Friday, 3 April 2015

क़्या “मैं आजाद हूं”

1994 वे में एक फिल्म देखी थी “मैं आजाद हूं”। अमिताभ बच्चन के नाम से सारे बच्चे जमा हो गये लेकिन उसकी थीम देखकर जल्दी ही सब एक एक कर के सो गये। एक मैं ही अकेली थी जिसने वो मूवी पूरी देखी। उसका एक गाना था जो मेरे मन मस्तिष्क पर छप सा गया। आज भी उसकी हर लाइन ताजा है। तब मैं नहीं जानती थी कि मैं भी एक जर्नलिस्ट बनूंगी। जब भी मौका मिलता है मैं वो फिल्म जरूर देख लेती हूं। फिल्म में सुभाषिनी का किरदार निभा रही शबाना आज़मी बताती है कि कैसे आजाद हिन्द फौज में रहे उसके पिता जी आजादी के बाद के भारत की बाते करते थे... आने वाला भारत ऐसा होगा वैसा होगा... ना भूख ना भ्रष्टाचार, ना बेबसी ना बेकारी.... कैसे लोग थे वो जो ये सपने देखा करते थे।
23 साल की उम्र में शहीदे आज़म बनने वाले भगत सिंह ने तो आज की भयावह स्थिति की उसी वक्त कल्पना कर ली थी। उन्होंने बहुत कुछ लिखा था कि अगर देश को सही दिशा नहीं मिली तो एक दिन असमानता, दोहन, भूख भ्रष्टाचार भारत को जकड़ लेंगे...। अंग्रेजो ने उनकी लिखे कई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ो को जेल में ही राख कर दिया था।
आज शहर में एक नाली भी बनती है तो उसकी नींव में भ्रष्टाचार की ईंट लगी होती है। इसलिये उसका ढांचा रसूख वालो की सहूलियत के हिसाब से बनता है। तभी तो मुम्बई हर साल मानसून आते ही थर्राने लगती है। नहीं तो क्या इस देश में इतने बेकार इंजीनियर ही पैदा होते हैं जो अन्दाजा ना लगा सके कि पानी को कौन सी दिशा देनी है। अगर देश में शहीदों के देखे एक भी सपने साकार करने का संकल्प लिया होता तो देश का ये हाल ना होता।
देश को चलाने की जिम्मेदारी सबसे पहले नेताओं की थी। उन्हे ही शहीदों के सपने साकार करने थे लेकिन उनके निजी स्वार्थों ने ऐसा आकार लिया कि वो सपने ना जाने कहां खो गये। हम आजादी के बाद की दूसरे ही पीढ़ी हैं लेकिन हम ही ने शहीदों को ऐसे बिसरा दिया है.. जैसे देश कभी गुलाम ही नहीं था और उसके लिये कभी किसी ने कुर्बानी दी ही नहीं थी।

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