Friday, 3 April 2015

“इंडियाज़ डॉटर”: बलात्कार के मनोविज्ञान का झरोखा

नि:सन्देह भारत में ज्यादातर पुरूष बहुत उदार और सकारात्मक हैं, बेहतरीन साथी हैं, ईश्वरचन्द विद्यासागर भी इसी देश में हुए हैं। लेकिन निर्भया कांड पर एक विदेशी द्वारा बनाई गई डॉक्युमेंट्री ने एक नई बहस छेड दी है। ज्यादातर लोग इसे देख नहीं पाये हैं और वो इस पर अपनी राय नहीं बना पा रहे हैं। कुछ का मनना है कि यह फिल्म भारतीय पुरूषों की छवि खराब करती है, भारत को बलात्कार के गढ़ के रूप में स्थापित करती है, कुछ लोगो को लगता है कि मोदी के इस्तकबाल में झुकी दुनिया में भारत की छवि खराब करने के लिये ये डॉक्यूमेंट्री एक साधन के तौर पर प्रयुक्त हो रही है, तो, वही दिल्ली पुलिस का मानना है कि बलात्कारी की बाते लॉ एंड ऑर्डर के लिये खतरा हैं। इसी बात को आधार मानकर दिल्ली हाईकोर्ट नें इस पर बैन लगाया है। मैंने अपने अनुभव के आधार पर डॉक्यूमेंट्री को आप सब तक पहुंचाने की कोशिश की है, शायद आप को भी इसे देखने और सही गलत कहने का मौका मिले।
निर्भया कांड पर बनी और भारत सरकार द्वारा बैन बीबीसी4 की डॉक्यूमेंट्री ‘इंडियाज़ डॉटर” मैं अब तक कई बार देख चुकी हूं। बलात्कारी मुकेश का सीना तानकर जेल की सेल से बाहर चलते आना, रेप करने के पीछे दिये उसके तर्क, दूसरे बलात्कारी अक्षय का जेल के अन्दर भी पुलिस से तेवर में बात करना मन में आक्रोश पैदा करता है। मैंने जहां तक समझा, फिल्म के माध्यम से एक बलात्कारी के मनोविज्ञान में झांकने का मौका मिलता है। आरोपी मुकेश कह रहा है कि वो मौज मस्ती करने निकले थे, उन्हें जीबी रोड जाना था, जब निर्भया अपने पुरुष मित्र के साथ बस में चढ़ी तो उन्हे बहुत बुरा लगा कि देर रात कैसे एक लड़का लड़की साथ घूम रहे हैं।
मुकेश वारदात को बयान करने के जो तर्क दे रहा था उनसे हम सभी कहीं ना कहीं परिचित हैं, वारदात को बयान करने के उसके शब्दों में जरा भी पश्चाताप नहीं दिख रहा था। वो पहला जवाब देता है “ ताली कभी एक हाथ से नहीं बज सकती। कोई शरीफ लड़की होगी तो वो रात के 9 बजे बाहर नहीं घूमेगी। लडकियां रेप के लिये लड़को से ज्यादा जिम्मेदार हैं।“ वो कहता है “लड़कियो को बनाया गया है घर में रहने के लिये, वो घर मे रहें घर का कामकाज देंखे, लेकिन वो बाहर घूमती है, डिस्को जाती है, बार जाती हैं" हैं” उसकी नजर में 20 प्रतिशत लड़किया ही सही हैं, बाकी 80% (कपड़ो के आधार पर) गलत।
ये तो बिना पढ़े लिखे अभाव में जीने वाले 6 लोग थे जिन्होंने महिला को कभी भोग की वस्तु के अलावा कुछ महसूस ही नहीं किया। उनके बीच कॉलेज में साथ-साथ हंसते मुस्कुराते युवाओं के लिये अन्दाजो की बुनियाद पर खड़ी कहानियां प्रचलित हैं। मसलन लड़का लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते, ये लोग खुले आम मौज करते हैं, लड़किया जमकर शराब पीती हैं, वो किसी भी लड़के के साथ घूमने चली जाती हैं, वगैरह वगरैह।
बैन का समर्थन करने वालों का मानना है कि ये फिल्म बलात्कारी का महिमा मंडन करती है। ये सोच एकदम आधारहीन है। डॉक्युमेंट्री कुछ नाट्य रूपानतण और साक्षात्कार पर आधारित है जिसमें दोषियों, पीडिता के माता-पिता और उसका ट्यूटर अपनी बात कहते हैं। साक्षात्कारों को एक कड़ी की तरह जोड़ा गया है। जैसे ही रेपिस्ट के वकील एमएल शर्मा कहते हैं कि शरीफ लड़की रात को 6:30, 7:30 या 8:30 बजे के बाद घर से नहीं निकलती। एमएल शर्मा कहते हैं कि लड़की किसी अजनबी के साथ डेट पर थी, दोस्ती हमारे क्ल्चर का हिस्सा नहीं है। तब “निर्भया” के ट्यूटर और मित्र कहते हैं कि क्या अपने दोस्त के साथ बाहर जाना गुनाह है।
