरकार किस अधिकार से प्लेट आदि से अंकित करने को बढावा मिला हुआ है।

बिजली चोरी चैकिंग

बिजली की भारी कमी से प्रदेश वासियों में भारी गुस्से से बिजली चोरी रोकने के लिए चलाये जा रहे चैकिंग अभियान को मुख्यमंत्री ने इसे तुरन्त रोके जाने के निर्देश दिए है। मुख्यमन्त्री के इस निर्णय का जहा बिजली प्रशासन कर्मियों ने स्वागत किया है वहां क्षेत्र के बिजली प्रशासन मे घबराहट  है कि इस चैकिंग से राजस्व वसूली लक्ष्य पाने मे सहुलियत हो रही थी अब वसूली की इस रोक से प्रभावित होगी।
      सरकार के इस फैसले पर विपक्ष ने आने वाले उप-चुनाव की रणनीति के तहद सरकार का फैसला बताते है। गत लोकसभा चुनाव के दौरान बिजली राजस्व वसूली के लिए बिजली कन्कशन काटे जाने व पुलिस रिपोर्ट के चलते प्रदेश सतावा दल अपने का मत न मिलने का कारण मान कर इन उप-चुनाव में इस तरह की नारजगी से बचने के लिए ही इस फैसले को लिया गया मानते है।
      प्रदेश सरकार का बिजली दरों मे वृद्धि को रोका जाना भी इन उपचुनाव को दृष्टिड्ढगत रखते हुए ही माना जा रहा है। इन उप चुनाव के बाद बिजली की दरो मे वृद्धि व कन्कशन लेना मंहगे के साथ बिजली चैकिंग अभियान शुरू होने को मिलने वाला तगड़ा झटका मान रहे है।
     मुख्यमन्त्री द्वारा बिजली के नये कन्कशन देने की विशेष अभियान रूप में चलाया जाना विभाग व जनता दोनों के हित में रहा और जनता के अपेक्षा की कि यह अभियान लगातार जारी रहे। विभाग के आकड़ों के अनुसार मेरठ के ग्रामीण क्षेत्र ने इस अभियान का शहरी क्षेत्र से अधिक लाभ उठाया। ग्रामीण क्षेत्र मे ११ हजार ५७१ के लक्ष्य के विपरीत  ३३ हजार १३ उपभोक्ता विभाग के नये बनाये। शहरी क्षेत्र में १० हजार ९६४ के लक्ष्य के विपरीत ३५५१ नये उपभोक्ता बनें।
     विद्युत उपभोक्ता सेवा समिति ने मांग की है कि बिजली प्रबन्धन इस बात की जांच करे कि अभियान के अन्र्तगत उपभोक्ता इस स्तर तक बढें इमसे स्पष्टड्ढ है कि नियमित नये कक्कशन की प्रक्रिया मे क्या कमी है या जिम्मेदार है, जो उपभोक्ता कन्कशन नही ले पा रहा था। इस जांच से कमियां खोजकर जिम्मेदारी निर्धारण के बाद फिर अभियान द्वारा कन्कशन देने की जरूरत भी नही होगी तथा बिना बिजली कन्कशन बिजली इस्तेमाल करने वालों में कमी आयेगी।
     बिजली के नये कन्कशन प्रक्रिया का लाभ जनता को दिलाने मे विभाग के प्रमुख सचिव उर्जा से जिला प्रशासन तक जागरूकता कराई गई जिम्मेदारी निर्वहन किया गया ऐसे प्रयास बिजली बचत व इसके दुरुपयोग को रोकने व बिजली सेवा देने में हो तो विभाग के प्रति जन आक्रोश मे कमी आयेगी।
 ठेका या फ्रेचाइंजी व्यवस्था से टिकाऊ कार्य संस्कृति बेहतर सेवा नही
वरिष्ठ नागरिक फोरम सदभावना समिति ने मुख्यमंत्री से उम्मीद की है कि अपनी योग्यता का परिचय बिजली व्यवस्था की बेहतरी की जरूरत मानते हुए विभाग से ठेकेदारी व फ्रेचाइंजी को वितरण व्यवस्था मे कम करने का सुझाव दिया है।

क़्या “मैं आजाद हूं”

