मेरठ प्राचीन ऐतिहासिक नगर है। मेरठ जनपद के अनेक मेले और उत्सव दूर-दूर तक विख्यात रहे है। ज्येष्ठ मास की दशमी को मवाना तहसील से ८ किलोमीटर दूर श्मखदूमपुर गंगा मेला्य, श्रावण मास की दशमी को परीक्षितगढ में छडियों का मेला, अक्टूबर-नवम्बर में हस्तिनापुर में जैन मेला अपना विशिष्टड्ढ महत्व रखते है। किन्तु सबसे प्रसिद्ध है मेरठ शहर का नौचन्दी का मेला
विभिन्नता में एकता, इस मेले की विशेषता
मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारे-चर्च, मेरठ की पहचान है।
मंदिरो के भजन, मस्जिदों की अजान
रूह की रोशनी के ये सब सामान है।
कोई मजहब किसी को लड़ाता नहीं,
फिर भी लड़ता है जो वो नादान है।।
व्यक्ति जन्म लेता है, बड़ा होता है। जिस माहौल में और जैसी परवरिश होती है वैसा कर्म करता है। पाप कर्म से रोकने के लिये मजहब बने है जो सभी को इंसानियत के मार्ग पर चलने की शिक्षा देते रहे है। दो वर्ष पूर्व पटेल मंडप के बराबर में श्एकता द्वार्य बनाया गया इसका प्रतीक है नौचन्दी मेले का पटेल मंडप सांस्कृतिक यादों को समेटे हुए है। कभी अन्र्तराष्टड्ढ्रीय स्तर के ख्याति प्राप्त कवि, शायर और कलाकार इसके रंगमंच पर अपनी प्रतिभा दिखाते थे। वर्ष १९८२ में इंडो-पाक मुशायरा नजीर बन गया है जिसमें पाकिस्तान के ख्याति प्राप्त शायर कतील शिफाई, नाबीना शायर (नेत्रहीन) इकबाल अजीम के साथ ही हिन्दुस्तान के शायर कुंवर महेन्द्र सिंह बेदी श्सहर्य और वसीम बरेलवी जैसे शायरो ने शिरकत की थी। नौचन्दी मेले का इतिहास ८०० साल से भी पुराना है। यहां का प्राचीन चण्डी मंदिर और बालेमियां का मजार आमने-सामने है। मंदिर में घंटे बंजते है, भंडारा होता है। मजार पर सूफी कलाम कव्वाली के स्वर गूंजते है तथा लंगर होता है। साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम करता यह मेला दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।
जिला पंचायत अध्यक्ष एवं मेला अधिकारी चै0 मनिन्दर पाल सिंह का कहना है कि यद्यपि मेले का उद्घाटन पिछले माह कर दिया गया किन्तु बुलन्दशहर में नुमाइश चलने के कारण यह मेला १० अप्रैल के बाद ही भरेगा। इस बार मेले का प्रंबध जिला पंचायत के अधीन है अतरू हमने मेले में आने वालो के लिये अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ क्षेत्रीय लोकगीत रागिनी आदि के कार्यक्रमों का आयोजन विशेष रूप से रखा है ताकि ग्रामीण जनता अधिक से अधिक मेले में आये और मेले का लुत्फ उठाये। मेले में मनोरंजन के सभी साधन मुहैया कराने के साथ कृषि व सरकारी योजनाओं की प्रदर्शनी लगाने का प्रयास किया जा रहा है।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है। समय के साथ मेले का स्वरूप भी बदला। दो दशक पहले तक मेला नौचन्दी के दौरान शहर के सिनेमाघर पूरी रात शो चलाया करते थे। मवाना, सरधना, परीक्षतगढ, किठौर आदि क्षेत्र के ग्रामीण कस्बों से आते लोग पूरी रात नौटंकी सिनेमा (बायस्कोप) देखते सुबह घर लौटते। पटेल मंडप में कव्वाली का मुकाबला पूरी रात चलता जिसमें मुम्बई, हैदराबाद, कानपुर, दिल्ली से कलाकार भाग लेते। एक बार मजीद शोला और चंचल भारती का कव्वाली मुकाबला हुआ जिसे देखने सुनने आसपास के जनपर्दा से भीड़ उमड़ी। फिल्म स्टार नाईट में भी अपार भीड़ उमड़ती थी। रंगमंच पर सिनेमा, लोकगीतो के साथ गजल गायक, कैबरे डांसर भी यहां आते रहे है। लेकिन आज सब ये गायब है।