बचावपक्ष के दूसरे वकील एपी सिंह कहते हैं कि जरूरी हो तभी लड़की को रात में बाहर जाना चाहिये वो भी अपने रिश्तेदार के साथ, किसी ब्वॉयफ्रेंड के साथ नहीं। उसका जवाब पीडिता की मां के जवाब से मिलता है जब वो कहती है कि जब भी किसी लड़की के साथ बुरा होता है तो लोग लड़की को दोष देते हैं, वो क्यों नहीं बुरे काम के लिये लड़को को “गिल्टी” ठहराते।
मुझे लगता है कि भारतीय दर्शक खुद समझदार हैं कि इन बातों का उन्हें क्या अर्थ निकालना है। एक तरीके से बलात्कार के दोषी का साक्षात्कार उस पहलू से रूबरू कराता है जो एक सामान्य इंसान की सोच से काफी परे है।
ये पूछे जाने पर कि ये घटना क्यों हुई उसके जवाब में मुकेश कहता है कि कुछ साफ तो नहीं पर ये घटना एक सबक के रूप में हुई। मेरे भाई ने पहली भी ऐसा किया पर उस वक्त उसका विचार रेप करने का नहीं था। उसे लगा उसे समझाने का हक है कि इतनी रात को लड़की लेकर कहां घूम रहा है। उन्हें बुरा लगा कि एक लड़का इतनी रात को कैसे एक लड़की के साथ घूम रहा है। वो उनके कपड़े उतार कर उन्हें सबक सिखाना चाहते थे ताकि वो दोनो इतने शर्मिन्दा हो जाये कि किसी से कुछ कह ना सकें। लेकिन पीडिता के विरोध ने उन्हें उकसा दिया। मुकेश कहता है कि उसे शांति से रेप करवा लेना चाहिये था। अगर वो हाथ पांव नहीं चलाती तो बच जाती।
मुकेश कहता है कि उसने केवल गाड़ी चलाई रेप नही किया। लड़की को पीटने के बाद पहला रेप नाबालिग और दूसरा उसके भाई रामसिंह ने किया, उसके बाद अक्षय फिर बाकी दो। लड़के के जूते पवन ने और जैकेट अक्षय ने पहने लिये, रिपोर्टर ने पूछा उन्हे डर नहीं था मुकेश कहता है हां उन्हें डर नहीं था। फिर उन्होंने आपस में तय किया कोई इस घटना का बाहर जिक्र नहीं करेगा। उसने पूछा उनके कपड़े कहां हैं नाबालिग ने जवाब दिया मेरे हाथ में कुछ लम्बा-लम्बा आया था मैंने उसे उनके कपड़ॆ में लपेट कर फेंक दिया। फिर सभी अपने घर जाकर सो गये। जो पूरी घटना हम दो साल पहले ग्राफिक्स के जरिये देख चुके हैं उसे दोषी के मुंह से सुनकर रोंगटे खड़ॆ हो जाते हैं,
क्या कोई ये अन्दाजा लगा सकता है कि हमारे बीच इस तरह के पशु भी घूम रहे हैं जो दिनभर इतने भयानक विचार लेकर घूमते हैं और मौका मिलने पर लोगो को नैतिकता का सबक सिखाना चाहते हैं। बलात्कार के पीछे उनका मानना है कि वो पीडिता गलत है।
ये फिल्म समाज को बताती है कि रेपिस्ट की मनसिकता क्या हो सकती है, जो आमतौर पर एक छुपा पहलू है। ये फिल्म बिना किसी नैरेशन के बताती है कि फांसी की सजा पाने के बाद भी वो जघन्य हत्या को “गलत काम” कहता है, उसे पश्चाताप नहीं है, ये फिल्म बताती है कि इनके चरित्र क्या रहे थे, लड़कियों के पीछे जाना, बसों में उनके साथ सीट पर बैठ जाना छेड़खानी करना, मारपीट करना उनका शगल थी। राम सिंह तो पहले भी बलात्कार कर चुका था और बेखौफ घूम रहा था।
ये फिल्म दरअसल हमारे खुफिया तंत्र को भी आइना दिखाती है, जिस पर गृह मंत्रालय को कहना पड़ता है कि ये जांच का विषय है कि एक फांसी के सजा पाये अपराधी का जेल के भीतर तीन दिन में 16 घंटे का साक्षात्कार कैसे सम्भव हुआ, क्यों किसी को कानोकान भनक नहीं लगी।
हाल ही में मैंने पढ़ा कि निर्भया का मित्र और वारदात के इकलौते गवाह और पीड़ित ने कहा है कि ये डॉक्यूमेंट्री अर्धसत्य है क्योंकि उसमें उसका कोई साक्षात्कार नहीं दिखाया गया है, बात सत्य भी है इस डॉक्यूमेंट्री की निर्माता लेस्ली उडविन को अवनिन्दर यानि निर्भया के दोस्त को नजर अन्दाज करना समझ से परे है जो “इंडियाज़ डॉटर” के प्रसारण की “टाइमिंग”  पर सवाल उठाता है।

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