1994 वे में एक फिल्म देखी थी “मैं आजाद हूं”। अमिताभ बच्चन के नाम से सारे बच्चे जमा हो गये लेकिन उसकी थीम देखकर जल्दी ही सब एक एक कर के सो गये। एक मैं ही अकेली थी जिसने वो मूवी पूरी देखी। उसका एक गाना था जो मेरे मन मस्तिष्क पर छप सा गया। आज भी उसकी हर लाइन ताजा है। तब मैं नहीं जानती थी कि मैं भी एक जर्नलिस्ट बनूंगी। जब भी मौका मिलता है मैं वो फिल्म जरूर देख लेती हूं। फिल्म में सुभाषिनी का किरदार निभा रही शबाना आज़मी बताती है कि कैसे आजाद हिन्द फौज में रहे उसके पिता जी आजादी के बाद के भारत की बाते करते थे... आने वाला भारत ऐसा होगा वैसा होगा... ना भूख ना भ्रष्टाचार, ना बेबसी ना बेकारी.... कैसे लोग थे वो जो ये सपने देखा करते थे।
23 साल की उम्र में शहीदे आज़म बनने वाले भगत सिंह ने तो आज की भयावह स्थिति की उसी वक्त कल्पना कर ली थी। उन्होंने बहुत कुछ लिखा था कि अगर देश को सही दिशा नहीं मिली तो एक दिन असमानता, दोहन, भूख भ्रष्टाचार भारत को जकड़ लेंगे...। अंग्रेजो ने उनकी लिखे कई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ो को जेल में ही राख कर दिया था।
आज शहर में एक नाली भी बनती है तो उसकी नींव में भ्रष्टाचार की ईंट लगी होती है। इसलिये उसका ढांचा रसूख वालो की सहूलियत के हिसाब से बनता है। तभी तो मुम्बई हर साल मानसून आते ही थर्राने लगती है। नहीं तो क्या इस देश में इतने बेकार इंजीनियर ही पैदा होते हैं जो अन्दाजा ना लगा सके कि पानी को कौन सी दिशा देनी है। अगर देश में शहीदों के देखे एक भी सपने साकार करने का संकल्प लिया होता तो देश का ये हाल ना होता।
देश को चलाने की जिम्मेदारी सबसे पहले नेताओं की थी। उन्हे ही शहीदों के सपने साकार करने थे लेकिन उनके निजी स्वार्थों ने ऐसा आकार लिया कि वो सपने ना जाने कहां खो गये। हम आजादी के बाद की दूसरे ही पीढ़ी हैं लेकिन हम ही ने शहीदों को ऐसे बिसरा दिया है.. जैसे देश कभी गुलाम ही नहीं था और उसके लिये कभी किसी ने कुर्बानी दी ही नहीं थी।

मीडिया की दिशा पाठक तय करें

वर्तमान में अखबार या पत्रिका का सफल प्रकाशन करना कितना कठिन कार्य है ये एक प्रकाशक ही बता सकता है। खासतौर से स्थानीय अथवा क्षेत्रिय समाचारपत्र/पत्रिका प्रकाशकों को इसका अधिक अनुभव है। हमारे आस पास रहने वाले पाठक इस वेदना से कभी अवगत नहीं होते। क्योंकि ऐसा कभी मौका या मंच ही नहीं होता जहां क्षेत्रिय समाचारपत्र/पत्रिकाओं के प्रकाशकों की समस्यायें रखी जा सकें। “लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन” ने इस तरह की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया और समाधान सुझाये हैं।
हाल ही में झारखंड की प्रसिद्ध पत्रिका राष्ट्र संवाद के 14 वें स्थापना दिवस के अवसर पर जब देश के बड़े अखबार कार्पोरेट जगत के दिग्गज और पाठक एक जगह एकत्रित हुये तब देश के विकास में मीडिया के योगदान की चर्चा हुई। जहां बड़ॆ अखबारों ने बाजारवाद और प्रतिस्पर्धा के कारण उभरती चुनौतियों की बात की तो कारपोरेट जगत ने मीडिया के नकारात्मक खबरें अधिक दिखाने और छापने पर चिंता व्यक्त की।
इस अवसर पर लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सुभाष सिंह ने कहा कि आज देश में इतने वर्षों में भ्रष्टाचार राजनीतिक मुद्दा बना है जिसका श्रेय मीडिया को जाता है। यह देश के विकास में मीडिया का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है। आज मीडिया को नियंत्रित करने की बातें हो रहीं हैं। मीडिया को ना तो सरकार नियंत्रित कर सकती है ना कारपोरेट। मीडिया को केवल पाठक ही नियंत्रित कर सकते हैं। यदि पाठक सकारात्मक खबरों को अधिक रूचि से पढ़े तो मीडिया वही दिखायेगा और छापेगा। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री सुभाष सिंह ने कहा कि मीडिया की सकारात्मक खबरों को कई बार गलत समझ लिया जाता है कि कहीं ये अखबार या पत्रिका बिक तो नहीं गयी।
सचमुच ये एक नया पहलू था चर्चा के लिये। सब ओर बात उठती है कि मीडिया सकारात्मक खबरों को नहीं दिखा रहा है। आप उदाहरण के लिये ले यदि मीडिया किसी राजनीतिक दल की या उसके नेताओं की अच्छाइयों को प्रमुखता देता है तो पाठक के मन में इसका नकारात्मक पहलू ही जल्द उभरता है।