शहर के कुछ प्रबुद्ध नागरिको का कथन है कि पूरे वर्ष पटेल मंडप बंद पड़ा रहता है। इसका उपयोग सामाजिक कार्यक्रमों, मैरिज होम, मिटिंग हॉल के लिये किया जा सकता है तथा नौचन्दी मैदान का उपयोग यहां लगने वाले साप्ताहिक बाजार (पैंठ) के लिये हो सकता है जो कि आय का स्त्रोत बन सकता है।
विभिन्नता में एकता, इस मेले की विशेषता
मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारे-चर्च, मेरठ की पहचान है।
मंदिरो के भजन, मस्जिदों की अजान
रूह की रोशनी के ये सब सामान है।
कोई मजहब किसी को लड़ाता नहीं,
फिर भी लड़ता है जो वो नादान है।।
व्यक्ति जन्म लेता है, बड़ा होता है। जिस माहौल में और जैसी परवरिश होती है वैसा कर्म करता है। पाप कर्म से रोकने के लिये मजहब बने है जो सभी को इंसानियत के मार्ग पर चलने की शिक्षा देते रहे है। दो वर्ष पूर्व पटेल मंडप के बराबर में श्एकता द्वार्य बनाया गया इसका प्रतीक है नौचन्दी मेले का पटेल मंडप सांस्कृतिक यादों को समेटे हुए है। कभी अन्र्तराष्टड्ढ्रीय स्तर के ख्याति प्राप्त कवि, शायर और कलाकार इसके रंगमंच पर अपनी प्रतिभा दिखाते थे। वर्ष १९८२ में इंडो-पाक मुशायरा नजीर बन गया है जिसमें पाकिस्तान के ख्याति प्राप्त शायर कतील शिफाई, नाबीना शायर (नेत्रहीन) इकबाल अजीम के साथ ही हिन्दुस्तान के शायर कुंवर महेन्द्र सिंह बेदी श्सहर्य और वसीम बरेलवी जैसे शायरो ने शिरकत की थी। नौचन्दी मेले का इतिहास ८०० साल से भी पुराना है। यहां का प्राचीन चण्डी मंदिर और बालेमियां का मजार आमने-सामने है। मंदिर में घंटे बंजते है, भंडारा होता है। मजार पर सूफी कलाम कव्वाली के स्वर गूंजते है तथा लंगर होता है। साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम करता यह मेला दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।
जिला पंचायत अध्यक्ष एवं मेला अधिकारी चै0 मनिन्दर पाल सिंह का कहना है कि यद्यपि मेले का उद्घाटन पिछले माह कर दिया गया किन्तु बुलन्दशहर में नुमाइश चलने के कारण यह मेला १० अप्रैल के बाद ही भरेगा। इस बार मेले का प्रंबध जिला पंचायत के अधीन है अतरू हमने मेले में आने वालो के लिये अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ क्षेत्रीय लोकगीत रागिनी आदि के कार्यक्रमों का आयोजन विशेष रूप से रखा है ताकि ग्रामीण जनता अधिक से अधिक मेले में आये और मेले का लुत्फ उठाये। मेले में मनोरंजन के सभी साधन मुहैया कराने के साथ कृषि व सरकारी योजनाओं की प्रदर्शनी लगाने का प्रयास किया जा रहा है।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है। समय के साथ मेले का स्वरूप भी बदला। दो दशक पहले तक मेला नौचन्दी के दौरान शहर के सिनेमाघर पूरी रात शो चलाया करते थे। मवाना, सरधना, परीक्षतगढ, किठौर आदि क्षेत्र के ग्रामीण कस्बों से आते लोग पूरी रात नौटंकी सिनेमा (बायस्कोप) देखते सुबह घर लौटते। पटेल मंडप में कव्वाली का मुकाबला पूरी रात चलता जिसमें मुम्बई, हैदराबाद, कानपुर, दिल्ली से कलाकार भाग लेते। एक बार मजीद शोला और चंचल भारती का कव्वाली मुकाबला हुआ जिसे देखने सुनने आसपास के जनपर्दा से भीड़ उमड़ी। फिल्म स्टार नाईट में भी अपार भीड़ उमड़ती थी। रंगमंच पर सिनेमा, लोकगीतो के साथ गजल गायक, कैबरे डांसर भी यहां आते रहे है। लेकिन आज सब ये गायब है।
शहर के कुछ प्रबुद्ध नागरिको का कथन है कि पूरे वर्ष पटेल मंडप बंद पड़ा रहता है। इसका उपयोग सामाजिक कार्यक्रमों, मैरिज होम, मिटिंग हॉल के लिये किया जा सकता है तथा नौचन्दी मैदान का उपयोग यहां लगने वाले साप्ताहिक बाजार (पैंठ) के लिये हो सकता है जो कि आय का स्त्रोत बन सकता है।
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