दुर्घटना ने जीवन बदल दिया पर टूटा नहीं हौसला

जीवन कितना क्षणभंगुर है फिर भी हम इस बात को समझ नहीं पाते लेकिन कुछ घटनाएं होती हैं जीवन की जो इस भौतिक शरीर की कमजोरी और किसी पराशक्ति के होने का आभास कराती है, जो हमें चलाती है। कई बार घटनाएं हमारे सोचने का ढंग बदल देती हैं। हमारे साथ सुखद और दुखद दोनो तरह की घटनाएं होती हैं। कई लोग छोटी-छोटी तकलीफों से परेशान हो जाते हैं। हम कई छोटी-छोटी तकलीफों में नकारात्मक हो उस ईश्वर से शिकायत करने लगते हैं। लेकिन कई लोग हैं जो बड़ी से बड़ी तकलीफ का सामना हंस कर करते हैं। जीवन को उन बुरी घटनाओं के बाद भी इतनी सकारात्मकता से लेतें हैं कि हैरान कर देते हैं। ऐसे ही हैं सीए भगवान झा।
जब उनका एक धन्यवादपत्र मुझे मिला तो उनकी अच्चाई और ईश्वर के प्रति श्रद्धा से मैं हैरान रह गई।
मुझे याद है जब 2013 में मैं उनसे मिली तो उन्हें कुछ तकलीफ में देखा वो अपनी गर्दन नहीं घुमा पा रहे थे। मगर उतनी तकलीफ में भी उनकी मुस्कान बहुत सहज थी। देखने से पता ही नहीं चल रहा था कि एक छोटे से एक्सीडेंट ने उनका जीवन ही बदल कर रख दिया था।
सीए बनने के कुछ ही दिनों के बाद की बात है सीए भगवान झा जी ऑटो से कहीं जा रहे थे। अचानक उनके ऑटो के सामने मोटरसाइकिल टकराई। कोई गम्भीर दुर्घटना नहीं थी किसी अन्य को चोट नहीं लगी, लेकिन जब ऑटो पलटा तब भगवान झा जी की गरदन की हड्डी टूट चुकी थी। किसी को एहसास नहीं था कि ये इतनी भयानक घटना है। उन्हे एम्स ले जाया गया जहां पहले उन्हे ट्रैक्शन दिया गया उसके लिये उनके सिर के पीछे से हैडफोन के आकार का एक यंत्र दो बड़े कीलों के माध्यम से कस दिया गया। करीब 2-2 इंच तक वो कील उनके माथे में धंसाये गये। बुरा ये हुआ कि इस प्रक्रिया को करने के लिये पहले डॉक्टर्स को पेशेंट सिर को सुन्न करना था लेकिन डॉ0 ने ये जाने बगैर कि शरीर का चोटिल भाग सुन्न है या नहीं कील कसने का काम शुरू कर दिया। मरीज के उस दर्द को चोट का दर्द समझ कर डॉ0 लापरवाही से अपना काम करते रहे।
तीन दिन बाद डॉक्टर्स को अपनी गलती का एहसास हुआ। इलाज के दौरान सिचुएशन आई कि जब उनके शरीर के बांये हिस्से को लकवा मारने लगा। इस स्थिति से बचने के लिये उनकी गरदन को लोहे की रोड से हमेशा के लिए स्ट्रेट जोड़ दिया गया। वो अपना सिर झुका नहीं सकते या गरदन को भी इधर उधर नहीं घुमा सकते लेकिन उनका हौसला देखिये हमेशा मुस्कुराते मिलते हैं। इतनी तकलीफ के बाद भी उन्होंने एक पत्र के माध्यम से ईश्वर डॉक्टर्स और मित्रों को धयन्यवाद दिया है। उनका ये पत्र शायद आपके लिये भी प्रेरणा का स्रोत बन सके इसलिये ये पत्र मैं ऐसे ही यहां पोस्ट कर रही हूं....

जीवन का पुनर्जन्म
ड़े हर्ष के साथ,मुझे,आज दिनाकं 02-सितम्बर-2014,मेरा जीवन कापुनर्जन्म का पहला जन्मदिन देखने और कुछ लिखने कासौभाग्य प्राप्त हो रहा है। यहसत्य है कि जो जीव-प्राणी जन्म लेते है। उनके जीवन की अंतिम यात्रा अवश्य होती है। यहभी कहाजाता है कि जीव-प्राणी को अपने कर्मो के अनुसार किसी न किसी रूप में पुनर्जन्म लेनापड़ता है। परन्तु पिछले साल (अगस्त2013) मेरे जीवन के साथ जो बीती उसने मेरा जीवन बदल दिया। ,लेकिनईश्वर की असीम कृपा से,भगवान रूपीचिकित्सकोकेअथक प्रयास और खासकर दोस्तों एव सगे सम्बंधियों के आशीर्वाद से,ईश्वर कीप्रार्थना,सहयोग एव अटूट साहस से आज मैअपने जीवनका पुनर्जन्म के पहले जन्मदिन पर यहछोटा सा धन्यवाद पत्र लिखने का शुभ अवसर प्राप्त कर रहा हूं।
एक जन्म तो माता –पिता  की कृपा से मिला लेकिन इसी जन्म का फिर से पुनर्जन्म आज ही के दिन दिनांक 2 सितम्बर 2013 में हुआ। यह जीवन ईश्वर, चिकित्सकों, दोस्तों, सगे सम्बन्धियों की आशीर्वाद से मिला। इसका ऋण मैं कभी चुकता नहीं कर सकता। बस मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि इन सभी को खुशी एवं स्वास्थ्य प्रदान करने की कृपा करें।
कहते हैं कि भगवान के कई रूप होते हैं, जिन्हे पहचानना बहुत कठिन है। यदि दु:ख-तकलीफ मिलती हैं तो ईश्वर किसी ना किसी रूप में किसी को भेजकर मदद कर देते हैं। इस दुर्घटना के बाद मेरा शरीर किसी काम का नहीं था। मगर इंसान रूपी भगवान ने मुझे आश्रय दिया, जिसके परिणामस्वरूप में खुद को एक सम्मानजनक स्थिति में देख पाता हूं। इन सभी को कोटी-कोटी धन्यवाद।

“इंडियाज़ डॉटर”: बलात्कार के मनोविज्ञान का झरोखा

नि:सन्देह भारत में ज्यादातर पुरूष बहुत उदार और सकारात्मक हैं, बेहतरीन साथी हैं, ईश्वरचन्द विद्यासागर भी इसी देश में हुए हैं। लेकिन निर्भया कांड पर एक विदेशी द्वारा बनाई गई डॉक्युमेंट्री ने एक नई बहस छेड दी है। ज्यादातर लोग इसे देख नहीं पाये हैं और वो इस पर अपनी राय नहीं बना पा रहे हैं। कुछ का मनना है कि यह फिल्म भारतीय पुरूषों की छवि खराब करती है, भारत को बलात्कार के गढ़ के रूप में स्थापित करती है, कुछ लोगो को लगता है कि मोदी के इस्तकबाल में झुकी दुनिया में भारत की छवि खराब करने के लिये ये डॉक्यूमेंट्री एक साधन के तौर पर प्रयुक्त हो रही है, तो, वही दिल्ली पुलिस का मानना है कि बलात्कारी की बाते लॉ एंड ऑर्डर के लिये खतरा हैं। इसी बात को आधार मानकर दिल्ली हाईकोर्ट नें इस पर बैन लगाया है। मैंने अपने अनुभव के आधार पर डॉक्यूमेंट्री को आप सब तक पहुंचाने की कोशिश की है, शायद आप को भी इसे देखने और सही गलत कहने का मौका मिले।
निर्भया कांड पर बनी और भारत सरकार द्वारा बैन बीबीसी4 की डॉक्यूमेंट्री ‘इंडियाज़ डॉटर” मैं अब तक कई बार देख चुकी हूं। बलात्कारी मुकेश का सीना तानकर जेल की सेल से बाहर चलते आना, रेप करने के पीछे दिये उसके तर्क, दूसरे बलात्कारी अक्षय का जेल के अन्दर भी पुलिस से तेवर में बात करना मन में आक्रोश पैदा करता है। मैंने जहां तक समझा, फिल्म के माध्यम से एक बलात्कारी के मनोविज्ञान में झांकने का मौका मिलता है। आरोपी मुकेश कह रहा है कि वो मौज मस्ती करने निकले थे, उन्हें जीबी रोड जाना था, जब निर्भया अपने पुरुष मित्र के साथ बस में चढ़ी तो उन्हे बहुत बुरा लगा कि देर रात कैसे एक लड़का लड़की साथ घूम रहे हैं।
मुकेश वारदात को बयान करने के जो तर्क दे रहा था उनसे हम सभी कहीं ना कहीं परिचित हैं, वारदात को बयान करने के उसके शब्दों में जरा भी पश्चाताप नहीं दिख रहा था। वो पहला जवाब देता है “ ताली कभी एक हाथ से नहीं बज सकती। कोई शरीफ लड़की होगी तो वो रात के 9 बजे बाहर नहीं घूमेगी। लडकियां रेप के लिये लड़को से ज्यादा जिम्मेदार हैं।“ वो कहता है “लड़कियो को बनाया गया है घर में रहने के लिये, वो घर मे रहें घर का कामकाज देंखे, लेकिन वो बाहर घूमती है, डिस्को जाती है, बार जाती हैं" हैं” उसकी नजर में 20 प्रतिशत लड़किया ही सही हैं, बाकी 80% (कपड़ो के आधार पर) गलत।
ये तो बिना पढ़े लिखे अभाव में जीने वाले 6 लोग थे जिन्होंने महिला को कभी भोग की वस्तु के अलावा कुछ महसूस ही नहीं किया। उनके बीच कॉलेज में साथ-साथ हंसते मुस्कुराते युवाओं के लिये अन्दाजो की बुनियाद पर खड़ी कहानियां प्रचलित हैं। मसलन लड़का लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते, ये लोग खुले आम मौज करते हैं, लड़किया जमकर शराब पीती हैं, वो किसी भी लड़के के साथ घूमने चली जाती हैं, वगैरह वगरैह।
बैन का समर्थन करने वालों का मानना है कि ये फिल्म बलात्कारी का महिमा मंडन करती है। ये सोच एकदम आधारहीन है। डॉक्युमेंट्री कुछ नाट्य रूपानतण और साक्षात्कार पर आधारित है जिसमें दोषियों, पीडिता के माता-पिता और उसका ट्यूटर अपनी बात कहते हैं। साक्षात्कारों को एक कड़ी की तरह जोड़ा गया है। जैसे ही रेपिस्ट के वकील एमएल शर्मा कहते हैं कि शरीफ लड़की रात को 6:30, 7:30 या 8:30 बजे के बाद घर से नहीं निकलती। एमएल शर्मा कहते हैं कि लड़की किसी अजनबी के साथ डेट पर थी, दोस्ती हमारे क्ल्चर का हिस्सा नहीं है। तब “निर्भया” के ट्यूटर और मित्र कहते हैं कि क्या अपने दोस्त के साथ बाहर जाना गुनाह है।
बचावपक्ष के दूसरे वकील एपी सिंह कहते हैं कि जरूरी हो तभी लड़की को रात में बाहर जाना चाहिये वो भी अपने रिश्तेदार के साथ, किसी ब्वॉयफ्रेंड के साथ नहीं। उसका जवाब पीडिता की मां के जवाब से मिलता है जब वो कहती है कि जब भी किसी लड़की के साथ बुरा होता है तो लोग लड़की को दोष देते हैं, वो क्यों नहीं बुरे काम के लिये लड़को को “गिल्टी” ठहराते।
मुझे लगता है कि भारतीय दर्शक खुद समझदार हैं कि इन बातों का उन्हें क्या अर्थ निकालना है। एक तरीके से बलात्कार के दोषी का साक्षात्कार उस पहलू से रूबरू कराता है जो एक सामान्य इंसान की सोच से काफी परे है।
ये पूछे जाने पर कि ये घटना क्यों हुई उसके जवाब में मुकेश कहता है कि कुछ साफ तो नहीं पर ये घटना एक सबक के रूप में हुई। मेरे भाई ने पहली भी ऐसा किया पर उस वक्त उसका विचार रेप करने का नहीं था। उसे लगा उसे समझाने का हक है कि इतनी रात को लड़की लेकर कहां घूम रहा है। उन्हें बुरा लगा कि एक लड़का इतनी रात को कैसे एक लड़की के साथ घूम रहा है। वो उनके कपड़े उतार कर उन्हें सबक सिखाना चाहते थे ताकि वो दोनो इतने शर्मिन्दा हो जाये कि किसी से कुछ कह ना सकें। लेकिन पीडिता के विरोध ने उन्हें उकसा दिया। मुकेश कहता है कि उसे शांति से रेप करवा लेना चाहिये था। अगर वो हाथ पांव नहीं चलाती तो बच जाती।
मुकेश कहता है कि उसने केवल गाड़ी चलाई रेप नही किया। लड़की को पीटने के बाद पहला रेप नाबालिग और दूसरा उसके भाई रामसिंह ने किया, उसके बाद अक्षय फिर बाकी दो। लड़के के जूते पवन ने और जैकेट अक्षय ने पहने लिये, रिपोर्टर ने पूछा उन्हे डर नहीं था मुकेश कहता है हां उन्हें डर नहीं था। फिर उन्होंने आपस में तय किया कोई इस घटना का बाहर जिक्र नहीं करेगा। उसने पूछा उनके कपड़े कहां हैं नाबालिग ने जवाब दिया मेरे हाथ में कुछ लम्बा-लम्बा आया था मैंने उसे उनके कपड़ॆ में लपेट कर फेंक दिया। फिर सभी अपने घर जाकर सो गये। जो पूरी घटना हम दो साल पहले ग्राफिक्स के जरिये देख चुके हैं उसे दोषी के मुंह से सुनकर रोंगटे खड़ॆ हो जाते हैं,
क्या कोई ये अन्दाजा लगा सकता है कि हमारे बीच इस तरह के पशु भी घूम रहे हैं जो दिनभर इतने भयानक विचार लेकर घूमते हैं और मौका मिलने पर लोगो को नैतिकता का सबक सिखाना चाहते हैं। बलात्कार के पीछे उनका मानना है कि वो पीडिता गलत है।
ये फिल्म समाज को बताती है कि रेपिस्ट की मनसिकता क्या हो सकती है, जो आमतौर पर एक छुपा पहलू है। ये फिल्म बिना किसी नैरेशन के बताती है कि फांसी की सजा पाने के बाद भी वो जघन्य हत्या को “गलत काम” कहता है, उसे पश्चाताप नहीं है, ये फिल्म बताती है कि इनके चरित्र क्या रहे थे, लड़कियों के पीछे जाना, बसों में उनके साथ सीट पर बैठ जाना छेड़खानी करना, मारपीट करना उनका शगल थी। राम सिंह तो पहले भी बलात्कार कर चुका था और बेखौफ घूम रहा था।
ये फिल्म दरअसल हमारे खुफिया तंत्र को भी आइना दिखाती है, जिस पर गृह मंत्रालय को कहना पड़ता है कि ये जांच का विषय है कि एक फांसी के सजा पाये अपराधी का जेल के भीतर तीन दिन में 16 घंटे का साक्षात्कार कैसे सम्भव हुआ, क्यों किसी को कानोकान भनक नहीं लगी।
हाल ही में मैंने पढ़ा कि निर्भया का मित्र और वारदात के इकलौते गवाह और पीड़ित ने कहा है कि ये डॉक्यूमेंट्री अर्धसत्य है क्योंकि उसमें उसका कोई साक्षात्कार नहीं दिखाया गया है, बात सत्य भी है इस डॉक्यूमेंट्री की निर्माता लेस्ली उडविन को अवनिन्दर यानि निर्भया के दोस्त को नजर अन्दाज करना समझ से परे है जो “इंडियाज़ डॉटर” के प्रसारण की “टाइमिंग”  पर सवाल उठाता है।